मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जयपताका स्वामी: तो मैं अपने दूसरी पीढ़ी के शिष्यों के मध्य यहाँ आकर अत्यंत प्रसन्न हूँ। श्रील प्रभुपाद ने हमें बताया कि हम श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के पौत्र हैं और दादा पौत्र को मिठाई और कुकीज़ देते हैं। परंतु पिता को संतानों को अनुशासित करना पड़ता है। तो, वह हमारा संबंध है। प्रति दिन, हमें श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा करने का अवसर मिलता है । हर अवतार का अपना भिन्न प्रयोजन है। जिस प्रकार नरसिंहदेव, वे अपने भक्त के साथ हुई दुर्व्यवहार पर अत्यंत क्रोधित होते हैं। भगवान् चैतन्य अत्यंत दयालु हैं। वह भगवान कृष्ण का प्रेम प्रदान करते हैं और हरिनाम संकीर्तन आंदोलन की स्थापना करते हैं। जब उन्होंने जगन्नाथ पुरी को छोड़ा और वे दक्षिण भारत भ्रमण करने गए। जो भी उन्हें मार्ग में दिखता, वे उसे गले लगाते और उन्हें हरे कृष्ण का जप करने के लिए कहते, तो वे कृष्ण के प्रेम से भावविभोर हो गए । और इस प्रकार उन्होंने सर्वत्र जाकर कृष्णभावनामृत प्रसारित किया ।
कूर्मदेश में, वहाँ के ब्राह्मण ने कहा, वह सब कुछ त्यागकर भगवान् चैतन्य के सान्निध्य में रहना चाहता है। परन्तु भगवान् चैतन्य ने उनसे कहा, मर्कट-वैरागी मत बनो, वानर त्यागी मत बनो । अपने परिवार के साथ यहाँ रहें और हरिनाम का प्रचार करें। और आप सभी से मिलें, उन्हें भगवान् कृष्ण के विषय में बताएँ ।
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश
आमार आज्ञाय गुरु हआ तार' एइ देश ।।
[चैतन्य चरितामृत. मध्य लीला 7.128]
तो, इस प्रकार , भगवान् चैतन्य ने इतने सारे लोगों को शक्ति प्रदान की । किसी ने चैतन्य चंद्र चरण दास से कहा कि उन्हें संन्यास लेना चाहिए । परन्तु मैंने उनसे कहा कि श्रील प्रभुपाद ने कहा कि जब तक आपकी पत्नी सहायक, सहयोगी है, आपको संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। हमें ज्ञात हैं कि गौरचंद्रिका देवी दासी एक अत्यन्त ही समर्पित भक्त हैं। परन्तु चैतन्य चंद्र चरण, वे मुझे बता रहे थे कि कैसे संस्कृति के माध्यम से कृष्ण भावनामृत प्रसारित की उनकी इतनी सारी योजनाएँ थीं । मुझे उम्मीद है कि आप सभी उनकी सहायता करेंगे जिसके फलस्वरूप, वह ऐसा कर सके। यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भगवान् चैतन्य की मनोदशा कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने की है । आप देखिए, वह देखना चाहते थे कि लोगों को भगवान् का प्रेम मिले और वे इस अमृत का स्वाद चखें। जैसे नरसिंहदेव कृद्धवेश में हैं, वैसे ही भगवान् चैतन्य दया के रुप में हैं। प्रह्लाद महाराज, उन्होंने गोष्ठ्यानंदी मनोदशा को अपनाया । वह असुरों के पुत्रों को भी उपदेश दे रहे थे। प्रह्लाद ने उन्हें बताया कि यहाँ तक कि महिलाएँ और कोई भी जो पवित्र नाम का जाप करता है और भक्तिमय सेवा करता है, वे पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। तो, उन्होंने सभी छोटे बालकों को हरे कृष्ण का जप करने के लिए कहा ।
मैं हर दिन अपने शिष्यों के लिए और आपके लिए, मेरे शिष्यों के शिष्यों के लिए पंच-तत्त्व और प्रह्लाद नरसिंहदेव से प्रार्थना करता हूँ। हम आशा करते हैं कि आप सभी किसी भी प्रकार की बाधा को पार कर सके । आप सब मुझे अत्यंत प्रिय हैं। और मैं देखना चाहता हूँ कि आप भगवान् चैतन्य के संदेश का विस्तार करें । तो, यह इतना कठिन नहीं है, परन्तु इसके साथ बने रहने की आवश्यकता है।
श्रील प्रभुपाद ने कहा कि भक्त बनाने के लिए रक्त की बाल्टी देनी पड़ती है। आप सभी को भक्त बनाने के लिए, श्रीमान चैतन्य चंद्र चरण दास ने कितना प्रयास किया होगा । तो, मुझे प्रतीत होता है कि श्रील प्रभुपाद को इतनी वृद्ध अवस्था में, कृष्ण भावनामृत आंदोलन को प्रसारित करने के लिए इतनी कठिनाईयों का साक्षात् करना पड़ा । अतः मुझे उनके ऋण से, ऋण मुक्त होना है। और इस प्रकार, मैं प्रेरित रहता हूँ । चूँकि ऋण इतना बड़ा है कि इसके भुगतान के लिए मेरे सम्पूर्ण प्रयास की आवश्यकता है, फिर भी यह पर्याप्त नहीं है! आप सभी ने परंपरा में आकर श्रील प्रभुपाद के माध्यम से भगवान् चैतन्य की कृपा प्राप्त की है। तो, श्रील प्रभुपाद के अनुयायियों के रूप में, आपको ऋण भुगतान के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। मुझे ज्ञात है कि कुछ भक्त श्री गुरु और गौरांग के मिशन की सेवा करने के लिए अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। परन्तु सम्भवतः कुछ भक्त अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास नहीं कर रहे हैं। आप देखिए, वैष्णव दो प्रकार के होते हैं - भजनानंदी, जो अपनी व्यक्तिगत मुक्ति के लिए कार्य करते हैं। परन्तु प्रह्लाद महाराज वे एक गोष्ठ्यानंदी थे।
श्रील प्रभुपाद एक गोष्ठ्यानंदी थे। वे वृन्दावन में रह सकते थे और मुक्ति प्राप्त कर सकते थे | परंतु उन्होंने 12 या 14 बार विश्वभर में भ्रमण किया | वे मास्को आये | वे वहाँ भगवान् चैतन्य की दया लेकर आए। क्यों? उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्योंकि वे एक गोष्ठ्यानंदी है! वे अकेले भगवान कृष्ण के पास वापस नहीं जाना चाहते थे अपितु वे अधिक से अधिक जीवात्माओं को लेना चाहते थे । यदि आप सभी श्रीमान चैतन्य चंद्र चरण दास को जीवात्माओं को पुनः भगवान् के पास वापस ले जाने में सहायता करते हैं, तो यह अत्यंत प्रशंसनीय होगा ।
हमारे गीता भवन में हम हजारों भक्तों को भीष्म पंचक के समय फल और कंद मूल से उपवास करते हुए देख रहे थे। वे सभी हरे कृष्ण का जाप कर रहे थे और गंगा स्नान कर रहे थे। श्रीकृष्ण को पुष्प अर्पित करें। राधा माधव को दीप अर्पित करना। उन सभी को आनंदपूर्वक कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करते हुए देखकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही थी । यह सुख, आपको भौतिक संसार में नहीं मिल सकता । अतएव, मैं आप सभी के साथ यहाँ आकर अत्यंत प्रसन्न हूँ।
मुझे आपको कुछ प्रश्न पूछने के लिए समय देना चाहिए।
प्रश्न : आनंदिनी पूर्णा देवी दासी- बहुधा आध्यात्मिक स्रोतों में, हमें जानने को मिलता हैं कि आध्यात्मिक विश्व में भगवान् कृष्ण सर्वदा 16 वर्ष के युुवक होते हैं। परन्तु साथ ही, मैंने अन्य भक्तों और अन्य शास्त्रों से सुना है कि आध्यात्मिक विश्व में भिन्न युगों में कृष्ण की लीलाऐं भी भिन्न हैं। तो वास्तविक सत्य क्या है? यह जानना कैसे सम्भव होता है ?
जयपताका स्वामी : उनकी अवतरण की लीलाएँ हैं जहाँ वे एक बालक की भाँति हैं, पुनः एक शिशु के रूप में और , पुनः तरुण बालक, पुनः एक युवक । अतः वह कभी भी यौवन से आगे नहीं बढ़ते । कई स्थानों पर 20 या 21। वृंदावन में, वे किशोर हैं। परन्तु वे सभी अवस्थाओं से गुजरते है, जैसा कि मैंने उल्लेख किया है। परंतु भगवान् वृद्ध नहीं होते । कोई बड़ी दाढ़ी, भूरे बाल या कुछ भी नहीं! उन्हें वृद्ध क्यों होना चाहिए? वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और समय के नियंत्रक हैं। तो वह सर्वदा नव-यौवन में रहते है, नित्य नवीन, नव युवक ।
प्रश्न : चैतन्य चंद्र चरण दास- गुरु महाराज आपकी दया से हमारी परियोजना पहले से ही काम कर रही है, हम यहाँ नियमित रूप से मेहमानों का स्वागत कर रहे हैं । हमारे पास कीर्तन-मेला, संवित कार्यक्रम, सांस्कृतिक संध्या हैं। गौरचंद्रिका नाटक कर रही थीं। आप इस बड़े हॉल को देख सकते हैं, हमारे पास कई भवन भी हैं, इसलिए हमारे पास एक वाष्प स्नानघर भी है और यह आपको भेंट करता हूँ | हमने पहले ही एक कला विद्यालय आरम्भ कर दिया है जहाँ स्थानीय बच्चे आते हैं और विविध कला सीखते हैं।
जयपताका स्वामी : यह हॉल कहाँ है?
प्रश्न : चैतन्य चंद्र कैरन दास- अलमती के निकट, कजाकिस्तान। और अब हम अर्चाविग्रह के साथ एक छोटा मंदिर बना रहे हैं, श्री राधा गोकुलानंद । अब हमारे पास भक्तों का एक तीसरा समूह आ रहा है और अब हमारे पीछे आप यूक्रेन के भक्तों को देख सकते हैं। कल उन्हें दीक्षा मिली।
जयपताका स्वामी : अप्रतिम!!!
प्रश्न : चैतन्य चंद्र चरण दास - और वे सभी आपके आशीर्वाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं गुरु महाराज । वे मिशन का हिस्सा बनने और सेवा करने के लिए तैयार हैं।
जयपताका स्वामी : राधा कृष्णे मतिर अस्तु!
चैतन्य चंद्र चरण दास : कृपया हमारी विनम्र प्रार्थना स्वीकार करें ।
जयपताका स्वामी : तो क्या यह हॉल में से एक है?
चैतन्य चंद्र चरण दास : यह एक रंगमंच की भाँति एक विशाल कक्ष है, और अब हम आपको मंच दिखाने जा रहे हैं ।
जयपताका स्वामी : वाह!
प्रश्न : चैतन्य चंद्र चरण दास- हमारे पास एक वेदी है । कभी-कभी हम वेदी को इस विशाल कक्ष में ले जाते हैं। और क्षमता 200 लोगों के लिए है, 200 लोगों के लिए कुशलता पूर्वक रहने का स्थान है। और हमारे पास एक दो मंजिला होटल और कई घर हैं जहाँ भक्तों के परिवार रहते हैं। हम नियमित रूप से फूड फॉर लाइफ कार्यक्रम कर रहे हैं।
जयपताका स्वामी : धन्यवाद!
प्रश्न :- हम वास्तव में प्रचार में आपके उत्साह की प्रशंसा करते हैं। आज, आपसे मिलने से पहले, हमने महा वराह प्रभु से आपके विषय में बताते हुए कई कहानियाँ सुनीं और हम वास्तव में, आप जो कुछ भी करते हैं, उसकी वास्तव में प्रशंसा करते हैं। तो कृपया हमें बताएँ कि हमें भी समान स्तर का उत्साह कहाँ से मिलता है?
जयपताका स्वामी : हम पढ़ रहे हैं कि कैसे भगवान् चैतन्य मास से सनातन गोस्वामी को निर्देश दे रहे थे। वह कह रहे थे कि कैसे भगवान्, वह कुछ लोगों को शक्ति देते हैं और वे अद्भुत कार्य कर सकते हैं। जिसके पास महान शक्ति है, उसे शक्त्यावेश के नाम से जाना जाता है। और जिसके पास महत्वपूर्ण सशक्तिकरण है, परन्तु वह उतना महान नहीं हो सकता है, उसे विभूति कहा जाता है। तो यदि आप चैतन्य चंद्र चरण की सेवा करने का प्रयास करते हैं और इस तरह गुरु-परंपरा, निश्चित रूप से भगवान् चैतन्य आपको अपनी दया देंगे! और इस प्रकार, आप सोच रहे होंगे कि यह शक्ति कहाँ से आई? तुम देखो, ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण भावनामृत के प्रसार के लिए व्यक्ति को सशक्त होना पड़ता है । तो जो कोई भी गुरु और गौरांग की सेवा करने के लिए समर्पित है, उसे स्वाभाविक रूप से शक्ति प्राप्त होगी। उस तरह, सनातन गोस्वामी ने सभी प्रकार के विस्तारों के विषय में सुना, उन्होंने भगवान् चैतन्य से पूछा, क्या एक व्यक्ति है जो हरिनाम संकीर्तन का प्रसार कर रहा है, और हर किसी को कृष्ण प्रेम प्रदान कर रहा है और उसकी सुवर्ण आभा है, क्या वह अवतार है? भगवान् चैतन्य ने उत्तर दिया, अपनी चतुराई बंद करो, मैं कहीं से भी शक्त्यावेश के निकट नहीं हूँ, उन्होंने विषय बदल दिया । परन्तु सनातन गोस्वामी ने अपनी परिभाषा से ज्ञात किया कि भगवान् चैतन्य महाप्रभु एक अवतार थे, एक युग-अवतार। परंतु भगवान् चैतन्य ने कहा, अपनी चतुराई बंद करो, वह हार गये थे ! यदि आप अपने आध्यात्मिक गुरु को समर्पित हैं और कृष्ण भावनामृत आंदोलन को प्रसारित करने का प्रयास करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से आपको भगवान् चैतन्य की दया रूपी आशीर्वाद मिलेगा।
प्रश्न : अच्युत दास- हमने आपसे सुना है कि हमें विश्व भर में कृष्ण भावनामृत प्रसारित करना चाहिए । तो मेरा प्रश्न यह है कि हम आजकल की वर्तमान स्थिति में कैसे प्रचार करते हैं जब बहुत सारी चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ हैं, जब महामारी है और वे सभी घटनाए हैं जो लोगों को विचलित करती हैं, और आप क्या सोचेंगे श्रील प्रभुपाद वर्तमान परिस्थिति में क्या करेंगे ? उनकी प्रचार रणनीति क्या रही होगी?
जयपताका स्वामी : मुझे नहीं पता कि कजाकिस्तान में क्या स्थिति है, परंतु मैंने सुना है कि रूस में यह अत्यंत विकट है। और हमें ज्ञात हैं कि श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि हमें पवित्र नाम का जप करना चाहिए। वह तेहरान को ईरान में स्थानांतरित कर रहा था और उन्होंने कुछ मौलवियों से बात की और उन्होंने बताया कि शास्त्र कहता है हरेर नाम, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नाम । तो यदि वे हरे कृष्ण का जप नहीं कर सकते हैं, तो वे भगवान् के किसी भी नाम का जाप कर सकते हैं जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को दर्शाता है। कुरान में अल्लाह के 99 नाम हैं। उनमें से किसी एक नाम का वे जाप कर सकते थे - मुसलमान। उसी तरह बाइबिल में यदि ईसाई धर्म में भगवान् के नाम हैं, तो वे उसका जप कर सकते थे। तुम देखो हरे कृष्ण का जप करना सरल है । मेरे पास एक रोमन कैथोलिक ईसाई नन थी जो मेरा निर्देश स्वीकार कर रही थी और वह जेसु क्रिस्टो.. जेसु क्रिस्टो… क्रिस्टो.. क्रिस्टो.. जेसु.. जेसु… का जाप कर रही थी। और उसने सोचा कि यह लगभग हरे कृष्ण जैसा है । तो मुझे इसका प्रयाश करने दो। और उसने " हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे " का जप करना प्रारम्भ कर दिया और उसने ऐसा प्रतीत किया, जब वह यीशु मसीह का जाप कर रही थी, परन्तु इससे भी अधिक। और वह 16 माला जप करने लगी और दीक्षा ली । और उनका नाम मोक्षरूपा देवी दासी है । परन्तु वह अभी भी एक ईसाई नन है। अतः हम यह नहीं कहते हैं कि आपको विश्व भर की यात्रा करनी है। आप जहाँ भी हों, वहाँ प्रचार करें। रेडियो हो या टीवी, किसी न किसी प्रकार से लोगों को मंत्रोच्चार करवाने हैं। टीके, दवाइयाँ लेने से भी वे बीमार हो रहे हैं। सरकार कह रही है कि सभी को टीका लगवाना चाहिए। पर फिर भी लोग प्रदर्शन कर रहे हैं कि नहीं, मुझे टीका नहीं लगाया जाए । वैसे भी, हम उस तर्क में प्रवेश नहीं कर रहे हैं। हम कह रहे हैं कि कृपया भगवान के पवित्र नाम का जाप करें, और यदि सभी जप करें तो यह महामारी दूर हो जाएगी। परंतु तकनीकी रूप से हम कृष्ण से कुछ भी नहीं मांगते हैं क्योंकि यदि हम कोई भौतिक वस्तु मांगते हैं, तो वह आपत्तिजनक होगा। पर कोई भी नामजप न करने से त्रुटिपूर्ण पवित्र नाम का जप करना उचित है यद्यपि हम किसी भी कामना के लिए जप नहीं कर सकते हैं, हम केवल भगवान को प्रसन्न करने के लिए जप करते हैं। पर अन्य लोग इस महामारी से छुटकारा पाने के लिए जाप कर सकते हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि उन्होंने कलकत्ता में प्लेग के समय ऐसा किया था, जहाँ ईसाई, मुस्लिम, हिंदू, पारसी, हरे कृष्ण का जाप कर रहे थे और प्लेग चला गया था। यह अवसर है, यदि हर कोई पवित्र नाम का जप करने से महामारी दूर हो जाए, तो लोग अधिक अनुकूल होंगे। ठीक है?
प्रश्न : देवशेखर गोविंद दास- मै अत्यंत शीघ्र ही एक भक्ति-वृक्ष की शुरुआत करने जा रहा हूँ। तो आपको क्या प्रतीत होता है कि भक्तों की देखभाल में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
जयपताका स्वामी : इन प्रश्नो का उत्तर देना हमेशा कठिन होता है। मुझे क्या लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है? मुझे नहीं लगता कि मेरी सोच बहुत महत्वपूर्ण है। मैं समझने का प्रयास करता हूँ कि भक्त क्या अनुभव कर रहा है। और जब भी मैं उनकी समस्या का समाधान करने का प्रयास करता हूँ, मुझे लगता है कि मैं इस विषय पर हमेशा ध्यान देता हूँ कि मैं उनको संतुष्ट कर पाऊँ । मुझे लगता है कि भक्त इसकी प्रशंसा करते हैं।
प्रश्न : विमला-कुण्ड देवी दासी- मेरे पास कोई प्रश्न नहीं है, पर मैं आपको यह संज्ञान दिलाना चाहती थी, कि एक बार, जब हमारे आध्यात्मिक गुरु, चैतन्य चंद्र चरण प्रभु, वे आपकी व्यास-पूजा के लिए मायापुर नहीं आ सके, अतएव परम पूज्य आप यहाँ पधारे , हम छत पर थे और यह दिन कीर्तन-मेला का दिन था और, परम पूज्य भक्ति चारु स्वामी के कीर्तन के पश्चात् पंच-तत्त्व रो रहे थे। और जब आप वहाँ छत पर हमारे साथ उपस्थित थे अपने शिष्यों के साथ , तो आपने हमसे कहा, अब आप मुझसे कोई भी आशीर्वाद मांग सकते हैं जो आप चाहते हैं। और मैं आपसे सभी संभावित सेवाओं के लिए पूछ रहा था, वे सभी सेवाएं जो मुझे स्मरण थीं, श्रील प्रभुपाद ने हमें करने के लिए कहा था। तो मैं आपको स्मरण कराना चाहता हूँ कि अब तक आपका आशीर्वाद इतना अच्छा काम कर रहा है। मैं श्रील प्रभुपाद की जो भी सेवा करना चाहती हूँ, वह सफल होती है। हमें भगवान् चैतन्य की दया देने के लिए और हमें अपना आश्रय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण!
जयपताका स्वामी : धन्यवाद! आप सदैव गुरुभावनामृत में रहें! और राधा कृष्ण की दया प्राप्त करो!
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