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20220101 श्रीमद्-भागवतम् 1.13.44

1 Jan 2022|Duration: 00:48:16|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Transcription|Śrī Māyāpur, India

यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं वा न चोभयम् ।
सर्वथा न हि शोच्यास्ते स्‍नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४॥

हे राजन्, सभी परिस्थितियों में, चाहे आप आत्मा को नित्य मानो अथवा भौतिक देह को नश्वर, अथवा प्रत्येक वस्तु को निराकार परम सत्य में स्थित मानो या प्रत्येक वस्तु को पदार्थ तथा आत्मा का अकथनीय संयोग मानो, वियोग की भावनाएँ केवल मोहजनित स्‍नेह के कारण हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।

तात्पर्य कृष्ण कृपा मूर्ति श्री श्रीमान ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा : वास्तविकता यह है कि प्रत्येक जीव परम पुरुष का व्यक्तिगत अंश है और उसकी स्वाभाविक स्थिति अधीनस्थ सहयोगी सेवक की है । चाहे जीव अपनी बद्ध अवस्था में हो अथवा ज्ञान तथा शाश्वतता से पूर्ण अपनी मुक्त अवस्था में हो, वह नित्य परमेश्वर के ही अधीन रहता है । लेकिन जो वास्तविक ज्ञान के जानकार नहीं हैं, वे जीव की वास्तविक स्थिति के विषय में तरह-तरह की कल्पनाएँ करते हैं । किन्तु दर्शन की सभी विचारधाराओं द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि जीव शाश्वत है और यह पाँच भौतिक तत्त्वों से बना शरीर रूपी वस्त्र विनाशशील तथा अस्थायी है । यह शाश्वत जीव कर्म के नियम द्वारा एक भौतिक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता है और ये भौतिक शरीर अपनी मूलभूत संरचना के कारण विनाशशील हैं । अतएव आत्मा के देहान्तरण के कारण या किसी अवस्था में भौतिक शरीर के विनष्ट होने से किसी तरह का शोक नहीं करना चाहिए । कुछ ऐसे लोग हैं, जो भौतिक बन्धन से छूटने पर परमात्मा में आत्मा के तादात्म्य में विश्वास करते हैं । और कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो आत्मा के अस्तित्व को ही नहीं मानते, अपितु पदार्थ में विश्वास करते हैं । हमारे दैनिक जीवन में न जाने कितने पदार्थ अन्य पदार्थों में रूपान्तरित होते देखे जाते हैं, किन्तु हम ऐसे परिवर्तनशील रूपों के लिए शोक नहीं करते । प्रत्येक दशा में दैवी शक्ति का वेग रोका न जा सके ऐसा होता है, इसमें किसी का वश नहीं है, अतएव शोक करने का कोई कारण नहीं होता ।

नम ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भूतले
श्रीमते भक्तिवेदांत-स्वामिन् इति नामिने ।
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे
निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे ॥
जय श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंद,
श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द ॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरि हराये नमः कृष्ण यादवाय नमः
यादवाय माधवाय केशवाय नमः
गोपाल गोविंद राम श्री मधुसूदन ॥


मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

जयपताका स्वामी: नारद मुनि युधिष्ठिर महाराज और उनके परिवार को अपना उपदेश दे रहे हैं । वह बोल रहे हैं कि परिस्थिति कैसी भी हो परंतु शरीर पर  शोक या विलाप करने का कोई औचित्य नहीं है । अतएव  वह बता रहे हैं कि कैसे शरीर अस्थायी है, परंतु आत्मा शाश्वत है। और आत्मा दूसरे शरीर में परिवर्तित या स्थानांतरित हो जाती है, और इसके लिए शोक करने का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए । यदि कोई स्वयं को शरीर मानता है, तो वह शरीर पर शोक करता है ।

 

तो, वास्तव में विदुर ने धृतराष्ट्र को उपदेश दिया और धृतराष्ट्र आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया क्रियान्वित करने के लिए हिमालय चले गए । और उनकी सुयोग्य पत्नी गांधारी ने भी उनका अनुसरण किया । फिर विदुर अन्य स्थान पर चले गए हैं। नारद मुनि कह रहे हैं कि शोक करने का कोई कारण नहीं है ।  अतएव इससे पहले कि वे यह बताए कि उनके काका कहाँ गए हैं, वे एक दार्शनिक आधार देते है। वास्तव में, वे काका नहीं हैं, वे ज्येष्ठ हैं । धृतराष्ट्र का जन्म पहले हुआ, उसके पश्चात् विदुर और तदुपरान्त पांडु ।

तो यह एक रोचक विशेषता है, क्योंकि  इस महामारी के कालावधि में 50 लाख से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं और हम सभी इस बात का शोक मना रहे हैं कि कोई हमें छोड़कर चला गया है । और हमने कुछ अपनों को या प्रियजनों को खोया है । परंतु यहां, यह कहा गया है कि किसी भी परिस्थिति में शोक करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि आत्मा अभी भी जीवित है । यह शरीर अस्थायी है और नष्ट हो जाएगा। आज या कल, भौतिक शरीर चला जाएगा । किंतु आत्मा स्थायी है और अनंत काल तक जीवित रहेगी । बृहद जनसमूह इस तथ्य से अनभिज्ञ है।

हम इस अवसर पर सभी को क्रिस्टाबदा नव वर्ष की शुभकामनाएं देते हैं। यद्यपि हमारा नया वर्ष गौराबदा, गौर पूर्णिमा से है। किंतु चूंकि हम सभी इस अंग्रेजी कैलेंडर, क्रिस्टाबद कैलेंडर का उपयोग करते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि हम इसका पालन भी करते हैं। कल रात हमें यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि आनेवाले नव वर्ष के लिए, लोग मायापुर में हरे कृष्ण का जप कर रहे थे । परंतु मसीह, प्रभु यीशु मसीह ने अपनी दस आज्ञाएँ दीं । उनकी एक आज्ञा है "हमें अपने ह्रदय, आत्मा और मन से भगवान् से प्रेम करना चाहिए।" एक आज्ञा है - "तू हत्या न करना।"  किंतु दुर्भाग्य से ... श्रील प्रभुपाद ने बताया कि कई ईसाई पशुओं को मारते हैं, उनके पास बूचड़खाने हैं । अब हम एक विश्वव्यापी महामारी से जूझ रहे हैं किंतु हम इतने सारे पशुओं की हत्या भी कर रहे हैं ।  मेरे एक सचिव ने मुझे बताया कि नागालैंड में, जो भारत में एक ईसाई राज्य है, वहां ईसाई परिवार मुर्गे का वध करते हैं, और उनके पास सूअरों के लिए बूचड़खाने भी हैं। श्रील प्रभुपाद कह रहे थे कि लोग कैसे सोचते हैं कि वे धार्मिक हैं, यदि वे इस प्रकार पशुहत्या करते हैं तो वे सज्जन की श्रेणी में भी नहीं आते  है । अतः, कदाचित् यदि लोग पशु हत्या बंद कर दें तो युद्ध और महामारियां कम होंगी। हमने सुना है संयुक्त राज्य अमेरिका में कुछ दिन पहले 582,000 लोगों का COVID के लिए परीक्षण सकारात्मक हुआ था। और यूके में 220,000 या कुछ और अधिक। यद्यपि यह ऑस्ट्रेलिया में अपेक्षाकृत कम था, परंतु पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में यह बढ़ रहा है। और लोग यदि मांस खाना बंद कर दें और भगवान् का नाम जपना प्रारम्भ कर दें, तो वस्तुस्थिति परिवर्तित हो सकती है। श्रील प्रभुपाद कह रहे थे कि हरे कृष्ण का जप करना सबसे उत्तम है, किंतु यदि लोग हरे कृष्ण का जप नहीं करना चाहते हैं, तो वे हरि या भगवान के किसी भी नाम का जाप कर सकते हैं ।  वे अल्लाह या यहोवा या परमेश्वर के किसी प्रामाणिक नाम का जाप कर सकते हैं। सभी लोग जप करना प्रारम्भ करें, जिससे विश्व में शांति आये। परंतु साथ ही उन्हें पशुओं को खाना और मारना बंद कर देना चाहिए । एक प्राणी की प्राकृतिक मृत्यु होती है, तब वे उसे खा सकते हैं। प्रभु यीशु ने कहा, " तुम नहीं मारोगे" !

वैसे भी, आज उद्धारण दत्त ठाकुर का तिरोभाव दिवस  है । उनका मंदिर त्रिवेणी में है। वह भगवान् नित्यानंद के संगी थे। वह एक सुवर्ण-वणिक थे। वह सोने का व्यापार करते थे , परंतु वे एक महान वैष्णव थे । तो एक गृहस्थ के रूप में उन्होंने वैश्य के रूप में अपना व्यवसाय किया । किन्तु वे भगवान् कृष्ण और भगवान् गौरांग की सेवा में लगे रहे । त्रिवेणी में उनके नाम से एक अद्भुत मंदिर है। श्रील प्रभुपाद उनके वंश में आते हैं । परंतु उन्होंने इसका इतना जिक्र कभी नहीं किया। उन्होंने अपनी पुस्तकों में इस तथ्य को कई बार स्वीकार किया था । उनके परिवार में यह परंपरा थी की विवाह से पूर्व , परिवार के सदस्यों को दीक्षा लेनी पड़ती है। और रघुनाथ दास गोस्वामी, उनके गाँव के निकट रहते थे।

इसके  पश्चात् महेश पंडित का दिवस आता है। मैं श्रील प्रभुपाद के साथ महेश पंडित के मंदिर गया था । चकदा स्टेशन के बाद महेश पंडित का स्थान है। मुझे नाम स्मरण नहीं है, यह कोलकाता की ओर अगला स्टेशन है। मुझे प्रतीत होता है कि यह स्टेशन का नाम पालपाडा़ है। वैसे भी, श्रील प्रभुपाद ने कहा कि रविवार को गांव के लोग एकत्रित  होते थे। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि आप उस दिन जो कुछ भी पकाते हैं, आप उसे सर्वप्रथम अर्चा विग्रहों को अर्पित करे और फिर प्रसाद ग्रहण करे। आप सभी सामग्री को एक स्थान पर एकत्रित करें और आप सभी एक सामुदायिक रसोइ के रूप में पकाएं, और  भगवान् को अर्पित करें और प्रसाद लें। वहाँ गौरांग महाप्रभु का एक मंदिर है। वहां के मंदिर मे उपस्थित  सेविते उस मंदिर को श्रील प्रभुपाद को दान करना चाहते थे। परंतु किसी कारणवश यह फलीभूत नहीं हुआ।

किंतु यह युक्ति, यह प्रणाली अत्यंत उत्तम है, हमारे ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश में , मलेशिया भी, सप्ताह में एक दिन है, हम मंदिर को सभी सामग्री दे सकते हैं, संयुक्तरूप से पका सकते हैं और प्रसाद एक साथ ले सकते हैं। तो श्रील प्रभुपाद, उनका विचार था कि हर कोई प्रसाद ग्रहण करे , उस दिन वे भोजन पकायें और अर्चा विग्रह को भोग लगायें हैं और सब प्रसाद ग्रहण करे ।

अब भारत में शरद ऋतु है। किंतु ऑस्ट्रेलिया में ग्रीष्म ऋतु होती है और मलेशिया में लगभग पूरा वर्ष गर्मी होती है। चूंकि मलेशिया भूमध्य रेखा के पास है। तथापि ऑस्ट्रेलिया में अब आम, लीची जैसे कई उष्णकटिबंधीय फल पाए जाते हैं। वहाँ बॉक्सिंग-डे पर, क्रिसमस के बाद, उनका स्नान-यात्रा उत्सव होता है । वहां उनका पाणिहटी उत्सव भी होता है । और वे राधा कृष्ण, गौर निताई और जगन्नाथ के चिड़ा* के बर्तनों पर सुंदर चित्र बनाते हैं। वे विभिन्न ऑस्ट्रेलियाई फलों से चिड़ा-दही बनाते हैं। मैं वहां व्यक्तिगत रूप से जाना पसंद करता हूं किंतू ऑस्ट्रेलियाई सीमाएं अब भी खुली नहीं हैं। मैं वहां जूम से गया था। और इसलिए, इन बर्तनों को नीलामी में लेने और मंदिर को दान करने का अवसर मिला। मैंने कुछ नीलामियों को देखा। आपको आश्चर्य होगा कि एक मिट्टी के बर्तन के लिए 600 डॉलर का भुगतान किया जाता था, रु 30,000! तो, निश्चित रूप से यह बांग्लादेश में अधिक टाका होगा। परंतु मैं भारतीय रुपए में बता रहा हूं। तो यह अकल्पनीय है कि एक मिट्टी के बर्तन रु 30,000!

वैसे भी, इस्कॉन में हम संपूर्ण विश्व में विभिन्न उत्सव मनाते हैं। और हमारे पास एक प्रकार का नित्य-महोत्सव, दैनिक उत्सव है। तो हमारे लिए नववर्ष का दिन भी एक पर्व है। नव वर्ष की पूर्व संध्या कल रात भी हम जप और नृत्य कर रहे थे। किंतु कुछ नगरों में वे विस्तृत आतिशबाजी करते है। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि आतिशबाजी आंखों की रोशनी को गुदगुदाने के समान है। क्या होता है, आतिशबाजी देखने से आपको क्या मिलता है? श्री कृष्ण का मुखमंडल देखकर गोपियों को अकल्पनीय आनंद मिला, कृष्ण के पास अतुलनीय सौंदर्य है। यद्यपि, हम भौतिक जगत में इन चीजों से संलग्न होना नहीं चाहते हैं। हम श्री कृष्ण और उनके सर्व-सुंदर रूप से जुड़ना चाहते हैं । हम आध्यात्मिक जगत में जाना चाहते है और अनंत काल तक कृष्ण की सेवा करना चाहते है । भौतिक जगत में पदम् पदम् यत् विपदम् - जो हर कदम पर विपदा है। ये भयावह स्थिति , आध्यात्मिक जगत में उपस्थित नहीं हैं। वहाँ हम कृष्ण की ऊर्जा के रूप में रहते हैं और कृष्ण की सेवा में संलग्न होकर हम असीमित आनंद प्राप्त करते हैं। जबकि हम भौतिक जगत में हैं यदि हम श्री कृष्ण के लिए अपने सुप्त प्रेम को जागृत कर सकते हैं, यही जीवन की पूर्णता है । हमें भगवान् श्री कृष्ण की सेवा के लिए परस्पर सहयोग करना है । तो, कलियुग ऐसा है कि हम सदा सर्वदा कलह और विभाजन में उलझे रहते हैं। किंतु येन केन प्रकारेंण नारद मुनि की दया और श्रील प्रभुपाद की कृपा से हमें श्री कृष्ण की सेवा के लिए एकत्र होना चाहिए ।

और  मानव जीवन का यही वास्तविक उद्देश्य है, कि हम अपने घर भगवद  पुनः जाएं। गौरांग महाप्रभु सभी का उद्धार करने आए। हमें गौरांग महाप्रभु के चरण कमलों की सेवा करनी चाहिए और देखना चाहिए कि बहुत से लोग कृष्ण के भक्त बनते हैं और हमें उस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। हम आशा करते हैं कि इस नूतन वर्ष की समयावधि में आप सभी कई कृष्ण भावनाभावित भक्त बना सकते हैं। आप सभी को मेरी शुभकामनाएं! राधा कृष्ण मतिर अस्तु !

तो, अब समय समाप्त हो गया है, मैं कुछ प्रश्नों का उत्तर दूंगा।

आनंदिनी सीता देवी दासी: आपने कहा था कि हमें किसी भी भौतिक शरीर के जाने के लिए शोक नहीं करना चाहिए, जब हम जानते हैं कि आत्मा अभी भी है । परन्तु फिर भी कृष्ण भावनामृत में रहते हुए हम अपने प्रियजनों के किसी भी भौतिक प्रस्थान के लिए आंसू बहाते हैं और शोक मनाते हैं । कृपया सुझाव दें कि हम उन परिस्थितियों को कैसे समझ सकते हैं?

जयपताका स्वामी: यदि कोई वैष्णव है, तो हम विरह अनुभव करते हैं । यदि वे वैष्णव हैं या नहीं परंतु हम आत्मा के  कल्याण हेतु पिंडदान या कुछ और करना चाहेंगे। तो हम जानते हैं कि आत्मा अभी भी जीवित है। तो, यदि वे कृष्ण भावनामृत में देह त्याग करते है तो हमें प्रसन्नता है कि वे आध्यात्मिक जगत में गए । हम कुछ विरह अनुभव कर सकते हैं, परंतु हम भौतिकवादियों की तरह शोक नहीं मनाते। जैसे की पहले नारद मुनि ने बताया कि युधिष्ठिर के काका और काकी कहाँ गए, विदुर ने उन्हें सबसे पहले यह आध्यात्मिक सलाह दी। अतः, यदि हम इस श्लोक को बार-बार पढ़ते हैं और इसका अर्थ समझते हैं, तो यह हमें ऐसी परिस्थितियों को नियंत्रण करने में सहायता कर सकते है।

द्विजनाथ गौरांग दास: इस नव वर्ष 2022 में हमें भगवान् कृष्ण से क्या प्रार्थना करनी चाहिए?

जयपताका स्वामी: प्रार्थना करने के लिए सबसे उत्तम बात यह है कि हम कृष्ण की सेवा कर सकते हैं । हम कृष्ण के लिए अपने सुप्त प्रेम को जागृत कर सकते हैं । कि हम बहुत से लोगों को कृष्ण भावनामृत में स्थिर होने में सहायता कर सकते हैं । कुछ लोग प्रार्थना करते हैं कि वे बहुत सारी पुस्तकें वितरित कर सकें। कुछ लोग प्रार्थना करते हैं कि वे मंदिर के विस्तार में सहायता कर सकते हैं। कुछ लोग प्रार्थना करते हैं कि पति और पत्नी, वे गुरु और गौरांग की सेवा के लिए एक साथ कार्य कर सकें। कुछ लोग प्रार्थना करते हैं  कि।  उन्हें उनके नामहट्ट या भक्ति-वृक्ष का विस्तार करने की  इच्छा हो सकती है । पुजारियों, वे पूछ सकते हैं कि उनकी अर्चा विग्रह पूजा उत्कृष्ट हो सकती है । रसोइया, वे प्रार्थना करते हैं कि वे कृष्ण के लिए उत्कृष्ट भोग बना सकें । इस प्रकार  से ऐसे  बहुत से  क्रिया-कलाप हैं जिनके लिए आप प्रार्थना कर सकते हैं। तो आप देख सकते है कि, भक्तों की इच्छाएँ होती हैं, किंतु उनकी इच्छाएँ कृष्ण भावनाभावित होती हैं । कोई व्यक्ति TOVP को ऊपर आते देखना पसंद कर सकता है! वे सोचते हैं कि मैं इस वर्ष और अधिक दान कैसे दे सकता हूं? मैं इस वर्ष मैं  अधिक भक्त कैसे बना सकता हूँ? तो, बहुत सी चीजें हैं जो हम कृष्ण से प्रार्थना कर सकते हैं । कि हम अधोगामी ना हो ,नीचे न गिरें, हमें गुरु और श्री कृष्ण को संतुष्ट करना चाहिए ।

सुमित्रा गौरचंद्र दास (बंगाली): हम परवर्ती आचार्यों के तिरोभाव दिवस को क्यों मनाते हैं?

जयपताका स्वामी: परवर्ती आचार्य, वे भगवान् के धाम ,भगवद्धाम लौट गए हैं। तो जब वे भौतिक संसार में थे, उन्होंने हमें हर पग पर सिखाया था कि हम भगवान् की सेवा में कैसे संलग्न हो सकते हैं। तो इस प्रकार उनका प्राक्टय दिवस और तिरोभाव  दिवस दोनों ही शुभ होते हैं।

देवेश्वर जगन्नाथ दास (बंगाली): आप प्रायः भक्त के कुशल क्षेम के विषय में बात करते हैं। जब माताजी प्रभु की देखभाल कर रही हों, या प्रभु माताजी की देखभाल कर रहे हों, तो उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए?

जयपताका स्वामी: सामान्य रूप से , माताजी,  अपने पतियों की सेवा करती हैं। और वे पुरुष अपनी पत्नियों की सहायता करते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त भी कदाचित्  अत्यंत सावधान रहना चाहिए। क्योंकि माताजी में स्नेह होता है, और वह स्नेह  अन्य रूप भी ले सकता  हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि महिलाएं आग की भाँति हैं और पुरुष मक्खन की भाँति, और यदि अग्नि और मक्खन एक साथ मिल जाते हैं, तो मक्खन पिघल जाता है। ठीक उसी प्रकार, यदि एक महिला को किसी अन्य पुरुष के लिए भोजन बनाना है तो एक घोषित दूरी बनाए रखी जानी चाहिए, एक औपचारिक रूप से !

तो मैं अब दर्शन के लिए प्रस्थान  करूँगा।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by हिंदी अनुवाद शशी मुखी केशवी देवीदासी द्वारा
Verifyed by प्रिती उपाध्याय द्वारा सत्यापित
Reviewed by निर्गुणा जाहनवा देवी दासी द्वारा समीक्षित

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