जयपताका स्वामी (बंगाली में) : मेरी श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के विषय में जानने की इच्छा थी, जिसमें उन्होंने 'उपदेशक' और 'महा-उपदेशक' का उल्लेख किया था। उस समय मैं समझ गया कि जिन भक्तों ने उपदेश दिया, तथापि उन्होंने भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर से दीक्षा ली थी, उन्हें देखकर वे कहेंगे कि, "ओह! तुम अमुक व्यक्ति हो!" इस प्रकार उन्होंने उन्हें सम्मान दिया जो उपदेश दे रहे थे या उनके शिक्षा गुरु थे। इस प्रकार भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी और अन्य भक्त इतने भक्तों को उद्यत कर रहे हैं। भविष्य में मेरी इच्छा है कि सभी गुरु, दीक्षा-गुरु बनें। किन्तु भविष्य में जिस प्रकार भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर इच्छा करते थे, शिक्षा गुरु होने चाहिए और वे भक्तों का मार्गदर्शन करें और उन्हें शिक्षा दें। मैंने देखा कि हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों ने ऐसा
किया था । श्रील प्रभुपाद ने कहा, कि अब यदि उनके पास 10,000 आचार्य हैं, तो भविष्य में एक लाख, और फिर दस लाख, फिर उससे एक करोड़ तक होंगे। इस प्रकार आचार्यों की कोई कमी नहीं होगी । और भगवान् कृष्ण के भक्तों का विस्तार होगा जो कृष्ण भावनामृत का विज्ञान जानते हैं । तो यह श्रील प्रभुपाद की भविष्य की दृष्टि थी ।
अब गौड़ीय मठ, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर द्वारा स्थापित, एक मठ में एक आचार्य होता है। किन्तु श्रील प्रभुपाद का इस्कॉन के लिए दृष्टिकोण था कि हजारों और लाखों आचार्य होंगे। इस प्रकार भगवान् चैतन्य की भविष्यवाणी कि " पृथिवीते आचे यत नगरादि-ग्राम सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम", यह प्राप्त की जाएगी । मैं GBC को सहमत करने का प्रयास कर रहा हूँ । यह श्रील प्रभुपाद का निर्देश है, मेरी व्यक्तिगत इच्छा नहीं है । यह बात उन्होंने कई अवसरों पर कही है। मायापुर में, अप्रैल 1975 में, उन्होंने एक व्याख्यान में कहा। और अन्य स्थानों पर, उन्होंने कहा, हमें हजारों आचार्यों की आवश्यकता है । अब इस्कॉन में हमारे पास 100 से भी कम गुरु हैं। अतः हमें उनकी अधिक आवश्यकता है।
अन्यथा भी, अब हम पढ़ रहे थे कि कैसे अमोघ ने भगवान् चैतन्य की आलोचना की थी। तब सार्वभौम भट्टाचार्य और उनकी पत्नी उसी के कारण उपवास कर रहे थे। और अमोघ को हैजा हो गया था और वह मृत्यु शय्या पर था। भगवान् चैतन्य उनके पास दौड़े और अपना हाथ उनकी छाती पर रख दिया। उन्होंने कहा, "तुम्हारा हृदय एक ब्राह्मण का हृदय है और भगवान् कृष्ण को वहाँ निवास करना चाहिए । ईर्ष्या के चांडाल को यहाँ क्यों स्थान दिया है? इस प्रकार आपका हृदय दूषित हो गया है। उठो और हरे कृष्ण का जप करो! भगवान् कृष्ण कृपा करेंगे।" तब अमोघ उठ खड़े हुए और हरे कृष्ण का जप करने लगे और कीर्तन में हर्षोल्लास से नृत्य करने लगे । उनके रोंगटे खड़े हो गए और उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। फिर उन्होंने भगवान् चैतन्य से क्षमा याचना की। फिर उन्होंने अपना मुख पीटना शुरू कर दिया और स्वयं को शाप दिया और कहा, "इस मुख ने आपकी आलोचना की, भगवान् चैतन्य!" और पिटाई के कारण उनका मुख सूज गया। तब गोपीनाथ आचार्य ने उन्हें स्वयं को पीटने से रोक दिया। भगवान् चैतन्य ने कहा कि, "मैं तुम पर कृपा करता था क्योंकि तुम सर्वभौम भट्टाचार्य के दामाद
हो । यहाँ तक कि उनका दास, दासी, या कुत्ता भी मुझे अत्यंत प्रिय है!” भगवान् चैतन्य ने कहा। यदि एक भक्त का कुत्ता भी भगवान् चैतन्य को प्रिय है, तो भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी इतना उपदेश दे रहे है और सेवा कर रहे हैं, मुझे इतनी सहायता दे रहे हैं, मैं भगवान् चैतन्य से प्रार्थना कर रहा हूँ कि वह उन पर अपनी कृपा प्रदान करें। भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी कई भिन्न - भिन्न प्रकारो से मेरी सहायता कर रहे हैं, और मुझे कहने के लिए बहुत कुछ है परन्तु मैं यहीं विराम लेता हूँ , क्योंकि कई और लोगों को बोलना है।
हरे कृष्ण!
कृष्णे मतिर अस्तु! कृष्णे रतिर अस्तु!
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