मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्रीगुरुम् दीन तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्
जयपताका स्वामी: श्री श्री गौर निताई की जय! श्री राधा गोपीनाथ की जय! श्री श्री जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा, सुदर्शन की जय, श्रीनिवास गोविंद की जय! मैं एक संक्षिप्त संबोधन करूँगा। आज हम दीक्षा समारोह कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त आकांक्षा तथा गुरु आश्रय भी होगा। कलियुग में, विशेष कृपा यह है कि हम भगवान के पवित्र नामों का जप करके भगवान की शरण प्राप्त कर सकते हैं। स्वयं श्री कृष्ण तथा श्री कृष्ण के पवित्र नाम अभिन्न है । मैं देख रहा हूँ कि यहाँ सभी भक्त पवित्र नामों का जप करते हुए अत्यधिक उत्साहित हैं। मुझे आशा है कि यहाँ राजमुंदरी नगर में भक्ति- वृक्ष समूह होंगे। निकट के गांवों में नामहट्ट होंगे , भाव है हरे कृष्ण महामंत्र का जप करना, श्रीमद् भगवद गीता तथा श्रीमद् -भागवतम् का अध्ययन करना, पढ़ना, श्री कृष्ण का प्रसाद ग्रहण करना एवं भगवान् की सेवा करना।
प्रेयस् एवं श्रेयस दो धारणाएं हैं। जनसाधारण प्रेयस् के पीछे है। प्रेयस् का अर्थ है तत्काल इन्द्रियतृप्ति । श्रेयस भविष्य में प्राप्त होने वाला, भविष्य का दिव्य आनंद है। कुछ क्रियाकलाप हम कर सकते हैं, जिनसे हमें भौतिक सुख प्राप्त होता है, एवं जो हमें आध्यात्मिक उन्नति भी देते है।
जैसे यदि हम भगवान् कृष्ण का प्रसाद ग्रहण करते हैं तो इसका स्वाद उत्तम होता है तथा यह हमें आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है । आप में से कितने लोग श्री कृष्ण का प्रसाद पसंद करते हैं ? आप कुछ लोगों को देखें, वे बस कुछ भी, कोई भी व्यर्थ खाते हैं। उन्हें कुछ तत्काल सुख प्राप्त होता है किंतु वास्तव में यह बुरा कर्म है। वैसे तो हम नशा नहीं करते हैं किंतु यदि डॉक्टर हमें औषधि के रूप में देते हैं तो हम उसे लेते हैं। हम जुआ नहीं खेलते, भले ही कोई हमें ऐसा करने के लिए पुरस्कार देने का प्रलोभन दे। भक्तों के लिए अधिकृत विवाह के बाहर हमारा कोई यौन जीवन नहीं है।
आज प्रातः मुझे एक शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिए कहा गया। सत्क्रिया- संस्कार- दीपिका में गर्भादान- संस्कार नामक एक समारोह होता है। यदि कोई वेदों के अनुसार गर्भादान-संस्कार करता है, तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह उनसे अभिन्न है। तो, गर्भादान-संस्कार के माध्यम से संतान उत्पत्ति हेतु पति एवं पत्नी के साथ संबंध रखना भक्तिमय सेवा है । यद्यपि यदि किसी का पति या पत्नी के साथ संबंध है, तो यह पाप नहीं है, बुरा कर्म नहीं है, परंतु यह गर्भादान-संस्कार के बिना यह भक्तिमय सेवा नहीं है।
तो, हम विभिन्न प्रकार से भक्तिमय सेवा कर सकते हैं। अंततः, हम श्रीकृष्ण के लिए परमानंद प्रेम प्राप्त कर सकते हैं । किंतु यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। हम सर्वप्रथम श्रवण करते हैं, श्री कृष्ण ने गीता में जो कहा हम उस में विश्वास करते हैं, हम भगवान् कृष्ण में विश्वास करते हैं, उसके पश्चात् हमारे मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। क्योंकि हमारे पास श्रद्धा है, हम भक्तों के साथ जुड़ते हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि उन्होंने इस्कॉन के मंदिरों का निर्माण किया ताकि लोग भक्तों से जुड़ सकें। जब कोई देखता है कि साधु कैसे रहते हैं - वे दीक्षा लेते हैं तथा भक्तिमय जीवन का अभ्यास करने का वचन देते करते हैं। इस प्रकार वे सभी बुरी आदतों से छुटकारा पा लेते हैं। यह अनर्थ निवृत्ति है, वे बुरी संगत से छुटकारा पाकर भक्तिमय जीवन में स्थिर हो जाते हैं । निष्ठा। उसके उपरांत वे भक्तिमय जीवन में एक स्वाद विकसित करना आरम्भ करते हैं। तत्पश्चात् वे भक्ति जीवन के मधुर स्वाद से आसक्त होकर भगवान् के प्रति आसक्ति के चरण पर आते हैं । आसक्ति के पश्चात् वे श्री कृष्ण के लिए परमानंद प्रेम प्राप्त करते हैं । तद्उपरांत श्री कृष्ण के प्रति उन्मत्त उत्साही प्रेम के पश्चात् उन्हें शुद्ध प्रेम प्राप्त होता है ।
तो यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। सिद्धांतों का पालन करके, हरे कृष्ण का जप करते हुए एक एक पग प्रगति करते हुए भक्त आगे प्रगति करता है । इस प्रकार, श्रील प्रभुपाद ने कहा, उनको पूर्णता प्राप्त करने में 20 वर्ष लगे। आपको कितना समय लगेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितने गंभीर हैं।
भक्ति-योग में , भगवान् श्री कृष्ण वचन देते हैं कि वे प्रेम का आदान प्रदान करेंगे, प्रतिफल देंगे। तो यदि हम श्री कृष्ण के लिए एक पग बढ़ाते हैं, तो वे हमारी ओर दस पग बढ़ाते हैं । अतः हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि भक्त आज अनेक पग उठा रहे हैं! हम अत्यंत भाग्यशाली हैं कि गोदावरी नदी यहाँ है, जो गंगा से अभिन्न है । भगवान् चैतन्य व्यक्तिगत रूप से यहां आए थे। तो आपके पास भी सुंदर अर्चा विग्रह हैं। मैं देख रहा हूँ कि गरुड आपको पुनः भगवान् तक ले जाने के लिए तत्पर हैं! अतः हम विभिन्न समारोह करेंगे। आपको गंभीरता से पालन करने के लिए अधिक सावधान रहना होगा।
बगुन्नारा? कृतज्ञतालु कोटाग्यतालु! अब मैं पहले पवित्र नामों का जप करूंगा, नाम कहूंगा।
श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु-नित्यानंद
श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादी- गौर-भक्त-वृंद॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे
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