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20211108 श्रील प्रभुपाद तिरोभाव इस्कॉन मलेशिया और पर्थ को उद्बोधन

8 Nov 2021|हिन्दी|प्रभुपाद कथा|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्रीगुरुम् दीन तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी: तो इस तिरोभाव तिथि का, हम श्रील प्रभुपाद को श्रद्धासुमन अर्पित कर पालन करते हैं । इस तिरोभाव तिथि पर हम विशेष रूप से उस विरासत के बारे में सोचते हैं, जो निर्देश श्रील प्रभुपाद पीछे छोड़ गए। वास्तव में, चूंकि हम जानते हैं कि श्रील प्रभुपाद ने पूर्णता प्राप्त की थी, हम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। साथ ही, चूंकि हम उनकी संगति से वंचित हैं, हम कुछ विरह अनुभव करते हैं। तो, मैंने देखा कि कैसे श्रील प्रभुपाद, हर रात, आधी रात से प्रात: काल तक, ग्रंथ लिख रहे थे, वह अनुवाद कर रहे थे, अपनी पुस्तकों को डिक्टेट ( बोल कर रिकॉर्ड) कर रहे थे। वे अपना भक्तिवेदांत अभिप्राय लिख रहे थे। उनके अभिप्राय ऐसे थे कि, उन्होंने यह नहीं कहा कि कृष्ण ने यह या वह कहा, उन्होंने दिशा निर्देश दिए। और उन्होंने अपना अवलोकन, अपना अनुभव, अपनी अनुभूति प्रस्तुत की। अतः, उन्होंने अगले दस हजार वर्षों के लिए अपने निर्देश दिए है। तो हर कोई उनकी पुस्तकों के माध्यम से श्रील प्रभुपाद के साथ जुड़ सकता है और उन्होंने कहा कि मुझे आशा है कि मैं अपनी पुस्तकों के माध्यम से आपके साथ रहूँगा। तो भक्तों, हमें उनके दिव्य साहित्य को पढ़कर श्रील प्रभुपाद के साथ नियमित रूप से जुड़ना चाहिए।

श्रील प्रभुपाद कह रहे थे कि दूसरी दीक्षा (ब्राह्मिणिक) कैसे प्राप्त करें, भक्तिशास्त्री प्राप्त करने के बाद । संन्यास पाने के लिए भक्ति-वैभव होना चाहिए । एक पत्र में उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक गुरु या दीक्षा-गुरु होने के लिए, व्यक्ति के पास भक्ति-वेदांत की उपाधि (डिग्री) होनी चाहिए। किसी ने कहा, ओह, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। दरअसल, भक्ति-वेदांत की डिग्री कार्यक्रम वृंदावन में लगभग दस वर्ष पहले और मायापुर में लगभग सात वर्ष पहले प्रारंभ हुई थी। यह स्वाभाविक है कि श्रील प्रभुपाद ऐसा नहीं कर सके क्योंकि यह तब विकसित नहीं किया गया था। दरअसल, श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि हमें भक्ति-सर्वभौम और चैतन्य की शिक्षाओं का अध्ययन करना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि भक्ति-सर्वभौम अभी उपलब्ध है । तो, मुझे मायापुर संस्थान की  "संप्रदाय वैभव" के उद्घाटन में भाग लेने में प्रसन्नता हुई। और वे श्रील प्रभुपाद लीलामृत और पिछले आचार्यों के विषय में पढ़ाएंगे । तो इस तरह, सभी को पढ़ना चाहिए, अध्ययन करना चाहिए, श्रील प्रभुपाद को उनकी शिक्षाओं के माध्यम से जानना चाहिए ।

जब श्रील प्रभुपाद मायापुर में थे, मैं हर दिन उनके साथ चलता था,  कभी सड़क पर चलते थे, कभी पगडंडी में, कभी गंगा के किनारे। उन्होंने अत्यंत रोचक बात कही कि गंगा में स्नान करते हुए उन्होंने कहा कि निर्जला उपवास के दिन गंगा में डुबकी लगाते हुए पानी नहीं लेना चाहिए। यह बहुत रहस्यमयी लग रहा था - इसका क्या अर्थ था? कुछ दिनों में हम निर्जला का पालन करते हैं। तब हम नदी में स्नान करते हैं, और हम पानी मैं हैं (डुबकी / गोता लगाते है) और हम पानी पी लेते हैं, और हम सोचते हैं कि कोई मुझे नहीं देखेगा! किंतु वास्तव में, कृष्ण हमारे हृदय में परमात्मा के रूप में मौजूद हैं । वह सब कुछ देख रहे है जो हम करते हैं। हम कृष्ण से  छल नहीं  कर सकते ! तो श्रील प्रभुपाद कहेंगे कि उपवास के दिन पानी के भीतर पानी न पिएं (डुबकी / गोता लगाते हुए) । तो ऐसे श्रील प्रभुपाद अपने दैनिक निर्देश देते थे। ऐसे में वह अत्यंत दयालु थे।

 एक बार मार्ग पर चलते हुए उन्होंने एक व्यक्ति को देखा और उन्होंने उससे पूछा कि तुम क्या करते हो? वह झुक कर प्रणाम किया और उसने कहा, मैं एक हथकरघा कार्यकर्ता (वस्त्र बुनकर) हूँ। तो श्रील प्रभुपाद ने कहा कि वह एक चतुर्थ श्रेणी के व्यक्ति हैं । प्रथम श्रेणी, ब्राह्मण, द्वितीय श्रेणी क्षत्रिय, तृतीय श्रेणी वैश्य, चतुर्थ श्रेणी शूद्र या कार्यकर्ता। ये सभी चार वर्ग अच्छे हैं, वे सभी कृष्ण की सेवा में लगे हो सकते हैं । पांचवी क्लास नहीं! तो उस तरह श्रील प्रभुपाद शिखा रहे थे और वे अति उदार-चित्त थे । वह अपने आप को सभी लोगों को दे रहे थे। मायापुर में शाम के 4 से 6 बजे तक उनकी खुले द्वार की नीति थी और जो कोई भी चाहता वह आकर उनसे मिल सकता था। एक पुलिस अधिकारी, वह आया और उसने कहा कि मुझे दीक्षा चाहिए । श्रील प्रभुपाद ने पूछा, तुम कितने माला जप करते हो? उन्होंने कहा, 8 क्योंकि मैं अत्यंत व्यस्त हूं। श्रील प्रभुपाद ने कहा, नहीं, आपको 16 माला जप करना चाहिए। जैसे श्रील प्रभुपाद एक ओर बहुत दयालु थे और दूसरी ओर वे बहुत सख्त थे। श्रील प्रभुपाद, पूर्व आचार्यों की सभी भविष्यवाणियों, उनके सभी निर्देष , सभी इच्छाओं को पूरा करना चाहते थे। पूर्व आचार्य वैदिक तारामंडल का मंदिर (TOVP) चाहते थे, वे उसे पूरा करना चाहते थे।

इसी तरह, वे देखना चाहते थे कि कृष्ण भावनामृत का संदेश जगत के हर नगर और गांव में फैले। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उन्हें पुस्तकें छापने के लिए कहा था, इसलिए उन्होंने स्वयं को पुस्तकें छापने के लिए समर्पित कर दिया। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने कहा कि संस्थान सुचारू रूप से चलाने के लिए एक जीबीसी (GBC) होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने जीबीसी की स्थापना की। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने कहा, गुरु होने की कोई सीमा नहीं है। तो श्रील प्रभुपाद ने कई आध्यात्मिक गुरुओं की इच्छा व्यक्त की। उस तरह श्रील प्रभुपाद की एक अलग दृष्टि थी । उनकी दृष्टि पूरी तरह से सभी पूर्व आचार्यों की दृष्टि से तादात्म्य रखती थी। अतः हम कृष्ण कृपामूर्ति श्रील प्रभुपाद दिव्य कृपा के मिशन और इच्छा की सेवा में स्वयं को समर्पित कर रहे हैं। इस तरह, हमें देखना चाहिए कि कृष्ण भावनामृत विश्व के हर नगर और गांव में फैलती है। हरे कृष्ण!

मैंने सुना है कि भूरिजन प्रभु और चेकितान प्रभु पर्थ मैं उपस्थित हैं। मैं उन्हें विनम्र प्रणाम अर्पित करता हूं। तो आज मैंने सोचा कि मुझे विभिन्न तिरोभाव तिथि महोत्सव में भाग लेना चाहिए । मैं इस त्योहार को मनाने के लिए भक्तों को धन्यवाद देता हूं। हरे कृष्ण!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by अजित मधुसूदन दास द्वारा
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