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20211226 इस्कॉन वैष्णवी फोरम को संबोधन

26 Dec 2021|Duration: 00:18:00|हिन्दी|Youth Programs|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी: कलियुग में सामान्य सिद्धांत यह है कि संन्यास लेना वर्जित है। यद्यपि आश्रम में रहने वाले कुछ लोग संन्यास लेते है। अधिकांश विवाह करते हैं तथापि उसमें पत्नी का वैष्णवी होना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा, लोग कृष्ण को भूल जाते हैं। तो वैष्णवी, सह-धर्मिणी, वह भगवान् श्री कृष्ण के बारे में चिंतन करने में पति की सहायता कर सकती हैं।

वास्तव में, हम देखते हैं कि इतिहास में कई महान वैष्णवी हुई हैं। ध्रुव महाराज की माता सुनीति देवी, वे आध्यात्मिक जगत में चली गईं। स्वयंभू मनु की पुत्री तथा कर्दम मुनि की पत्नी देवहूति। वह कपिल मुनि की माँ बनीं और अपने जीवन के अंत में आध्यात्मिक जगत में वापस चली गईं। तो इस प्रकार महान वैष्णविओं के कई उदाहरण हैं। भगवान् श्री कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं कि स्त्री, शूद्र, वैश्य, जो कोई भी उनकी शरण लेता है, वे आध्यात्मिक जगत में वापस जा सकते हैं। और उन्होंने उसमें स्त्रियों, व्यवसायियों, तथा कामगारों को सम्मिलित किया है।

तो, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वैष्णवियाँ कृष्ण भावनामृत का आचरण करने में विशेषज्ञ बनें। आध्यात्मिक आनंद का आस्वादन करें तथा उसे संतानो व पति तक पहुँचाएं। और, इस प्रकार यह मानव जीवन भगवान् श्री कृष्ण के पास लौट के जाने का एक महान अवसर है। अधिकांश जनसमुदाय, वे नहीं जानते कि जीवन का उद्देश्य क्या है। मैं चेन्नई में एक नाटक देख रहा था और वहाँ कुछ लड़कियों/ किशोरियों ने रंग से मूंछें बनाई थीं, वे यमराज व यमदूत की भूमिका निभा रही थीं। और यमदूत असंतोष प्रकट कर रहे थे, "हम व्यक्ति के घर जाते हैं, वे कृष्ण के अर्चा विग्रह की पूजा कर रहे होते हैं, वे पवित्र नाम का जप कर रहे होते हैं, वे भागवतम् पढ़ रहे होते हैं, हम उन्हें नहीं ले जा सकते क्योंकि वे सभी भक्त हैं। हम क्या करेंगे? यमराज, हमारे लिए कोई काम नहीं है!" तो, मैं उस नाटक को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ।

हम देखते हैं कि यदि वैष्णवियाँ घर में अर्चा विग्रहों की पूजा करती हैं, यदि वे संतानों को कृष्ण भावनामृत सिखाती हैं, तो वे पूरे परिवार का उद्धार कर सकती हैं, तथा वे स्वयं का भी उद्धार कर सकती हैं। तो यह वास्तव में अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस कलियुग में महिलाओं को कृष्णभावनाभावित होना चाहिए। और कृष्णभावनाभावित, कृष्ण केंद्रित परिवार बनाएं। हम इसे विकसित होते हुए देखने का प्रयास कर रहे हैं, अतः हम बेंगलुरु तथा हैदराबाद में इस 'वैष्णवी गर्ल्स फोरम' की स्थापना के लिए राधाप्रिया देवी दासी के अत्यंत आभारी हैं। और हमने रायचूर को भी सुना। तो इस प्रकार यह बहुत बड़ी बात है। वास्तव में, कृष्ण की सेवा करने में, कोई प्रतिबंध नहीं है, कोई भी भगवान् के पास लौट सकता है, कृष्ण ने वचन दिया हैतो लोग, वे नहीं जानते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य कृष्ण के लिए प्रेम विकसित करना है

निश्चित रूप से कृष्ण, या उनके विभिन्न अवतार जैसे, नरसिंहदेव या अन्य, रामचंद्र, सीताराम, इतने सारे रूप हैं….. अनंत रूप। परंतु ये सभी भगवान् का ही स्वरूप हैं। हम उनकी तटस्थ शक्ति हैं, तथा हमारा उद्देश्य वास्तव में उनकी सेवा करना है। यह भौतिक संसार कुल ऊर्जा का मात्र एक चौथाई भाग है। तीन चौथाई भाग आध्यात्मिक जगत है। तो, यह संपूर्ण मानव जन्म घर वापस जाने के लिए है, पुनः भगवान के पास और आप में से प्रत्येक में भगवद्धाम वापस जाने की क्षमता है। आप किसी और पर निर्भर नहीं हैं। आप दूसरों की सहायता कर सकते हैं, किंतु आप वापस जा सकते हैं। हम आशा करते हैं कि आप गोष्ठानंदी बनें, तथा हम चाहेंगे कि आप भक्तों की संख्या में वृद्धि करें तथा लोगों को कृष्णभावनाभावित बनने में सहायता करें

तो, भगवद् गीता, श्रीमद्-भागवतम् का अध्ययन तथा गुरू व कृष्ण के लिए विभिन्न सेवाओं का पालन करना, अत्यंत आनंददायक हैवास्तव में, कोई नहीं समझता कि कृष्ण की सेवा करने में कितना आनंद आता हैवास्तव में, जैसे-जैसे हम प्रगति करते हैं, पहले हम इन सभी नियम विनियमों का अभ्यास करते हैं, तदुपरांत हम अत्यंत सहजता से उनका पालन करते जाते हैं और तब यह हमें उच्च स्तर पर ले जाता है। अंत में, हम कृष्ण के प्रेमोन्माद को प्राप्त कर सकते हैं तथा इसे कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम में परिष्कृत किया जा सकता है। तो, निश्चित रूप से, जब हम भौतिक जगत में होते हैं, तो कुछ भौतिक इच्छाएं होना स्वाभाविक है। किंतु भक्ति-योग द्वारा हम युक्त-वैराग्य का अभ्यास कर सकते हैं, जिसका अर्थ है उन इच्छाओं को कृष्ण की सेवा में जोड़ना। जैसे कि कोई संतान चाहता है, और फिर वे बच्चे को भक्त बनाने का प्रयास करते हैं। जैसे कोई अच्छा भोजन सेवन करना चाहता है, तो उसे कृष्ण को अर्पित करें। तो इस प्रकार हम सब कुछ, कृष्णभावनाभावित तरीके से करने का प्रयत्न करते हैं। हमने स्वायंभुव मनु के बारे पढ़ा, वे गृहस्थ थे। उनकी अनेक संंताने, पुत्र एवं पुत्रियाँ थीं। और उनकी पुत्रियाँ अत्यंत महान थीं, उन पुत्रियों में से एक थीं देवहूति। परंतु ऐसा कहा जाता है कि यद्यपि वे एक गृहस्थ थे, भौतिक ऐश्वर्य के साथ रहने वाले एक राजा होने पर भी उन्होंने कृष्ण को सदैव केंद्र में रखा। इस प्रकार वह कृष्णभावनाभावित हो सके। वह भौतिक जीवन में लिप्त नहीं हुए। वे सदैव कृष्णभावनाभावित थे। हम चाहते हैं कि आप सभी परमानंद में कृष्ण की सेवा करने का आस्वादन करें। जप, व्याख्यान, सेवा करना, पुस्तकें पढ़ना। भगवान् चैतन्य, उन्होंने लोगों से हरे कृष्ण का जप करने, कृष्ण की सेवा करने और कृष्ण की शिक्षाओं, भगवद् गीता और श्रीमद् भागवतम् का अध्ययन करने के लिए कहा। तो इस प्रकार उन लोगों का जीवन परिपूर्ण हो गया। यद्यपि यह कलियुग है तथा यह पाखंड व कलह, भौतिकवाद का युग है, परंतु इस युग में नामजप द्वारा आध्यात्मिक जगत में वापस जाना सरल है। मुझे यह सुनकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि आप में से कुछ लोग 16 माला, 8 माला या कम से कम एक माला जप कर रहे हैं। 16 माला का अर्थ एक वर्ष में कृष्ण के एक करोड़ नाम, 8 माला का अर्थ 50 लाख नाम, जप माला के 2 फेरे का अर्थ वर्ष में 12.5 लाख नाम हैं। तो यह जुड़ जाता है। तो यह बूंद-बूंद सिंचाई की पद्धति जैसा है! और आपकी भक्तिमय लता बढ़ती और बढ़ती जाएगी। आपका बहुत बहुत धन्यवाद! मैं आप सभी को देखकर व आप सभी के साथ समय व्यतीत करके अत्यंत प्रसन्न हूँ!

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Transcribed by प्रतिलेखन का हिंदी अनुवाद अजित मधुसूदन दास
Verifyed by शशि मुखी केशवी देवी दासी द्वारा सत्यापित
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा समीक्षित

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