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20210702 श्री गौर मंडल भूमि परियोजना संभाषण

2 Jul 2021|हिन्दी|सार्वजनिक वक्तव्य|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालम पंगुं लंघयते गिरीम्
यत-कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम दीन- तारणम्
परमानंद माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥

हरि ओम तत सत

तो आपने गौर मंडल भूमि की कुछ महिमा सुनी है। आपने इसके सामान्य आयामों को सुना है और आपने देखा है कि कुछ स्थान अच्छी स्थिति में हैं, कुछ पुराना निर्माण हैं, उन्हें बहुत काम की आवश्यकता है और कुछ वास्तव में खो गए हैं! कुछ संशोधन से हम ज्ञात कर सकते हैं कि वे कहाँ हैं। तो बांग्लादेश में, क्योंकि बहुत से हिंदू भारत भाग गए हैं, हमें कुछ जन्मस्थान मिले है। अद्वैत आचार्य का जन्मस्थान, श्रीवास ठाकुर का जन्मस्थान। हम गदाधर पंडित का जन्म स्थान प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे पास पुंडरीक विद्यानिधि का जन्मस्थान है। हमारे पास रूप और सनातन की बाल्यकाल की जमीन है। और उस तरह हमारे पास नरोत्तम दास ठाकुर का श्रीपात है । वे एक राजकुमार थे पर प्रचार करने के लिए उन्होंने सिंहासन को त्याग दिया। बांग्लादेश के भक्त इस मुद्दे को बड़े उत्साह से उठा रहे हैं। बंगाल में, हमारे पास मायापुर में एक मंदिर है, हमारे पास एकचक्र में एक मंदिर है और अन्य जगहों पर हम भक्तिवेदांत स्वामी चैरिटेबल ट्रस्ट के दान के पैसे से, हमारे पास कनाई-नटशाला में एक मंदिर है, वहां कुछ और मंदिर हैं, हम करे और हमें करना चाहिए। या हम तत्कालीन सेवइयों में से कई की सहायता कर सकते हैं हम उन्हें पैसे देना पसंद नहीं करते हैं, लेकिन हम वहां जाकर काम करने में उनकी सहायता करना चाहेंगे। तो यह वर्तमान में हमारा मानक है।

नवद्वीप धाम में हमने बहुत विकास कार्य किये है । नृसिंहपल्ली में, हरिहर क्षेत्र में, हंस-वाहन के मध्यद्वीप मंदिर और कई मंदिरों में। राजापुर में जगन्नाथ मंदिर है। साथ ही सिमंतिनी देवी। तो ऐसे में बहुत काम करना है। तो हम देखते हैं कि कैसे रूप और सनातन, छह गोस्वामी ने वृंदावन के पवित्र स्थानों का उत्खनन किया।

हम बहुत भाग्यशाली हैं कि श्रील प्रभुपाद ने हमें यह सेवा दी है । यद्यपि उन्होंने मुझे लगभग 43 साल पहले निर्देश दिए थे, पर मैं सीमित मात्रा में कार्य कर सका हूं। परंतु और बहुत कुछ है जो किया जा सकता है। वास्तव मैं उन्होंने भक्तिवेदांत स्वामी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। पर इसकी संपत्ति सीमित है। और इसलिए मैं कह रहा था कि इतने सारे श्रीपात हैं, जहां हम विकास का कार्य कर सकते हैं। मैं प्रस्ताव दे रहा था कि हमारे पास एक वेबपेज होना चाहिए और वहां श्रीपात प्रोजेक्ट प्रदर्शित करना चाहिए। तो कोई किसी एक श्रीपात की मदद करना या एक श्रीपात को अपनाना पसंद कर सकता है। तो श्रीमान रमणीपति कुछ ऐसी परियोजनाये बता सकते हैं जो अभी तैयार हैं। वास्तव में यह एक सुअवसर है। सचमुच में इनमें से प्रत्येक सहयोगी, भगवान चैतन्य का शाश्वत संगी है। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर वे इसके बारे में गाते हैं। यह भी हमने सुना है कि कैसे श्रील प्रभुपाद और विभिन्न लोगों ने उल्लेख किया है कि, "गौरा मंडल भूमि जेबे जाने चिंतामणि तारा हय व्रजभूमि वास" - जो कोई भी मानता है कि गौर मंडल पारलौकिक है, वह वृंदावन वासी ही है।

तो मैं गीत भूल रहा हूँ, "गौरांगेर संगे गनी नित्य सिद्ध कोरो माणि"। जो चैतन्य महाप्रभु के सहयोगी हैं वे वास्तव में भगवान के सहयोगी हैं । तो, अभी हमारे पास रामकेली में सात बीघा लगभग २ एकड़ जमीन खरीदने का अवसर है। वह स्थान जहाँ भगवान चैतन्य रूप और सनातन से मिले थे। इसी तरह और भी जगहें हैं जिनका विकास आवश्यक है। तो, अभी इस रामकेली में हमारे भक्त हैं जो वहां रहने के लिए सहमत हुए है और यह कन्हाई नटशाला से लगभग ३० मील की दूरी पर है, जो गंगा के दूसरी ओर है। यह बंगाल की प्राचीन राजधानी थी। वैसे पूरे बंगाल में विभिन्न पवित्र स्थान हैं। हम पढ़ रहे थे, की जो शची माता को याद करता है, भले ही वे एक लाख बार च्युत हुआ हों, बस उन्हें याद करते रहें, उनकी सेवा करने से, भगवान चैतन्य की विशेष कृपा होती है।

अब किसी तरह अद्वैत आचार्य को शांतिपुर में माधवेंद्र पुरी ने दीक्षा दी। तो हर साल गौर पूर्णिमा से पहले गोविंदा द्वादशी, द्वादशी पर एक बड़ा भोजन समारोह कहोता है । हम वहां जाते हैं और लगभग ५०,००० लोगों को प्रसाद वितरित करते हैं । जैसे कुछ कार्य श्रीपातों का स्थायी विकास हैं और कुछ सेवा के अवसर हैं।

यथार्थ रूप मे, श्रील प्रभुपाद वह चाहते थे कि सारस्वत परिवार की सभी शाखाएँ संयुक्त हों। हम जानते हैं कि भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने देखा कि जो वैष्णव थे, उनमें स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणों के गुण थे। तो वे

उन्होंने वैष्णवों को उपनयनम दिए, जो जरूरी नहीं कि वे ब्राह्मण जाति के ही हो। उसी तरह, इस पद्धति की संस्थापना करके, श्रील प्रभुपाद विश्वभर में मंदिर स्थापित करने में सक्षम हुए। वैसे भी, यहाँ हम श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के जन्मस्थान और विभिन्न श्रीपातों को विकसित करना चाहते हैं। तो उसके लिए भविष्य में हमें सहयोग की आवश्यकता है। हरे कृष्ण!

 

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Transcribed by अजित मधुसूदन दास
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