मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री गुरुं दीन-तारणम्॥
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ।।
हरि: ऊँ तत् सत्
जयपताका स्वामी: चैतन्य चंद्र चरण प्रभु मुझसे किस विषय पर बात करना चाहेंगे?
चैतन्य चंद्र चरण दास : मैं गुरु महाराज से अनुरोध करना चाहता हूँ कि आप हमें भगवान् चैतन्य के आन्दोलन का विशेष महत्व तथा उसकी क्या विशेषता है उस विषय में हमें प्रबुद्ध करें।
जयपताका स्वामी: तो यह एक रोचक प्रश्न है । परन्तु प्रथम मैं यह कहना चाहूँगा कि चैतन्य चंद्र चरण दास के सभी शिष्य मेरे लिए अत्यन्त विशेष हैं! प्रातः जब मैं अर्चाविग्रहों का दर्शन करता हूँ, तो मैं साधारणतः अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना करता हूँ, परन्तु मैं चैतन्य चंद्र चरण के शिष्यों के लिए भी प्रार्थना करता हूँ। तथा विशेष रूप से मैं चाहता हूँ कि सभी शिष्य प्रचार के लिए उत्साहित रहे एवं सफल भी हों। अभी, मैं कोयंबटूर, तमिलनाडु, दक्षिण भारत में हूँ। उसके पूर्व मैं बेंगलुरु में था। बेंगलुरू के न्यू राजापुर मंदिर में लगभग 200 भक्त तथा 100 परिवार हैं। परन्तु वहाँ मात्र दो ब्रह्मचारी हैं । तथा अन्य सभी गृहस्थ प्रतीत होते हैं । अतः वहाँ सौ से अधिक महिलाएँ थीं, वैष्णवी । तथा निश्चित रूप से, अनेक पुरुष भी हैं। अतः एक पुरुष जो सेना से सेवानिवृत्त है, उसके पास 200 सेना परिवार हैं जो हरे कृष्ण का जप करते हैं ! परन्तु सभी महिलाएँ सेवा में लगी हुई हैं। कुछ भोजन पकाती हैं, उनके पास भगवान् जगन्नाथजी का विग्रह है , अतएव वे 56 प्रकार के भोग व्यंजन पकाती हैं । इनमें आधे पुरुष प्रचारक तथा आधी महिला प्रचारक हैं। भक्त-युगल शास्त्र पाठ्यक्रमों के प्रभारी हैं । भक्ति-शास्त्री , भक्ति- वैभव , भक्ति-वेदांत । अतः इस समुदाय को देखकर प्रसन्नता हुई जहाँ प्रत्येक भक्त सेवा में व्यस्त था। अब क्या विभिन्नता है? तो शंकराचार्य , उन्होंने कहा कि यदि आप भौतिक जगत से मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको संन्यासी होने की आवश्यकता है । परन्तु भगवान् चैतन्य ने कहा कि चाहे आप गृहस्थ हों या वैरागी , आप भक्ति-योग के माध्यम से मुक्ति प्राप्त कर सकते हो?। यही एक भिन्नता है। तो, आप में से कौन संतुष्ट होना चाहेगा? उचित है तथा आप में से किसने भौतिक जीवन से पूर्ण संतुष्टि प्राप्त कर ली है? चूँकि हम अपनी इंद्रियतृप्ति में लीन रहते हैं तथा हमारी इंद्रियाँ कभी तुष्ट नहीं होती हैं। परन्तु यदि हम कृष्ण की इंद्रियों की सेवा हेतु कार्यरत रहते हैं तो हम संतुष्ट हो जाते हैं । भगवान् चैतन्य ने हमें एक अत्यंत ही सरल विधि दी है। उन्होंने हमें "हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे" का जप करने के लिए कहा! भगवान् चैतन्य ने हमें यह सरल प्रणाली दी है। तथा श्रील प्रभुपाद ने कहा कि हमें 12 महाजनों का अनुसरण करना चाहिए । भगवान चैतन्य ने कहा: " यारें देख तारे कह 'कृष्ण' उपदेश "। अतएव आप जिसके भी सम्पर्क में आएँ उन्हें कृष्ण का संदेश बताएँ तथा उन्हें हरे कृष्ण का जप करने के लिए प्रेरित करें।
किसी ने कहा, "अरे! क्या इसका अर्थ यह है कि हमें एक अत्यन्त महान विद्वान बनना चाहिए?" परन्तु प्रह्लाद महाराज , वे एक अल्पायु बालक थे, एक असुर के पुत्र थे उनकी इतनी आयु नहीं थी कि उन्हें अधिकतम शिक्षा दी जा सके। उनका जन्म एक असुर परिवार में हुआ था। परंतु कृष्ण प्रत्येक निष्कपट प्रयास को स्वीकार करते हैं, यदि आप में से प्रत्येक अपनी पूर्ण निष्ठा से प्रयास करें, तो कृष्ण इसे सहर्ष स्वीकार करेंगे । यह भगवान् चैतन्य के आंदोलन की एक विशिष्ट विशेषता है। कोई भी पूर्णता प्राप्त कर सकता है यदि वे केवल निष्ठापूर्वक कृष्ण को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं जैसे हम इस महामंत्र का जप करते हैं, वैसे ही हम स्वाभाविक रूप से शुद्ध हो जाते हैं । अतएव भगवान् चैतन्य चाहते थे कि पूरे विश्व के हर नगर तथा ग्राम में उनके पवित्र नामों का जप किया जाए। अतः उन्होंने मात्र भारत नहीं कहा अपितु उन्होंने संपूर्ण विश्व में कहा तथा इसमें रूस भी सम्मिलित है! आपको अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए कि किस प्रकार अपने देश में कृष्णभावनामृत का प्रचार करें । तत्पश्चात् आप लोगों को संतुष्ट कर पाओगे ! यही वास्तविक रहस्य है! मैं सोच रहा था कि नारद मुनि सदैव प्रगतिवादी थे तथा वे किस प्रकार सदैव किसी को कृष्णभावनामृत बनाने के लिए कुछ विधि में नये सुधार कर रहे थे । वे एक शिकारी से मिले तो शिकारी ने कहा कि मैं स्वयं को किस प्रकार से शुद्ध कर सकता हूँ? नारद मुनि ने कहा कि भगवान् के नाम का जप करो। शिकारी ने कहा, "यह संभव नहीं है, मैं एक शिकारी हूँ, मैं एक हत्यारा हूँ, मैं एक चोर हूँ, मैं कुछ भी पवित्र नहीं कर सकता।" तत्पश्चात् नारद मुनि ने एक क्षण के लिए विचार किया तथा उन्होंने कहा, " मरा , मरा , मरा !" जिसका संस्कृत में अर्थ है "मार डालो , मारो, मारो!" शिकारी ने कहा, "ओह मैं यह जप कर सकता हूँ , मुझे इसका अभ्यास है, मरा , मरा , मरा , मरा " उसने जप करना प्रारम्भ कर दिया। प्रथम अक्षर के पश्चात यह बन गया, " राम , राम, राम ।" कितनी अद्भुत बात है! नारदमुनि ने राम के नाम का जप करने के लिए उस शिकारी को प्रेरित किया। परन्तु उन्होंने इसे अत्यन्त ही गुप्त प्रकार से किया। तो आप सोच सकते हैं कि आप रूस में व्यक्तियों को जप करने के लिए किस प्रकार से प्रेरित कर सकते हैं। आप भाषा जानते हैं अतएव ऐसा कोई शब्द हो सकता है जो उचित हो। आप खिड़की के चौखट का जप करें! खिड़की की चौखट! (रूसी भाषा में खिड़की की चौखट को "राम" कहा जाता है तो किसी न किसी प्रकार व्यक्तियों से कृष्ण के नाम का जप करवाएँ तथा शुद्ध हो जाएँ। ( नारायणी राधा देवी दासी रूसी अनुवादक ने कहा कि रूसी भाषा में एक वाक्यांश है जो बर्फ में पिघलता नहीं है वे निताई हैं।) अंग्रेजी भाषा में हम knee (नि) पर धनुषाकार टाई बाँधते हैं तथा यदि कोई पूछता है, तो वह नि+ टाई है अर्थात् 'नि' ' ताई '। अतः इस प्रकार किसी न किसी रूप में उन्हें निताई या गौरांग अथवा गौर या किसी का भी नाम जप करने के लिए प्रेरित करें। परन्तु तथ्य यह है कि आप विचार कर रहे हैं कि भगवान् कृष्ण को किस प्रकार प्रसन्न किया जाए, गौरांग को किस प्रकार प्रसन्न किया जाए । वह स्वयं भगवान् कृष्ण को प्रसन्न करेगा । एक न्यूरोलॉजिस्ट ने व्यक्तियों को गो-रन-गो ,गो-रन-गो, गो-रन-गो कहने के लिए कहा । गौरांग शब्द पुनरावृत्ति करने के पश्चात् आपने पहले ही रूसी भाषा में दो
नामों के विषय में विचार किया है, खिड़की की चौखट तथा बर्फ में नहीं पिघलना है। पुर्तगाली में हमारे पास एक शब्द है अमराद, जिसका अर्थ है एक बालक तथा बालिका एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं । अमराद में , तो राधा का नाम है । मलय में दिन का नाम हरि है। ( नारायणी राधा देवी दासी ने कहा, रूसी में, मैं प्रसन्न हूँ, हम कहते हैं "या राधा" ! मुझे ज्ञात नहीं कि वे प्रसन्न हैं या नहीं? सभी को कहना चाहिए, " या राधा !" मैं ज़ूम वाले दर्शकों को नहीं सुन सकता “ या राधा !" इस प्रकार से व्यक्तियों से जप कराने का यह एक उपाय है। इसे अज्ञात-सुकृति कहा जाता है , अनभिप्रेत में उन्हें लाभ मिलता है । अन्य प्रकार भी हो सकते हैं। साधारणतः उसी प्रकार जैसे व्यक्तियों को फ़ूड फ़ॉर लाइफ़, जीवन के लिए भोजन, बाँटने में सहायता करने के लिए कहना। संभवतः युवा पीढ़ी को भूखे व्यक्तियों की सहायता करने का विचार उचित लगे। आप देखिए, मैं भक्तों को श्रील प्रभुपाद की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूँ, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवतम्, चैतन्य-चरितामृत का पठन करें। कुछ भक्तों की इतनी अधिक सेवा होती है तथा उनके पास अध्ययन करने तथा परीक्षा देने का समय नहीं होता है। मैंने अनेक बार शास्त्र पढ़े हैं। मुझे श्रील प्रभुपाद की उपस्थिति में भक्ति शास्त्री की उपाधि मिली। अब मैं केवल एक योग्य उदाहरण दिखाने के लिए भक्ति-वैभव कर रहा हूँ । मेरे पास परीक्षा देने का समय नहीं है। मेरे पास पहले से ही पुस्तकें हैं, मैंने दो परीक्षाएँ दी हैं, मुझे ए+ मिला है किंतु परीक्षा देने के लिए समय निकालना कठिन है। मुझे लगता है कि यदि भक्त प्रथम दीक्षा लेते हैं, तभी से वे भक्ति शास्त्री, भक्ति-वैभव का अध्ययन करना प्रारम्भ कर सकते हैं, यह सरल रीति होगी | मेरी तमिलनाडु के एक नगर में 20 वर्ष की एक युवा बालिका से भेंट हुई, वह अल्प आयु में ही भक्ति-वेदांत कर चुकी थी। मैंने अभी उसे द्वितीय दीक्षा दी है। अतएव मैं द्वितीय दीक्षा , ब्राह्मिणी, तब तक नहीं देता जब तक भक्तों के पास भक्ति शास्त्री न हो । मुझे लगता है कि रूस में यह मानक है? क्या यह सत्य है? मैंने पाया कि श्रील प्रभुपाद ने कहा कि यदि हम द्वितीय दीक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें भक्ति शास्त्री करना होगा । परन्तु ... आप वृद्ध महिला को क्या कहते हैं,... आप रूसी भाषा में किस प्रकार से कहते हैं, 'बभुस्क ' या कुछ ऐसा जो उनके पास अध्ययन के लिए समय नहीं है, अतएव मैंने उनके लिए एक विशेष परीक्षा ली। अब एम-आई, मायापुर इन्स्टीट्यूट , में उनके पास प्रौढ भक्तों के लिए प्राविधान है जो दस वर्ष से अधिक समय से आंदोलन में हैं, वे भक्ति शास्त्री के लिए आठ प्रश्नों की परीक्षा दे सकते हैं । किसी भी पाठ्यक्रम के माध्यम से जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप तत्वज्ञान जानते हैं, यदि आपने भगवद्गीता पढ़ी है , यदि आप आंदोलन में 10 वर्ष से हैं, तो आप सीधे परीक्षा दे सकते हैं। हम चाहते हैं कि व्यक्ति श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन तथा चैतन्य-चरितामृत का पठन करें , जो स्नातकोत्तर अध्ययन के समान है । श्रील प्रभुपाद ने कहा कि भगवद्गीता अध्ययन स्नातक की तरह है, भक्ति-वैभव स्नातकोत्तर की भाँति तथा भक्ति-वेदांत , पीएचडी, स्नातकोत्तर शोध के समान है एवं भक्ति-सार्वभौम पीएचडी से अधिक, विद्या वाचस्पति के समान है। अतः, हम चाहते हैं कि आप सभी भक्त कृष्णभावनामृत का विस्तार करने में सहायता करें । आप चैतन्य चंद्र चरण दास के शिष्य हैं परन्तु हम चाहेंगे कि आप स्वयं स्वामी बनें, बाद में! आप सदैव चैतन्य चंद्र चरण प्रभु के शिष्य रहेंगे परन्तु आप सामान्य लोगों के गुरु होंगे। इस प्रकार कृष्णभावनामृत आंदोलन, भगवान् चैतन्य का आंदोलन विस्तृत हो सकता है ।
कोई प्रश्न?
प्रश्न: कक्षा के लिए धन्यवाद। कलियुग की सभी विपदाओं को उद्धृत करने में लोगों की सहायता कैसे करें?
जयपताका स्वामी: अतः बात यह है कि हमें इस जगत को त्यागकर आध्यात्मिक धाम पुनः लौटने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। जब इतनी अधिक समस्याएँ हैं तो लोग यहाँ क्यों निवास करना चाहते हैं? तथा यदि हम भक्ति-योग का अभ्यास करते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से संतुष्ट होते हैं तथा कलियुग की समस्याओं से सुरक्षित रहते हैं। क्या यहाँ महावराह हैं? अत: यदि व्यक्ति कृष्णभावनाभावित हो जाते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से सभी भौतिक समस्याओं का सामना कर सकते हैं । कर्म तथा भक्ति में यही भिन्नता है । कर्मी व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम भुगत रहे हैं तथा यदि वे कृष्ण के लिए वही गतिविधियाँ करते हैं, तो वे आनंद में रहते हैं। प्रहलाद महाराज के समान , उनके पिता एक असुर थे, परन्तु प्रहलाद महाराज दिव्य थे। अतः ऐसे में यदि आप, लोगों को भक्ति-योग की शिक्षा देते हैं , तो वे कलियुग की समस्याओं से सामना कर सकते हैं। कोई अन्य प्रश्न?
प्रश्न: आपकी कक्षा के प्रारम्भ में ही आपने कहा था कि हम कुछ रचना कर सकते हैं या कृष्ण के नाम के गीतों का गायन कर सकते हैं, कृपया हमें आशीर्वाद दें क्योंकि हमारे पास पूर्व से ही अनेक भजन हैं तथा हम उन्हें अपने बैंड नामामृत पर गायन करते हैं । हम ये भजन नवीन व्यक्तियों के लिए गायन करते हैं। कृपया हमें आशीर्वाद दें!
जयपताका स्वामी: आशीर्वाद! कृष्णे मतिर अस्तु ! भगवान् चैतन्य श्वेतद्वीप में हैं ! तथा गोलोक वृंदावन में । इसके अतिरिक्त, क्षीरोदकशायी विष्णु के निवास स्थान को भी श्वेतद्वीप कहा जाता है ! आपका एक आध्यात्मिक नाम है! ( श्वेतलिन भक्त का नाम था)। अद्भुत ! मंदाकिनी देवी दासी माताजी की जय हो ! (वह रूस में जूम सत्र में थीं तथा उन्होंने गुरु महाराज को उनकी अद्भुत सेवा के लिए महिमामंडित किया) जयपताका स्वामी: श्रीलं प्रभुपाद 70 वर्ष की आयु में, वे एक मालवाहक समुद्री जहाज से पाश्चात्य् देशों में गए। उन्होंने हमें कृष्णभावनामृत देने के लिए अत्यधिक प्रयत्न किया । मुझे लगता है कि मैं उन्हें उनके इस अनुग्रह के समक्ष अपना अल्प योगदान ही दे पा रहा हूँ। परन्तु यदि कोई भगवान् चैतन्य तथा पंचतत्त्व की सेवा करने के लिए उत्साहित है, तो मैं अत्यन्त प्रसन्न होता हूँ! मैं चैतन्य चंद्र चरण दास तथा उनके शिष्यों, उनकी गुणीयल पत्नी तथा मेरे सभी शिष्य-के-शिष्यों से अत्यधिक प्रसन्न हूँ! कृपया कृष्णभावनामृत प्रसार करने का प्रयास करें । स्पेसबो , कोटि- कोटि धन्यवाद! मेरे यहाँ आने से पूर्व, मुझे एक संदेश मिला कि श्रीवास ठाकुर के भाई, श्रीराम पंडित , उनके द्वारा सेवित अर्चाविग्रह हमें प्राप्त हुए है ! वे श्री श्री राधा दामोदर हैं , अत्यन्त शोभायमान अर्चाविग्रह तथा उनके दर्शन भगवान् चैतन्य ने किये । किसी प्रकार वे अर्चाविग्रह हमारे समक्ष आ गए! गौर- मंडल भूमि पर हम सभी पवित्र स्थानों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। यही श्रील प्रभुपाद चाहते थे।
हरे कृष्ण !
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