मुकं करोती वाचालम पंगुं लंघयते गिरीम
यत-कृपा तम अहम् वन्दे श्री-गुरुम दीन- तारणम
परमानंद: माधव: श्री चैतन्य ईश्वरम॥
हरि ओम तत सत ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद-भागवतम १.१०.४
कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुधा मही ।
सिषिचुः स्म व्रजान् गावः पयसोधस्वतीर्मुदा ॥
महाराज युधिष्ठिर के राज्य में मनुष्यों को जितना भी पानी चाहिए था, बादल उतना पानी बरसाते थे और पृथ्वी मनुष्यों की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति पर्याप्त मात्रा में करती थी। दूध से भरे थनों वाली तथा प्रसन्न चित्त गौवें अपने दूध से चरागाही को सिक्त करती रहती थीं।
तात्पर्य : आर्थिक विकास का मूल सिद्धान्त भूमि तथा गायों पर केन्द्रित है। अन्न, फल, दूध, खनिज, वस्त्र, ईंधन इत्यादि मानव समाज की आवश्यकताएँ हैं। शरीर की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य को इन्हीं वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। निश्चित ही मनुष्य को मांस और मछली या लोहे के औजार तथा यंत्र नहीं चाहिए। महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल में सारे संसार में नियमित वर्षा होती थी। वर्षा मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होती। स्वर्ग का राजा इन्द्रदेव वर्षा का अधिष्ठाता है और वह भगवान् का सेवक है। जब राजा तथा राजा के अधीन लोग भगवान् की आज्ञा का पालन करते हैं, तो आकाश से नियमित वर्षा होती है और यही वर्षा पृथ्वी पर विविध प्रकार की उपजों को निमित्त स्वरूप है। नियमित वर्षा से न केवल प्रचुर धान्य तथा फल उत्पन्न होते हैं, अपितु जब नक्षत्रों के साथ वर्षा का संयोग बैठता है, तो बहुमूल्य रत्न तथा मोती बहुतायत से उत्पन्न होते हैं। अनाज तथा शाकों से मनुष्यों तथा पशुओं का भरण-पोषण होता है और मोटी ताजी गाएँ भरपूर दूध देती हैं, जिससे मनुष्य को बल तथा जीवनी शक्ति मिलती है। यदि प्रचुर मात्रा में दुग्ध, अन्न, फल, कपास, रेशम तथा रत्न हों तो फिर लोगों को सिनेमा, वेश्यालयों, कसाईघरों इत्यादि की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? सिनेमा, कार, रेडियो, मांस तथा होटलों के कृत्रिम विलासमय जीवन को क्या आवश्यकता है? क्या इस सभ्यताने एक दूसरे से व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर लड़ते रहने के अतिरिक्त और कुछ भी दिया है ? क्या इस सभ्यता ने एक व्यक्ति की सनक पर हजारों व्यक्तियों को नारकीय फैक्टरियों में तथा युद्धस्थलों में भेजकर समानता तथा विश्व बन्धुत्व को बढ़ावा दिया है यहाँ पर कहा गया है कि गौवें अपने दुग्ध से चरागाहों को सिक्त करती थीं, क्योंकि उनके थन दूध से भरे रहते थे, और वे अत्यन्त प्रमुदित रहती थीं तो फिर क्या उन्हें खेतों में पर्याप्त मात्रा में घास खिलाकर, प्रसन्न जीवन बिताने के लिए समुचित संरक्षण की आवश्यकता नहीं है? तो लोगों को अपने स्वार्थ के लिए उनका वध क्यों करना चाहिए? मनुष्य अन्न, फल, दूध से क्यों नहीं सन्तुष्ट हो लेता, जिनसे हजारों प्रकार के व्यंजन तैयार हो सकते हैं? इन निर्दोष पशुओं का वध करने के लिए सारे विश्व में कसाईघर क्यों हैं?
महाराज युधिष्ठिर के पौत्र महाराज परीक्षित ने अपने विशाल राज्य का दौरा करते हुए देखा कि एक काला व्यक्ति गाय का वध करने का प्रयास कर रहा है। राजा ने तुरन्त उस कसाई को गिरफ्तार करके उसे पर्याप्त मात्रा में दण्डित किया। क्या राजा या शासनाध्यक्ष को इन बेचारे पशुओं की रक्षा नहीं करनी चाहिए, जो अपनी रक्षा स्वयं करने में अक्षम हैं? क्या यह मानवता है? क्या देश के पशु देशवासी नहीं हैं? तो फिर संगठित कसाईघरों में वे उनके वध किये जाने की अनुमति क्यों देते हैं? क्या ये समानता, बन्धुत्व तथा अहिंसा के लक्षण हैं?
अतएव आधुनिक, प्रगतिशील सभ्य स्वरूप की सरकार के विपरीत, महाराज युधिष्ठिर का जैसा राजतन्त्र तथाकथित प्रजातंत्र से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, जिसमें पशुओं का वध किया जाता है। और पशु से भी गिरे हुए मनुष्य से, पशु से भी निम्न कोटि के दूसरे मनुष्य के लिए मतदान कराया जाता है।
हम सभी भौतिक प्रकृति के प्राणी हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि भगवान् स्वयं बीजदाता पिता हैं और प्रकृति सभी आकार प्रकार के जीवों की माता है। इस तरह माता प्रकृति के पास, परम पिता श्रीकृष्ण की कृपा से पशुओं तथा मनुष्यों दोनों के लिए पर्याप्त भोजन है। मनुष्य अन्य समस्त जीवों का बड़े भाई जैसा है। उसमें पशुओं की अपेक्षा अधिक बुद्धि है, जिससे वह प्रकृति का मार्ग तथा परम पिता के संकेतों को समझ सके। इस संसार में कृत्रिम विलास तथा इन्द्रिय-तृप्ति के लिए, कृत्रिम लोभ तथा डाँवाडोल शक्ति द्वारा, कृत्रिम ढंग से आर्थिक विकास करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, अपितु मानवीय सभ्यता को प्राकृतिक उत्पादन पर आश्रित रहने देना चाहिए। यह तो कूकरों-सूकरों का जीवन है।
जयपताका स्वामी: तो आज हम श्रीमद-भागवतम से पढ़ रहे हैं । हम भीष्मदेव की लीलाओं के बारे में पढ़ते हैं। अब हम पृथ्वी पर उस स्थिति के बारे में सुन रहे हैं जब युधिष्ठिर महाराज सम्राट थे। सारी बारिश ठीक से हुई, खाद्यान्न का पर्याप्त उत्पादन हुआ। गायों के दूध के थन इतने दुध से भरे रहते थे कि वे सभी खेतों को गीला कर देते थे। तो पृथ्वी पर पूरी स्थिति बहुत विनियमित थी, बहुत सुंदर तो अब पृथ्वी पर स्थिति ऐसी है कि कहीं बाढ़ और कहीं सूखा है। भूकंप, ज्वालामुखी, कई अन्य समस्याएं हैं। आजकल, लोगों की चेतना ईश्वरीय भावनामृत के संदर्भ में बहुत कम है। ठीक वैसे ही जैसे अभी COVID-19 महामारी चल रही है। पहले अल्फा था, अब डेल्टा है। और हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि भविष्य में क्या होगा।
कलियुग के लोग, वे हरिनाम कर सकते थे । हरिनाम, भगवान के पवित्र नामों का विशेष सामूहिक जप विधि है। श्रील प्रभुपाद ने कहा, कि अगर कोई हरे कृष्ण का जप करता है तो अच्छा है, किंतु अगर कोई भगवान के अन्य नामों का जाप करता है तो वह भी ठीक है। किसी तरह हमें लोगों को अब पवित्र नामों का जाप करवाना चाहिए। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि १९०० शताब्दी में कलकत्ता में एक प्लेग/हैजा फैला था। तब कलकत्ता को एक बाबाजी द्वारा बचाया गया था, जिन्होंने सभी को पवित्र नामों का जाप करने के लिए एक साथ रखा था। स्वास्थ्य के लिए नामजप एक भौतिक उद्देश्य है, यह एक नाम अपराध है। लेकिन शास्त्र कहता है कि भौतिकतावादियों भले ही वे किसी अपराध के साथ भी भगवान का नाम जपें, यह जप न करने से बेहतर है। हम यह कहते हुए जप कर सकते हैं कि यदि प्रभु चाहें तो । हो सकता है कि भौतिकतावादी वैसे भी जप करें। किसी न किसी रूप में हमें लोगों से नामजप कराना है, इससे पूरी दुनिया को बहुत फायदा होगा। यूरोप मैं, वे 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को रोकना चाहते हैं। चूंकि यह अच्छा है कि वे प्रकृति को नष्ट होने से रोकने के बारे में सोच रहे हैं। परंतु वे इतने सारे जानवरों को भी मार रहे हैं। इसके कारण कई बीमारियां और कई अन्य समस्याएं होती हैं। तो हम चाहते हैं कि विश्व ईश्वरीय भावनाभावित बन जाए। तो अगर हम पूरी स्थिति की रक्षा करना चाहते हैं तो हमें सभी को कृष्ण भावनाभावित बनाना होगा । इसलिए हमें सभी को पवित्र नामों का जाप करवाना चाहिए।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे!
यह महा मंत्र भगवान चैतन्य ने पूरी विश्व को बचाने के लिए दिया था। इसलिए लोगों को महा मंत्र का जाप करना चाहिए, भगवान के नाम का जाप करना चाहिए और उन्हें अधिक शुद्ध जीवन जीना चाहिए। इसी कारण से श्रील प्रभुपाद ने कहा कि हमारे पास दसियों हज़ार, लाखों-करोड़ों आध्यात्मिक गुरु होने चाहिए। तो हम आशा करते हैं कि हर कोई श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करेगा । इस तरह, भविष्य के आध्यात्मिक गुरु के रूप में योग्य बनें, और भगवान चैतन्य के संकीर्तन मिशन का प्रसार करें। चैतन्य महाप्रभु ने कहा था, ,"पृथ्वी थे आच्छे जोतो नगर आदि ग्राम, सर्वत्र प्रचार होइबे मोर नाम" । भगवान चैतन्य ने भविष्यवाणी की थी कि दुनिया के हर शहर और गांव में पवित्र नाम का सामूहिक जप होगा। तो उस विचार में, श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि हर कोई आध्यात्मिक गुरु होगा। पहले यह व्यवस्था एक आश्रम, एक गुरु की होती थी। लेकिन श्रील प्रभुपाद की योजना थी कि लाखों गुरु होने चाहिए। तो उनके पास श्री चैतन्य महाप्रभु का यह तत्वदर्शन था।
तो इस तरह युधिष्ठिर महाराज के शासनकाल में पूरे विश्व में शुभ्रता थी। अगर हम कृष्ण भावनामृत वितरित करते हैं तो वही स्थिति, हम भी बना सकते हैं । तो हमें अनाज, दूध और कपड़े, जैसी वस्तुएं चाहिए। अब उनके पास सिनेमा हॉल, अवैध सेक्स, वेश्यालय और मांस खाने वाले होटल हैं।
यूके में, उन्होंने प्रतिबंध हटा दिए, मैं समाचारों में यह देखकर चकित था कि कैसे एक नाइट क्लब वृद्ध लोगों से भरा हुआ था। हमें अधिक शुद्ध जीवन शैली दिखाने के लिए भक्तों की आवश्यकता है। तो अब दुनिया की स्थिति बहुत खराब है। जब हम मारते हैं तो एक के बाद एक करते हैं। लेकिन जब कृष्ण मारते हैं, वे लाखों और लाखों का वध होता हैं, सामूहिक वध । इसलिए वे घोषणा कर रहे थे कि महामारी पराजित हो गई है। अब उनका कहना है कि डेल्टा वेरिएंट आ गया है और यह एक नई समस्या है। ऑस्ट्रेलिया में भी, जो पहले आज़ाद था, वे इस महामारी से पीड़ित हैं। इंडोनेशिया, मलेशिया, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। किसी तरह, अगर हम लोगों को पवित्र नाम का जप करने के लिए कहें, तो यह नया बदलाव ला सकता है। कोई श्रील प्रभुपाद को बता रहा था कि मैं एक ईसाई हूं। श्रील प्रभुपाद ने कहा, ठीक है, हमें यीशु मसीह में बहुत विश्वास है। लेकिन क्या तुम मांस खाते हो, श्रील प्रभुपाद ने उससे पूछा । हाँ, मैं खाता हूँ। तब आप ईसाई नहीं हैं, श्रील प्रभुपाद ने कहा! दस आज्ञाओं (10 कमानडेंट) में कहा गया है कि तू हत्या नहीं कर सकता! लेकिन तुम मार रहे हो तुम एक प्राणी की हत्या कर रहे हो। तो आप ईसाई नहीं हैं। श्रील प्रभुपाद एक बहुत मजबूत उपदेशक थे।
युधिष्ठिर महाराज के समय कोई कसाईघर नहीं थे। और आधुनिक समाज कसाईखाना, सिनेमा घर, ये सब चीजें। क्या यह उन्नति है? आजकल लोग जानवरों से भी निम्न जीवन परिवहन कर रहे हैं। मैं देखता हूं कि भक्तों, गृहस्थों के घरों में अनेक देवी-देवता हैं। वे भोग लगाते हैं, वे प्रसाद खाते हैं । वे बेहद शांत और प्रसन्न हैं। गृहस्थ जीवन में संबंध रखना पाप नहीं है। निःसंदेह यदि कोई संतान के लिए हो सकता है, तो वह लक्ष्य है, वह है भक्ति सेवा। किंतु जो लोग शादी से बाहर संबंध रखते हैं, वे यौन संबंध कर रहे हैं, यह पाप है।
तो चैतन्य महाप्रभु, उन्होंने दिखाया कि हम हरिनाम संकीर्तन का जप करके उच्चतम सुख प्राप्त कर सकते हैं । कभी-कभी वह परमानंद में होते, वह छह घंटे हंसते! जोर से हंसते! वह रो रही होगै, उसके रोंगटे सिरे पर खड़े होंगे। लोग उन्हें देखने आते थे और एक बार वहाँ मिलने के बाद, वे उन्हे छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे! दबीर खास, जो नवाब के लिए काम कर रहे रूप गोस्वामी थे, हुसैन शाह जिन्होंने उनसे पूछा कि यह चैतन्य कौन है? वे कहेंगे कि आप राजा हैं, आप भगवान के प्रतिनिधि हैं, आप उनके बारे में क्या सोचते हैं? उन्होंने कहा कि जिसे तुम कृष्ण कहते हो और हम अल्लाह कहते हैं, यह वही व्यक्ति है। और उसने कहा, लोग मेरी सेवा क्यों करते हैं? मेरी सेना, मेरे सेनापति, मेरे मंत्री। तुम एक महाराज हो, तुम एक नवाब हो उन्होंने कहा । अगर मैं उन्हें छह महीने तक पगार नहीं देता हूं तो वे मुझे उखाड़ फेंकने की कोशिश करेंगे। मुझे नहीं लगता कि मेरी रानियां मेरे साथ रहेंगी, जब तक कि मैं उन्हें उपहार न दूं। हर कोई भगवान चैतन्य के पास आता है लेकिन वे उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं देते हैं। इसलिए, मुझे लगता है कि जब तक आप अल्लाह या कृष्ण नहीं हैं, यह संभव नहीं है। मेरे राज्य में मेरे आदेश का पालन किया जाता है। किंतु उनके आदेश का हर जगह पालन किया जाता है। गौउरां...ग! गौउरां...गा!! गौउरां...गा!! इसलिए हम यह स्थापित करना चाहते हैं कि पूरी दुनिया में हर कोई भगवान चैतन्य का अनुसरण करे। इस तरह, वे भगवान के नाम का जाप करेंगे और प्रसन्न रहेंगे। इस प्रकार उन्हें अज्ञान रूप से बाहर आने के लिए और किसी चीज की आवश्यकता नहीं होगी। तो हमें जगत को कृष्ण भावनामृत से भर देना चाहिए ।
चैतन्य महाप्रभु उन्होंने दिन-रात जप और नृत्य किया। तो कुछ लोगों ने एक-दूसरे से सलाह ली और उन्होंने सोचा कि शायद हुसैन शाह अपना विचार बदल दें, श्रेयकर होगा कि भगवान चैतन्य कहीं और चले जाएं। उन्होंने एक ब्राह्मण से कहा कि जाओ और भगवान चैतन्य को यह बताओ । लेकिन, भगवान चैतन्य गा रहे थे और संकीर्तन मैं इतने औत-प्रौत थे कि वे किसी से बात नहीं कर सकते थे। ऊस ब्राह्मण ने उन्की घंटों और घंटों प्रतीक्षा की, लेकिन उन्हें भगवान चैतन्य से वार्तालाप का कोई मौका नहीं मिला। फिर उन्होंने रामकेली के लोगों से कहा जो भगवान चैतन्य के साथ जप कर रहे थे, कुछ भय हो सकता है, भगवान चैतन्य को चले जाना चाहिए । तो धीरे-धीरे कीर्तन प्रभावित हुआ । भगवान चैतन्य रुक गए, उन्होंने कहा, चिंता की कोई बात नहीं है! मैं कहीं नहीं जा रहा हूं। फिर से, उन्होंने सभी भक्तों का संकीर्तन करना शुरू कर दिया।
वैसे भी, श्रील प्रभुपाद वर्णन करते हैं कि कैसे प्रशासन की व्यवस्था युधिष्ठिर महाराज के अधीन थी। हम उस प्रणाली को स्थापित करने की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन हमें समाज को ऊपर उठाना चाहिए ताकि समाज अधिक सात्विक, और अधिक ईश्वर के प्रति जागरूक हो। इस तरह कुछ ऐसे भी होते हैं जो अधिक ईमानदार और सात्विक होते हैं। वैसे भी भगवान चैतन्य उन्होंने कलि के इस युग में संकीर्तन आंदोलन की स्थापना की है। हमने पढ़ा कि कैसे युधिष्ठिर महाराज के समय ऐसी आदर्श स्थिति थी। अब हम केवल यही आशा करते हैं कि लोग ईश्वर भावनाभावित बनें। मैं सभी भक्तों को इस संकीर्तन यज्ञ में भाग लेने के लिए धन्यवाद देता हूं, भगवान चैतन्य की दया से, विश्व बदल सकता है। तो आप सभी की इच्छा होनी चाहिए ताकि हम भगवान चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी और इच्छा को पूरा कर सकें । हरे कृष्ण! क्या कोई सवाल हैं?
आज का दिन गतिविधियों से भरा है। मेरे पास अभी, अभी थोड़ी देर हो चुकी है, ५ या १० मिनट, प्रश्न हैं ?! फिर मैं मंदिरों में जाऊँगा।
सुबाहा सची सूत दास, (सुभद्रा ने पूछा), बांग्लादेश: बंगाली: संक्षेप में उनका सवाल यह है कि जब वे एक नए भक्त थे तो उन्होंने बहुत कुछ पढ़ा, परंतु अब उन्हें यह कठिन लगता है।
जयपताका स्वामी: तो हमारे मायापुर संस्थान ने कहा कि उनके पास अब ऑनलाइन परीक्षण हैं। इसलिए अगर किसी ने पुस्तकें पढ़ी है, तो वह परीक्षा दे सकता है। वे भक्ति वैभव, भक्ति वेदांत की उपाधि प्राप्त कर सकते हैं।
हरिता माधवी देवी दासी, मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया : आपने नामजप की महिमा के बारे में अद्भुत ढंग से बताया। मेरा सवाल यह है कि जब हम हरिनाम संकीर्तन करने बाहर मार्ग पर जाते हैं, तो हमारे पास पश्चिमी देशों में पवित्र नामों पर नृत्य करने पुरुष और महिलाएं दोनों आते हैं। नवागंतुक जो पुरुष हैं, वे भी हमारा हाथ पकड़कर नृत्य करते हैं, क्योंकि वे हमारी संस्कृति के बारे में नहीं जानते हैं। एक महिला होने के नाते, अविवाहित या विवाहिता, हरिनाम संकीर्तन के दरम्यान, क्या इससे हमारी शुद्धता और पवित्रता प्रभावित होती है?
जयपताका स्वामी: बहुत कुछ आपके उद्देश्यों पर निर्भर करता है। महिलाओं के साथ नृत्य करना अपेक्षाकृत है। किंतु अगर ऐसी कोई स्थिति आती भी है, तो आदर्श रूप से पुरुषों को पुरुषों के साथ नृत्य करना चाहिए। परंतु किसी भी मामले में, प्रचार करने के लिए आप वह कर सकते हैं जो आवश्यक है। मुझे लगता है कि कृष्ण तुम्हारी रक्षा करेंगे ।
विशाखा सुसेविनी देवी दासी, मलेशिया: मैं मुसलमानों और ईसाइयों को पवित्र नामों का जाप करने के लिए कैसे प्रोत्साहित कर सकती हूं? उदाहरण के लिए, मेरे कार्यालय के कर्मचारी?
जयपताका स्वामी: उन्हें उस नाम का जाप करने के लिए कहें जिस पर उन्हें विश्वास है। कुरान में 99 नामों का उल्लेख है। तो, उनमें से कुछ नाम वैदिक नामों से बहुत मिलते-जुलते हैं। अगर वे हरे कृष्ण का जप करते हैं तो कोई प्रतिबंध नहीं है । परंतु अगर वे नहीं चाहते हैं, तो वे जिस भी नाम में आस्था रखते हैं, भगवान के नाम का जाप कर सकते हैं। दक्षिण अमेरिका में एक ईसाई नन ने जेसु कृष्ण जेस्तु कृष्ण कृष्ण जेस्तु जेस्तु का जाप करना शुरू किया। बाद में उसने महसूस किया कि मुझे हरे कृष्ण की कोशिश करने दो, यह बहुत आसान है । और उसने हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप किया और उसे यीशु के नाम का जप करने जैसा ही आनंद मिला। लेकिन और! तो फिर वह हरे कृष्ण जप का जप करने लगी । अब वह दीक्षित है। वह अभी भी एक ईसाई नन है। अंतिम प्रश्न!
सुकमला निताई दास, इस्कॉन हबीबगंज, बंगाली: वर्तमान में युधिष्ठिर जैसे राजा बहुत दुर्लभ हैं। इस युग में कृष्ण भक्तों का क्या कर्तव्य है? क्या वे पापी मंत्रियों या राजनेताओं के निर्देशों का पालन करते हैं?
जयपताका स्वामी: सरकार के कायदे जो भी हों, अगर वे कायदों का पालन नहीं करते हैं तो उन्हें दंडित किया जाएगा। लेकिन इस स्थिति में, भगवान चैतन्य के आंदोलन का प्रचार करना उत्तम है।
और भी सवाल हैं, लेकिन मायापुर के लोगों को जाकर प्रातः प्रसाद लेना है, और मुझे बांग्लादेश के विविध मंदिरों में जाना है और फिर सुदूर पूर्वके देशों में जाना है।
हरे कृष्ण!
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