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20211226 श्री श्रीमद् जयपताका स्वामी महाराज द्वारा शिष्यों को नारायण मास का संदेश

26 Dec 2021|हिन्दी|सार्वजनिक वक्तव्य|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

  जयपताका स्वामी: मेरे प्रिय  दीक्षा, आश्रय, आकांक्षी,  शिक्षा  शिष्यों , इस बार केशव मास के बाद यह दूसरा महीना है, यह नारायण मास है। यह महीना एक बहुत ही विशिष्ट महीना है, विशेष रूप से महीने की शुरुआत में कृष्णकृपामूर्ति श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद का तिरोभाव दिवस था। मुझे खेद है कि मुझे यह संदेश भेजने में थोड़ी देरी हो गई। इस मेल के अंत में मैंने तिरोभाव दिवस के लिए अपना विशेष भजन पोस्ट किया है। श्रील प्रभुपाद ने कहा है कि आध्यात्मिक गुरु के तिरोभाव दिवस पर , हमें आध्यात्मिक गुरुओं और गुरु-परंपरा को स्मरण करना चाहिए। इसलिए, मैंने बंगाली में एक गीत की रचना की जिसमें मैंने ऐसा करने का प्रयास किया है।

 हमने सुना कि कैसे श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, वे विभिन्न शिष्यों के लिए अलग-अलग शिक्षा-गुरुओं को सुनिश्चित करते थे जैसे कोई शिष्य आया और वह कहते, "ओह, यह शिष्य अमुक व्यक्ति का है।" तो, इस प्रकार  जिस भक्त ने एक को भक्त बनाया, जो एक का मार्गदर्शन कर रहा था, उसका श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने प्रशस्तीकरण किया। तो श्रील प्रभुपाद ने कहा कि वह अपने शिष्यों के लिए दीक्षा-गुरु और शिक्षा-गुरु थे। मैं भी दीक्षा और शिक्षा का उत्तरदायित्व लेने का प्रयत्न कर रहा हूँ । यद्यपि किसी व्यक्ति के पास कई शिक्षा-गुरु हो सकते हैं, बहुत से लोग जो उनकी आध्यात्मिक प्रगति में सहायता करते हैं। इसलिए, यह स्वाभाविक है कि हम उनके प्रति कृतज्ञता अनुभव करते हैं। हमने देखा कि श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, उनके पास एक परामर्शदाता प्रणाली थी, उपदेशक, महा-उपदेशक और महा-महा-उपदेशक। तो, महा-महा-उपदेशक होने की उनकी योग्यता अद्भुत थी । मैं उस परीक्षा के बारे में सुनकर चकित रह गया।

श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि हम उनके ग्रंथ पढ़ें और कुछ मूलभूत परीक्षणों से गुजरें। भगवद्-गीता, भक्ति रसामृत सिंधु, ईशोपनिषद और शिक्षामृत। भक्ति-शास्त्री प्राप्त करने के लिए इन पुस्तकों को पढ़ा जाता है । श्रीमद् -भागवतम् के पहले छह सर्ग, भक्ति-वैभव का पाठ्यक्रम है। श्रीमद् -भागवतम् के दूसरे छह सर्ग भक्ति-वेदांत की उपाधि प्रदान करते है। और फिर चैतन्य-चरितामृत, आदि पढ़ना भक्ति सर्वभौम की उपाधि अर्जित करने के लिए है । तो, मैं चाहूंगा कि मेरे सभी शिष्य सभी पुस्तकें पढ़ें, परीक्षण प्राप्त करें और कृष्ण भावनामृत के अपने ज्ञान में उत्कृष्टता प्राप्त करें।

मैं जानता हूँ कि अधिकांश भक्त, वे अपने आध्यात्मिक जीवन में बहुत अच्छा कर रहे हैं। किंतु कुछ भक्तों कठिनाइयों का सामना कर रहे है। अतः, हम आशा करते हैं कि भक्त इस नामजप को बहुत गंभीरता से लेंगे। क्योंकि जप विशेष युग-धर्म है और नामजप, यह न केवल हमारे मन को शुद्ध करता है, अपितु यह हमें शुद्ध भक्ति और शुद्ध आकर्षण, कृष्ण के प्रति स्नेह प्राप्त करने में मदद करता है। तो, हम आशा करते हैं कि हर कोई नियमित रूप से जप करे और इस तरह अपनी कृष्णभावनामृत में आगे बढ़े । कुछ भक्तों ने मुझे बताया कि कैसे वे कुछ नियामक सिद्धांतों के साथ समस्याओं का सामना कर रहे हैं। यह बहुत दुर्लभ बात है, किंतु कुछ लोग इससे जूझ रहे हैं  अतः हमें आप से अपेक्षा है कि यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, तो उनकी मदद करने का प्रयास करें और हम माया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर रहे हैं।  माया चाहती है कि हम नियामक सिद्धांतों को तोड़ दें, कृष्ण को भूल जाएँ । परंतु हम हमेशा कृष्ण को याद रखना चाहते हैं और उन्हें कभी नहीं भूलना चाहते । हम सभी नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहते हैं।

श्रीमद् -भागवतम् 8 वें सर्ग में, गजेंद्र मोक्ष लीला में, गजेंद्र और मगरमच्छ लंबे समय तक पानी में लड़ रहे थे। तो गजेंद्र बहुत मजबूत था, परंतु वह एक भूमिगत पशु था, और वह पानी में था। मगरमच्छ पानी का जीव है, और वह बलवान होता जा रहा था और गजेंद्र दुर्बल होता जा रहा था। तो तात्पर्य में, श्रील प्रभुपाद ने कहा कि हमें माया से लड़ना है । किंतु हमें शक्तिशाली स्थिति में रहने की आवश्यकता है, अतः हमें अपनी स्वाभाविक स्थिति में होना चाहिए। यह विभिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है। मगरमच्छ की प्राकृतिक स्थिति पानी में थी, हाथी जमीन पर सबल था। उस तरह, कुछ लोग ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, सन्यास के रूप में अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं, और कोई गृहस्थ के रूप में अधिक शक्तिशाली हो सकता है। तो, कलियुग में, अधिकतर लोगों के लिए मूल रूप से गृहस्थ आश्रम की संस्तुति की जाती है। तो श्रील प्रभुपाद ने कथित तौर पर कहा कि यदि कोई पालन करने में विफल रहता है, तो तथाकथित संन्यास आश्रम में होने का कोई बड़ा श्रेय नहीं है, कोई अधिक श्रेयस्कर नहीं है, यदि वे पालन करने में विफल रहते हैं, तो उत्तम यह होगा कि वे गृहस्थ हों। वैसे भी, यह प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करेगा। परंतु हमें हमेशा माया के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्प होना चाहिए, उसके लिए हमें मानसिक रूप से, इन्द्रियासक्ति से मजबूत होना चाहिए ।

तो वैसे भी, मैं आपके साथ संवाद करने के इस अवसर के लिए अत्यंत प्रसन्न हूं। हमारे पास जयपताका स्वामी ई-केयर सिस्टम है, जहां हम सभी शिष्यों का ध्यान रखने और उनके आध्यात्मिक जीवन में उनकी मदद करने का प्रयास कर रहे हैं। जेएसएसएस, जयपताका स्वामी शिष्य समूह द्वारा दी जा रही मदद के लिए मैं अत्यंत आभारी हूँ, और मैं देखता हूँ  कि मेरी कक्षाओं में बहुत से भक्त आते हैं। अतः, विभिन्न प्रकार से हम भक्तों की मदद करने और उन्हें संपर्क में रखने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको किसी सहायता की आवश्यकता है या कोई प्रश्न पूछना है, तो आप जयपताका स्वामी ई-केयर को भेज सकते हैं। यदि यह एक सामान्य प्रश्न है, तो मैं आपको एक उत्तर भेज सकता हूँ जो मैंने पहले भेजा है। किंतु कुछ अनोखा प्रश्न/ जिज्ञासा वे इसे मुझे भेज सकते हैं। तो, मुझे आशा है कि आप सभी कृष्ण भावनामृत को बहुत आनंद से ग्रहण करेंगे और इस तरह, आप कृष्ण भावनाभावित हो सकते हैं और घर वापस जा सकते हैं, वापस भगवान श्री कृष्ण के पास । हरे कृष्ण! आपका शुभचिंतक सदैव, जयपताका स्वामी

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Transcribed by प्रतिलेखन का हिंदी अनुवाद अजित मधुसूदन दास
Verifyed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा सत्यापित
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी समीक्षित

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