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6 अक्टूबर 2022 को कुआलालंपुर, मलेशिया में

1 Jan 2000|हिन्दी|प्रश्नोत्तर सत्र|Transcription|Kuala Lumpur, Malaysia

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी: मैं अब कुछ प्रश्नों के उत्तर दूंगा।

प्रश्न: गुरु महाराज क्या आप बका-व्रत तथा वेदाल-व्रत के विषय में अधिक जानकारी प्रदान कर सकते हैं ?

जयपताका स्वामी: बका अर्थात्  बत्तख सदैव नीचे की ओर देखती हैं, एवं क्वैक, क्वैक करते हुए कहती है “मैं अत्यंत विनम्र हूँ , मैं सबसे अधिक विनम्र हूँ । समस्त संसार में मुझ जैसा विनम्र अन्य कोई नहीं है”। कुछ लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा प्राप्ति हेतु ऐसी प्रवृति का अनुकरण करना बका-व्रत है । तथा बिल्ली-व्रत (वईदला व्रत), कुछ कठिन है। ऐसा व्यक्ति चाहता है कि लोग किसी भी क़ीमत पर उसका सम्मान करें।

प्रश्न: हम गृहस्थ जीवन में हम कृष्ण भावनाभावित संतान किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं ?

जयपताका स्वामी: मैं श्रीमद्-भागवतम् के छठे स्कंध में राजा चित्रकेतु के विषय में पठन कर रहा था। वे समस्त संसार के सम्राट थे तथा उनकी अनेक पत्नियाँ थीं, परंतु वे सभी निःसंतान थीं। कोई संतान ना होने के कारण राजा सदैव उदास रहते थे । यद्यपि एक राजा को उत्तराधिकारी के रूप में पुत्र, संतान की आवश्यकता होती है। गृहस्थ के लिए यह सामान्य बात है कि उनकी संतान श्राद्ध आदि संस्कार करती है, जो माता-पिता को नरक जाने से रक्षा करती है। अंगीरा मुनि के आशीर्वाद से राजा चित्रकेतु को एक संतान की प्राप्ति हुई। तथा अंगीरा मुनि ने उनसे कहा कि “यह पुत्र आपके सुख एवं दुःख दोनों का कारण होगा ”। पुत्र के उत्पन्न होने पर राजा अत्यंत प्रफुल्लित हुए तथा उन्होंने बहुत सा सोना एवं गायें दान दीं। अति उत्तम! एक किलो सोने के लिए कितने रिंगगिट? एक औंस लगभग 1800 डॉलर है अर्थात् 8 मिलियन रिंगिट। और राजा चित्रकेतु किलो-किलो सोना दान कर रहे थे । वे अत्यंत प्रसन्न थे क्योंकि अब उनका एक पुत्र था। अपनी रानी को पुत्र देने के लिए उन्होंने बहुत स्नेह दिया। परंतु इससे उनकी अन्य रानियां अत्यधिक ईर्ष्यालु हो गईं। उन्होंने सोचा “इस पुत्र के कारण हमें अब राजा का स्नेह प्राप्त नहीं हो रहा है ”। अतः उन्होंने उस शिशु को विष देकर मार डाला। इससे राजा शोकग्रस्त हो गए । तब अंगीरा मुनि तथा नारद मुनि आए एवं उन्होंने राजा से वार्तालाप की। उन्होंने राजा को ज्ञान दिया कि किस प्रकार यह भौतिक संसार एक स्वप्न के समान है । यहाँ हमारे विभिन्न सम्बंध हो सकते हैं जैसे पत्नी, संतान , देश, इत्यादि परंतु जब जीवन का अंत होता है तो सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह वास्तव में एक स्वप्न के समान है जिसे आप अनुभव करते हैं परंतु जब आप जागृत होते हैं तो आप इन सबको पीछे छोड़ देते हैं। गृहस्थों को कृष्णभावनाभावित संतान प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिए । श्रील प्रभुपाद ने कहा कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर एक गृहस्थ थे। उन्हें श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर जैसी संतान की प्राप्ति हुई । श्रील प्रभुपाद का कहना था कि हमें ऐसे अनेक  संतानों की आवश्यकता है । उनकी इच्छा थी कि उनके सभी गृहस्थ भक्त परमहंस बनें तथा उनकी संताने कृष्ण-भक्त हों। हमें कृष्ण भावनाभावित, दीर्घायु तथा स्वस्थ सुपुत्रों के लिए विग्रहों से प्रार्थना करनी चाहिए । केवल संतान की उत्पत्ति हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। कृष्णभावनाभावित , स्वस्थ , दीर्घजीवी सुपुत्र की इच्छा करना उत्तम विकल्प है । कुछ एकादशी भी होती है जिसे पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। उस एकादशी का पालन करने से, रात भर जगकर निर्जला करने से, संतान की प्राप्ति होती है ।

प्रश्न: क्या भक्त अंगदान या रक्तदान कर सकते हैं? क्या वे इसे अभक्तो से अंग-प्रत्यंंग प्राप्त कर सकते हैं?

जयपताका स्वामी: अवश्य , क्यों नहीं? श्रीमद्-भागवतम् में एक ब्राह्मण थे, उन्हें उनकी हड्डियाँ दान देने के लिए कहा गया था। यदि आप अपनी समस्त हड्डियों का दान कर दें  , तो आप मृत्यु को प्राप्त होगे परंतु उन्होंने अपनी हड्डियां दान कीं। सामान्यतः लोग अपनी वसीयत में लिखते हैं कि “जब मेरी मृत्यु होगी तो मैं अपने अंग दान कर दूंगा”। मैं डायलिसिस पर था। मुझे लीवर सिरोसिस हो गया था। किसी कार दुर्घटना में एक दंपती की मृत्यु हो गई। मेरे  शरीर में उनमें से एक से मिली लीवर तथा किडनी प्रत्यापित हैं, मैं नहीं जानता, उनमें से किससे । हम मानते हैं कि हम आत्मा हैं, हम यह शरीर नहीं हैं। एक बार जब आत्मा शरीर का त्याग कर देती है तो शरीर मृत हो जाता है। तत्पश्चात् यदि यह शरीर किसी के काम आ सकता है तो क्यों नहीं? सभी को कोटि कोटि धन्यवाद! कल मिलते हैं!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by हिन्दी अनुवाद यशी मिरचंदानी द्वारा
Verifyed by सत्यापित प्रीतिवर्धिनी तुलसी देवीदासी द्वारा
Reviewed by समीक्षित भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा

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