मुकं करोती वाचालम पंगुं लंघयते गिरीम
यत-कृपा तम अहम् वन्दे श्री-गुरुम दीन- तारणम
परमानंद: माधव: श्री चैतन्य ईश्वरम॥
हरि ओम तत सत ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्-भागवतम् १.१०.११-१२
सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः ।
कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥११॥
तस्मिन्यस्तधियः पार्थाः सहेरन् विरहं
कथम् दर्शनस्पर्शसंलापशयनासनभोजनैः ॥१२॥
शब्दार्थ: सत्-सङ्गात्- शुद्ध भक्तों की संगति से; मुक्त-दुःसङ्गः - बुरी भौतिक संगति से; मुक्त हातुम् – परित्याग करने के लिए; न उत्सहते-कभी प्रयास नहीं करता है; बुधः - भगवान् को समझनेवाला; कीर्त्यमानम्- यशोगान करता; यशः– ख्याति; यस्य- जिसका; सकृत्- मात्र एक बार; आकर्ण्य - केवल सुनकर; रोचनम्- प्रसन्न करके; तस्मिन् - उसमें ; न्यस्त धिय: - जिसने अपना मन उनको अर्पित कर रखा है; पार्था:- पृथा के पुत्र सहेरन्- सह सकते हैं; विरहम् - वियोग; कथम्–कैसे; दर्शन–आमने सामने देखते हुए; स्पर्श- स्पर्श करते हुए; संलाप– परस्पर बातें करते; शयन- सोते; आसन-बैठते; भोजनै:- एक साथ भोजन करते
वह बुद्धिमान जिस ने शुद्ध भक्तों की संगति से परमेश्वर को समझ लिया है और भौतिक कुसंगति से अपने को छुड़ा लिया है, वह भगवान् के यश को सुनने से चूकेगा नहीं; उसने चाहे उनके विषय में एक ही बार क्यों न सुना हो तो भला, पाण्डव उनके वियोग को कैसे सह पाते? क्योंकि वे उनसे घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित थे, वे उन्हें साक्षात् अपने समक्ष देखते थे, उनका स्पर्श करते थे, उनसे बातें करते थे और उन्हीं के पास सोते, उठते-बैठते तथा भोजन करते थे।
तात्पर्य : जीव की स्वाभाविक स्थिति अपने से वरिष्ठ की सेवा करना है। उसे इन्द्रिय-तृप्ति की विभिन्न अवस्थाओं में, माया की आज्ञाओं का पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ता है और इन्द्रियों की सेवा करने में वह कभी थकता नहीं। यदि वह थक भी जाय, तो माया उसे इन्द्रियों की सेवा करने के लिए निरन्तर बाध्य करती है और कभी सन्तुष्ट नहीं होती। ऐसे इन्द्रियतृप्ति व्यापारों का कोई अन्त नहीं है और बद्धजीव छूटने की आशा के बिना ऐसी सेवा में उलझा रहता है। छुटकारा केवल तभी मिलता है, जब शुद्ध भक्तों की संगति होती है। ऐसी संगति से वह धीरे धीरे अपनी दिव्य चेतना की ओर उन्नत होता है। इस प्रकार वह जान सकता है कि उसकी शाश्वत स्थिति भगवान् की सेवा करने के लिए है, विकृत इन्द्रियों की काम, क्रोध, प्रभुत्व जताने इत्यादि की इच्छा पूर्ति के लिए नहीं है।
भौतिक समाज, मित्रता तथा प्रेम कामवासना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। घर, देश, परिवार, समाज, सम्पत्ति तथा अन्य वस्तुएँ भौतिक जगत् में बन्धन के कारणस्वरूप हैं, जहाँ तीन प्रकार के ताप बने हुए हैं। शुद्ध भक्तों की संगति से तथा विनीत भार से उनका श्रवण करने से भौतिक भोग के प्रति आसक्ति कम होती है और भगवान् के दिव्य कार्यकलापों के विषय में सुनने के प्रति आकर्षण की प्रधानता होती है। एक बार आकर्षण उत्पन्न हो जाने पर वह बिना रुके चलता रहता है, जिस प्रकार बारूद की आग। ऐसा कहा गया है वि श्री हरि दिव्य रूप से इतने आकर्षक हैं कि जो आत्म साक्षात्कार द्वारा अपने आप में ही सन्तुष्ट है और वास्तव में सारे भव-बन्धनों से मुक्त हो चुके हैं, वे भी भगवान् के भक्त बन जाते हैं।
ऐसी परिस्थिति में यह भलीभाँति समझा जा सकता है कि पाण्डवों की क्या स्थिति हुई होगी, जो भगवान् के नित्य संगी थे? वे श्रीकृष्ण के वियोग की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, क्योंकि निरन्तर व्यक्तिगत सम्पर्क के कारण उनका आकर्षण अत्यधिक प्रगाढ़ था। शुद्ध भक्त के लिए भी उनके रूप, गुण, नाम, यश, कार्यकलाप आदि का स्मरण इतना आकर्षक होता है कि वह संसार के सारे रूप, गुण, नाम, यश, कार्यकलाप भूल जाता है और शुद्ध भक्तों की परिपक्व संगति के कारण वह क्षण भर के लिए भी भगवान् के सम्पर्क से दूर नहीं होता।
जयपताका स्वामी: आज हम श्रीमद-भागवतम वर्ग से पढ़ रहे हैं कि पांडव कैसे भगवान कृष्ण से विरह का अनुभव कर रहे थे। चूंकि वे लगातार कृष्ण को देख रहे थे, कृष्ण के साथ बात कर रहे थे, कृष्ण के साथ बैठे थे, कृष्ण को छू रहे थे। भले ही जब कोई कृष्ण को एक बार देख लेता है, वह उनके प्रति आकर्षित हो जाता है, तो उन पांडवों की क्या बात करें जो प्रतिदिन उन्हें देख रहे थे?
चारों कुमार विष्णुलोक गए। उन्होंने भगवान नारायण, विष्णु को देखा और उन्हों ने झुक कर प्रणाम किया। जब उन्होंने विष्णु के चरण कमलों में दंडवत प्रणाम किया तब विष्णु के चरण कमलों में रखी तुलसी की सुगंध उनके नथुने में प्रवेश कर गई और उस सुवास से उनको अलौकिक अनुभव हुआ। वे पहले ही मुक्त थे लेकिन भगवान को देखकर वे भक्त बन गए। तुलसी को सूंघकर वे परमानंद का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने अपने ब्रह्मभूत अवस्था में उस परमानंद का अनुभव कभी नहीं किया। तब उन्होंने अनुभव किया कि विष्णु ब्रह्म से श्रेष्ठतर थे। भले ही ब्रह्म भगवान विष्णु का शारीरिक तेज है। लेकिन भगवान के व्यक्तित्व की वह अनुभूति अवैयक्तिक अनुभूति से कहीं अधिक है। मैं श्रीमद-भागवतम में पढ़ रहा था कि कैसे लाखों और लाखों मुक्त आत्माएं, और लाखों सिद्ध पुरुष, सिद्ध जीव, लगभग मुक्त हो गए थे। लेकिन शुद्ध भक्त दुर्लभ है, दुर्लभ है। आज प्रातःकाल हम श्रील प्रभुपाद के उद्धरण पढ़ रहे थे, उन्होंने कहा कि इस युग में मंदिर बनाने से बेहतर भक्त बनाना है। मंदिर बनाना अच्छा है, लेकिन मंदिर का असली फल यह है कि हमारे कितने शुद्ध भक्त हैं।
भक्त और अभक्त में क्या अंतर है? भगवान का भक्त भगवान की प्रेमपूर्ण भक्ति में संलग्न रहता है, और वह भगवान को प्रसन्न करना चाहता है। लेकिन जो अभक्त वह अपने को इन्द्रियतृप्ति में लगना चाहता है और अपने परिवार, दोस्तों, प्रकृति और शरीर से जुड़ी हर, सभी चीजों में संलग्न होना चाहता है,। जब रघुनाथ दास भगवान चैतन्य के पास आत्मसमर्पण करने के लिए पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि वे नीलांचल में भगवान चैतन्य के सहयोगी बनना चाहते हैं। लेकिन चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि पारिवारिक जीवन को छोड़ना सही नहीं है। एक स्त्री की तरह, जिस एक एक प्रेमी भी है, वह अपने घरेलू कर्तव्यों का बहुत ही कुशलता से निर्वश करेगी। परंतु उसका मन हमेशा अपने प्रेमी में लीन रहेगा। भगवान चैतन्य ने सलाह दी, रघुनाथ दास को निर्देश दिया, अपने घरेलू कर्तव्यों को सावधानी से करें परंतु कृष्ण पर अपना ध्यान केंद्रित रखें । मैं ज़ूम विज़िट पर कई गृहस्थ देखता हूं, उनके घर में सुंदर विग्रह हैं। कैसे वे एक साथ देवताओं की पूजा करते हैं, पति और पत्नी एक साथ, और अपने संतानों को कृष्ण के प्रति अवगत करने का प्रयास करते हैं । तो इस तरह अगर हम कृष्ण के प्रति अधिक आसक्त हो जाते हैं, तो हमारा जीवन परिपूर्ण हो जाता है ।
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और इसलिए हमारा मानव जीवन हमारी ईश्वरीय चेतना को जगाने का एक अवसर है। तो, वर्णाश्रम प्रणाली के मानदंडों के अनुसार, वैश्य, स्त्रिय:, शूद्र (व्यापारी, महिलाएं, श्रमिक) उन्हें बहुत उन्नत नहीं माना जाता है। लेकिन भगवद गीता ९.३२ कृष्ण बताते हैं कि जो लोग उनकी शरण लेते हैं, वे लाभान्वित होते हैं ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥३२॥
हे पार्थ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शुद्र (श्रमिक) क्यों न हों, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं |
हरीबोल! तो यहाँ कृष्ण बताते हैं कि उनकी शरण लेना कितना अद्भुत है । उनका क्या जो वर्णाश्रम में नहीं हैं ? जो शूद्र से नीचे हैं, उन्हें क्या आशा है?
श्रीमद्-भागवतम् के २.४.१८ में कहा गया है:
किरात हूणान्ध्र पुलिन्द पुल्कशा आभीर शुम्भा यवनाः खसादयः।
येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥
किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कश, आभीर, शुम्भ, यवन, खस आदि जातियों के सदस्य तथा अन्य लोग, जो पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए परम शक्तिशाली भगवान् के भक्तों की शरण ग्रहण करके शुद्ध हो सकते हैं, मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ।
तो हूण वे पूर्वी जर्मनी के क्षेत्र से, रूस के उस हिस्से से आते हैं जिसे हूणों के प्रांत के रूप में जाना जाता है। मेरे दोनों दादा-दादी इस प्रशिया, पूर्वी जर्मनी/ रूस में पैदा हुए थे। इसके बाद वे अमेरिका चले गए। एक और पापी जगह। लेकिन अभय चरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की दया से, मेरा उद्धार हुआ। तो इस तरह, यवन, खसादयः चीनी, कोरियाई, जापानी जाति के लोग, मुझे लगता है कि वे सभी खसादयः के अंतर्गत आते हैं। लेकिन उनका भी उद्धार किया जा सकता है, कोई बात नहीं।
मैंने अभी-अभी एक स्नातक कार्यक्रम में भाग लिया जहाँ १८ जापानी भक्तों ने भक्ति शास्त्री कार्यक्रम से स्नातक किया। अब पूरी दुनिया का ध्यान ओलिंपिक देखने के लिए जापान पर है। मैंने जापानी भक्तों से कहा कि उनका भक्ति शास्त्री पुरस्कार स्वर्ण पदक से उत्तमतर है। हरीबोल! हरीबोल! हरीबोल!
अब हमें अपनी भौतिक इच्छाओं के कारण इस भौतिक जगत में बार-बार जन्म लेना पड़ता है। लेकिन अगर हमें भगवान के चरण कमलों के लिए आकर्षण है तो हम वापस भगवान के पास लौट सकते हैं। बृहद भगवतमृत में नारद मुनि यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सबसे बड़ा भक्त कौन है। इस तरह उन्होंने विभिन्न भक्तों से संपर्क किया। प्रह्लाद महाराज एक महान भक्त हैं । मैं सभी भक्तों की नाम भूल रहा हूं, लेकिन एक भक्त से दूसरे भक्त, ढूंढते ढूंढते आखिर उन्हे बताया गया कि पांडव सबसे बड़े भक्त है, तो नारद मुनि उन्हे मिलने के लिए गए। उस समय सभी पांडव मिलकर एक विशेष मंत्रणा कर रहे थे। उनका विषय क्या था? उनकी चर्चा थी कि कैसे हम सभी कृष्ण के चरण कमलों से जुड़े रह सकते हैं ? हम कृष्ण को हमारे स्थान पर कैसे वापस ला सकते हैं ? तो हम बता सकते हैं कि हम पर हमला किया जा रहा है। तो वह काम तो कम करेगा नही, कृष्ण पहले ही सभी दुश्मनों को मार चुके हैं । और वे विभिन्न तरीकों पर चर्चा कर रहे थे, कृष्ण को कैसे लाया जाए, मैं कृष्ण को फिर से देखना चाहता हूँ !! नारद मुनि ने कहा कि ठीक है, तो बताओ महानतम भक्त कोन हैं । तब अर्जुन ने कहा, वृष्णि अधिक भाग्यशाली हैं। कृष्ण हमें छोड़ कर द्वारका में वृष्णि से मिलने गए, , वे सबसे बड़े भक्त हैं । नारद मुनि जो भी भक्तों के पास जाते थे वे हमेशा कहते थे, मुझसे ज्यादा भक्ति किसी और की है ।
तो भक्त हमेशा विनम्र होते हैं, हमेशा सोचते हैं कि कोई और उससे अधिक उत्तम भक्त है। तो वे सभी को कृष्ण की सेवा के प्रति लगाव था। ये, कृष्ण के प्रति अनुरक्ति, सबसे सुदुर्लभ है और वह भगवान चैतन्यने सब को वितरित किया। मानव समाज के बीच कृष्ण के इस सुदुर्लभ प्रेम को वितरित करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु, पंच-तत्व, वे अवतरित हुए/ प्रकट हुए।
यह बहुत कठिन नहीं है, यदि कोई भगवान के पवित्र नामों का जप करता है और यदि कोई शुद्ध भक्त भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं के बारे में सुनता है, तो भक्त के हृदय में वह स्मृति स्वतः ही स्फूरित हो जाती है।
तो आप सभी जो कक्षा को सुन रहे हैं, यह दर्शाता है कि आप शुद्ध भक्त हैं और आपको दूसरों को अपनी संगति देनी चाहिए और उन्हें जप करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। श्रीमद्-भागवतम्, भगवद गीता को पढ़ने से लोग स्वाभाविक रूप से भगवान के भक्त बन जाते हैं। श्रील प्रभुपाद, विनोद भावे के आश्रम में भगवद गीता सम्मेलन के लिए गए थे। तब भक्तों को श्रील प्रभुपाद द्वारा हरे कृष्ण का जाप करने के लिए कहा गया था। जब उन्होंने जप किया तो सभीने हंसते हुए भाग लिया। श्रील प्रभुपादने बताया कि वे सब कैसे शुद्ध भक्त हैं । किसी ने कहा कि मैं अभी तक शुद्ध भक्त नहीं हूं। उन्होंने कहा कि कच्चा आम है, या पका हुआ आम, आम तो आम है। तो आप भले ही हरे आम हों, लेकिन फिर भी आम हों। उन्होंने कहा कि कोई पका हुआ शुद्ध भक्त हो सकता है, कोई कच्चा शुद्ध भक्त हो सकता है। तो हमें श्रील प्रभुपाद और उनके प्रतिनिधियों की सेवा करने के लिए भगवान चैतन्य के इस उपाय/ विधि का पालन करने में बहुत सतर्क रहना चाहिए।
मैं गोपाल भट्ट गोस्वामी के सत-क्रिया-सार-दीपीका में पढ़ रहा था, प्रस्तावना में कहा गया है कि यदि कोई नियमों का पालन करने से नीचे गिर जाता है, तो उसे प्रायश्चित करना होगा। जैसे लग्नेतर यौन संबंध रखना। और मांस खा रहे हैं। हमारे नियामक सिद्धांतों को गंभीरता से तोड़ना। तब कहा जाता है कि गुरु को दिया हुआ मंत्र आपके पास होना चाहिए। और गुरु नहीं है, वह गृहस्थ है, तो उनकी पत्नी से। और ऐसे ही, अगर वह नहीं है, तो उसका पुत्र। मैंने चैतन्य लीला में भी पढ़ा कि गदाधर प्रभु, उन्हें उनके गुरु ने शिष्यों को लेने का आदेश दिया था लेकिन उन्होंने कहा कि एक शिष्य बहुत अच्छी तरह से पालन नहीं कर रहा था और परिणाम स्वरूप वह(गदाधर) मानसिक रूप से पीड़ित थे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से एक बार फिर मंत्र लेने की इच्छा की । लेकिन उन्होंने पहले ही दीक्षा ले रखी थी, पुंडरीक विद्यानिधि से शिष्यपन स्वीकार किया था। तो भगवान चैतन्य ने उनसे कहा कि पुंडरीक विद्यानिधि जल्द ही यहां नीलकला आ रहे हैं, इसलिए आप उनसे मंत्र ले सकते हैं । तो यह एक विज्ञान है और हमें कृष्ण भावनामृत को ठीक उसी तरह लागू करना चाहिए जैसे पांडवों ने किया था ।
यह पहले से ही 9 बजे है। मैं कुछ प्रश्न लूंगा और फिर दर्शन दूंगा। दो प्रश्न लें, एक बंगाली, एक अंग्रेजी।
सुमन कुमार मंडल, आश्रय शिष्य: बंगाली: आपने उल्लेख किया है कि मंदिरों की तुलना में भक्त बनाना उत्तम है। भक्त इतने महत्वपूर्ण हैं लेकिन भक्तों के इतने महत्व के बावजूद, हम भक्तों की आलोचना करते हैं, हमें भक्तों की परवाह नहीं है। हम कैसे भक्तों के साथ सतर्कता रखते हुए और उनकी देखभाल कर सकते हैं?
जयपताका स्वामी: यह ग्रह पर ८ से ९ अरब लोग हैं। उनमें से कितने भक्त हैं? ये तो भक्त हैं, क्यों न हम इन्हें वास्तव में अपना प्रिय समझें? हम समझते हैं कि वे कृष्ण को प्रिय हैं, वे कहते हैं कि एक भक्त उन्हें उनके जीवन से अधिक प्रिय है। इसलिए हमें हमेशा सावधान रहना चाहिए। भगवान चैतन्य ने कहा कि वे वैष्णव- अपराधियों को छोड़कर सभी का उद्धार करेंगे। चपला गोपाल ने श्रीवास ठाकुर के चरण कमलों पर अपराध किया था। फिर उसके बाद उसे कुष्ठ रोग हो गया। उन्होंने भगवान चैतन्य से प्रार्थना की थी," आप साक्षात प्रेममूर्ति हैं, कृपया मुझ पर दया करें, मुझे क्षमा करें"। भगवान चैतन्य ने उनका एक और रूप दिखाया, कहा: "आपने मेरे शुद्ध प्रिय भक्त को नाराज कर दिया है, अब आप जो पीड़ित हैं, वह नरक में आपको जो मिलेगा, उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है, कुंभिपाक!" तब चपला गोपाल ने कहा कि "आप बहुत दयालु हो, मुझे इस अपराध के लिए कैसे क्षमा किया जा सकता है?" भगवान चैतन्य ने कहा: " क्षमा करने का एकमात्र उपाय है यदि आप जाते हैं और श्रीवास से क्षमा मांगते हैं, और अगर श्रीवास आपको क्षमा करने के लिए सहमत होते हैं"। एक लंबी कहानी को छोटा करने के लिए, श्रीवास गए और चपला गोपाल को क्षमा कर दिया। तुरंत भगवान चैतन्य, चपला गोपाल के पास पहुंचे और उन्होंने उन्हें गले लगा लिया। हम ये सभी निर्देश सुनते हैं; हम वैष्णवों से सावधान क्यों नहीं रहेंगे?
रत्नबाहु प्रभु: हम पांडवों की तरह भगवान कृष्ण के प्रति विरह का भाव कैसे विकसित कर सकते हैं?
जयपताका स्वामी: जिस तरह पांडवों ने, कृष्ण के प्रति अनुरक्ति बढ़ा दि थी और वे लगातार कृष्ण के बारे में सुन रहे थे, कृष्ण से जुड़ रहे थे। अगर हम कृष्ण की लीलाओं के बारे में सुनते हैं, श्रीमद-भागवतम पढ़ते हैं, अगर हम उनके पवित्र नामों का जप करते हैं, निताई गौर की दया प्राप्त करते हैं, अगर हमें गौडिय संप्रदाय से कृपा मिलती है, तो हम वास्तव में अपने कृष्ण प्रेम को विकसित कर सकते हैं, और वैसे आसक्त हो सकते हैं, पांडव। जब तक आप किसी विषयवस्तु से जुड़े नहीं होते, तब तक आप विरह महसूस नहीं करते। तो हमें अपनीअनुरक्ति विकसित करना होगा, तब स्वाभाविक रूप से हम विरह अनुभव कर सकते हैं।
अब क्लास समाप्त हो गई है। इसके तुरंत बाद हम दर्शन के लिए जाएंगे, विभिन्न मंदिरों के दर्शन करेंगे।
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