
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्-भागवतम् 1.12.2
तस्य जन्म महाबुद्धेः कर्माणि च महात्मनः।
निधनं च यथैवासीत्स प्रेत्य गतवान् यथा ॥
शब्दार्थ: महान सम्राट परीक्षित, जो एक अत्यंत बुद्धिमान और महान भक्त थे, उस गर्भ में कैसे जन्म लिया? मृत्यु किस तरह हुई? और मृत्यु के बाद उन्होंने कौन सी गति प्राप्त की?
तात्पर्य: कम से कम महाराज परीक्षित के पुत्र के जीवन काल तक, हस्तिनापुर (अब दिल्ली) का राजा सारे विश्व का सम्राट होता था। महाराज परीक्षित की रक्षा उनकी माता के गर्भ में भगवान् द्वारा की जा चुकी थी। अतएव वे एक ब्राह्मण पुत्र के शाप से अकाल मृत्यु से वे निश्चित ही बचाये जा सकते थे। चूँकि महाराज परीक्षित द्वारा राज्य सँभालने के बाद ही कलियुग ने अपना कार्य करना शुरू कर दिया था, अतएव इसका जो पहला कुलक्षण प्रकट हुआ, वह था इतने बुद्धिमान तथा भक्त राजा, महाराज परीक्षित का शापित होना। राजा तो असहाय नागरिकों का रक्षक होता है और उन सबका कल्याण, शान्ति तथा सम्पन्नता उसी पर निर्भर रहती है। दुर्भाग्यवश, पतित कलियुग के बहकावे में आकर, एक अभागे ब्राह्मण पुत्र द्वारा निर्दोष महाराज परीक्षित को लांछित कराया गया और इस तरह राजा को सात दिनों में अपनी मृत्यु के लिए तैयार होना था। महाराज परीक्षित, विष्णु द्वारा रक्षा किये जाने के लिए, विशेष रूप से विख्यात हैं। अतएव जब एक ब्राह्मण पुत्र ने उन्हें वृथा ही शाप दे डाला, तब भी यदि वे चाहते तो अपनी रक्षा के लिए भगवान् की कृपा का आवाहन कर सकते थे, किन्तु शुद्ध भक्त होने के कारण उन्होंने ऐसा नहीं करना चाहा। शुद्ध भक्त कभी भी भगवान् से अनावश्यक कृपा याचना नहीं करता। महाराज परीक्षित को ज्ञात था और अन्य लोगों को भी पता था कि ब्राह्मण पुत्र द्वारा दिया शाप अवैध है, किन्तु वे उसका प्रतिकार करना नहीं चाहते थे, क्योंकि वे यह भी जानते थे कि कलियुग का शुभारम्भ हो चुका है और इस युग का पहला लक्षण भी, अत्यन्त प्रतिभावान ब्राह्मण जाति के पतन के साथ प्रकट हो चुका है। वे काल-प्रवाह के मार्ग में बाधक बनना नहीं चाह रहे थे, अपितु वे खुशी-खुशी और उचित ढंग से मृत्यु वरण करने के लिए तैयार मृत्यु के लिए तैयारी करने के लिए उन्हें कम से कम सात दिन का समय मिला था। अतएव उन्होंने इस समय का सदुपयोग परम सन्त तथा भगवद्भक्त शुकदेव गोस्वामी के सान्निध्य में किया।
जयपताका स्वामी: तो, नैमिषारण्य के ऋषि महान सम्राट परीक्षित के बारे में और अधिक जानना चाहते थे। और उन्होंने कृष्ण और पांडवों की विभिन्न लीलाएं सुनी थीं। कृष्ण ने द्वारका नगरी में कैसे प्रवेश किया, उन्होंने इन सभी लीलाओं का श्रवण किया था। किंतु अब वे महाराज परीक्षित के बारे में मूल प्रश्न पर आ रहे हैं। तो, परीक्षित महाराज को एक ब्राह्मण बालक ने श्राप दिया। यह वास्तव में उचित नहीं था। परीक्षित महाराज, यदि वे चाहते तो कृष्ण से उन्हें बचाने के लिए प्रार्थना कर सकते थे। किंतु, वे एक शुद्ध भक्त थे, अतएव उन्होंने कृष्ण से कोई भौतिक लाभ की कामना नहीं की। तो, अनुचित कार्य करने वाले इस ब्राह्मण बालक ने भी दिखाया कि कलियुग आ गया है। अब कलि का यह युग कलह और समस्याएँ पैदा करता है। बांग्लादेश की तरह, हिंदू और मुसलमान आपस में शांति और सौहार्दपूर्ण ढंग से रहते हैं। किंतु तभी अचानक सोशल मीडिया में कोई छोटी सी बात आ जाती है और कलि का युग आकर अपना प्रभाव दिखाता है। और वे कहते हैं कि ईश्वर से प्रेम करो, इसके विपरित वे विभिन्न धर्मों से घृणा करते हैं। अतएव सभी धार्मिक लोगों को इस दुष्कर्म के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। आस्था से घृणा वास्तव में मार देती है। बांग्लादेश में यद्यपि हिंदुओं को प्रताड़ित किया जाता है। न्यूजीलैंड में कुछ मुसलमानों को एक मस्जिद में मार दिया गया। आयरलैंड, प्रोटेस्टेंट कैथोलिकों से लड़ रहे थे। तो हाल ही में अफगानिस्तान में, सुन्नी बहुसंख्य हैं और उनमें से कुछ ने किसी तरह शिया मस्जिदों पर बमबारी करवा दी। उसी तरह, पूरे विश्व में आस्था से घृणा है। और यह निर्दोष लोगों को मारते है। अतः हमारा अनुरोध है कि जो भी लोग वास्तव में धार्मिक हैं, वे इस प्रकार की आस्था से घृणा का विरोध करें।
तो, यह वह स्थिति थी जिसे परीक्षित महाराज ने देखा, कि कलियुग प्रारम्भ हो चुका था। उन्हें सात दिवस में मृत्यु को प्राप्त करना था, अतः वह सात दिवस के बाद मृत्यु के लिए तैयारी करने लगे। वह शांत थे और वह प्रसन्न थे और उनके समक्ष शुकदेव गोस्वामी की अति उत्तम संगति थी। वह भगवान कृष्ण और उनके विभिन्न अवतारों की लीलाएं सुन सकते थे। हमें नहीं ज्ञात है, हम सभी को मरना है, हमें यह शरीर छोड़ना है, हमें नहीं ज्ञात है कि कब? भगवद गीता हमें अवगत कराती है कि हम शाश्वत हैं। हम शाश्वत, अविनाशी आत्मा हैं। और इस संसार में हमें जितने भी शरीर मिलते हैं, उन सबकी एक सीमा होती है। तो ब्रह्मदेव, उनका जीवन हमारे जीवन की तुलना में अतिशय दीर्घ है। और, एक दिन हम यहाँ मायापुर में छत पर टहल रहे थे। हम श्रील प्रभुपाद के साथ थे, और हम कुछ चींटियों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाते हुए देख रहे थे। श्रील प्रभुपाद ने कहा, जैसे हम इन चींटियों को देखते हैं और सोचते हैं कि वे इतने लंबे समय तक नहीं रहती हैं। इस तरह, स्वर्ग के देवता, वे हमें देखते हैं और हम उनके लिए छोटी चींटियों के सदृश हैं और उन्हें लगता है कि ये लोग लंबे समय तक जीवित नहीं रहेंगे, क्योंकि हमारा एक वर्ष उनका एक दिवस है। तो इस तरह, हम सौ साल या नब्बे साल जी सकते हैं। वह उनके सौ दिवस हैं। जैसे तीन महीने। या तीन महीने क्या रहता है, चूहा या मूसक? यह सब सापेक्ष है। परंतु इस भौतिक जगत में हर किसी का जन्म और मृत्यु होता है। उनकी गणना के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सौ वर्ष तक जीवित रहता है। और ब्रह्मदेव सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं। किंतु उनका एक दिन हजार युग का होता है। और प्रत्येक चतुर-युग ४३२,००० वर्ष का होता है। तो हमारे लिए यह अति दीर्घ काल है। उन हजारों चतुर-युगों में से एक ब्रह्मा का एक दिन है। एक हज़ार। तो हम गंभीरता से कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करके अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कलि को नहीं पता कि इस तरह से कृष्ण की सेवा में जुड़ने होने का क्या परिणाम होता है। इसलिए भगवद गीता कहती है कि जो लोग अल्प बुद्धिमान होते हैं, वे भौतिक लाभ के लिए जाते हैं। यह भौतिक संसार में जो भी सुख और सुविधाएं हैं कदाचित ये सब अत्यंत अस्थायी हैं। तो संभवतः, जो लोग भगवान में विश्वास करते हैं, वे संभवतः पर भगवान से कुछ टिमटिमाती भौतिक सुविधाओं के लिए पूछते हैं। वे फलदायी इच्छा या मानसिक अटकलों के बिना भगवान की सेवा नहीं करते हैं।
अतएव, कृष्ण कहते हैं कि शुद्ध भक्त अति, अत्यंत दुर्लभ है। किंतु यदि कोई इस तरह से कृष्ण की सेवा करता है, शुद्ध अवस्था में अगर कोई भक्ति सेवा में संलग्न होता है, तो उसे दिव्य आध्यात्मिक आनंद मिलता है। फिर उसके पास वही है जो कोई कहता है, परमानंद! इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे भक्त जीवन के वास्तविक लाभ को समझें जो भगवान चैतन्य हमें देते हैं। कुछ लोग वैरागी हो सकते हैं और कुछ लोग गृहस्थ हो सकते हैं। परंतु उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि भौतिक जगत में स्थायी समाधान है। श्रील प्रभुपाद ने एक बार कहा था कि यह भौतिक संसार सज्जन पुरुष और सज्जन स्त्रीयों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। यहां विशेष रूप से इस कलियुग में कई तरह की समस्याएं हैं। परंतु यह भौतिक संसार, कृष्ण कहते हैं, पुनर्जन्म का स्थान है।
भगवद गीता 8.15:
“मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्र्वतम्
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः”
तो मुझे प्राप्त करने के बाद महान आत्माएं या योगी भक्त कभी भी इस अस्थायी जगत में नहीं लौटते हैं, जो दुखों से भरा है। क्योंकि, उन्होंने आध्यात्मिक जगत में सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त की है। तो हम यही चाहते हैं, सभी लोगों को परमगति प्राप्त करनी चाहिए। किंतु माया अति शक्तिशाली है। माया हमें भ्रमित करती है, हम सोचते हैं कि हम भौतिक संसार में सुख प्राप्त कर सकते हैं। सुख होगा और संकट भी होगा। परंतु कुछ भी पूर्ण नहीं है। तो, हमें अपनी बुद्धि पर ध्यान देना चाहिए कि हम कृष्ण की सेवा कैसे कर सकते हैं? कलियुग के प्रभाव के कारण लोग अन्य धर्मों से घृणा कर रहे हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि हमें भगवान से प्रेम करना चाहिए। पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर, भगवान वास्तव में, हर धर्म कहता है कि हमें प्रेम करना चाहिए। परंतु भक्ति-योग हमें सिखाता है कि यह कैसे करना है। अन्यथा, हम वास्तव में कृष्ण से प्रेम नहीं करते, हम भौतिक वस्तु से प्रेम करते हैं। हम कृष्ण के निकट जाते हैं और कहते हैं कि मुझे धन दो, और मुझे अनुयायी दो और विभिन्न भौतिक लाभों के लिए उन्हें तंग करते हैं। मैं एक ईसाई उपदेशक को सुन रहा था। उन्होंने लोगों से अधिक वेतन पाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने को कहा। सभी लोग, वे अपनी क्रय सूची के साथ सर्वोच्च भगवान के पास जाते हैं। वे अति प्रसन्न होते हैं जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं या जब हम कहते हैं कि कृपया कृष्ण, कृपया राधा, कृपया मुझे अपनी सेवा में सम्मिलित करें! तो यही जीवन का मूल उद्देश्य है, राधा और माधव की सेवा करना। तो परीक्षित महाराज ने ऐसा ही किया जब उन्हें पता चला कि उनके पास जीवन के लिए मात्र सात दिवस ही शेष हैं। हम नहीं ज्ञात है कि हमारे पास सात दिवस, सात साल या सात सेकंड हैं। किंतु हमें विश्वास है कि हमें शरीर छोड़ना है। शत प्रतिशत निश्चित! यह घृतक्रीड़ा नहीं है! हम कब जाएंगे, यह निश्चित नहीं है। किंतु हमें शरीर तो छोड़ना होगा, यह निश्चित है।
चैतन्य-चरितामृत मध्य-लीला १९.१४९ में यह कहता है:
कृष्ण-भक्त-निष्काम, अतएव ‘शांत’
भक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी-सकली ‘अशांत’
क्योंकि एक शुद्ध भक्त केवल कृष्ण की सेवा करना चाहता है, वह शांत है। जो लोग भौतिक भोग के इच्छा रखते हैं, जो मुक्ति या रहस्यवादी शक्ति चाहते हैं, वे शांतिपूर्ण नहीं हैं। जो लोग रहस्यवादी शक्ति के इच्छुक हैं वे भी शांत नहीं हैं। तो यदि हम जीवन में वास्तविक शांति चाहते हैं, तो हमें हरे कृष्ण का जप करना चाहिए। हमें शुद्ध भक्त बनना चाहिए। मैं ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, बांग्लादेश में भक्तों को देखकर अति प्रसन्न हूं। हमें समझना चाहिए कि यह भौतिक जगत वह स्थान नहीं है जहां हम रहना चाहते हैं, हम कृष्ण के साथ रहना चाहते हैं। यदि हम सोचते हैं कि भौतिक ऐश्वर्य अति उत्तम है, तो हमें सोचना चाहिए कि अगर यह भौतिक संसार इतना समृद्ध है, तो इस संसार का निर्माता कितना उत्कृष्ट होगा। हमारे अधम कर्मों के कारण हमारी पापी गतिविधियाँ महामारी, चक्रवात और भूकंप और कई अन्य समस्याएं हैं। हम नवीन जगत बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं - जैसे श्री प्रभुपाद कह रहे थे कि अटलांटिक महासागर को पार करते हुए हम गिरते हैं और यदि हम कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि समुद्र को शांतिपूर्ण बनाएं, यह समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान यह है कि हम समुद्र को छोड़कर सूखी भूमि पर आ जाएं। हमें भौतिक संसार को छोड़ देना चाहिए और भगवान के परम व्यक्तित्व के साथ उनके शाश्वत निवास में रहना चाहिए। तो नैमिषारण्य में ऋषि, वे परीक्षित और भगवान कृष्ण के बारे में सुनना चाहते थे, इसलिए वे अत्यंत भाग्यशाली थे। हर दिवस, हमें कुछ समय कृष्ण के बारे में सुनने या पढ़ने में व्यतीत करना चाहिए।
तो, कल हमने एकादशी की थी। और अब कई लोग कार्तिक मास का पालन कर रहे हैं। और कुछ लोग पूर्णिमा तक प्रतीक्षा करते हैं। तो इस प्रकार, दामोदर का यह मास भगवान को दीप चढ़ाने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। चूंकि, अब आज की कक्षा का समय समाप्त हो गया है। मैं कुछ प्रश्नो के उत्तर दूंगा और फिर मंदिरों में जाऊंगा। तब मैं लोगों को उनके घरों में देखूंगा।
भक्ति विजय भागवत स्वामी: अति उत्तम कक्षा! मेरे पास प्रश्न है। यद्यपि आपने कार्तिक-व्रत के बारे में उल्लेख किया है कि कार्तिक-व्रत का सर्वोत्तम प्रकार से पालन कैसे करें और दीपक कैसे अर्पित करें? किसी ने कहा कि तुलसी के साथ दीपक चढ़ाएं, कोई चढ़ाने के लिए नहीं कहता है। कुछ भक्त अत्यंत सख्ती से व्रत का पालन करते हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि चार मासों में आपको मात्र चार वस्तुओं से बचना चाहिए। अधिक लोग बीन्स, परवल(पोटल), गाजर न लेते हुए अत्यंत सख्ती से पालन करते हैं। कार्तिक-व्रत का पालन कैसे करें, और सर्वोत्तम प्रकार से और भगवान दामोदर को प्रसन्न करें और उनकी भक्ति प्राप्त करें।
जयपताका स्वामी: आप देखते हैं, कि कम से कम हमें उड़द-दाल नहीं खानी चाहिए। हम और भी बहुत कुछ कर सकते थे, हम हविश्यान्न खा सकते थे या अपने आहार को विभिन्न प्रकारो से सीमित कर सकते थे। अब श्रील प्रभुपाद उलाहना देंगे कि यदि कोई किसी विशेष व्रत का पालन नहीं कर रहा है, तो मात्र दाढ़ी और बाल उगाने से कोई लाभ नहीं होगा। एक वर्ष हम गायों की तरह बिना हाथों का उपयोग किए फर्श से खिचड़ी उतार रहे थे, उस समय हमने अपनी दाढ़ी रखी थी। तो कोई क्या करना चाहता है, वह वैकल्पिक है। और कोई अधिक कर रहा है, उन्हें गर्व नहीं करना चाहिए या दूसरों की आलोचना नहीं करनी चाहिए जो अधिक नहीं कर रहे हैं। न्यारे होने के लिए हम ज्यादा कर सकते हैं, परंतु सेवा कम नहीं करनी चाहिए। जहां तक दामोदर-पूजा में तुलसी की टहनी चढ़ाने की बात है, पद्म पुराण में कहा गया है कि अगर हम भगवान कृष्ण को तुलसी का दीपक चढ़ाते हैं, तो हमें एक सौ अग्नि यज्ञों का फल मिलता है, और सौ गायों को दान में देना। साथ ही, उसी पुराण में यह उल्लेख है कि यदि हम तुलसी पर कृष्ण को दीपक अर्पित करते हैं, तो यह एक करोड़ या दस लाख दीपक के बराबर है। मुझे आशा है कि आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया, महाराज?
भक्ति विजय भागवत स्वामी: हाँ गुरु महाराज, आपने अत्यंत उत्तम प्रकार से समझाया है और जो कुछ आपने कहा है, मैं दूसरों के साथ साझा करूंगा। हरे कृष्ण!
जयपताका स्वामी: निसंदेह, वे अभी भी पुस्तकें वितरित कर सकते हैं!
हरिहर कृष्ण चैतन्य दास: यदि पिछले संस्कारों के कारण, कोई दुर्गा-पूजा जैसे त्योहारों से जुड़ा हुआ है, तो क्या यह उनकी कृष्ण भावनामृत में बाधा डालता है? कृपया प्रबुद्ध करें प्रिय गुरु महाराज।
जयपताका स्वामी: आप देखिए, हमने कुछ प्राचीन दुर्गा पंडाल आयोजकों से वार्ता की और उन्होंने कहा कि उनके पास शालीग्राम-शिला है, और वे पहले शिला की पूजा और तत्पश्चात दुर्गा देवी को प्रसाद देते हैं। तो उस तरह की पूजा अधिकृत है। यदि आप कुछ भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए देवी या कुछ देवताओं की पूजा करना चाहते हैं, तो यह हमारी भक्ति सेवा में बाधा डाल सकता है। अंतिम प्रश्न
सुजीतेंद्रिया दास: यदि दुर्गा पूजा पंडालों में कुछ भक्त दुर्गा जाते हैं और वे दुर्गा को कृष्ण की बहन मानते हैं, तो इस तरह दुर्गा हमारी पिसी-मा है, क्योंकि वह श्री पद्मनाभ सहोदरीम हैं, उस मानसिकता के साथ, अगर भक्त जाकर सम्मान देते हैं क्या वह अधिकृत है?
जयपताका स्वामी: हम दुर्गा देवी को कृष्ण की ऊर्जा के रूप में देखते हैं। और इसी तरह हम दाहिनी ओर से अपना सम्मान देते हैं। हम समझते हैं कि शिव पवित्र धाम के क्षेत्रपाल हैं और उनकी ऊर्जा, शक्ति, दुर्गा देवी, वह रक्षक हैं।
(बंगाली मैं) जो लोग कृष्ण की सेवा नहीं करते या नहीं करना चाहते हैं या भक्ति सेवा में सम्मिलित नहीं होना चाहते हैं, क्या हम उनके नाम पर या उनके लाभ के लिए दीपक चढ़ा सकते हैं, और ऐसा करने से, क्या उन्हें धीरे-धीरे उन्हें भक्तिमय सेवा करने की इच्छा होगी?
जयपताका स्वामी: हम परिणाम किसी को भी दे सकते हैं। वे कृष्ण को स्वीकार करते हैं या नहीं, यह उनकी स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है। तो यह चोट नहीं पहुंचा सकता है, परंतु इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वे स्वीकार करेंगे। तो अब मैं कुछ मंदिर देखूंगा।
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