मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्-भागवतम् १.१०.३३-३५
अथ दूरागतान् शौरिः कौरवान् विरहातुरान् ।
सन्निवर्त्य दृढं स्निग्धान् प्रायात्स्वनगरीं प्रियैः ॥
शब्दार्थ: संगियों के साथ भगवान् कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ स्नेहवश कुरुवंशी पाण्डव उन्हें विदा करने के लिए उनके साथ काफी दूर तक गये।
तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा: वे भावी विछोह के विचार से अभिभुत थे। किन्तु भगवान् ने उनसे घर लौट जाने का आग्रह किया और स्वयं अपने प्रिय संगियों के साथ द्वारका की ओर रवाना हुए।
कुरुजाङ्गलपाञ्चालान् शूरसेनान् सयामुनान् ।
ब्रह्मावर्तं कुरुक्षेत्रं मत्स्यान् सारस्वतानथ ॥
मरुधन्वमतिक्रम्य सौवीराभीरयोः परान् ।
आनर्तान् भार्गवोपागाच्छ्रान्तवाहो मनाग्विभुः ॥
शब्दार्थ: हे शौनक, तब भगवान् कुरुजांगल, पाञ्चाल, शूरसेन, यमुना के तटवर्ती प्रदेश, ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, सारस्वत, मरुप्रान्त तथा जल के अभाव वाले भाग से होते हुए आगे बढ़े। इन प्रान्तों को पार करने के बाद वे सौवीर तथा आभीर प्रान्त पहुँचे और अन्त में इन सबके पश्चिम की ओर स्थित द्वारका पहुँचे।
तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा: भगवान् जिन-जिन प्रान्तों से होकर गये, वे उस समय भिन्न नाम से जाने जाते थे. परंतु जो दिशा दी गई है उससे यह सूचित होता है कि वे दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, सौराष्ट्र तथा गुजरात से होकर यात्रा करते हुए, अन्त में अपने निवास स्थान द्वारका पहुँचे। हमें उन दिनों से आज तक इन प्रान्तों के समानार्थी प्रान्तों के नाम ढूँढने से कोई लाभ मिलने वाला नहीं, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पाँच हजार वर्ष पूर्व भी, राजस्थान का मरुस्थल तथा मध्यप्रदेश जैसे जल के अभाव वाले प्रान्त विद्यमान थे। मृदा विशेषज्ञों का यह सिद्धान्त कि मरुस्थल हाल ही में विकसित हुए, भागवत के कथन से पुष्ट नहीं होता। हम इस विषय को भूगर्भ विज्ञानियों द्वारा खोजे जाने के लिए छोड़ देते हैं, क्योंकि परिवर्तनशील ब्रह्माण्ड में भूगर्भीय विकास की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। हमें प्रसन्नता है कि भगवान् अब कुरु-प्रान्त से अपने निजी प्रान्त द्वारकाधाम में पहुँच गये हैं। कुरुक्षेत्र वैदिककाल से विद्यमान है, अतः जब व्याख्याकार कुरुक्षेत्र के अस्तित्व को नकारते हैं, तो यह उनकी निरी मूर्खता प्रतीत होती है।
जयपताका स्वामी: हम देखते हैं कि पांडव, कुरु वंश का हिस्सा थे। (जब भगवान द्वारका जा रहे थे) स्नेह के कारण वे भगवान् के कुछ दूर तक साथ गए। फिर भगवान् ने उनको वापस जाने का अनुरोध किया। तो भगवान् द्वारका कैसे गए, इसका उल्लेख यहां किया गया है । ये सभी भारत के हिस्से हैं, अब इनका एक अलग नाम हो सकता है लेकिन ये ( बृहद) भारत के हिस्से हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने भारत वर्ष की इस भूमि पर अपने चरण कमलों को रखा। पांडव हमेशा भगवान् के बारे में सोच रहे थे। और उनके समर्पण के कारण, उन्हें प्रभु की लीलाओं में भाग लेने की अनुमति दी गई।
तो हमें भी भगवान् के भक्ति-योग में भाग लेना चाहिए। भक्ति-योग की प्रक्रिया यह है कि व्यक्ति हर समय चौबीसों घंटे भगवान् का चिंतन करता है। और भक्ति-योग की प्रक्रिया से हम हमेशा भक्ति सेवा में सक्रिय रहते हैं। भक्ति सेवा की नौ अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और भक्त को भक्ति सेवा की एक या दूसरी प्रक्रियाओं में संलग्न होना चाहिए। अब मैं कीर्तन गा रहा हूं। कीर्तन विभिन्न प्रकार का होता है, अब मैं भगवान् की महिमागान कर रहा हूं जो कि एक अन्य प्रकार का कीर्तन है। और आप सब सुन रहे हैं और यह भी भक्ति सेवा की प्रक्रियाओं में से एक है। यदि तुम दिन में प्रभु का स्मरण करते हो, तो वह है स्मरणम् । और फिर यदि तुम भगवान् से प्रार्थना करते हो, तो दण्डवत करना, वह वंदनम है। और पाद सेवनम् भगवान् की किसी प्रकार से सेवा कर रहा है। कदाचित प्रभु के लिए भोजन बनाना, या संभवत: पुस्तक वितरण करना। तुम कोई शारीरिक सेवा कर रहे हो, कदाचित तुम मंदिर की सफाई कर रहे हो। आप अपने घर की सफाई कर सकते हैं, जब की आपके घर में एक मंदिर है, इसलिए यह भगवान् का स्थान है। ब्रह्मचारी वे यदि मंदिर की सफाई कर रहे हैं या कुछ आध्यात्मिक गतिविधियाँ कर रहे हैं। जो गृहस्थ हैं, उन्हें अपनी सारी गतिविधियाँ कृष्ण को केंद्र में रख कर करनी चाहिए । या तो बालकों की देखभाल करना या कोई अन्य गतिविधि करना, यह सोचकर कि मैं यह कृष्ण के लिए कार्य कर रहा हूँ । तो इस तरह आप भगवान् की पूजा करते हैं जो कि अर्चनम् है। तुम अपने आप को कृष्ण का सेवक समझते हो, वह दास्यं है । और यदि मैं यह सोचता हूँ कि भगवान् मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, तो वह साख्य है, मित्रता। और इस तरह, जब हम सब कुछ भगवान् के चरण कमलों में समर्पित करते हैं, अर्थात् आत्म-निवेदनम्, अपने आप को भगवान् के चरण कमलों में समर्पित करना।
आप देखिये, जैसे पांडवों की एक विशेष स्थिति थी, वे पहले से ही भगवान् की लीलाओं का हिस्सा थे और कृष्ण से अत्यधि जुड़े हुए थे । तो जब हम भक्ति सेवा के साथ शुरू करते हैं, हम विधि-मार्ग का पालन करते हैं । हो सकता है कि हमें प्रभु के लिए स्वाभाविक स्नेह न हो, लेकिन हम अभ्यास करते हैं। और भगवान् के लिए निरंतर भक्ति सेवा करने से, भगवान् के प्रति हमारी आसक्ति बढ़ेगी। भक्ति के अमृत ग्रंथ, भक्ति-रसामृत-सिंधु में, यह उल्लेख किया गया है कि वैधि-भक्ति की प्रक्रिया के भीतर, रागानुग-भक्ति नामक एक अवस्था होती है। जब आप सोचते हैं कि अपनी सेवा को कैसे उत्तमतर बनाया जाए। जब कि मैं अपनी भक्ति सेवा इस प्रकार करूँगा कि मैं इसे उच्च स्तर पर पहुँचाना चाहूँ। अन्य सभी योग, वे हर समय पूरी तरह से निश्चित नहीं होते हैं। लेकिन भक्ति सेवा करने से आप हमेशा कृष्ण भावनामृत में स्थिर रहते हैं ।
तो, हम जानते हैं कि ब्रह्मचारी होना बहुत अच्छा है । किंतु सब एक जैसे नहीं होते। और कोई परिवार के साथ रहना और गृहस्थ बनना पसंद कर सकता है। और विवाहित लोग दो प्रकार के होते हैं - गृहमेधी और गृहस्थ। एक दिन मैं मायापुर मैं श्रील प्रभुपाद के साथ चल रहा था। और कुछ बैल केंद्रदंड के चारों ओर घूम रहे थे और वे अपने पैरों से पौधे से निकले हुए मूंग की भूसी अलग कर रहे थे। तो श्रील प्रभुपाद ने कहा, इस दंड को क्या कहा जाता है? इसे कहते हैं माई-दंड, स्त्री की छड़ी! गृहमेधी इधर-उधर घूम रहे है परंतु उसका ध्यान केवल इन्द्रियतृप्ति पर है। जब की गृहस्थ एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। उनके पास कुछ इन्द्रियतृप्ति का अधिकारिता हो सकती है, परंतु वे ऐसा कृष्ण भावनाभावित तरीके से करते हैं । इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे विवाहित लोग गृहस्थ हों। शास्त्र कहता है कि पुरुष के लिए स्त्री नरक का द्वार है। और स्त्री के लिए पुरुष नरक का द्वार है। यदि वे केवल यह देख रहे हैं कि पुरुष या स्त्री इन्द्रियतृप्ति के साधन हैं । क्योंकि जो पुरुष अपनी पत्नी से आसक्त होता है तो फिर वह एक महिला के रूप में अपना अगला जन्म लेता है। और जब स्त्री अपने पति से ममत्व रखती है तो फिर वह अगला जन्म पुरुष के रूप में लेती है। परंतु जब वे दोनों कृष्ण भावनाभावित हैं तो यह डर नहीं है । क्योंकि, उन्हें भगवान् कृष्ण के प्रति अधिक आसक्ति होगी ।
हम भागवतम् में पढ़ रहे थे, कैसे देवहुति, वापस भगवान् के पास गई । उसने अपने पति की सेवा की और दाम्पत्य जीवन से उसे दस संतानें हुए। परंतु वह वापस भगवान् के पास वापस गई। ध्रुव महाराज की माता सुनीति, वह भी भगवान् के पास वापस चली गईं। इसी तरह हम चाहते हैं कि हमारे सभी पुरुष और हमारी सभी महिलाएं भक्ति-योग विशेषज्ञ हों। हम चाहते हैं कि वे सभी भगवान के पास जाएं। मैंने श्रील प्रभुपाद से कहा कि मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं, जन्म- जन्मांतर । उन्होंने कहा, तुम मुझे वापस क्यों लाना चाहते हो? मुझे लगा कि क्या मैंने कुछ गलत कहा? क्या मैंने सही बात नहीं कही? तब मैंने कहा, मैं जन्म- जन्मांतर के बाद भी आपकी सेवा करना चाहता हूं। तब श्रील प्रभुपाद मुस्कुराए। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे शिष्य भक्ति सेवा में बहुत सक्रिय रहें।
प्रत्येक अवतार, भगवान् के प्रत्येक अवतार की एक विशेष मनोदशा होती है। जैसे भगवान नरसिंहदेव उग्र भाव में हैं, भगवान वराहदेव ने सांसारिक ग्रह मां भूमि को गर्भोदक सागर की अगाध गहराई से बाहर निकाला। भगवान् रामचंद्र आदर्श राजा थे। भगवान् कृष्ण भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। और भगवान् चैतन्य और पंच-तत्त्व सभी को बचाने के लिए नीचे आए, क्योंकि वे पतित-पावन हैं, सभी पतित लोगों को बचाने के लिए । जितना अधिक कृष्ण भावनामृत का विस्तार हुआ, उतना ही अधिक कृष्ण के प्रेम ने संसार में बाढ़ ला दी । तो इस तरह, हम मदद कर सकते हैं, हम इस हरिनाम संकीर्तन को फैलाकर भगवान की सेवा कर सकते हैं । कुछ पुस्तकें बांट रहे हैं। कुछ नामहट्ट का प्रचार कर रहे हैं। कुछ भक्ति-वृक्ष के कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। बहुत सारे माताजी और प्रभु हैं जो भक्ति-वृक्ष कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। तो इस तरह यह सोचकर कर करे कि हम दूसरों को कृष्ण भावनाभावित होने में कैसे मदद कर सकते हैं । तो इस तरह हम भगवान् चैतन्य और पंचतत्व की मदद कर रहे हैं । वे चाहते हैं कि पवित्र नाम दुनिया के हर शहर और गांव में फैले। श्रील प्रभुपाद गौर-वाणी का प्रसार कर रहे थे। तो इस तरह, हम भगवान् चैतन्य के संदेश वितरण मैं सहायता कर सकते हैं। तो, उस तरह मैं उन सभी ब्रह्मचारियों और गृहस्थों का अत्यन्त आभारी हूं, जो सोच रहे हैं कि कृष्ण भावनामृत कैसे प्रचारित किया जाए । जब मैं ब्रह्मचारी कहता हूं, इसमें वानप्रस्थ और संन्यासी शामिल हैं ।
तो भगवान् चैतन्य की मनोदशा यह थी कि कृपा कैसे दी जाए । उन्होंने हरिदास ठाकुर को बताया कि कैसे सभी यवन मुक्त हो सकते हैं। और हरिदास ठाकुर ने कहा, कृपया चिंता न करें, वे भी मुक्त हो जाएंगे । आप देखते हैं कि एक भक्त की यही मनोदशा होती है, वे भगवान् की इच्छा को संतुष्ट करना चाहते हैं। जैसे जब कृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका गए, तो युधिष्ठिर ने भगवान् की रक्षा के लिए चार अक्षौहिणी या सैनिकों के चार दल भेजे। अब एक दृष्टि से कवचित यह आवश्यक न रहा हो। परन्तु उन्होंने ऐसा भगवान् के प्रेम के कारण किया। तो इस तरह, भगवान् चैतन्य चाहते हैं कि सभी को मुक्ति मिले। सभी भक्त को यह सोचना चाहिए कि हम सभी लोगों को भक्ति-योग, भक्ति सेवा की ओर कैसे आकर्षित कर सकते हैं। तो जैसे श्रील प्रभुपाद ने एक भक्त बनाने के लिए कहा, यह रक्त की डोल लेता है । किसी के लिए भक्त बनना सरल नहीं है।
भगवद् गीता कहती है, कि हम यह शरीर नहीं हैं, हम आत्मा हैं । किंतु सामान्यत: लोग सोचते हैं कि वे शरीर हैं। और वे इस शरीर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करते हैं। परंतु वे यह नहीं जानते कि देह-अभिमानी होने से वास्तव में उन्हें कष्ट होता है। क्योंकि इन्द्रियाँ न केवल सुख का स्रोत हैं, बल्कि दुःख का भी स्रोत हैं। जैसे, गर्म मौसम में पंखा अच्छा होता है, लेकिन ठंड के मौसम में सुखदायक नहीं होगा। जैसे इन्द्रियाँ सुख देती हैं, वैसे ही दुख भी देती हैं।
इसलिए हम चाहते हैं कि लोग उच्च स्वाद विकसित करें। हम कृष्ण का हिस्सा हैं । जब हम कृष्ण को प्रसन्न करते हैं, तो हम भी आनंदित हो जाते हैं । अगर कृष्ण थोड़े प्रसन्न हैं, तो हम सूनामी की तरह आनंदित और प्रसन्न हो जाते हैं ।
जब वे चैतन्य महाप्रभु का वर्णन हुसैन शाह से कर रहे थे तो वे कह रहे थे की कैसे उनकी आँखों से आँसू गंगा जल के समान प्रवाहित हो रहे थे, और वह छह घंटे तक हँस रहे थे!
छह घंटे तक कौन हंस सकता है?! कौन प्रदर्शन कर सकता है इस प्रकार ?
वह परमानंद से प्रसन्न और आनंदित होने के कारण अत्यंत उन्मादित होकर ऐसा कर रहे थे।
भारत में कुछ सार्वजनिक उद्यानों में हास्य सभाऍं होती हैं। हा ...हा... हा ...हा...! (अट्टहास्य)
वे सब वहां प्रतिदिन दस मिनट के लिए हंसते हैं। परंतु छह घंटे? गौरांग! गौरांग!
जब हुसैन शाह ने यह सुना, तो आश्चर्यचकित होकर उनकी आँखें जैसे बाहर निकल आईं!
उन्होंने कहा कि यह चैतन्य महाप्रभु, भगवान(खुदा ) से भिन्न नहीं होने चाहिए। तब उन्होने आदेश दिया की अब कोई भी भगवान् चैतन्य को नहीं सताएगा ।
तो हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हम चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में हैं । चैतन्य-भागवत में एक श्लोक है: यध्यपि हो नित्य-लीला करे गौर-राय, कोना कोना भाग्यवान देखी बारे पाय ।निसंदेह आज भी, भगवान् चैतन्य, भगवान् गौर राय अपनी शाश्वत लीलाएं कर रहे हैं और कुछ भाग्यशाली आत्माएं, वे इसे देख पा रहे हैं।
कुछ दिनों में, हम प्राकट्य दिवस मना रहे हैं, श्रील प्रभुपाद की व्यास-पूजा । और भगवान् चैतन्य ने भविष्यवाणी की थी कि वे पांच सौ वर्षों के बाद वे अपने सेनापति-भक्त को भेजेंगे। और वह विश्व भर में संदेश लाएगा। तो किसी तरह यथासंभव, हम भगवान् चैतन्य की मदद कर सकते हैं, चाहे वह कासदेश हों, या वे जो ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर, बांग्लादेश में रहते हों। इसलिए हमें यह देखना चाहिए कि हर कोई पवित्र नाम का जप करे। मायापुर में एक व्याख्यान में, श्रील प्रभुपाद ने कहा कि १९०० में सदी के मोड़ पर कलकत्ता में एक गंभीर प्लेग आया था। और यह कि कुछ बाबाजी ने हरे कृष्ण का जप करवाया । केवल हिंदू ही नहीं, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी भी जपा कर रहे थे। इस तरह वे सभी इस प्लेग से बच गए। लेकिन श्रील प्रभुपाद ने समझाया कि कुछ भौतिक लाभ के लिए हरिनाम का जप करना आपत्तिजनक है।
लेकिन भक्तों को हमेशा कहना चाहिए, "यदि भगवान् चाहें तो", पहले।
लेकिन भले ही दूसरे लोग आपत्तिजनक जप करें, कुछ सीमा तक उन्हें लाभ होगा। यदि कोई अपराध के साथ भी जप करता है, तो भविष्य मैं वह शुद्ध नामों का जाप कर सकेगा।
अब यह COVID-19 महामारी बढ़ती जा रही है, नए भिन्न रूप मैं। इसलिए हमें पूरे विश्व में पवित्र नामों का जप करना चाहिए। यद्यपि वे हरे कृष्ण महा-मंत्र का जाप नहीं करना चाहते हैं तो वे भगवान् के अन्य नामों का जाप कर सकते हैं।
वैसे भी, हम देखते हैं कि कैसे पांडव हमेशा कृष्ण भावनाभावित थे, हम आशा करते हैं कि आप सभी हमेशा कृष्ण भावनाभावित होंगे । यदि आपके कोई प्रश्न हैं, तो मैं लगभग पांच मिनट के लिए उत्तर दूंगा।
बंगाली: एक उपदेशक, एक परामर्शदाता और मंदिर प्राधिकरण की चेतना और मनोदशा क्या होनी चाहिए?
जयपताका स्वामी: एक ध्यान रखें - कृष्ण को कैसे प्रसन्न करें, आध्यात्मिक गुरु को कैसे प्रसन्न करें । सोचो कैसे अभ्यर्थी कृष्ण भावनाभावित हो सकते हैं ।
बंगाली: सुकमला नित्यानंद दास, इस्कॉन हबीबगंज: श्रील प्रभुपाद ने पूरे विश्व को कृष्ण भावनामृत से भर दिया। और पहले भी कई धार्मिक प्रचारकों ने ऐसा करने की कोशिश की है। लेकिन उनमें से कोई भी सफल नहीं हो सका। इस सफलता का विशेष चरित्र क्या था जो श्रील प्रभुपाद की सफलता के पीछे काम कर रहा था? और हम सफलता के साथ श्रील प्रभुपाद की सेवा में कैसे संलग्न हो सकते हैं?
जयपताका स्वामी: श्रील प्रभुपाद समझा रहे थे कि उनके शुभ विजय के लक्षण क्या थे। वह हमेशा गुरु-परंपरा का पालन कर रहे थे। वह अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का अक्षरश: अनुसरण करते थे, व्यावहारिक रूप से हर शब्द हर अक्षर । तो ऐसे ही अगर हम श्रील प्रभुपाद और अपने गुरुदेव के आदेश का पालन करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हमें यह सारी सफलता मिलेगी। अंतिम सवाल।
श्रीगुरु भक्ति देवी दासी, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया: गुरु महाराज, मैं जीवन के बाद जीवन और यहां तक कि जीवन के बाद जीवन के बीच के अंतर को नहीं समझ पा रहा हूं।
जयपताका स्वामी: आप देखते हैं, जीवन के बाद जीवन का अर्थ है भौतिक जगत में जन्म लेना । यहां तक कि जीवन के बाद जीवन का अर्थ है, हम लौटकर भगवान् के पास जा सकते हैं। किंतु यदि हम नहीं जाते हैं, तब भी हम श्रील प्रभुपाद की सेवा करना चाहते हैं । यदि हम आध्यात्मिक जगत में जाते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से भगवान् की सेवा करेंगे।
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