मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्-भागवतम् १.९.१०
कृष्णं च तत्प्रभावज्ञ आसीनं जगदीश्वरम्।
हृदिस्थं पूजयामास माययोपात्तविग्रहम् ॥
शब्दार्थ: भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में आसीन हैं, तो भी वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से अपना दिव्य रूप प्रकट करते हैं। ऐसे भगवान् साक्षात भीष्मदेव के समक्ष बैठे हुए थे। और चूँकि भीष्मदेव उनकी महिमा से परिचित थे, अतएव उन्होंने उनकी विधिवत् पूजा की।
तात्पर्य श्रील ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा: भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता का प्रदर्शन प्रत्येक स्थान में उनकी उपस्थिति द्वारा होता है। वे अपने नित्य धाम गोलोक वृन्दावन में सदैव उपस्थित रहते हैं, तो भी वे जन-जन के हृदय में, यहाँ तक कि प्रत्येक अदृश्य परमाणु के भीतर भी स्थित रहते हैं। जब वे इस भौतिक जगत में अपने नित्य दिव्य रूप को व्यक्त करते हैं, तो वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से ऐसा करते हैं। बहिरंगा शक्ति या माया का इस नित्य रूप से कोई सरोकार नहीं होता। ये सारी बातें श्री भीष्मदेव को ज्ञात थीं, अतएव उन्होंने तदनुसार ही उनकी पूजा की।
जयपताका स्वामी: यद्यपि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं, उन्होंने युधिष्ठिर के एक छोटे, चचेरे भाई के रूप में व्यव्हार किया। जब युधिष्ठिर और अन्य पांडवों ने भीष्मदेव को प्रणाम किया, तो भगवान् श्री कृष्ण ने भी ऐसा ही किया। परंतु भीष्मदेव भगवान् श्री कृष्ण की महिमा को जानते थे। अतः उन्होंने स्वीकार किया कि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। यद्यपि भीष्म बाणों की शय्या पर थे, और वे सामान्य रूप से सभी का अभिवादन नहीं कर सकते थे, परंतु वे अपनी बातों में अत्यंत निपुण थे। तो इस तरह हम देख सकते हैं कि उनके पास ऐसे अद्भुत गुण हैं। और कृष्ण चाहते थे कि भीष्मदेव की महिमा सर्वज्ञात हो। अतएव, कृष्ण ने व्यवस्था की कि सभी भीष्मदेव को देखने के लिए एक साथ जाएंगे। तो भीष्मदेव को यह जानकर आनंद होगा कि धर्मराज युधिष्ठिर, जो धर्म का मूर्तिमान स्वरूप हैं, अपने भाइयों के साथ शासन हेतु सिंहासन पर विराजमान हैं। तो लोग, मायावादियों की तरह, विचार कर सकते हैं, कि कृष्ण ने कोई भौतिक रूप धारण कर लिया है। किंतु यह श्लोक बताता है कि उनके रूप का भौतिक शक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से स्वयं को प्रकट करते है। और हम देख सकते हैं कि वे अति अद्भुत है! वे अपने भक्तों के साथ कितना स्नेहपूर्ण व्यवहार कर रहे है। और साथ ही साथ, वे सबके हृदय में और यहां तक कि प्रत्येक परमाणु में भी विद्यमान हैं। वे गोलोक वृन्दावन में उपस्थित हैं और वे यहाँ भी उपस्थित हैं।
कभी-कभी, श्रील प्रभुपाद कहते थे कि राजा अपने सिंहासन पर बैठा है, और ऐसा ही खटमल भी है। परंतु वे सामान नहीं हैं। यदि आप सोचते हैं कि उनके एक ही आसन पर बैठने के कारण वे समान हैं, तो राजा की भूमिका शासन करने की है। और खटमल की भूमिका रक्त चूसने की होती है। तमाल कृष्ण महाराज श्रील प्रभुपाद के प्रोबेट मामले के दौरान उच्च न्यायालय में थे। वहाँ जो लकड़ी का आसन था, उसमें कुछ खटमल थे और वे उन्हें काट रहे थे। तो उन्होंने पूछा कि क्या करना है? और उन्होंने कहा कि कानूनी पत्र आसन पर रख दो, वे सभी पुनर्जन्मित वकील हैं, वे सभी कानूनी पत्रों का सम्मान करते हैं। हा!.. हा!.. और वकील अपने ग्राहकों का रक्त चूस रहे हैं। तो जो लोग धार्मिक नहीं हैं, वे खटमल के रूप में जन्म लेते हैं। परंतु वे कानूनी पत्रों का सम्मान करते हैं! तो तमाल कृष्ण गोस्वामी ने कुछ कानूनी पत्रों को नीचे रखा और उस पर बैठ गए, और अब उन्हें और नहीं काटा गया! तो इस तरह यह भौतिक संसार एक ऐसा स्थान है जहां हम पुनः जन्म लेने हेतु विवश है। किंतु कृष्ण, वे आते हैं, प्रकट होते हैं और अदृश्य हो जाते हैं और वे भौतिक जगत के नियमों से बंधे नहीं हैं। जैसे राज्य का मुखिया कारागृह की जाँच करने जा सकता है कि वह कैसा है। परंतु वह कारागृह के नियमों के अधीन नहीं है। तो भीष्मदेव, वे बाणों की शय्या पर लेटे हुए थे, और इस स्थिति में भी उन्हें युधिष्ठिर और अन्य लोगों को दिव्य ज्ञान देना था, और कृष्ण चाहते थे कि भीष्मदेव की यह महिमा प्रकट हो। भीष्मदेव का कृष्ण के साथ वीर रस का संबंध था। और अपने शरीर को त्यागते समय, वे कृष्ण को उस भाव में देखना चाहते थे। और भीष्मदेव जानते थे कि कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी थी, जब, उन्होंने रथ का पहिया उठा कर भीष्म की ओर दौड़ पड़े थे, तो, भीष्मदेव भगवान् के उस रूप का दर्शन करना चाहते थे। भीष्मदेव महाजनों में से एक हैं। और वे भक्ति-योग की प्रक्रिया के विशेषज्ञ है। उसी तरह, हम चाहते हैं कि सभी भक्त कृष्ण भावनामृत में अत्यंत प्रवीण हों। और इस घटना से सभी को सीख लेना चाहिए। उन्हें सीखना चाहिए कि कैसे कृष्ण भावनामृत का प्रचार करना है। प्रचार करने के अनेक अवसर हैं।
अब महामारी की अवधि के दौरान, यह महत्वपूर्ण है कि लोग भगवान् के पवित्र नामों का जाप करें। यदि वे इस समय हरिनाम ग्रहण करते हैं, तो हम आशा करते हैं कि वे जीवन भर उसे जारी रखेगे। जब मैं अमेरिका गया तो मुझे एक शिष्य एक चर्च ले गया। न्यू जर्सी का यह चर्च अति महत्वपूर्ण चर्च था। इसे यूनिटेरियन यूनिवर्सलिस्ट चर्च कहा जाता है। और वे बाइबिल, गीता, कुरान, विभिन्न धर्मों का सम्मान करते हैं। सो मैं ने वहां जाकर पवित्र नाम की महिमा का प्रचार किया। और वे सब अत्यंत प्रसन्न थे! फिर मैं कैलिफोर्निया, सांता मोनिका, के एक चर्च में गया जो लगुना बिच में स्थित है। मैं नहीं जानता कदाचित ऑस्ट्रेलिया में, और कुछ देशों में इस प्रकार के चर्च उपलब्ध हैं। किंतु वे भक्ति-योग के बारे में, हरिनाम के बारे में सुनने के लिए अति इच्छुक हैं। उनका मानना है कि ईश्वर एक ही है। और यह कि सभी धर्म उसी एक ईश्वर की पूजा करते हैं।
तो, इस तरह, सभी प्रकार के लोगों को प्रचार करने के अवसर हैं। मैंने सुना है कि एक शिष्य ऑस्ट्रेलिया में एंग्लिकन पुजारी बन गया। वास्तव में मेरी मां एंग्लिकन चर्च की सदस्या थीं। जब उनका निधन हुआ तो मैंने चर्च में प्रचार किया, मुझे स्मरण है। उसने अपनी अस्थियो के कुछ अंश को गंगा में प्रवाहित करने का अनुरोध किया था। और कुछ राख अमेरिका में उनके संतानों के लिए छोड़ दी गई थी।
तो, जैसे भीष्मदेव सभी को एकजुट कर रहे थे, श्रील प्रभुपाद ने भविष्यवाणी की थी कि हरिनाम संकीर्तन द्वारा, हर कोई कृष्ण भावनाभावित हो जाएगा। और इस तरह हर कोई भक्तिमय सेवा करना चाहेगा। अब देखिए धर्म के कारण कितने प्रकार के युद्ध होते हैं। अतऐव लोग चाहते हैं कि विश्व में शांति हो। और यह चैतन्य महाप्रभु की प्रक्रिया से संभव है। भगवान् के सभी पवित्र नामों का जाप किया जा सकता है। और यह सभी लोगों को आध्यात्मिक चेतना में एकजुट कर सकता है। मलेशिया में ईसाइयों ने बाइबिल में शब्द बदल दिया और भगवान् का नाम बदल दिया और वहां अल्लाह डाल दिया। तो मुसलमानों ने विरोध किया, तुम अल्लाह का नाम क्यों लेते हो? किंतु फिर एक सांसद ने कहा, हमें हिंदुओं की तरह होना चाहिए, वे भगवान् के सभी नामों को स्वीकार करते हैं! तो, इस तरह, हम संपूर्ण विश्व को एक ईश्वर, एक पवित्र नाम के सार्वभौमिक धर्म में एकजुट करना चाहते हैं। तो कोई पूछ रहा था कि कृष्ण के पास दिव्य देह कैसे है? कई बार हम देखते हैं कि कृष्ण अर्जुन को भगवद् गीता की शिक्षा दे रहे हैं। कृष्ण का सुंदर युवा शरीर अति सुंदर है। क्या आप जानते हैं कि उनकी आयु कितनी थी? देवकी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए उन्हें 125 वर्ष हो गए थे। परंतु भगवान् वृद्ध नहीं होते। मैं एक शंकराचार्य से बात कर रहा था। और मैंने कहा कि "आपके पास अत्यंत आकर्षक राधा और कृष्ण के श्री विग्रह हैं। किंतु आप शारीरिक रूप से वृद्ध हैं"। उन्होंने कहा, "यह मेरी लीला है! मेरा मनोरंजन"। यह लीला हर कोई इस भौतिक जगत में कर रहा है! सब वृद्ध हो जाते हैं। परंतु कृष्ण, वे वृद्ध नहीं होते। क्योंकि उनके पास एक दिव्य आध्यात्मिक शरीर है, जो सद् चिद् आनंद है।
तो, इस तरह, कृष्ण इस भौतिक जगत में अपने स्वयं की इच्छा से आते हैं, एवं वापस जाते है । वे श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए। और वे हमारे साथ घुलमिल गये, वे नृत्य कर रहे थे, हमें आलिंगन कर रहे थे, रो रहे थे। हम व्यक्ति हैं, वे एक व्यक्ति है। किंतु हम केवल अपने शरीर के बारे में जानते हैं, परंतु वे हर ब्रह्मांड, हर शरीर के बारे में जानते हैं। तो हमारे पास सुअवसर है, हम उनके साथ जुड़ सकते हैं! भगवान् चैतन्य की कृपा से हमें यह अवसर प्रदान हुआ है। उन्होंने सभी को पवित्र नामों का सामूहिक संकीर्तन करने का निर्देश दिया था। यदि हम ऐसा करते हैं, तो हम भगवान् कृष्ण के साथ संबंध बना सकते हैं। एक मनुष्य जन्म के लिए यह कितना उत्कृष्ट अवसर है! निसंदेह, हमारी प्रवृत्ति भौतिक इन्द्रियतृप्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त रहने की होती है, परंतु वह आसुरी प्रकृति है।
मैं श्रीमद्-भागवतम् के तीसरे स्कंध में पढ़ रहा था, कि स्वायंभुव मनु सम्राट थे, मनु पूरे ब्रह्मांड के सम्राट थे। तो उनके पास भौतिक इन्द्रियतृप्ति का एक अत्यंत उच्च स्तर था। किंतु सामान्यतः इन्द्रियतृप्ति हमें निचली प्रजातियों में ले आती है। परंतु स्वयंभू मनु नीचे नहीं गिरे। क्योंकि उन्होंने अपने भौतिक जीवन का आनंद लिया, कृष्ण भावनाभावित हो कर। तो श्रील प्रभुपाद कह रहे थे कि आज लोग जीवन की सुख-सुविधाओं से प्रति अत्यंत आकृष्ठ हुए हैं। वे स्वायंभुव मनु के उदाहरण को भूल गए। निसंदेह, प्रति दिन प्रातः काल स्वर्गीय ग्रहों के गंधर्वों से वे भगवान् की महिमा और लीलाओं का गायन सुनते। उनके राजभवन में एक मंदिर था। और इस तरह वे सदा कृष्णमय रहते थे। यद्यपि उनकी एक पत्नी, संतानें, राज्य थे। उनके आनंद का स्तर उच्च था! परंतु उनका पतन नहीं हुआ। तो, श्रील प्रभुपाद कह रहे थे कि इस प्रकार, आधुनिक विश्व के लोग, यदि वे भक्ति योग का अभ्यास करते हैं, कदाचित गृहस्थों के पास गंधर्वों की मंडली नहीं हो, परंतु हमारे पास टेप रिकॉर्डर है! हमारे पास वीडियो प्लेयर हैं, हमारे घर में श्री विग्रह हैं, इसलिए हम कीर्तन कर सकते हैं, कृष्ण भावनामृत वीडियो देख सकते हैं। पति-पत्नी अपने घर में अर्चा विग्रहो की पूजा कर सकते हैं। इस प्रकार, वे पुनः भगवद धाम जा सकते हैं! वे सुख-साधन से रह सकते हैं। और वे कृष्ण भावनाभावित भी हो सकते हैं।
तो यह प्रक्रिया संसार में हर किसी के लिए संभव है! मेरा तात्पर्य है, ब्रह्मचारी, सन्यासी यह दूसरी बात है। यध्यपि सामान्य लोग साधु या सन्यासी नहीं बनना चाहेंगे। वे भी इस तरह कृष्ण भावनामृत में स्थित हो सकते हैं। हम जो कह रहे हैं वह अत्यंत ही व्यावहारिक है! लोगों को आरामदायक जीवन जीने दो, परिवार हो, उनके सभी सुख-सुविधाएं हों, परंतु कृष्ण भावनाभावित रहो। तो इस तरह, सारा विश्व कृष्ण भावनामृत का अभ्यास कर सकता है। जैसा कि आचार्यों ने सिखाया है, "गृहे थाको वने थाको सदा हरि बोले डाको"। चाहे आप घर में रहें या जंगल में, सदा हरि के पवित्र नामों का जाप करें। हरि बोल! गौरांग! नित्यानंद! हरि बोल!
तो हमारे पास दस मिनट है, मैं आपके प्रश्नो के उत्तर देने का प्रयास करूंगा।
कृपया कृष्ण भावनामृत आंदोलन के प्रचार में सहायता करें। यह कृष्ण भावनामृत सभी के लिए आवश्यक है।
सदानंद गौरनाम दास, स्वामी भाग, बांग्लादेश, बंगाली में प्रश्न: फलदायी गतिविधि और ज्ञान प्राप्त करना, इनमे और भक्तिमय सेवा में क्या अंतर है?
जयपताका स्वामी: आप देखते हैं, कर्म-कांड हमें कहते हैं कि इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करो। ज्ञान-कांड हमें निराकार ब्रह्म के बारे में बताता है। किंतु योग का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान से जुड़ना। कर्म-योग का अर्थ है कृष्ण के लिए कार्य करना। भक्ति-योग का अर्थ है कृष्ण को प्रसन्न करने में पूरी तरह से लीन हो जाना। तो भक्ति-योग, ज्ञान योग से ऊपर है। भक्ति-योग का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान। और ज्ञान योग का अर्थ है भगवान् के निराकार स्वरुप से जुड़ना।
बंगाली में प्रश्न: एक भक्त के लिए आध्यात्मिक गुरु की शरण में रहना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? दीक्षा लेने से पहले की गई जप और भक्तिमय सेवा, क्या वह भगवान् कृष्ण या चैतन्य महाप्रभु द्वारा स्वीकार किया जाएगा?
जयपताका स्वामी: शास्त्र कहते हैं कि भगवान् के पवित्र नाम का जप, आपके दीक्षा और अन्य शुद्धिकरण समारोहों की प्रतीक्षा नहीं करता है। परंतु कृष्ण, जप में आपकी सहायता करने के लिए एक गुरु भेजते हैं, आप इसे कृष्ण की कृपा के रूप में ले सकते हैं।
मरिचि दास, मलेशिया: कैसे भगवान् कृष्ण अपने आध्यात्मिक शरीर में आए। पांडवों, कौरवों, भीष्मदेव जैसे सहयोगियों के बारे में क्या, उनके पास आध्यात्मिक शरीर था या भौतिक शरीर था? एक साधारण व्यक्ति जो भगवान् का भक्त नहीं है, क्या वे भी कृष्ण को अपनी भौतिक आँखों से देख सकते है?
जयपताका स्वामी: उस समय की कृष्ण-लीला को प्रकट -लीला कहा जाता है। हर कोई उन्हें देख सकता था। किंतु जिन्होंने उन्हें देखा, उन्होंने उन्हें अलग-अलग भाव से देखा। जैसे कृष्ण जब कंस के क्षेत्र में मथुरा गए, तो सभी ने कृष्ण को अलग तरह से देखा। देवकी और वासुदेव ने कृष्ण को अपने प्रिय पुत्र के रूप में देखा। पहलवानों ने कृष्ण को एक वीर योद्धा के रूप में देखा। दिव्य योगियों ने कृष्ण को परमात्मा के रूप में देखा। और कंस ने कृष्ण को अपनी शाक्षात मृत्यु के रूप में देखा। ऐसे ही हर किसी ने कृष्ण को अलग प्रकार से देखा। साधारण लोगों ने कृष्ण को एक नवयुवक के रूप में देखा, वे प्रशिक्षित पहलवानों से कैसे लड़ रहे हैं! बू!... बू!... यह उचित नहीं है! बू!... बू!... तो इस तरह हर व्यक्ति कृष्ण को अलग प्रकार से देख रहे थे ।
कभी-कभी कृष्ण के सहयोगी वे अपने भौतिक शरीर के साथ दिव्यधाम जाते हैं। वे कहते हैं कि भगवान् चैतन्य के शिष्य तुकाराम को गरुड़ वाहन मैं विष्णुलोक ले जाया गया था। तो यह कहना कठिन है कि किसके पास आध्यात्मिक शरीर था, परंतु उनका शरीर दिव्य हो गया था।
सुकमल निताई दास, हबीगंज, बांग्लादेश: बंगाली में: भीष्मदेव ने अपने शरीर को छोड़ने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी। मेरा प्रश्न यह है कि महाभागवत् होने के कारण, क्या यह महत्वपूर्ण था कि उन्हें शुभ समय पर जाने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े?
जयपताका स्वामी: भीष्मदेव को आशीर्वाद या वरदान था कि वे जब चाहें अपना शरीर त्याग सकते हैं। तो इस तरह वह सभी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे। और इसके अतिरिक्त कृष्ण के उपस्थित होने से, उत्तरायण और भी शुभ हो गया। तो अब जब कि कृष्ण उनके सामने उपस्थित थे, इस स्थिति में अपना शरीर छोड़ना सबसे शुभ है। इसलिए, उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाया और उस विशेष क्षण पर अपना शरीर त्याग दिया।
जयपताका स्वामी: मैं भक्ति विजय भागवत स्वामी को देख रहा हूं, और मेरे सभी संदेह दूर हो गए हैं, बस उनके दर्शन करने से!
सुजीतेंद्रिय दास, मायापुर: बंगाली में: कुछ शास्त्रों में कहा गया है कि कृष्ण के जाने के बाद अर्जुन द्वारा भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था। यह आश्चर्य की बात है कि भगवान का शरीर दिव्य है, इस श्लोक में इसका उल्लेख है, किंतु साथ ही कुछ अन्य शास्त्रों में इसका उल्लेख है। हम इसे कैसे समझत सकते हैं?
जयपताका स्वामी: हम भागवत् पुराण को अमलम् पुराण के रूप में लेते हैं। और भागवत् पुराण कहता है कि कृष्ण वापस आध्यात्मिक जगत में चले गए। वह कुछ भी कर सकते है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में कभी-कभी बाण उन्हें छेद देते थे। और उनका रक्त बह रहा होता। इसलिए वे चाहे तो कुछ भी कर सकते है। परंतु वास्तव में, वे कभी नहीं मरते, वे कभी माया से प्रभावित नहीं होते। और कभी-कभी भौतिकवादियों को भ्रमित करने के लिए, वे अलग-अलग कार्य कलाप करते हैं। हम इन बातों से विक्षुब्ध नहीं हैं। हम चैतन्य-लीला में पढ़ रहे थे कि कैसे भगवान् चैतन्य वे कुएं में गिरे। परंतु उन्हें पता न नहिं था कि वे कुएं में है। वे प्रेमभाव में थे, परमानंद मैं! और पानी घी जैसा, मक्खन जैसा हो गया। तो, इस तरह वे मक्खन पर तैर रहे थे। और फिर अद्वैत आचार्य, और अन्य भक्तों ने उन्हें कुएं से बाहर निकाला। परंतु अपनी लीला में, उन्हें इस बात का कभी अनुभव नहीं हुआ। जब मुस्लिम राज्यपाल ने उन्हें देखा, तो उन्होंने कृष्ण और हरि के नाम का जाप करना शुरू कर दिया! और उसने उनसे कुछ सेवा की याचना की। तो, भगवान् चैतन्य का दर्शन से ही लोग बदल गए!
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