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20211205 जूम संबोधन- देने के लिए जियो

5 Dec 2021|हिन्दी|सार्वजनिक वक्तव्य|Transcription|Śrī Māyāpur, India

नम ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भूतले
श्रीमते भक्तिवेदांत-स्वामिन् इति नामिने ।
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे
निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारिणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

जयपताका स्वामी : वैशेषिक प्रभु, आप कैसे हैं?

वैशेषिक प्रभु : महाराज आपको देखकर हमें एक नया जीवन मिला है, और हम आपका स्वागत करते हैं । हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2.2 मिलियन ( 22 लाख) भगवद्गीता के लक्ष्य को पार करने की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। हम सभी सहमत हैं, यह आपके आशीर्वाद से ही संभव है, इसलिए हम आपका यहाँ स्वागत करते हैं। और मैं कैसा हूँ? मैं आपको देखकर अत्यंत प्रसन्न हूँ और संग प्रदान करने के लिए मैं आपको विशेष धन्यवाद देता हूँ ।

जयपताका स्वामी : मेरा आशीर्वाद स्वीकार करे! कृष्णे मतिर अस्तु! हम 2 मिलियन 500 हजार (25 लाख) पुस्तक वितरण के लक्ष्य की घोषणा कर रहे थे किंतु अब हम समझते हैं कि यह लक्ष्यांक 2 मिलियन 200 हजार (22 लाख) का है, हमें आशा है कि आप उस कीर्तिमान को पार कर सकते हैं। मेरे पास वर्चुअल बुक टेबल है। कुछ लोग मोक्षदा एकादशी तक प्रतिदिन एक भगवद्गीता दान कर रहे हैं । कुछ अपने जन्मदिन के लिए दे रहे हैं, कुछ कहते हैं कि वे 60 वर्ष के हैं, वे 60 भगवद्गीता दे रहे हैं । तो इस तरह आज मैंने 350 भगवद्गीता दान की बात सुनी । कल 560 वितरित हुई थी। प्रतिदिन यह एक निश्चित राशि है। किंतु मैं सभी गुरुओं को यह बताने जा रहा हूँ कि कैसे उनके पास वर्चुअल बुक टेबल हो सकती है। हम गौड़िय मठ, विश्वविद्यालयों, कॉलेज, पुस्तकालयों, आदिवासियों, नगरपालिका पुस्तकालयों, स्कूलों आदि को पुस्तकें वितरित करते हैं। और कभी-कभी हम सेट देते हैं जहाँ भगवद्गीता निःशुल्क उपहार रूप दी जाती है, वैसे वे श्रील प्रभुपाद की पांच अन्य पुस्तकें क्रय कर लेते हैं। इस तरह बीबीटी को कुछ आय होती है और श्रील प्रभुपाद के साहित्य, जन समुदाय को उपलब्ध हो सकते हैं।

आज रात्रि मैं उन विभिन्न तथ्यों के विषय में पढ़ रहा था जो हम "सनातन गोस्वामी को भगवान् चैतन्य की शिक्षाओं " से अपनी भक्ति सेवा के अंश के रूप में कर सकते हैं कि हमें वह सब कुछ करना चाहिए जो कृष्ण को आनंदित करे और हमें सर्वदा कृष्ण को स्मरण करना चाहिए और उनकी कभी विस्मृत नहीं होनी चाहिए । तो पुस्तकों को वितरित करने से, हमें स्मरण होता है कि ये पुस्तकें भगवान कृष्ण के विषय में हैं और इस तरह हमें स्मरण करने के लिए विवश होना पड़ता है। और श्रील प्रभुपाद मुझे स्मरण है, उन्हें देखकर, जब वे अपनी मेज पर रखी पुस्तकों के ढेर को देखते- देखते भावुक हो जाते, तो उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे। वह कहते थे कि मेरे गुरु महाराज यह देखकर कितने प्रसन्न होंगे! मैं सोच रहा था कि श्रील प्रभुपाद के शिष्यों के शिष्य बहुत भाग्यशाली हैं और श्रील प्रभुपाद ने हमेशा हमें बताया कि हमारे दादा गुरु, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अधिक दयालु होंगे। तो श्रील प्रभुपाद के शिष्यों के रूप में हमें श्रील प्रभुपाद द्वारा अनुशासित होना होगा। किंतु शिष्यों के शिष्यों के रूप में, आपको श्रील प्रभुपाद की दया अधिक मिलती है और वे आपको कृपा, उनकी दया और आशीर्वाद देंगे। विशेष रूप से यदि आप उनकी पुस्तकें वितरित करते हैं, तो उन्हें बहुत प्रसन्नता होगी । यद्यपि, संसार में लोगों को इतना कष्ट हो रहा है, वे सोचते हैं कि वे शरीर हैं, उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि हम सनातन आत्मा हैं। वे नहीं जानते कि कैसे उनका भगवान् कृष्ण के साथ शाश्वत संबंध है। इन पुस्तकों को देने से उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। मैं वह भी पढ़ रहा था जो श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि हमें बहुत अधिक पुस्तकें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। भगवद्गीता, श्रीमद्भागवतम्, भक्ति-रसामृत-सिंधु और चैतन्य-चरितामृत । इसलिए वह सभी को पुस्तकें पढ़ने और पुस्तकें वितरित करने के लिए कह रहे थे। इसलिए मैं हर किसी को अपने प्रचार क्षेत्र में लाने के प्रयत्न कर रहा हूँ और किसी अन्य स्थान पर भी, मैं भी पुस्तकें पढ़ सकता हूँ और भक्ति-शास्त्री, भक्ति-वैभव, भक्ति-वेदांत की डिग्री ले सकता हूँ। साथ ही पुस्तकों का वितरण भी कर सकता हूँ ।

मुझे स्मरण है कि कैसे एक व्यक्ति न्यू ऑरलियन्स में एक संकीर्तन भक्त से मिला और कहा, "मुझे पुस्तकें नहीं चाहिए क्योंकि यह मेरे जीवन का सबसे बुरा दिन है, सबसे बुरा दिन है!"

पुस्तक वितरक ने पूछा, “यह सबसे बुरा दिन क्यों है? यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो अपने जीवन में सबसे बुरे दिन व्यतीत कर रहे हैं!"

उन्होंने कहा, "मैं स्कूल क्यों गया, मैंने विवाह क्यों किया! मैंने काम क्यों किया! मैंने अपनी माँ के लिए सब कुछ किया! और वह आज मर गई।”

भक्तों ने कहा, "नहीं, वह मरी नहीं है वह जीवित है, यहाँ देखें भगवद्गीता में कहा गया है, व्यक्ति कभी नहीं मरता ।"

उन्होंने कहा, "ओह सच में! क्या मुझे वह पुस्तक मिल सकती है?"

भक्त ने कहा, "ठीक है।

क्या मैं 20 डॉलर दे सकता हूँ?"

भक्त ने कहा, "ठीक है!"

तो हम लोगों को बहुत प्रसन्न करते हैं, वे सर्वदा श्रील प्रभुपाद की पुस्तके प्राप्त कर प्रसन्न होते हैं और लोग अपनी अज्ञानता के कारण बिना किसी कारण के पीड़ित होते हैं। किंतु श्रील प्रभुपाद उन सभी भक्तों के आभारी थे जिन्होंने पुस्तकों को वितरित करने के लिए निष्ठा से प्रयास किया। इस सेवा को करने की शक्ति कृष्ण द्वारा दी गई है, इसे बढ़ाने के लिए । इसलिए हर वर्ष हम पुस्तकों के वितरण में आगे बढ़ रहे है। अब हमारे पास नया वेरिएंट ओमिक्रोन भी है। इसलिए सब लोगों को 'ओम' - ओम-आइक्रोन का जाप करने के लिए विवश कर रहे हैं। किसी तरह यदि हम लोगों को भगवद्गीता पढ़ने के लिए कह सकते हैं तो वे निर्भय हो सकते हैं । जब मैं यहाँ आया तो मैंने सुना कि परम पूज्य गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज मेरे सामने प्रवचन दे रहे थे और वे कह रहे थे कि कैसे किसी को विश्वव्यापी समिति का भाग होना चाहिए। वास्तव में, भगवान् चैतन्य का आंदोलन हर नगर और गांव के लिए है और स्वाभाविक रूप से भगवान् चैतन्य अत्यंत प्रसन्न होंगे, भगवान् नित्यानंद अत्यंत प्रसन्न होंगे, अद्वैत गोसांई अत्यंत प्रसन्न होंगे, और सभी पंच-तत्व, भगवद्गीता का वितरण और श्रीमद्भागवतम् का वितरण करने से। वास्तव में , हमारे पास पहले श्रीमद्भागवतम् था - भाद्रपूर्णिमा अभियान, अब हम गीता मैराथन कर रहे हैं, गीता जयंती मोक्षदा एकादशी के दिन है। संयोग से श्रीकृष्ण ने एकादशी पर भगवद्गीता व्यक्त किया , यह एक अत्यंत ही अद्भुत बात है । एकादशी एक बहुत ही उत्तम दिवस माना जाता है और एकादशी पर भगवान् ने भगवद्गीता भी बोली थी। अतः मुझे आशा है कि सभी भक्तों को उपदेशाग्नि प्राप्त हो सकती है और लोगों को निर्भय बनने मे सहायता मिल सकती है।

ऐसे विश्व में लाखों लोग पीड़ित हैं। वर्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन WHO ने कहा कि इस COVID कोरोना वायरस महामारी का आघात दूसरे विश्व युद्ध से भी निकृष्टतम है। अतः हमें हमेशा कहा जाता था कि विश्व युद्ध होगा और उसके बाद उत्तम आध्यात्मिक उपदेश होगा। अब हम पहले से ही एक विश्व युद्ध से कहीं अधिक का सामना कर रहे हैं! तो यह उपदेश देने का, लोगों को श्रील प्रभुपाद की पुस्तकें देने का, और उन्हें निर्भय बनने में सहायता करने का, उन्हें भगवान् के पास वापस जाने में सहायता करने का अवसर है । तो यह बड़ी दया है। हमने देखा कि कैसे प्रह्लाद महाराज, पाँच वर्ष की आयु में असुरों के पुत्रों को उपदेश दे रहे थे। वह एक गोष्ठानंदी थे। जब वे अपनी माता के गर्भ में थे तब उन्हें नारद मुनि से पहले ही निर्देश प्राप्त हो चुके थे। हम इतना समय व्यतीत नहीं सकते हैं, किंतु यदि हम श्रील प्रभुपाद द्वारा लिखित एक पुस्तक दे सकते हैं, तो वे पुस्तक पढ़ेंगे और प्रचार के घंटे और दिन प्राप्त करेंगे।

मैं सुन रहा था, हमने एक भगवद्गीता किसी को वितरित की, उसने इसे पढ़ा और अपने घर त्याग दिया और उसके चचेरे भाई ने इसे पढ़ा, उसके भाई ने इसे पढ़ा और जैसे पूरा परिवार भगवद्गीता पढ़ने से भक्त बन गया, एक गीता से ! सम्पूर्ण कुटुम्ब भक्त बन गया! हरि बोल! हरि बोल!!

हमें यह ज्ञात नहीं है पर ये पुस्तकें टाइम बम की भाँति हैं! वे कहां जाएंगे, किसके हाथ मे आएंगी। मैंने दक्षिणी कैलिफोर्निया के एक पुस्तक वितरक से सुना, उन्होंने एक व्यक्ति को एक पुस्तक वितरित की, और फिर एक अन्य कार चालक ने उसे गोली मार दी, वह स्पष्ट रूप से एक ड्रग डीलर था और अन्य प्रतिस्पर्धी ड्रग डीलर ने उसे गोली मार दी थी, किंतु वह ग्रंथ हाथ में पकड़े हुए था, उसने अभी खरीदा था। तो ऐसे ही उन्हें आशीर्वाद मिला। अन्यथा, वह एक पापी व्यक्ति बना रहता। किंतु गीता कृष्ण का अवतार है, और जब उन्हें पुस्तक मिली; उसे गोली मार दी गई थी। वैसे भी, ये पुस्तकें शुद्ध कृपा हैं।

संभवतः मैं जा सकता, मैं व्हीलचेयर से बंधा हुआ हूँ किंतु मैंने अपनी वर्चुअल टेबल सेट की है और पुस्तकों को दूर से वितरित करने का प्रयास कर रहा हूँ। परंतु पहले मैं बाहर जाकर पुस्तकें बांटता था। मैं वैशेषिक प्रभु को विचलित होते देख रहा हूँ । क्या मैंने बहुत समय ले लिया ?

वैशेषिक प्रभु : नहीं, नहीं, वह मात्र आप की प्रशंसा थी महाराज! धन्यवाद महाराज! आप की बाते हमें ह्रदय तक स्पर्श कर गयी है। हम तो बस आपके मुख कमल से निकलने वाले अमृत के झरने के नीचे बैठे हैं। हम आपका

बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं। क्या हम आपको कुछ मानचित्र दिखा सकते हैं? हम विश्व भर में बस जिप करेंगे और आपको एक विचार देंगे कि अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप में पहुँच है, हमें वहां किसी की आवश्यकता है।

जयपताका स्वामी : मैं चिली से कहूंगा कि उन्हें वहाँ जाना चाहिए । हम पेंगुइन के एक पूरे समूह को भगवद्गीता पढ़ते हुए देखेंगे! मैं देख रहा हूँ कि दक्षिण भारत की पुस्तक वितरण प्रतिज्ञा अभी भी मानचित्र में नहीं है। मायापुर के लिए प.पू. भक्ति विजय भागवत बताएंगे। भक्ति विनोद स्वामी दक्षिण भारतीय डीसी के अध्यक्ष हैं। मैं उनसे पूछूँगा कि हम दक्षिण भारत, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक को क्यों नहीं देखते हैं। आंध्र प्रदेश भी। मैंने अभी तक इटली या स्पेन की प्रतिज्ञा भी नहीं देखी। मुझे घाना - नाइजीरिया, केन्या को छोड़कर पूर्वी और पश्चिमी नहीं दिखाई देता है? प.पू भक्ति धीर दामोदर स्वामी, वे नाइजीरिया में हैं। प.पू. गोपाल कृष्ण गोस्वामी केन्या के जीबीसी हैं। केन्या से 8,000 प्रतिज्ञाएँ हैं। मलेशिया ने अभी-अभी 5,000 देने का प्रण किया है, मलेशिया को बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरा पुनरावर्तक मलेशिया से है! हम ब्राजील नहीं देखते हैं। कनाडा भी वहाँ? अच्छा कार्य किया!

वैशेषिक प्रभु : यदि आप, महाराज, आशीर्वाद दे सकते हैं कि हम इस वर्ष निर्धारित 22 लाख लक्ष्य को पार कर सकते हैं।

जयपताका स्वामी : कृष्णे मतिर अस्तु!

वैशेषिक प्रभु : बहुत-बहुत धन्यवाद महाराज! हम आज यहां आपकी उपस्थिति से ह्रदय के अंतकरण से आपके अत्यंत आभारी हैं और हम आपके शब्दों को ह्रदय में लेंगे और मानचित्र (नक्शे) को निरंतर भरते रहेंगे और आपको और अधिक अंतरालों को भरने के लिए पुनः आप से सहायता लेंगे।

जयपताका स्वामी : मैं दक्षिण भारत और ब्राजील को भाग लेने के लिए कहूंगा।

वैशेषिक प्रभु : यदि अंटार्कटिका के लिए कुछ है, तो हमें भी रुचि हैं।

जयपताका स्वामी : मैंने सुना है कि उन्होंने वहां हरिनाम किया था। अंटार्कटिका में। और मैंने सुना है कि चिली के दक्षिणी सिरे में वे गायों के लिए भी धूप का चश्मा पहनाते हैं, क्योंकि ओजोन परत में छेद है, इसलिए यदि आप अपनी आंखों को नहीं ढकते हैं, तो आप अंधे हो जाएंगे। किंतु मुझे ज्ञात नहीं है कि अंटार्कटिका में कुछ विश्राम स्थल हैं या नहीं, सम्भव है कि हम उन्हें कुछ पुस्तकें दे सकते हैं।

हरे कृष्ण!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by अनुवाद अजित मधुसूदन दास
Verifyed by प्रीति उपाध्याय द्वारा सत्यापित
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा समीक्षित

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