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20211204 श्रीमद्-भागवतम् 1.13.16

4 Dec 2021|Duration: 00:58:29|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुं दीन- तारणम्
परमानन्द माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीमद्-भागवतम् 1.13.16 के पाठ के साथ प्रवचन प्रारम्भ होता है।

युधिष्ठिरो लब्धराज्यो द‍ृष्ट्वा पौत्रं कुलन्धरम्।
भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्मुमुदे परया श्रिया॥

अनुवाद : अपना राज्य वापस पाकर तथा एक ऐसे पौत्र का जन्म देखकर, जो उनके परिवार की प्रशस्त परम्परा को आगे चलाने में सक्षम था, महाराज युधिष्ठिर ने शान्तिपूर्वक शासन चलाया और उन छोटे भाइयों के सहयोग से, जो सारे के सारे जन साधारण के कुशल प्रशासक थे, असाधारण ऐश्वर्य का भोग किया।

कृष्णकृपामूर्ति ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा तात्पर्य : महाराज युधिष्ठिर तथा अर्जुन दोनों ही कुरुक्षेत्र युद्ध के शुरू होने के दिन से ही अप्रसन्न थे, किन्तु युद्ध में स्वजनों को मारने की अनिच्छा होते हुए भी उन्हें उसे कर्तव्य समझकर करना पड़ रहा था, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण की परम इच्छा से इसकी योजना की गई थी। युद्ध के बाद महाराज युधिष्ठिर ऐसे सामूहिक संहार से दु:खी थे। एक प्रकार से पाण्डवों के बाद कुरु वंश को चलाने वाला कोई नहीं था। यदि एक मात्र आशा शेष थी, तो वह पुत्रवधू उत्तरा की कोख में स्थित बालक था और उस पर भी अश्वत्थामा ने हमला कर दिया था, किन्तु भगवान् की कृपा से वह बालक बच गया था। अतएव सभी उपद्रवों के शान्त होने तथा राज्य में शान्ति स्थापित होने के बाद और एकमात्र बचे हुए बालक परीक्षित को देखकर युधिष्ठिर सन्तुष्ट थे और सदैव क्षणिक और भ्रांत करने वाले भौतिक सुख के प्रति आकर्षण न होने पर भी मानव होने के कारण उन्हें कुछ चैन मिला था।

जयपताका स्वामी : हम देखते हैं कि कुरुक्षेत्र में युद्ध के बाद, युधिष्ठिर महाराज ने एक बहुत ही शांतिपूर्ण, समृद्ध स्थिति प्राप्त की थी। हम देखते हैं कि एक भक्त भौतिक शांतिपूर्ण स्थिति भी प्राप्त कर सकता है, किंतु भौतिक जीवन की यह सफलता अस्थायी और क्षणिक है। युधिष्ठिर महाराज भौतिक सफलता से बहुत अधिक आसक्त नहीं थे। यद्यपि हम देख सकते हैं कि वे सफल रहे; किंतु युधिष्ठिर महाराज को हमेशा कृष्ण के प्रति गहन आसक्ति थी। इसलिए, युधिष्ठिर महाराज को सुनने की उत्सुकता या श्रीकृष्ण को सुनने की उत्सुकता, इसमें कोई अंतर नहीं है। आप श्रीकृष्ण के शुद्ध भक्त को देखेंगे, वे हमेशा कृष्ण से युक्त रहते हैं। भौतिक जगत में, कुछ सफलता मिल सकती है, वह केवल अस्थायी और अल्पावधि के लिए होती है। हमें भक्तिमय सेवा, कृष्ण के प्रति प्रेम की इच्छा रखनी चाहिए, इस आशा को बनाए रखना चाहिए। इस लक्ष्य में कोई परिवर्तन नहीं है। श्रीकृष्ण शाश्वत हैं, जीव शाश्वत है और श्रीकृष्ण के लिए हमारा प्रेम शाश्वत है। तो, नारद मुनि ब्रह्मांड में सर्वश्रेष्ठ भक्त को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे। वे विभिन्न लोगों के पास गए और फिर अंततः वे पांडवों के पास आए। उस समय पांडव एक विशेष युद्ध सम्मेलन कर रहे थे, परंतु उनकी चर्चा का उद्देश्य क्या था – हम भगवान् कृष्ण को पुनः कैसे देख पाएंगे? किसी ने सुझाव दिया, [...अश्रव्य..] यह कार्य नहीं करेगा, श्रीकृष्ण ने पहले ही हमारे सभी शत्रुओं का विनाश कर दिया है। अतः, इस प्रकार वे चर्चा कर रहे थे कि कैसे वे पुनः कृष्ण का संग प्राप्त करेंगे। तब नारद मुनि ने कहा, आप लोग सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। अर्जुन ने खड़े होकर कहा कि मैं भक्त हूँ, परंतु मैं सर्वश्रेष्ठ भक्त नहीं हूँ। श्रीकृष्ण वृष्णियों, यदुओं के साथ द्वारका में हैं, अतः वे सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। हर भक्त ऐसा ही सोच रहा था कि दूसरा भक्त श्रेष्ठ है। अतः, पांडव, वे अत्यंत विशेष हैं। श्रीकृष्ण के सभी भक्तों में विभिन्न विशेषताएँ हैं। अब हमारे लिए कृष्ण-भक्त बनना कठिन हो गया है। हम आकांक्षी भक्त हो सकते हैं। श्रीकृष्ण के वास्तविक भक्त इतने उन्नत होते हैं; यदि आप कृष्ण के भक्त हैं, तो शुद्ध भक्त होना होगा, यह बहुत बड़ी बात है। हमें किसी भौतिक स्थिति से बहुत आसक्ति हो सकती है; जैसे कि हम देखते हैं कि सुख में हो या संकट में हो युधिष्ठिर महाराज और पांडव श्रीकृष्ण के प्रति ही अत्यधिक आसक्त रहते थे। अतः, यही वह वस्तु है जिसे पाने के लिए हमें प्रयत्नशील रहना चाहिए। हम भगवान् श्रीकृष्ण की शुद्ध भक्ति करना चाहते हैं, ऐसा नहीं है। भौतिक सफलता या भौतिक संकट, कुछ भी हो, हम केवल श्रीकृष्ण की सेवा करना चाहते हैं। अब ये भक्त बहुत उन्नत हैं। श्रीमद्भागवतम् को पढ़ने से, भगवद्गीता पढ़ने से, हम श्रीकृष्ण और उनके महान भक्तों के साथ युक्त हो जाते हैं। उनके संग से हम अपनी स्वाभाविक भक्ति का विकास कर सकते हैं। कई लोग शिकायत करते हैं कि ग्रंथ पढ़ने का क्या लाभ? परंतु इन पुस्तकों को पढ़कर हम पवित्र संग प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप इन पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो आप श्रील प्रभुपाद का संग प्राप्त करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि उनके तात्पर्य, उनमें से सबसे अच्छे हैं। अतः, आप श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों को पढ़कर उनका और अधिक संग प्राप्त कर सकते हैं। हमारे पास इस जीवन में यह मानव रूप है, और यह हमारे लिए श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना, सेवा करने का एक दुर्लभ अवसर है। बहुत-से लोग किसी भौतिक शुभ स्थिति को प्राप्त करने के लिए कुछ देवी, कुछ देवताओं की पूजा करने में लगे होते हैं। परंतु इस प्रकार, वे भौतिक जगत में बार-बार जन्म लेने के लिए बाध्य हैं। अतः, वास्तव में यदि हम भगवान् श्रीकृष्ण से युक्त हो सकते हैं, तो हम इस भौतिक जगत को त्याग कर सकते हैं और श्रीकृष्ण के साथ वापस भगवद्धाम आ सकते हैं। जहाँ हम श्रीकृष्ण के साथ शाश्वत जीवन पाएंगे। इसलिए हमें भौतिक स्थिति से बहुत अधिक आसक्त नहीं होना चाहिए। विशेष रूप से कलियुग में हम देखते हैं कि संसार में बहुत अधिक समस्याएँ हैं। अब COVID-19 के नए वेरिएंट आ गए हैं। पहले हमारे पास डेल्टा वैरिएंट था। वह अभी भी मुख्य वेरिएंट है किंतु अब ओमीक्रोन वेरिएंट है। और लोग भयभीत हो रहे हैं कि क्या करें! वास्तव में, सभी को हरिनाम का जाप करना चाहिए।

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं।

कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा॥

(चैतन्य-चरितामृत, आदि लीला 17.21)

अतः, इस प्रकार वे स्थायी शांति प्राप्त कर सकते हैं विदुर की भाँति; वे पांडवों को खुशहाल देखकर प्रसन्न होकर वापस आये। परंतु उनकी इच्छा थी कि उनका भाई धृतराष्ट्र, वह, धर्म के मार्ग पर कैसे चलेंगे, यही उनकी चिंता थी। युधिष्ठिर महाराज ने विदुर से पूछा कि आप कैसे है? श्रीकृष्ण और यदु कैसे हैं? तो, विदुर ने सभी अच्छी बातें कही। परंतु उन्होंने यह नहीं कहा कि समस्त यदुओं का विनाश हो गया है और श्रीकृष्ण प्रस्थान कर गए हैं, क्योंकि वे पांडवों को दुःखी नहीं देखना चाहते थे। हमें वही सच बोलना चाहिए जो मनभावन हो। यदि किसी की नाक पर मस्सा है, तो यह कहना कदाचित ही उचित होगा कि आपकी नाक पर मस्सा है। आप ऐसी सच्ची बातें नहीं कहते जो कष्टदायक हों। सत्य को स्वादिष्ट तरीके से कहा जाना चाहिए। अशुभ समाचार तो उन्हें विभिन्न स्रोतों के माध्यम से प्राप्त होंगे ही, तो विदुर को उन्हें क्यों व्यक्त करना चाहिए। अतः, इन महात्माओं की गतिविधियों से हम कई चीजें सीख सकते हैं। मानव जीवन महान आत्माओं का संग करने के लिए है। अब कलियुग में, हम अच्छे लोगों या महान आत्माओं की संगति कैसे प्राप्त कर सकते हैं? श्रीकृष्ण ने हमें श्रीमद्भागवतम् दिया है, यह हमारे लिए अच्छा संग पाने का एक महान अवसर है। कलियुग के आरंभ के साथ ही , श्रीमद्भागवतम् का उदय दैदीप्यमान सूर्य की भाँति हुआ है। परीक्षित महाराज अर्जुन और सुभद्रा देवी के पौत्र हैं। और हम रथ-यात्रा में सुभद्रा देवी की पूजा करते हैं। वे श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति हैं। मैं इस्कॉन चटग्राम, बांग्लादेश देख सकता हूँ, वहाँ जगन्नाथ बलदेव और सुभद्रा हैं। उन सुभद्रा मैया के पौत्र ने हमें श्रीमद्भागवतम् दिया है, तो हमें इसे पढ़ना चाहिए। हमें इसका अध्ययन करना चाहिए, हमें इसका बहुत उत्तम प्रकार से अनुशीलन करना चाहिए।

श्रील प्रभुपाद ने कहा, ऐसी शिकायतें थीं कि भक्त, विशेष रूप से ब्राह्मण दीक्षित भक्त, भी आध्यात्मिक ज्ञान में समर्थनहीं हैं। उन्होंने कहा कि दूसरी दीक्षा (ब्राह्मण दीक्षा) पाने के लिए भक्ति शास्त्री का होना अनिवार्य है। जिन लोगों ने पहले ही ब्राह्मण दीक्षा प्राप्त कर ली है, किंतु अभी तक भक्ति-शास्त्री की डिग्री नहीं मिलीं हैं, उन्हें भक्ति-शास्त्री का अध्ययन कर उसे प्राप्त करना चाहिए। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि संन्यासी बनने के लिए उनके पास भक्ति वैभव की डिग्री होनी चाहिए। यदि वे गुरु बनना चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि भक्तिवेदांत की डिग्री होनी चाहिए। तो, पिछले दस वर्षों से, हमारे पास मायापुर और वृंदावन इंस्टिट्यूटस में भक्ति वेदांत की डिग्री उपलब्ध है। मायापुर संस्थान ने घोषणा की कि छह महीने के भीतर वे भक्ति सर्वभौम पाठ्यक्रम आरंभ करेंगे, तो सभी को श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि ये सभी डिग्री स्नातक, परास्नातक, पी.एच.डी. हैं। प्रत्येक भक्त को यह सोचना चाहिए कि वे श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन कैसे कर सकते हैं। हम शिक्षा मंत्रालय के साथ काम करने का प्रयास कर रहे हैं कि सरकारी प्रबंधक कैसे श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करके अपनी डिग्री प्राप्त कर सकते हैं। यह मानव जीवन श्रीकृष्ण के बारे में जानने के लिए है। हमें परम सत्य को जानना चाहिए। वे कहते हैं कि एक ब्रह्मांड है, एक जगत है और कुछ भी नहीं है। किंतु श्रीमद्भागवतम् कहता है कि स्वर्गलोक उच्चतर लोक हैं, मध्य ग्रह प्रणाली हैं, निम्न ग्रह प्रणाली हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड जीवों से भरा है। जैसे जल में जीव होते हैं, वैसे ही अग्नि में भी जीव हो सकते हैं। क्योंकि आत्मा गीली नहीं हो सकती, जलाई नहीं जा सकती, यह भौतिक प्रपंच की सबसे उत्तम वस्तु है। उनका यह विचार रहा है कि केवल हमारी पारिस्थितिकी (जीवों के मध्य सम्बन्ध तथा उनका भौतिक परिवेश) ही जीवन को बनाए रख सकती है। किंतु, हर पारिस्थितिकी, हर प्रणाली में जीवों की उपस्थिति है। अतः, हम आधुनिक विज्ञान में केवल ब्रह्मांड का एक अत्यंत सीमित पहलू देखते हैं। परंतु वास्तव में, यदि हम जानना चाहते हैं कि ब्रह्मांड में क्या है, तो हमारे पास वैदिक शास्त्रों के अनुसार, अवरोही ज्ञान का विज्ञान होना चाहिए। अतः, हम इसे वैदिक तारामंडल (TOVP) के पश्चिम भाग में व्यक्त करने का प्रयास कर रहे हैं। हम विभिन्न प्रदर्शन और चलचित्र दिखा रहे हैं। जब हम श्रीमद्-भागवतम् पढ़ते हैं, तो हम एक अलग ब्रह्मांड, एक पूर्ण रूप से भिन्न रचना देखते हैं। इस महत्तत्व में, असंख्य ब्रह्मांड, असीमित ब्रह्मांड हैं। और हम सभी दयालु भगवान्, करुणा-सिंधु भगवान् को जानते हैं, ब्रह्मांड के आवरण पर उनके चरण कमलों के स्पर्श से गंगा इस ब्रह्मांड में प्रवेश करती हैं। ब्रह्मा, वे गर्भोदकशायी विष्णु से आए हैं और गर्भोदकशायी विष्णु महाविष्णु से आए हैं, और महाविष्णु संकर्षण से आते हैं, और संकर्षण बलराम से आते हैं। बलराम कृष्ण से आते हैं। तो इस प्रकार पूरे भौतिक संसार को एकपाद विभूति कहा जाता है, यह भगवान् की संपूर्ण ऊर्जा का एक चौथाई भाग है; और आध्यात्मिक जगत तीन चौथाई विभूति, तीन चौथाई सृष्टि है। वैसे भी परम सत्य को जानना एक महान विज्ञान है। अब हम आपके कुछ प्रश्नों को एक छोटे से ब्रेक के बाद लेंगे।

जयेश्वरी देवी दासी : आपने कहा था कि सत्य को सुलभ तरीके से बताना होगा। परंतु मुझे डर है कि यदि मैं अपने किसी करीबी को कड़वा सच बता दूँ तो इससे रिश्ते में खटास आ सकती है। कृपया मुझे मार्गदर्शन करें कि क्या करना है।

जयपताका स्वामी : इसलिए हम केवल मृदु सत्य बताते हैं। हम उन चीजों को नहीं बताते हैं जो हम जानते हैं कि जो लोगों को व्यथित करती हैं।

कविप्रिया देवी दासी, सिडनी : क्या महेश धाम आध्यात्मिक जगत या भौतिक जगत का हिस्सा है?

जयपताका स्वामी : यह सीमा पर है।

दूसरा प्रश्न : यदि बद्ध आत्माओं को नित्य-बद्ध कहा जाता है, तो हमारी मूल शाश्वत स्थिति को कैसे समझा जाए, यदि वे नित्य बद्ध हैं?

जयपताका स्वामी : हम नित्य-बद्ध से नित्य सिद्ध बन सकते हैं, सदा के लिए बंधन से मुक्त हो सकते हैं। नित्य-बद्ध इस प्रकार है कि हम नित्य-बद्ध में तब तक स्थायी रूप से रहेंगे जब तक हम नित्य-सिद्ध बनने की इच्छा नहीं रखते। अतः, यदि हम हमेशा के लिए मुक्त होने की इच्छा रखते हैं, तो हम इसे प्राप्त कर सकते हैं।

बंगाली : गुरु महाराज, कृपया हमें बताएँ कि दीक्षा लेने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

जयपताका स्वामी : एक चेकलिस्ट है जिसमें 31 या 32 पॉइंट हैं। जयपताका स्वामी ऑफिस की वेबसाइट है जहाँ से आप इसे प्राप्त कर सकते हैं।

मिल्टन चौधरी, बांग्लादेश : भक्ति-शास्त्री पाठ्यक्रम केवल दीक्षित भक्तों के लिए ही है? क्या अदीक्षित भक्त भी यह कोर्स कर सकते हैं?

जयपताका स्वामी : श्रील प्रभुपाद ने कहा कि दीक्षित या अदीक्षित सभी भक्ति-शास्त्री कर सकते हैं। परंतु संन्यास या ब्राह्मण दीक्षा लेने के लिए, या गुरु बनने के लिए, कुछ व्यवहारों का पालन करना होगा। अकादमिक अध्ययन आप कर सकते हैं।

अखिल बंधु गोपाल दास, इंदौर, मध्य प्रदेश : जैसा कि आपने समझाया कि संपूर्ण ब्रह्मांड का ¼ भौतिक जगत है और ¾ आध्यात्मिक जगत है। गुरु महाराज एक समय आ सकता है जब सभी लोग आध्यात्मिक जगत में चले जाएंगे और सभी लोग मुक्त हो जाएंगे, और भौतिक जगत में कोई नहीं होगा?

जयपताका स्वामी : यह एक मनोकल्पित सोच है! क्या आपने कभी 100% लोगों को ग्रहणशील पाया है? हमेशा कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी भौतिक चीजों से आसक्त होते हैं। यह हमारे जगत में है, अन्य लोकों और ग्रहों की क्या बात करें? मेरा कहना है, निचले लोकों में बहुत अधिक आसुरी जीव हैं। यद्यपि वैसे भी, यह कोई समस्या नहीं है। यदि आप सभी को भक्त बनाते हैं, तो बहुत अच्छा! श्रीकृष्ण शिकायत नहीं करेंगे। किंतु हमेशा कुछ ऐसे होंगे जिन्हें इससे आसक्ति नहीं होगी। आपके पास बहुत-से प्राणी हैं, पक्षी हैं, पेड़ हैं, मछली हैं, यदि आप उन सभी को कृष्ण के प्रति जागरूक बना सकते हैं, अति उत्तम! कम से कम भगवान् चैतन्य, उनके पास हरे कृष्ण का जप करने वाले सभी प्राणी थे। अतः, यदि हम कम से कम मनुष्यों को कृष्णभावनाभावित बना सकते हैं, तो यह एक उत्तम उपलब्धि होगी। अब मैं ऑस्ट्रेलिया और सुदूर पूर्व के मंदिरों और घरों में जाऊँगा।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by अजित मधुसूदन दास द्वारा हिंदी अनुवाद
Verifyed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा सत्यापन
Reviewed by धर्मात्मा निमाइ दास द्वारा समीक्षा

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