
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्रीगुरुम् दीन तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्॥
तो, श्रील प्रभुपाद के तिरोभाव के इस पवित्र दिवस पर, हम आध्यात्मिक दुनिया में श्रील प्रभुपाद के आरोहण का उत्सव मना रहे हैं। उन्होंने वृंदावन में कहा, यदि मैं शरीर छोड़ दूं तो दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने अपने सर्वोत्ता! आध्यात्मिक साहित्य तैयार किया है, और आप सभी मेरी पुस्तकों के माध्यम से मेरे साथ जुड़ सकते हैं। हमने मायापुर में श्रील प्रभुपाद को देखा है, वह आधी रात को जाग कर, प्रातः काल तक वे अपनी ग्रंथों का अनुवाद कर रहे थे और अभिप्राय लिख रहे थे। कभी-कभी वह मुझे 1 बजे या 2 बजे सुबह बुलाते थे। और वहाँ मैंने देखा कि वह मच्छरदानी में होते थे, और वह अनुवाद कर रहे थे। और फिर जो उनके मन में होता वह कह देते, और फिर मैं चला जाता। तो, उस तरह, श्रील प्रभुपाद, वे हर रात लिख रहे थे, और यह हम सभी के लिए एक महान यज्ञ है । यद्यपि उनके शिष्य, भव्य शिष्य, सीधे श्रील प्रभुपाद के साथ जुड़ने में सक्षम नहीं हैं, वे श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों के माध्यम से ऐसा करने में सक्षम हैं। हम जानते हैं कि एक साधु, उसे हमें अपने कानों से देखना चाहिए, अपनी आँखों से नहीं । तो हम अपने कानों से श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं को सुन सकते हैं।
मायापुर में, वे TOVP चाहते थे, वे भगवान चैतन्य के आंदोलन को संपूर्ण विश्व मैं, हर नगर और गांव में फैलाना चाहते थे। उन्होंने बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान में मंदिरों के विस्तार के लिए कुछ पैसे दिए। तो वे कृष्ण भावनामृत फैलाने के प्रयास कर रहे थे, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के निर्देशानुसार । और वह सारस्वत परिवार को एकजुट करना चाहता थे और अपने सभी गुरुभाईओं, अपने गुरुभाईओं के शिष्यों को मायापुर में आमंत्रित किया, और उन्हें एक साथ काम करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। पिछले आचार्य जो कुछ भी चाहते थे, उन्होंने उसे अमल में लाने का प्रयास किया। तो, हमारे पास उसकी इच्छा को पूरा करने का प्रयत्न करने का एक विशाल अवसर है। मुझे यहाँ मायापुर में याद है, उन्होंने मुझे खींच लिया और कहा, कृपया देखें कि मेरे जाने के बाद, कम से कम मेरे द्वारा बनाए गए मंदिर बेचे या नष्ट नहीं होते हैं। उन्होंने स्वयं , 108 मंदिर बनाए। उन्होंने कहा कि यदि आप विस्तार कर सकते हैं, तो यह अति उत्तम है, किंतु कम से कम जो मैंने किया है उसे मत खोना, उन्हें बनाए रखें। क्योंकि उन्होंने देखा था कि संस्थापक के जाने के बाद कई अन्य संस्थानों ने आराम से रहने के लिए संपत्ति बेच दी है। तो वह चिंतित थे।
यद्यपि, एक समय श्रील प्रभुपादने कहा था कि अपने अंतिम समय वह या तो वृंदावन से या मायापुर से देह त्याग करना चाहेंगे, और वे मायापुर जाने के लिए तैयार थे, हम सब उनका स्वागत करने के लिए तैयार थे। किंतु तभी कुछ चमत्कार हुआ और सभी कारें खराब हो गईं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि यह कृष्ण की निशानी है, मुझे यहाँ रहना है (वृंदावन)। तो निश्चित रूप से उनका ह्रदय मायापुर में था और उन्होंने कहा कि अगर मैं वृंदावन में देह त्याग करता हूं, तो मायापुर में मेरी पुष्प-समाधि होगी, जहां आज हम सब इकट्ठे हुए हैं। और उन्होंने कहा कि अगर वह मायापुर में चले जाते हैं, तो उनकी पुष्प-समाधि वृंदावन में होगी । वैसे भी, उन्होंने अलग-अलग भक्तों को अलग-अलग निर्देश दिए, और मैं जननिवास प्रभु से बात कर रहा था, श्रील प्रभुपाद ने उन्हें बताया कि कैसे उन्हें विभिन्न पुजारियों को प्रशिक्षित करने का निर्देश दिया। उस समय मायापुर में रहने वाले प्रत्येक भक्त को कोई न कोई उपदेश अवश्य प्राप्त हुआ होगा। मुझे कई निर्देश मिले। दूसरों को भी प्राप्त हो सकता है। कृपया इसे साझा करें और जो कुछ भी हम कर सकते हैं उसे करने का प्रयास करें।
मैं ज्यादा देर नहीं बोलूंगा क्योंकि बोलने के लिए दूसरे लोग भी हैं। श्रील प्रभुपाद अत्यंत दयालु थे। वह अपने आत्मिक पुत्रों और पुत्रियों से प्रेम करते थे, और वह सब से गहन प्रेम भाव रखते थे। वह देख रहे थे कि कैसे पश्चिम में लोग, कैसे वे जुनून और अज्ञान की ज्वाला में जल रहे थे। वह चाहते थे कि पूरे विश्व में, भगवान् कृष्ण और भगवान् चैतन्य की कृपा बरसाई जाए। श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं का अध्ययन करने में हमारी मदद करने के लिए मैं मायापुर संस्थान को धन्यवाद देता हूं, क्योंकि मायापुर आध्यात्मिक मुख्यालय है, हमें श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं के अनुसार जीने का प्रयास करना चाहिए। हरे कृष्ण!
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