6 दिसंबर 2020 | समयावधि -00:17:90 | अंग्रेजी | ज़ूम सत्र |इस्कॉन कुचिंग, मलेशिया |
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री गुरुं दीन-तारणम् ॥
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि: ऊँ तत् सत्
जयपताका स्वामी: मेरी कुचिंग यात्रा के सुन्दर स्वागत और वीडियो के लिए धन्यवाद। मंदिर के उद्घाटन में, हमारे पास कुचिंग के विभिन्न आदिवासी थे । उन्होंने अपना नृत्य प्रस्तुत किया। मैं प्रभावित हुआ क्योंकि उन्होंने कहा कि उनकी समझ के अनुसार परमेश्वर के बालों में एक पंख है। वे महिला साथी के साथ नृत्य करते है। वे रास-पूर्णिमा के कृष्ण की भाँति लग रहे थे। निःसंदेह, कृष्ण मोर पंख धारण करते हैं, किंतु उनके पास मोर का पंख नहीं था, उनके पास कोइ अन्य पंख था । वह पंख बलराम के पंख के समान था। बलराम की भी एक रास-लीला है ।
वैसे भी मुझे कुचिंग के लोग अधिक पसंद हैं। और मुझे इस बात का खेद है कि मैं 2008 से यहां नहीं आ रहा हूँ । किन्तु मैं वस्तुतः, नियमित रूप से कुचिंग जाता रहा हूँ , जैसा कि विशाखा जानती है। और कुचिंग के सभी भक्तों ने मुझे एक विशाल प्रीतिभोज का निमंत्रण दिया। यद्यपि अप्रत्यक्ष (virtual) प्रीतिभोज में शून्य कैलोरी होती है, किंतु इसमें उच्च-प्रेम होता है। मैंने सदैव अनुभव किया है कि कुचिंग के भक्तों में उच्च-प्रेम है।
मानव जीवन का उद्देश्य वास्तव में कृष्ण के साथ हमारे संबंध को जाग्रत करना है । यही कारण है कि भगवान् चैतन्य ने हमें नामजप करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का नाम दिया। क्योंकि कृष्ण और उनके नाम में कोई अंतर नहीं है । यदि हम कृष्ण के नाम का जप करते हैं, तो हमें कृष्ण का संग प्राप्त होता है । और अब हम एक महामारी से पीड़ित हैं। जिसे पशु मांस का भक्षण करके मानव समाज में लाया गया था। अतः हमें यह पशु रोग है। यह शाकाहारियों को भी प्रभावित करता है। अतएव, हम आशा करते हैं कि सभी भक्त अत्यंत सावधान रहेंगे। लोगों को हरे कृष्ण का जाप करने या भगवान् के किसी नाम का जाप करने के लिए प्रोत्साहित करके, यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न करेगा। हमने अनगिनत जीवों की हत्या कर निर्ममता पूर्ण कार्य किया। विशेष रूप से कृष्ण को गोविंद के नाम से जाना जाता है, वे गायों की रक्षा करते हैं । उन्होंने गायों और व्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। वे अपने भक्तों की रक्षा करते है, और वे गायों की रक्षा करते है। वे ब्राह्मणों की रक्षा करते है - नमो ब्रह्मण्य-देवाय, गो-ब्राह्मण-हिताय च ।
तो वे अत्यंत चिंतित है कि मनुष्य अपने आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करें। कलियुग में भगवद् धाम पुनः प्राप्त करना इतना कठिन नहीं है। वहाँ आध्यात्मिक जगत में कोई जन्म , मृत्यु, जरा, व्याधि नहीं है। गृहस्थ दो प्रकार के होते हैं - दो प्रकार के विवाहित व्यक्ति - गृहस्थ आश्रम जहां पति-पत्नी, वे अपने कृष्णभावनामृत को विकसित करने का प्रयास करते हैं। और इसी चेतना में वे अपनी संतानों का पालन-पोषण भी करते हैं।
दूसरे प्रकार को गृहमेधी कहा जाता है - वे केवल अपने परिवार और अपने विस्तृत परिवार के विषय में सोचते हैं। स्वभाव से ये अति ईर्ष्यालु होते हैं। यदि किसी के पास उत्तम साड़ी हैं, उत्तम घर है, तो इन्हे ईर्ष्या होती है। आप देखिए, इस कलियुग में, इस गृहमेधी अवधारणा का विस्तार हो रहा है, और देश से देश, समुदाय से समुदाय, विभिन्न भ्रांतियां हैं। हम कई अनावश्यक युद्ध देखते हैं। लोग अब शांत नहीं हैं; किंतु वे इस संघर्ष के कारण व्यग्र हैं। तो हरे कृष्ण का जप करके, भगवद् गीता को पढ़कर हम वास्तव में शांतिपूर्ण हो सकते हैं । अतएव हम इस बात पर बल देने का प्रयास कर रहे हैं कि लोग अधिक से अधिक ईश्वर के प्रति जागरूक हों, अधिक कृष्णभावनामृत हों । इस प्रकार वे अधिक शांत, अधिक प्रसन्न होंगे।
हम भगवान् चैतन्य की लीला के विषय में पढ़ रहे थे । भगवान् चैतन्य आनन्द विभोर हुए जब उन्होंने कीर्तन को चाँद क़ाजी तक पहुंचाया। चार पक्ष की किर्तन टोलियाँ थी - अद्वैत गौसाई, श्रीवास ठाकुर, हरिदास ठाकुर और भगवान् चैतन्य। भगवान् चैतन्य के साथ भगवान् नित्यानंद और गदाधर पंडित थे। कीर्तन में लाखों भक्त थे और प्रत्येक जलती हुई मशाल और भरने के लिए कुछ तेल ले जा रहे थे। कहा जाता है कि वे ताली भी बजा रहे थे और विभिन्न वाद्य यंत्र बजा रहे थे। यदि वे जलती हुई मशाल और तेल ले जा रहे हों तो वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? एक साथ वे कैसे ताली बजा सकते हैं और संगीत वाद्ययंत्र बजा सकते हैं। वास्तव में, वृंदावन दास ठाकुर ने कहा कि उन्होंने वैकुंठ-वासियों की तरह चार भुजाओं को प्रकट किया। परन्तु वे होश में नहीं थे। उन्हें यह अनुभव ही नहीं हुआ क्योंकि वे अत्यधिक भाव विभोर थे। तो इंद्र और अन्य देवता यह देखने के लिए आए कि भगवान् चैतन्य यह कीर्तन कैसे कर रहे हैं। और जब उन्होंने भगवान् चैतन्य को रोते और नाचते देखा, तो वे मूर्छित हो गए! वे चेतना खो बैठे, उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। यह अति अद्भुत था। जब उनके शरीर में पुनः चेतना आयी तो उन्होंने मानव रूप धारण कर लिया। और वेश बदलकर कीर्तन में सम्मिलित हो गए और उन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ हरिबोल का जप किया | स्वर्ग की अप्सराएं, उन पर फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा कर रही थी। यह एक अद्भुत कीर्तन था। यह निरंतर और आगे बढ़ता गया, किंतु उस समय की तुलना में अधिक लंबी अवधि तक चला । तो, इस तरह, भगवान् चैतन्य का कीर्तन अति विशेष था । कृष्ण-लीला में कुरुक्षेत्र युद्ध था । राम-लीला में वानर श्री लंका गये थे । चैतन्य-लीला में उनका कीर्तन अद्भुत था और हर कोई इस कीर्तन से पूरी तरह द्रविभूत हो गया था।
हम आशा करते हैं कि कुचिंग के सभी भक्तों को भगवान् चैतन्य की असीम कृपा प्राप्त हो । मैं निताई गौर के अर्चाविग्रह, गिरिराज के अर्चाविग्रह, गोवर्धन को देखकर अधिक प्रसन्न हुआ। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी व्रजवासियों की रक्षा की। तत्पश्चात गोपजन नंद महाराज के पास जाकर बोले, "आपका पुत्र कौन है? आपका पुत्र कौन है ? हमें मत बताओ कि वह एक साधारण व्यक्ति है, उसने सात दिनों के लिए गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। आपका पुत्र कौन है? हम सत्य जानना चाहते हैं। तब उन्होंने कहा, "नारद मुनि कृष्ण के जन्म के समय आए थे और हमें बताया कि इसके पास नारायण की शक्ति है"। और वह ग्वाले समुदाय के लिए शुभ होगा। यह सुनकर वे संतुष्ट हुए। परन्तु उसके पास नारायण की शक्ति कैसे है? वह नारायण हैं। वे सभी नारायणों के स्रोत हैं। इस प्रकार, कुचिंग में हमारे पास जो महान कृपा है कि भगवान् और उनका पवित्र नाम आपके साथ उपस्थित रहे। भगवान् का श्री अर्चाविग्रह है और उनका आशीर्वाद आप सभी को मिलता रहे, आप पर हमेशा भगवान् चैतन्य की कृपा बनी रहेगी।
कलियुग में इस मानव जीवन का सफल होना अत्यंत कठिन है। परन्तु भगवान् चैतन्य की कृपा से यह अधिक सरल है । मुझे आशा है कि आप सभी को पवित्र नाम जप का आनंद प्राप्त हो और आप प्रेमपूर्वक प्रसाद पाएंगे । और इस तरह, आपका जीवन परिपूर्ण हो सकता है।
मैं उन सभी महिलाओं और पुरुषों को धन्यवाद देता हूँ, जो कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने के लिए एक साथ सहयोग से कार्य कर रहे हैं । कुचिंग में कृष्ण भावनामृत लाने के लिए मैं कृपासिंधु कृष्ण दास को
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