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20211211 श्रीमद्-भागवतम् 1.13.23

11 Dec 2021|Duration: 01:23:21|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुं दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीमद्-भागवतम् 1.13.23 पाठ के साथ प्रवचन प्रारम्भ होता है।

अहो महीयसी जन्तोर्जीविताशा यथा भवान्।
भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत् ॥ 23॥

“ओह! प्राणी में जीवित रहने की इच्छा कितनी प्रबल होती है! निश्चय ही आप एक घरेलू कुत्ते की तरह रह रहे हैं और भीम द्वारा दी गई जूठन को खा रहे हैं।”

कृष्णकृपामूर्ति ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा तात्पर्य : साधु को कभी भी सुखमय जीवन बिताने की इच्छा से राजाओं या धनियों की चापलूसी नहीं करनी चाहिए। साधु को चाहिए कि वह गृहस्थों को जीवन के कटु सत्य के बारे में बताए, जिससे वे इस भौतिक अस्तित्व के संकटपूर्ण अनिश्चित जीवन के विषय में सचेत हो सकें। धृतराष्ट्र गृहस्थ जीवन के प्रति आसक्त वृद्ध पुरुष के जीते-जागते उदाहरण हैं। वे वास्तव में दरिद्र हो चुके थे, फिर भी वे पाण्डवों के घर में सुखपूर्वक जीवन बिताना चाह रहे थे। इनमें से भीमसेन का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है, क्योंकि उसने धृतराष्ट्र के दो प्रमुख पुत्रोंदुर्योधन तथा दुःशासन का स्वयं वध किया था। ये दोनों पुत्र अपने छल-कपट एवं दुष्ट कार्यों के कारण उन्हें अत्यन्त प्रिय थे और भीमसेन का विशेष उल्लेख इसलिए हुआ है, क्योंकि उसने इन दोनों प्रिय पुत्रों को मारा था। तो धृतराष्ट्र पाण्डवों के घर में क्यों रह रहे थे? क्योंकि सारा अपमान सहकर भी वे सुखपूर्वक जीवन बिताना चाह रहे थे। अतः विदुर को आश्चर्य हो रहा था कि जीवित रहने की आशा कितनी प्रबल होती है। यह जीविताशा सूचित करती है कि जीव शाश्वत है और वह अपने शारीरिक निवास स्थान को बदलना नहीं चाहता। मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसे यह शरीर सीमित अवधि के लिए बन्दी के रूप में बिताने के लिए मिला है और मनुष्य शरीर तो अनेकानेक जन्मांतरों के बाद मिलता है, जो भगवद्धाम वापस जाने के लिए आत्म-साक्षात्कार का सुअवसर होता है। लेकिन धृतराष्ट्र जैसे व्यक्ति, लाभ-सहित सुखी रहकर जीवित रहने की योजनाएँ बनाते हैं, क्योंकि उन्हें असली रूप में ज्ञान नहीं होता। धृतराष्ट्र अन्धे थे और जीवन की समस्त विषमताओं के बीच वे सुखपूर्वक जीवित रहने की आशा लगाये हुए थे। विदुर जैसे साधु ऐसे अन्धे व्यक्तियों को सावधान करने के लिए तथा शाश्वत जीवन बिताने के लिए भगवद्-धाम जाने में सहायता करने के लिए होते हैं। एक बार वहाँ जाकर कोई इस दुःखमय संसार में वापस नहीं आना चाहता। अतएव हम सोच सकते हैं कि महात्मा विदुर जैसे साधु पुरुषों को कितना उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य करने के लिए सौंपा जाता है।

जयपताका स्वामी : अतः हम देखते हैं कि कैसे एक साधु के रूप में विदुर ने सत्य कहा था। यद्यपि वह, धृतराष्ट्र, बहुत ही समाधानपूर्ण स्थिति में रह रहा था। और उसके भाई के रूप में विदुर ने उसे जगाने का प्रयास किया, ताकि वह पुनः भगवद्धाम वापस जाने के लिए कुछ उत्तम युक्ति कर सके। धृतराष्ट्र भक्तिमय सेवा या भक्ति-योग करने में सक्षम नहीं था, क्योंकि उसे भक्तों के प्रति ईर्ष्या थी। तो इस तरह, विदुर ने कुछ अत्यंत कठोर वचन बोले, ताकि धृतराष्ट्र आध्यात्मिक जीवन की दिशा में कुछ प्रयास करे। अतः, ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा स्वभाव शाश्वत होना है, परंतु हम सोच रहे हैं कि इस शरीर में सदा के लिए कैसे रहें। भौतिक जगत में हर किसी की अपनी निर्धारित समय सीमा होती है, एक समाप्ति तिथि होती है! इस तरह हमें जाना होगा, सब कुछ त्यागना होगा, अपनी पत्नी, संतान, घर, सब कुछ त्यागना होगा। हमारे पास जो भी बैंक बैलेंस और धन है, हमें सब कुछ पीछे छोड़कर जाना होगा। और इस जन्म के बाद हमें कौन-सा जन्म, कैसा शरीर मिलता है, यह कौन जानता है? अतः, मानव देह में जन्म होने के कारण हमारे पास भगवान् के पास पुनर्गमन का एक विशेष अवसर है। अतः हमें उसके लिए किसी एक योग के माध्यम से प्रयास करना चाहिए। मुझे लगता है कि विदुर धृतराष्ट्र से अष्टांग-योग कराने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु हमारे लिए उपयुक्त विधि भक्ति-योग है। केवल पवित्र नामों का श्रवण करने और उनका जप करने से ही हम भगवान् के पास वापस जा सकते हैं। और हमें इस जीवन का उपयोग कृष्ण पर अपना ध्यान केंद्रित करने में लगाना चाहिए, न कि घरेलू विलासिता पर।

कलियुग में मूलतः संन्यास लेना वर्जित है, मूल रूप से गृहस्थ होना चाहिए। कुछ लोग वन में रहने के लिए नहीं, बल्कि आश्रम में रहने के लिए संन्यास लेते हैं। वैसे भी, मानव जीवन आत्म-साक्षात्कार के लिए है। चाहे कोई गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या संन्यासी हो, हमें कृष्ण की सेवा करनी चाहिए। अब हम देखते हैं कि आज विश्वभर में लोग कृष्ण के विषय में पूर्ण रूप से विस्मृत हैं। और धृतराष्ट्र अब अपनी स्थिति को समझने में पूर्णतः सक्षम नहीं है।

मैं कल एबीसी न्यूज देख रहा था। और वे कह रहे थे, “समाचार देखोगे तो प्रसन्न रहोगे।” अतः, समाचार यह था कि एक बड़े रॉक कॉन्सर्ट में भगदड़ के कारण कुचल जाने से दस लोगों की मृत्यु हो गई। और दूसरा समाचार यह है कि मेक्सिको से अमेरिका में घुसने का प्रयास कर रहे अवैध प्रवासियों को ले जा रहा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया और 50 लोगों की मृत्यु हो गई। मुझे कोई प्रसन्नता नहीं हुई! किंतु, उन्होंने कहा, हमारे समाचार सुनिए आपको प्रसन्नता होगी; वे कुछ भी बकवास कह सकते हैं। किंतु विदुर, वे परम सत्य बोल रहे हैं। और वे अपने भाई को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रकार, आप में से जो इस प्रवचन को सुन रहे हैं, आप अपने आप को, अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों, संबंधियों को कृष्ण भक्ति में प्रायोजित करने का प्रयास करें ताकि वे भी इस मानव जीवन का सदुपयोग कर सकें। मानव जीवन का सदुपयोग करना है ताकि हम अपने घर वापस भगवान् के पास जा सकें। यह लोगों को वास्तव में प्रसन्न बनाएगा। यह मीडिया की झूठी खबर नहीं है।

सनातन गोस्वामी को भगवान् चैतन्य की शिक्षाओं में हम पढ़ रहे हैं, और मनुष्यों के लिए कुछ चीजों की अनुशंसा जाती है। श्रवण, कीर्तन, भगवान् के नाम, भगवान् के पवित्र नामों का जप और श्रवण। विग्रह अर्चना, श्रीकृष्ण की पवित्र लीलास्थलियों, वृंदावन या मायापुर या किसी मंदिर के समीप रहना। इस तरह, कुछ चीजें हैं जिनकी अनुशंसा की जाती है, जैसे भगवद्गीता और श्रीमद्-भागवतम् पाठ करना। विदुर अपनी बुद्धि का उपयोग धृतराष्ट्र को कृष्णभावनामृत में लाने के प्रयास में कर रहे हैं। कल हमने श्रील प्रभुपाद को अपने शिष्यों से कहते सुना, कि तुम्हें अपनी बुद्धि का उपयोग करने का प्रयत्न इसमें करना चाहिए, यह देखने के लिए करना चाहिए कि कृष्ण कैसे प्रसन्न होंगे। सामान्यतः लोग अपनी बुद्धि का उपयोग यह देखने के प्रयास में करते हैं कि वे किस प्रकार अधिक इन्द्रियतृप्ति कर सकते हैं। किंतु यदि हम अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं कि कैसे कृष्णभावनामृत का प्रसार किया जाए, यह उचित उपयोग है।

अतः, भगवान् चैतन्य सभी को कृष्णभावनाभावित देखना चाहते थे। श्रील प्रभुपाद, उन्होंने यह सोचने का प्रयास किया कि यह कैसे करना है। उन्होंने शिष्यों से कहा, “आप अपनी बुद्धि का उपयोग करें और देखें कि इस कृष्णभावनामृत का प्रसार कैसे हो सकता है।” अतः इस तरह, यदि हम कृष्ण को प्रसन्न करने में लीन हैं, तो यह भक्ति-योग की प्रक्रिया है। एक भक्त एक काजी के पास गए, चांद काजी नहीं, किसी दूसरे काजी के पास।

उन्होंने काजी से कहा, “आप बहुत प्रसिद्ध, बहुत अच्छे दिखने वाले, मजबूत और अच्छे राजनीतिज्ञ हैं!

“क्या मैं आपसे कुछ कह सकता हूँ?”

ओह क्यों नहीं!”

उन्होंने काजी से कहा, “यह सब भूल जाएं और हरे कृष्ण का जप करें।”

काजी ने कहा, “मैं कल हरे कृष्ण का जप करूँगा!” और भक्त नृत्य करने लगे, आपने पहले ही आरंभ कर दिया है, हा! हा! कृपया रुकें नहीं, जपते रहें! हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे!”

तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि हम अभी जिस क्षति से गुजर रहे हैं, वो द्वितीय विश्व युद्ध से भी बदतर है। और अधिक लोगों की मृत्यु हुई है। श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध होगा और उसके बाद प्रचार अति उत्तम होगा। किंतु यह वैश्विक महामारी विश्व युद्ध की तरह है। और हमें प्रयत्न करना चाहिए कि लोग “हरे कृष्ण” का जप करें। किंतु हम कृष्ण से कोई भौतिक लाभ की कामना नहीं करते। किंतु अधिकांश लोग वही करेंगे, जो उन्हें करना है। और यदि वे अपराध युक्त नामजप भी करें, तो भी यह नामजप न करने से अच्छा है। और, यदि वे श्रीकृष्ण के नाम का जाप नहीं करना चाहते हैं, तो श्रील प्रभुपाद ने कहा है कि भगवान् के अल्लाह, यहोवा, आदि जैसे कई नाम हैं। वे उन नामों का जप कर सकते हैं। यह शास्त्रोक्ति “हरेर् नाम हरेर् नाम हरेर् नाम...” का अर्थ है भगवान् के नाम का जप। तो इस तरह, जैसे भगवान् चैतन्य ने कहा है, भगवान् के कई नाम हैं—नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः —भगवान् के कई नाम हैं। तो यदि वे अपने धर्म में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के किसी भी नाम का जप करते हैं, तो यह नामजप न करने से उत्तम है। और इस तरह यदि संपूर्ण विश्व के सभी लोग भगवान् के नाम का जप करें, तो वे वास्तव में प्रसन्न होंगे। और इस तरह, श्रील प्रभुपाद, जब वे तेहरान मोहम्मडन पंडितों के पास गए थे, वे कह रहे थे कि “अल्लाह ओ अकबर” का अर्थ है परब्रह्म धीमहि। इस तरह उन्होंने सभी से कहा कि यदि आप श्रीकृष्ण का जप नहीं करना चाहते हैं, ठीक है; केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के किसी नाम का जप करें।

मैं देख रहा था कि क्या मैं ऑस्ट्रेलिया जा सकता हूँ, किंतु पर्यटकों के लिए सीमा अभी भी बंद है। अतः मैंने सोचा कि मैं मलेशिया जाऊंगा, किंतु वे अभी भी एक सप्ताह के लिए क्वारंटाइन करते हैं। विश्व की यात्रा करना अभी भी अत्यंत कठिन है। जापान पूरी तरह से बंद है। इस प्रकार, लोगों को सभी से जप करवाना चाहिए, यही एकमात्र आशा है। कलियुग में भगवान् चैतन्य ने भविष्यवाणी की थी कि हर नगर और गाँव में पवित्र नाम का कीर्तन होगा। अतः, हमें प्रयत्न करना चाहिए कि लोग हरे कृष्ण या भगवान् के किसी नाम का जप करें और इससे वातावरण शुद्ध होगा। हम यह गीता मैराथन कर रहे हैं, यह भी भगवद्गीता को वितरित करने का एक सुअवसर है। तो, इस तरह, विश्व इस महामारी के अधीन हो सकती है, किंतु किसी न किसी तरह हमें कृष्णभावनामृत का प्रचार करना चाहिए।

विदुर हस्तिनापुर गए और पांडवों से मिलने के बाद, वे धृतराष्ट्र के पास जाकर उन्होंने धृतराष्ट्र से कुछ कठोर वचन बोले ताकि वे आध्यात्मिक जीवन अपना सके। “आप कुत्ते की तरह हैं, आप भीम के हाथों से भोजन ग्रहण कर रहे हैं।” तो इस प्रकार, वे ऐसा इसलिए बोलते हैं ताकि धृतराष्ट्र के अहंकार को कुचल दिया जाए ताकि वह आध्यात्मिकता का मार्ग अपना सके। तो इसके लिए विदुर को जो कुछ भी करना पड़ा, वे अत्यंत कुशलता से प्रयत्न कर रहे थे कि धृतराष्ट्र को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर कैसे ले जाया जाए। अब, द्वापर-युग में आपको गृह त्यागकर वन जाना होता था। कलियुग में गृह से ही आप भगवान् की सेवा कर सकते हैं या मंदिर जाकर भक्तिमय सेवा कर सकते हैं। यह आवश्यक है कि हम भगवान् की सेवा में संलग्न हों। इस तरह हम अत्यंत प्रसन्नता की अनुभूति कर सकते हैं। हम भगवान् के किसी विग्रह को अपने विशेष विग्रह के रूप में स्थापित कर सकते हैं और कृष्ण के समक्ष अपने मनोभाव प्रकट कर सकते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह, हम व्यक्तिगत रूप से भगवान् कृष्ण की सेवा में रत रह सकते हैं। और हमें आध्यात्मिक गुरु की सहायता करनी चाहिए, ताकि कृष्णभावनामृत का प्रसार हो सके।

आपका बहुत बहुत धन्यवाद। मैं कुछ प्रश्न लूँगा। हम गीता जयंती की ही तैयारी कर रहे हैं। 14 या 15 तारीख को हम गीता जयंती एकादशी मना रहे हैं।

अनिक पाल : (बंगाली) गुरु महाराज पिछले क्लास में हमसे कहा गया था कि यदि हम सच बोलते हैं तो हमें मधुर बोलना चाहिए। आज के क्लास में हम सुनते हैं कि विदुर ने धृतराष्ट्र से अत्यंत कठोर वचन बोले। हमें किससे और कैसे व्यवहार करना चाहिए और किस प्रकार से सत्य बोलना चाहिए, क्योंकि कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए विदुर धृतराष्ट्र से कठोर वचन बोलते हैं, परंतु किस परिस्थिति में हमें कठोर वचन बोलना चाहिए और किस में नहीं? कृपया हमारा मार्गदर्शन करें।

जयपताका स्वामी : ऐसा करने के लिए, व्यक्ति को अपनी व्यवहारिक बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। जैसे जब वे पांडवों के पास गये, वे उन्हें दुखी नहीं करना चाहते थे और उन्हें बताना चाहता थे कि भगवान् श्रीकृष्ण पहले ही प्रस्थान कर चुके हैं। परंतु धृतराष्ट्र के साथ परिस्थिति दूसरी थी। इसलिए, वे धृतराष्ट्र के पास आकर कठोर वचन बोलते हैं ताकि उसे भक्तिमय सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। अतः कृष्णभावनामृत के प्रचार के लिए बहुत अधिक व्यवहारिक बुद्धि की आवश्यकता होती है। अलग-अलग परिस्थितियों में हमें अलग-अलग प्रकार से काम करना पड़ता है। मुझे लगता है, यह निराशाजनक हो सकता है किंतु कोई सरल सूत्र (फॉर्मूला) नहीं है जो मैं आपको बता सकूं। इसलिए, हम श्रीमद्-भागवतम् का श्रवण करते हैं जहाँ हम पाते हैं कि विदुर अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग व्यवहार करते हैं।

अखिल बंधु गोपाल दास, इंदौर : जैसा कि आपने कहा कि हर किसी को भगवान् का नाम जपना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। कोई भी जो यीशु मसीह का सच्चा अनुयायी है और बाइबल के सिद्धांतों का पालन करता है, क्या वह परमेश्वर के साम्राज्य में प्रवेश करेगा जैसा कि यीशु मसीह ने कहा है? भगवान् के जिस साम्राज्य के बारे में प्रभु यीशु मसीह बात कर रहे हैं, क्या यह हमारे वैकुण्ठ जैसा ही है या कुछ और है?

जयपताका स्वामी : वैसे तो केवल एक ही भगवान् हैं। विभिन्न धर्म की सोच हो सकती है कि वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। किंतु कृष्णभावनाभावित दृष्टिकोण से हम समझते हैं कि केवल एक ही भगवान् हैं। मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं और ईसाई गॉड को पूजते हैं। तो असल बात यह है कि क्या आपने परम पुरुष के लिए प्रेम विकसित किया है। यदि आप केवल भगवान् से प्रार्थना कर रहे हैं कि आपको रोटी दें, आपको अच्छी पत्नी, अच्छा पति, ऐसा कुछ दें, तो इसका अर्थ है कि आप केवल भौतिक चीजों से आसक्त हैं, उनसे नहीं। हम चाहते हैं कि लोग पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए प्रेम विकसित करें। अतः, प्रभु यीशु ने परमेश्वर के जिस साम्राज्य की बात की है और हम जिसे वैकुण्ठ कहते हैं, एक ही बात है। प्रश्न यह है कि वे वास्तव में किस हद तक भगवान् के प्रति प्रेम विकसित करते हैं, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है।

अभय चरण निमाइ दास : आप हमें याद दिला रहे थे कि समस्त विश्व में वे कह रहे हैं कि कोई संकट चल रहा है। भक्तों के रूप में, हमें भी सादा जीवन उच्च विचार का स्मरण कराया जाता है। तो मैं उत्सुक था कि यह कहने वाले कर्मियों से अलग कैसे हैं, जैसे कि इस संकट के विरूद्ध स्वयं की सहायता करने के लिए कुछ उपाय करना। क्या अंतर है?

जयपताका स्वामी : देखो हम श्रीकृष्ण को स्मरण करने का प्रयास कर रहे हैं। और नवविध-भक्ति के मार्ग पर चलकर हम भक्तिमय सेवा में संलग्न होने का प्रयत्न कर रहे हैं। और इसलिए, हम व्यक्तिगत रूप से श्रीकृष्ण की सेवा करने के लिए आध्यात्मिक जगत में लौटना चाहते हैं। किंतु कर्मी, वे, अपनी भौतिक समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं ताकि वे निर्विघ्न इन्द्रियतृप्ति कर सकें। इस तरह वे जन्म के बाद, जन्म के बाद जन्म लेते हैं। परंतु वास्तव में हमारे पास जो यह मानव जीवन है, हमें इसका लाभ उठाना चाहिए और वापस भगवान् के पास जाना चाहिए।

सुमित्रा गौरचंद्र दास : (बंगाली) हर किसी को अधिक भक्त बनाने का प्रयास चाहिए, या लोगों को भक्ति की गतिविधियों, जप, पाठ और अर्चा विग्रहों की सेवा में सम्मिलित होने का प्रयास कराना चाहिए?

जयपताका स्वामी : हाँ। तो, बात यह है कि दो भक्त हैं, भजनानन्दी और गोष्ट्यानन्दी भजनानन्दी अपनी स्वयं की व्यक्तिगत मुक्ति देखना चाहते हैं। गोष्ट्यानन्दी कई भक्तों को अपने साथ वापस भगवद्धाम ले जाना चाहते हैं। तो हमारी गुरु-शिष्य परंपरा गोष्ट्यानन्दी है। हम कृष्णभावनामृत का अभ्यास करते हैं, साथ ही हम भक्तों की संख्या का विस्तार करने का प्रयास करते हैं। अतः हमारा व्यापार कृष्णभावनामृत का अभ्यास करना है और साथ ही हम सभी तक पहुंचने का प्रयास भी करते हैं।

आपके अच्छे प्रश्नों के लिए धन्यवाद। मैंने सुना है कि कल पर्थ में रथ-यात्रा है। दुर्भाग्य से, ऑस्ट्रेलिया के बाहर, जो ऑस्ट्रेलियाई नागरिक नहीं हैं, वे शारीरिक रूप से नहीं जा सकते हैं। किंतु हम आशा करते हैं कि उत्सव और रथ-यात्रा अति उत्तम हो। मायापुर में गीता मेला है। हम 2000 आगंतुकों के लिए आशान्वित हैं। मैं सभी भक्तों को मेरी वर्चुअल बुक टेबल में भाग लेने के लिए भी धन्यवाद देता हूँ। मैंने सुना है कि ऑस्ट्रेलिया में कुछ भक्त हैं जो गुरु आश्रय लेना चाहते हैं, जैसा मणिगोपाल दास ने कहा। पहले हम मंदिरों के दर्शन करेंगे, फिर हम गुरु आश्रय अनुष्ठान करेंगे और फिर भक्तों के दर्शन करेंगे।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by अजित मधुसूदन दास द्वारा (11 Dec 2021)
Verifyed by धर्मात्मा निताई दास द्वारा
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