मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारिणम् ।
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय राधा माधव! जय पंचतत्व! जय प्रह्लाद नरसिंहदेव! सभी एकत्रित भक्तों की जय।
अब तक हमने श्रील प्रभुपाद , जननिवास प्रभु , जीवनाथ प्रभु , और भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी को सुना। तो श्रील प्रभुपाद ने व्यक्त किया कि उनकी इच्छा है कि उनकी पुस्तकों का वितरण किया जाए । मैंने मायापुर में देखा, प्रभुपाद अपनी पुस्तकें लिखते, अपनी पुस्तकों का मध्यरात्रि से प्रातःकाल तक अनुवाद करते और उनकी इच्छा थी कि उनकी पुस्तकें सभी लोगों तक पहुँचे। मैंने जीवनाथ प्रभु से सुना, हमने उनसे सुना कि हमें किस प्रकार चिंतन में रहना चाहिए। हमने जननिवास प्रभु से सुना कि हम किस प्रकार पुस्तकों के वितरण से अर्चाविग्रहों की सेवा कर सकते हैं ।
किस प्रकार सुभद्रा देवी और अर्जुन के पौत्र परीक्षित महाराज ने विश्व को भागवतम् प्रदान करने हेतु अपना जीवन समर्पित कर दिया था। जैसे कि, राजापुर में जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के विग्रह हैं। सुभद्रा के पौत्र परीक्षित महाराज हैं, मेरा अभिप्राय है कि उनके स्वयं के पौत्र ने जीवन का परित्याग किया जिसके फलस्वरूप श्रीमद्भागवतम् अभिव्यक्त हुआ और भगवद्गीता स्वयं भगवान कृष्ण ने सुनाई है । मैंने श्रील प्रभुपाद की मेज पर भगवद्गीता देखी, पुनः मैंने श्रील प्रभुपाद से पूछा, "क्या भगवद्गीता एक मूलभूत ग्रंथ है?" उन्होंने कहा, "प्रचार करने हेतु आपको भगवद्गीता का अध्ययन करना ही होगा ।"
वैसे भी, मायापुर में हमारे पास लगभग 7,000 भक्त हैं । जब मैं अस्वस्थ अवस्था में दिल्ली के चिकित्सालय में था। मैं इस रहस्य का साक्षी हूँ कि क्यों कभी-कभी दिल्ली हमें पराजित कर देती है। दिल्ली मंदिर के अध्यक्ष, वे सबके पास जाते हैं, प्रत्येक भक्त, प्रत्येक भक्ति-वृक्ष, प्रत्येक नामहट्ट, प्रत्येक संकीर्तन भक्त के पास जाते हैं और उनसे प्रतिज्ञा करवाते हैं। देखिए, एक प्रौढ़ व्यक्ति ने 5,000 गीता की प्रतिज्ञा की । वह रेड लाइट पर खड़े रहते और कारों के निकट खड़े हो जाते है और उनसे कहते "मैं तब तक नहीं जाऊँगा जब तक आप भगवद्गीता नहीं ले लेते!" वह इतने दृढ़ है। तो जीवनाथ प्रभु ने पूछा, "200 रुपये कौन देगा?" परंतु मैं जीवनाथ प्रभु, भक्ति विजय भागवत स्वामी से अनुरोध करूँगा कि उनको सभी के पास जाकर प्रतिज्ञा करवानी चाहिए "वे कितनी पुस्तकें वितरित करेंगे?" आपको और कुछ नहीं सोचना है, हमारे समुदाय में गृहस्थ अपने परिवारजन और मित्रों को पुस्तकें वितरित कर सकते हैं। निश्चित रूप से कुछ भक्त पुस्तकें वितरित करने के लिए नवद्वीप या कृष्णनगर या निकट के किसी नगर में जाये। यदि वे कम से कम एक पुस्तक की प्रतिज्ञा लेते हैं, जिसका अर्थ है, 7,000 गीता । मुझे लगता है, भक्तों के पास इतने सारे लोग हैं जो दिसंबर के महीने में मायापुर आते हैं, बहुत से तीर्थयात्री । इसलिए, कुछ लोग यहाँ मंदिर प्रागण में पुस्तकें बाँट सकते हैं। उनसे कई बार संपर्क किजीए , " क्या आप एक पुस्तक खरीद सकते है? " आप इसे दिखाइए, पुनः आप उन्हें छोड़ दीजिए । यही एकमात्र विधि है। यदि आप मायापुर परिसर में आते हैं, तो आपको एक पुस्तक खरीदनी होगी । हमने कितनी पुस्तकों की प्रतिज्ञा की हैं? प्रत्येक स्थानीय भक्त, सभी 7,000, उन्हें कुछ प्रतिज्ञा करनी चाहिए।
हमने भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी से सुना है कि ऐसा नही है कि केवल समर्पित पुस्तक वितरक ही वास्तविक वितरक हैं, अपितु सभी वितरक हैं। सभी को सोचना चाहिए, "दिसंबर के इस मास में मैं कितनी पुस्तकें दान कर सकता हूँ! मैं कितना वितरण कर सकता हूँ?" जैसा कि जीवनाथ प्रभु ने उल्लेख किया है, हमें चिंतन करना चाहिए, मुझे लगता है कि मैं 100 कर सकता हूँ तो मुझे दोगुना, 200, की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए । इससे मैं गीता वितरण के चिंतन में रहूँगा । तो इस प्रकार हम देख सकते हैं कि हम कितनी पुस्तकें वितरित कर सकते हैं? लोगों को सोचने दें कि वे यह कैसे कर सकते हैं?
और हमने भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी को भी सुना, वे कह रहे थे कि पुस्तक वितरण वृद्धि के लिए TOVP क्या करेगा? तो, इस अवधि में बहुत से लोग आएंगे और उन्हें प्रभुपाद का यह संदेश देने का एक सुअवसर है । उन्हें भगवद्गीता प्रदान करें ताकि वे इसे पढ़ सकें और उन्हें कृपा प्राप्त हो सके ... हम उनको कितने समय तक प्रचार कर सकते हैं? यदि वे गीता पढ़ते हैं, तो वे कई दिवस और कई सप्ताह तक अध्ययन कर सकेंगे । तो, यह एक महान अवसर है।
दिल्ली यात्रा का प्रत्येक सदस्य इसमे भाग लेता है। अब हम देखना चाहेंगे कि मायापुर का हर सदस्य भगवद्गीता वितरण मैराथन में भाग लें। यह हमारा परमानंद है। हम चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन आंदोलन में हैं । प्रभुपाद ने कहा है कि मायापुर कुछ विशेष है। उन्होंने कहा, कैसे योगपीठ एक जन्मस्थान है, परंतु मायापुर मंदिर कर्म-स्थान है। गीता में कृष्ण ने कहा: "जन्म कर्म च मे दिव्यं" । उनके पास जन्मस्थान हो सकता है और हमारे पास कर्म-स्थान है - हमें क्रियाओं को कर्मस्थली की सेवा में लगाना चाहिए । तो, मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा … बोलने के लिए और भी लोग हैं किंतु मैं इसका उल्लेख करना चाहता हूं कि सभी को एक प्रतिज्ञा लेनी चाहिए, कि वे कितनी पुस्तकें वितरित करेंगे।
जैसा कि जीवनाथ प्रभु ने कहा, हमारी मैराथन आज से प्रारम्भ हो रही है अतः हम इसे और अधिक बढ़ाना चाहते हैं। और मैं अत्यंत आभारी हूँ कि सभी भक्त भाग ले रहे हैं, यहाँ तक कि जो भक्त व्यक्तिगत रूप से यहाँ उपस्थित नहीं हैं, मुझे आशा है कि वे वस्तुतः देख रहे हैं। और वे यह भी कर सकते हैं, मैं नहीं जानता कि कैसे, MCS मायापुर सामुदायिक सेवा सेवकों की भी प्रतिज्ञा प्राप्त करके, उन्हें भक्ति विजय भागवत स्वामी और जीवनाथ प्रभु को बताना चाहिए। किसी न किसी प्रकार हमें हर किसी को पुस्तक वितरण के चिंतन के आनंद में नियोजित करना चाहिए।
यशोदा और गोपियाँ, वे चिंता में रहती कि कृष्ण के कोमल चरण वृंदावन के कंकड़ से चोटिल हो सकते हैं । हमें चिंता में रहना चाहिए कि इस जगत में इतने सारे लोग पीड़ित हैं, जिन्हें श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों की आवश्यकता है और यदि वे यहाँ आते हैं, तो उन्हें कृपा मिल सकती है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद!
हरे कृष्ण!
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