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20211106 श्रीमद्-भागवतम् 1.12.23

6 Nov 2021|Duration: 01:49:57|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीमद्-भागवतम् 1.12.23

पितामहसम: साम्ये प्रसादे गिरिशोपम:
आश्रय: सर्वभूतानां यथा देवो रमाश्रय:॥

यह बालक मन की समता में अपने पितामह युधिष्ठिर या फिर ब्रह्मा के समान होगा दानशीलता में यह कैलाशपति शिव के समान होगा यह देवी लक्ष्मी के भी आश्रय भगवान् नारायण के समान सबको आश्रय देने वाला होगा

तात्पर्य श्रील ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा: महाराज युधिष्ठिर तथा जीवों के पितामह ब्रह्मा, दोनों ही मन की समता (समदर्शिता) के द्योतक हैंश्रीधर स्वामी के अनुसार, पितामह शब्द ब्रह्मा के लिए आया है, किन्तु विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार पितामह स्वयं महाराज युधिष्ठिर हैंकिन्तु दोनों ही तरह से यह उपमा समान रूप से उत्तम है, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के जाने-माने प्रतिनिधि हैं, अतएव दोनों को ही जीव के कल्याणकार्य में लगे रहने से मानसिक समता बनाये रखनी होती हैशासन के किसी भी सर्वोच्च जिम्मेदार कार्यकारी व्यक्ति को उन्हीं सबके घात सहने पड़ते हैं, जिनके लिए वह कार्य करता हैब्रह्माजी की आलोचना गोपियों तक ने की, जो भगवान् के महान्तम पूर्ण भक्त हैंगोपियाँ ब्रह्माजी के कार्य से असन्तुष्ट थीं, क्योंकि इस ब्रह्माण्ड-विशेष के सृष्टा-रूप में उन्होंने पलकें बनाईं, जिनके कारण भगवान् कृष्ण का दर्शन करने में उन्हें बाधा पहुँचती थीवे क्षण भर भी पलक झपकाना पसन्द नहीं करती थीं, क्योंकि इससे उनके परम प्रिय भगवान् का दर्शन रुक जाता थाअतएव अन्यों के विषय में क्या कहा जाये, जो किसी भी उत्तरदायी व्यक्ति के हर कार्य की आलोचना करते रहते हैं? इसी प्रकार महाराज युधिष्ठिर को अपने शत्रुओं द्वारा उत्पन्न की गई अनेक विषम परिस्थितियों का सामना करते रहना होता था, किन्तु सभी नाजुक परिस्थितियों में भी वे मानसिक सन्तुलन पूर्णरूपेण बनाये रहेअत: मानसिक समता बनाये रखने में दोनों पितामहों का उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त है

शिवजी भिखारियों को दान देने के लिए विख्यात देवता हैंअतएव उनका नाम आशुतोष है, जिसका अर्थ है शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न होने वालेवे भूतनाथ भी कहलाते हैं, जिसका अर्थ है सामान्य (गँवई) लोगों के स्वामी, जो उनके प्रति इसलिए आकर्षित होते हैं, क्योंकि वे भावी परिणामों का विचार किये बिना उदार वर देते रहते हैंरावण शिवजी के प्रति अत्यधिक आसक्त था और वह उन्हें सरलता से प्रसन्न करके इतना शक्तिशाली बन गया कि उसने भगवान् राम की सत्ता को चुनौती देना चाहानिस्सन्देह, जब रावण शिवजी के आराध्य भगवान् राम से लड़ा, तो शिवजी ने उसकी कोई सहायता नहीं कीशिवजी ने वृकासुर को ऐसा वरदान दिया था, जो न केवल उपहासास्पद था, अपितु भयावह भी थाशिवजी की कृपा से वृकासुर इतना शक्तिशाली बन गया कि वह किसी के भी मस्तक पर हाथ रखकर उसे तुरन्त नष्ट कर सकता थायद्यपि शिवजी ने ही यह वरदान दिया था, किन्तु उस चालाक असुर ने शिवजी के मस्तक का स्पर्श करके इसकी शक्ति का परीक्षण करना चाहाइस तरह शिवजी को इस मुसीबत से अपनी रक्षा करने के लिए विष्णु की शरण लेनी पड़ीभगवान् विष्णु ने अपनी माया से वृकासुर को अपने ही मस्तक का स्पर्श करके परीक्षण करने के लिए कहाउसने वैसा ही किया, जिससे वह नष्ट हो गया और इस तरह यह संसार देवताओं के चालाक याचक की सारी मुसीबतों से मुक्त हो सकासबसे मजेदार बात यह है कि शिवजी कभी किसी को किसी प्रकार का वरदान देने से मना नहीं करतेअतएव वे सर्वाधिक उदार हैं, यद्यपि कभी-कभी उनसे ऐसी कुछ भूल हो जाती है

रमा का अर्थ है भाग्य की देवीउनके आश्रय भगवान् विष्णु हैंभगवान् विष्णु समस्त जीवों के पालक हैंजीव असंख्य होते हैं, जो न केवल इस ग्रह में रहते हैं, अपितु अन्य लाखों ग्रहों में भी रहते हैंआत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए उन सबको जीवन की समस्त सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, लेकिन इन्द्रियतृप्ति के मार्ग में वे माया के कारण कठिनाई में फँस जाते हैं, अतएव वे आर्थिक विकास की मिथ्या योजना के मार्ग पर जाते हैंऐसा आर्थिक विकास कभी सफल नहीं होता, क्योंकि यह भ्रामक हैये लोग सदैव भ्रामक लक्ष्मीदेवी के पीछे-पीछे लगे रहते हैं, लेकिन ये लोग यह नहीं जानते कि लक्ष्मीजी केवल विष्णु के संरक्षण में ही रह सकती हैंविष्णु के बिना लक्ष्मीजी कोरी माया हैंअतएव हमें प्रत्यक्ष रूप से लक्ष्मीजी का आश्रय न ढूँढ़कर विष्णु का आश्रय लेना चाहिएकेवल विष्णु तथा उनके भक्त ही सबको आश्रय प्रदान कर सकते हैं और चूँकि महाराज परीक्षित की रक्षा स्वयं विष्णु कर रहे थे, अतएव यह सर्वथा सम्भव था कि वे अपने शासन में रहने वाले सबको पूरा-पूरा संरक्षण प्रदान कर सकें

जयपताका स्वामी: तो हम देखते हैं कि लंबे समय से, युधिष्ठिर महाराज भविष्य के राजा के विषय में ज्ञात करना चाहते हैं। गत सप्ताह, मुझे लगता है कि वे अभी भी ज्योतिषियों से परामर्श कर रहे थे। अब भी वह परामर्श कर रहे है। तो, वह अत्यंत चिंतित थे कि परीक्षित महाराज कैसे होंगे, उनमें कौन से गुण होंगे और क्या वे राजवंश के सम्मान को बनाए रखने में सक्षम होंगे। जितने भी उदाहरण दिए गए हैं, वे सभी दिव्य और अत्यंत मूल्यवान हैं। उदाहरण है कि वह भगवान् ब्रह्मा या युधिष्ठिर महाराज की भाँति समभाव रखते थे, भगवान् शिव के रूप में उदार थे और अपनी प्रजा को बनाए रखते थे जैसे भगवान् नारायण ब्रह्मांड को बनाए रखते हैं। ये अत्यंत सुंदर उदाहरण हैं। तो आज वासु घोष का तिरोभाव दिवस हैवे अत्यंत विशिष्ट भक्त थे। तीनो सहोदर, वे सभी भगवान् चैतन्य के शुद्ध भक्त थे। गोविंद घोष, माधव घोष और वासु घोष। तो, वासु घोष ने गीत लिखा, अगर भगवान् चैतन्य नहीं होते तो क्या होताऔर इसने मुझे "यदि प्रभुपाद न होईतो तबे की होईतो" लिखने के लिए प्रेरित किया - यदि प्रभुपाद नहीं होते तो क्या होता। तो वासु घोष ने भगवान के अर्चाविग्रह के सामने एक समाधि का गड्ढा खोदाऔर वह गढ्ढे में उतर गए और अपने अनुयायियों से कहा, मुझे जीवित मिट्टी से ढक दो। अर्चाविग्रह से भगवान् ने कहा, "तुमने अपना शरीर मुझे दिया है, तुम आत्महत्या नहीं कर सकते!" तो वह कितना परिपूर्ण था कि भगवान् ने उनसे वार्ता की! परंतु भगवान् चैतन्य के चले जाने पर उन्हें अवर्णनीय विरह का अनुभव हो रहा था। वैसे भी, आज उनका तिरोभाव दिवस है और हम उन्हें नमन कर रहे हैं।

तो हम देखते हैं कि युधिष्ठिर महाराज के लिए शिशु के भविष्य के गुण कितने महत्वपूर्ण थेउसी तरह, हमारे गृहस्थों की संतान होना उनके गृहस्थ जीवन का एक प्रमुख पहलू है। ष्ट गोस्वामीओं में से, गोपाल भट्ट गोस्वामी ने सत-क्रिया-सार-दीपिका लिखी। उस पुस्तक में गर्भधान-संस्कार सम्मिलित हैयह कितना महत्वपूर्ण है। छह गोस्वामी में से एक बाबाजी थे, एक परमहंस, उन्होंने इसे अपनी पुस्तक में लिखा है। तो श्रील प्रभुपाद ने यह भी कहा कि गृहस्थों को अतिरिक्त माला जप करनी चाहिए, और अर्चा विग्रहों से प्रार्थना करनी चाहिए। केवल संबंध होने में कम समय लगता है। परंतु संतान उत्पत्ति मैं किसी की चेतना कैसी है यह महत्वपूर्ण है। तो, हम देख सकते हैं कि यह अति महत्वपूर्ण है। कुछ मिनटों का संबंध, किंतु संतान जीवन भर के लिए होता है। तो, जैसे युधिष्ठिर जानना चाहते थे कि बालक भविष्य में कैसा बनेगा, इस तरह, हमारे गृहस्थ हमें भी थोड़ा विचारशील होना चाहिए कि संतान कृष्णभावनाभावित, दिर्घायु, स्वस्थ पुत्र या पुत्री होगा।

कल विशेष गोवर्धन पूजा थीगोवर्धन पूजा एक अत्यंत ही विशेष उत्सव हैऔर इस गोवर्धन-पूजा पर कई लीलाएं हुईंमेरा कथन है, मुझे ज्ञात है कि यह गोवर्धन-पूजा का दिन था, प्रसाद वितरण के बाद श्रील प्रभुपाद ने कुछ कोलाहल सुना और वह जानना चाहते थे कि क्या हुआ। तब यहाँ केवल लोटस भवन था | और प्रभुपाद लोटस बिल्डिंग के दालान में चले गये और देखा कि कोलाहल की ध्वनि कहाँ से आ रही है। वहाँ केले के पत्तों का एक बड़ा ढेर था जहाँ लोगों के प्रसाद के पत्तल, अवशेष, फेंके जाते थे। बहुधा लोग पूरा प्रसाद खा लेते हैं, परंतु कुछ लोग पत्तल में कुछ छोड़ भी देते है। कुछ गाँव के बच्चे थे जो प्रसाद अवशेष खा रहे थे। किंतु कुत्ते भी इसे खाना चाहते थे। भूख के मारे कुत्ते भी कराह रहे थे और भौंक रहे थे। कुत्तों को दूर रखने के लिए लड़के अपनी ग्राम्य लाठी का प्रयोग कर रहे थे। एक तरफ वे लाठी लेकर कुत्तों से लड़ रहे थे और दूसरी तरफ लोगों के भोजन अवशेष खा रहे थे। श्रील प्रभुपाद ने यह दृश्य देखा और रोने लगे, "वे कितने भूखे होंगे! कितना भूखा! कृष्ण परम पिता हैंऔर पिता के सामने उनके बालकों का पेट नहीं भरता।” तो श्रील प्रभुपाद ने कहा कि, "हमारे मंदिर के 10 मील के परिक्षेत्र में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिए। कृष्ण परम पिता हैं, सबको खिलाना चाहिए" उस दिन से हमने सप्ताह में दो दिन शुरू किया, आने वाले सभी लोगों को निःशुल्क भोजन दिया। जाति, पंथ या किसी के जन्म के किसी भी भेद के बिना यह प्रसाद सभी को वितरित किया गया था। और हम अभी भी ऐसा कर रहे हैं। तो यह गोवर्धन-पूजा के दिन हुआ था

एक और बात, मुझे ज्ञात है जो 1977 में वृंदावन में हुई थी। एक-दो दिन में गोवर्धन-पूजा होने वाली थी। श्रील प्रभुपाद ने कहा, मुझे गोवर्धन के चारों ओर बैलगाड़ी से जाने दो। किंतु कविराज, श्रील प्रभुपाद की देखभाल करने वाले चिकित्सक ने कहा कि यदि ऐसा किया जाता तो श्रील प्रभुपाद जीवित नहीं रहते। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि मैं एक उपदेशक हूं, मुझे उपदेश देते हुए मरने दो। और कुछ भक्त श्रील प्रभुपाद को परिक्रमा पर ले जाने के लिए तैयार थे। और हम अनुभव कर रहे थे कि जैसे - तैसे श्रील प्रभुपाद का स्वास्थ्य सुधार हो रहा है, और उन्हें यह चरम कदम नहीं उठाना चाहिए। तो, कुछ शिष्य वे रो रहे थे और श्रील प्रभुपाद से कह रहे थे, कृपया मत जाओ! अन्य लोग गोवर्धन की परिक्रमा पर श्रील प्रभुपाद को लेने के लिए तैयार थे। तो, तब कृष्णदास बाबाजी, उनके गुरुभाई वहां थेश्रील प्रभुपाद ने उससे कहा, "देखो मेरे शिष्य मुझसे कितना प्रेम करते हैं!" यह गोवर्धन-पूजा के ठीक पहले ही हुआ थामैं कल कई भिन्न भिन्न मंदिरों में गोवर्धन-पूजा का दर्शन कर रहा थाऔर मात्र मंदिर ही नहीं, अपितु कई गृहस्थ के घरों का भी भ्रमण किया जहां गोवर्धन पूजा आयोजित किया गया था। निःसंदेह यह एक आभासी यात्रा थी। तो हम देख रहे थे कि कितने भिन्न भिन्न लोग, वे भाँति-भाँति के आकर्षक गोवर्धन पहाड़ी तैयार कर रहे थे। और विशाखापत्तनम में उन्होंने गाय के गोबर से कृष्ण बनाया था। और वह गोवर्धन पहाड़ी को उठाये हुए था। और कई गृहस्थों ने, उन्होंने वहाँ भोग लगाकर भाग लिया। कहीं 56 भोग प्रसाद, कहीं 108, किसी स्थान पर हजार से अधिक!

मायापुर धाम में एक विशाल अन्नकूट बनाया थामैंने मायापुर धाम की भाँति विशाल अन्नकूट का दर्शन नहीं कियापरंतु हर कोई भाग ले रहा था, कुछ ने पूरा वृंदावन, पूरा गोवर्धन बनाया। एक ओर गोवर्धन, राधा-कुण्ड, श्याम-कुण्ड और दूसरी ओर मानसी गंगाकुछ लोगों ने बंदरों और गायों को बिठाया हैं। मैं मनन कर रहा था कि कुछ जगहों पर उन्होंने कृष्ण-लीला दिखाते हुए नाटक किया। इस प्रकार, उन्होंने भक्ति सेवा के कई रूपों का प्रदर्शन किया है। कुछ स्थान पर कीर्तन, नाटक और उनकी महिमा कर रहें थे, स्मरणम्। वे गोवर्धन में कृष्ण-लीला कर रहे थे, पाद-सेवनम्वे गोवर्धन भगवान् की पूजा कर रहे थे, अर्चनम्। उन्होंने गोवर्धन की परिक्रमा की और प्रणाम किया, वंदनम्। इस प्रकार, मैंने देखा कि गोवर्धन-पूजा में कई भक्त भाग ले रहे थे। वृन्दावन जैसे कुछ स्थान अत्यंत विस्तृत थे, कुछ स्थान अत्यंत साधारण। किंतु प्रत्येक स्थान पर कई मण्डली के भक्त भी भाग ले रहे थे। तो हमें अति प्रसन्नता है कि सभी भक्त इस प्रकार से भाग ले रहे हैं। बांग्लादेश, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, हमने कई भक्तों को भी इस गोवर्धन-पूजा में भाग लेते देखा।

कार्य दिवस के कारण, किसी ने शाम को तो किसी ने सुबह के समय गोवर्धन-पूजा आयोजित कीकिसी ने धान का पहाड़ बनाया, किसी ने हलवे को पहाड़ बनाया, हल्वकुट्ट! यद्यपि, हम देखते हैं कि लोगों के लिए, भक्ति सेवा कितनी आनंदमयी है। तो, उस प्रकार, भौतिक जगत में हमारे पास भूत, वर्तमान और भविष्य हैजब की आध्यात्मिक जगत में ऐसा नहीं है। नित्य-वर्तमान, सर्वदा उपस्थित। कोई वृद्ध नहीं होता, किसी को रोग नहीं होता, किसी की मृत्यु नहीं होती। इस प्रकार, गोवर्धन पूजा की भांति यदि हम पूर्णरूपेण कृष्ण भावनामृत में डूबे हुए हैं और सेवा में लगे हैं, तो अपने जीवन के अंत में हम पुनः भगवान् के पास जाएंगे।

युधिष्ठिर महाराज जानना चाहते थे कि बालक कैसा होगा। तो, उसी प्रकार, हमें अपने बच्चों को यथासंभव कृष्ण भावनामृत में प्रसन्न रहने के लिए प्रशिक्षित करने का प्रयास करना चाहिएकुछ दंपति को संतान प्राप्ति की इच्छा होती हैं किंतु उन्हें प्राप्त नहीं होतापुनः, उन्हें दूसरों को कृष्ण भावनामृत देने का प्रयास करना चाहिएअन्य गृहस्थ वे बच्चे नहीं चाहते, किंतु उन्हें प्राप्त हो गया हैऔर वे अपने संतानों का उचित प्रकार से लालन पालन नहीं कर पाते हैं। अतः उन बच्चों को वर्ण-संकर कहा जाता है। किसी भी प्रकार से भक्तों के रूप में हमें अपनी संतानों के भविष्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि युधिष्ठिर महाराज अपने पोते के विषय में ज्ञात करना चाहते थे। "एक बच्चे को पालने के लिए एक गाँव लगता है" किसी ने एक किताब लिखी। तो, हम सभी बच्चों को कृष्ण भावनाभावित बनने में सहायता करने की प्रक्रिया में भाग लेना चाहते हैंमैं यहाँ कक्षा समाप्त करूँगा। दामोदर मास में इस पवित्र दिन पर, मुझे आशा है कि हर कोई इस अवसर का उपयोग दीप दान आयोजित करने हेतु करेगा। उनके स्थानीय मंदिरों के साथ-साथ श्रीधाम मायापुर में भी। हम आशा करते हैं कि हर कोई भगवद्-गीता को वितरित करने का प्रयास करेगा और इस प्रकार से हर कोई अपने "संबंध, अभिधेय और प्रयोजन" को समझेगा

हरि ॐ तत् सत्॥

यदि कोई प्रश्न हैं, तो हम दो या तीन लेंगे और फिर ज़ूम यात्रा के लिए आगे बढ़ेंगे।

सुबाहु सची सूत दास [बंगाली]: हम आध्यात्मिक गुरु की मनोदशा और मानसिकता को कैसे समझ सकते हैंहम 1977 में श्रील प्रभुपाद के विषय में देखते हैं, जब उन्हें स्वास्थ्य में अल्प सुधार लगा, वे गोवर्धन परिक्रमा पर जाना चाहते थे, और उनके कई शिष्य, श्रील प्रभुपाद के प्रेम के कारण नहीं चाहते थे कि परिक्रमा पर जाएं, क्योंकि वह इस स्थिति को सहन नहीं कर पाएगें। और हम गौर किशोर दास बाबाजी के विषय में भी देखते हैं कि वह चाहते थे कि उनके जाने के पश्चात उनके नश्वर शरीर को नवद्वीप की गलियों में घसीटा जाए, किंतु श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ऐसा नहीं चाहते थे। तो हम आध्यात्मिक गुरु की मनोदशा और मानसिकता को कैसे समझते हैं?

जयपताका स्वामी: हमें इस हेतु आध्यात्मिक गुरु कृष्ण की एक विशेष कृपा प्राप्त होती है और आध्यात्मिक गुरु के शरीर को रस्सियों से खींचना उचित नहीं है। तो श्रील प्रभुपाद प्रचार करना चाहते थे, वे एक उपदेशक थेकिंतु उनके डॉक्टर ने कहा कि यदि वह गोवर्धन परिक्रमके लिए बैलगाड़ी से जायेंगे, तो, कवचित वे बचेंगे नहीं, तो उनके कुछ शिष्य यह सोचकर सहन नहीं कर सके कि श्रील प्रभुपाद चले जाएंगे। और इस हेतु, उन्होंने श्रील प्रभुपाद से अनुरोध किया कि उन्हें कृपया नहीं जाना चाहिएऔर श्रील प्रभुपाद ने कहा कि वह जाएंगे, उनका अंतिम कथन थाकिंतु हम रो रहे थे कि वह न जाए। हम आशा कर रहे थे कि वह ठीक हो जाएँगे तो, एक ओर आध्यात्मिक गुरु की चेतना है और दूसरी तरफ भक्तों की चेतना है।

रंगावली: यदि कोई मांसाहारी भोजन के साथ प्रसाद लेता है, तो यह स्वीकार्य है या पाप?

जयपताका स्वामी: प्रसाद लेना अच्छा हैमांसाहारी भोजन करना पाप है।

भक्ति अद्वैत नवद्वीप स्वामी: सभी भक्त गोवर्धन खींचते हैं, जैसा कि हमने सुना है कि आपको पसंद नहीं आया, इसलिए हमने नहीं किया लेकिन अन्य सभी मंदिरों ने किया। कृपया गुरु महाराज मार्गदर्शन करें

जयपताका स्वामी: गोवर्धन-पूजा के नामों में से एक अन्नकूट है। तो गोवर्धन की भाँति धान का पहाड़ बनाना, तो गोवर्धन कृष्ण हैंतो पुनः हम आंख, नाक, हास्य मंडित मुखारविंद लगाते हैं। तो, इसमें समस्या क्या है? भगवान् चैतन्य गोवर्धन पहाड़ी पर नहीं चलेंगे क्योंकि वे पूरी गोवर्धन पहाड़ी को कृष्ण मानते थे। तो, वैसे भी गोवर्धन की भक्ति के साथ सेवा की जाती है, मैं इसकी प्रशंसा करता हूं।

बांग्ला: जब हम भगवान को भोग लगाते हैं, तो हमारी मानसिकता कैसी होनी चाहिए? हमें क्या प्रार्थना करनी चाहिए?

जयपताका स्वामी: हम आशा करते हैं कि यह भगवान् को स्वीकार्य हैहम भगवान को प्रसन्न करना चाहते हैं। और हम प्रार्थना करते हैं। अब हम प्रश्नों को समाप्त करेंगे और प्रथम मायापुर के भक्तों को देखेंगे और पुनः मंदिर और सुदूर पूर्व के भक्तों को देखेंगे।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by अजित मधुसूदन दास द्वारा
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