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20210918 श्रीमद्-भागवतम् 1.11.11-12 श्री वामन द्वादशी

18 Sep 2021|Duration: 01:57:13|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्थठ
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

जयपताका स्वामी : तो आज वामन द्वादशी का विशेष दिवस है। हमने कल वामन एकादशी का व्रत किया। आज द्वादशी के दिवस उपवास नहीं करना चाहिए। आज वामनदेव का प्राकट्य दिवस है तथा श्रील जीव गौस्वामी का भी प्राकट्य दिवस है। साथ ही कल, श्री श्रीमद् भक्तिचारु स्वामी की व्यास पूजा थी। तो आज, वामन देव का प्राकट्य दिवस है तथा यह पूजा के लिए एक अत्यंत ही विशेष दिवस है।

बलि महाराज ने वैध रूप से समस्त ब्रह्मांड को जीत लिया था। यदि एक राजा दूसरे राजा पर विजय प्राप्त करता है जो इसे वैध माना जाता है। तो उसी तरह, बलि महाराज ने विश्वजित यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ किया और फिर वे पूरे ब्रह्मांड को जीतने के लिए निकल पड़े। तो , उससे संपत्ति वापस पाने के केवल दो ही तरीके थे - या तो उसे युद्ध में हरा दें, या उससे भीख माँगें। तो, इंद्र की माता अदिति अत्यंत परेशान थी क्योंकि इंद्र को उनके पद से हटा दिया गया था। तो तब, कश्यप मुनि अदिति के पति ध्यान में थे। जब वे अपने ध्यान से बाहर आये तो उन्होंने अदिति को उदास देखकर उन्हें उपदेश दिए । परंतु अदिति अपने पति की बात सुनकर प्रसन्न नहीं हुई। माता अदिति चाहती थीं कि इंद्र को उनका पद वापिस प्राप्त हो जाये। तब कश्यप मुनि ने उन्हें निर्देश दिया था कि उन्हें पूर्ण पुरषोत्तम भगवान् की पूजा करनी चाहिए। तो उन्होंने पयो-व्रत किया और भगवान् विष्णु को संतुष्ट करने की कोशिश की। अतः इसके परिणाम स्वरूप उनके पुत्र के रूप में भगवान् स्वयं अवतरित हुए । उन्हें बाल्यकालीन लीलाओं का आनंद प्राप्त नही हुआ, जैसा कि भगवान् कृष्ण के बाल्यकालीन लीलाओं में हुआ था। वामनदेव चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए थे । शंख, चक्र, गदा, तथा पदम धारण किये हुए। इसके पश्चात भगवान् ने बौने ब्राह्मण का रूप धारण किया। तो भगवान ने कहा कि बलि और अन्य राक्षस लगभग अजेय थे, चूंकि ब्राह्मणों द्वारा उन्हें विशेष सरंक्षण प्राप्त है। तो भगवान् विष्णु ने कहा, चूंकि आपने पयोव्रत के साथ मेरी पूजा की है और आप अपने पुत्र इंद्र का कल्याण चाहती हैं, मैं भी आपका पुत्र बनूंगा और आपकी सहायता करूंगा। इस तरह वामनदेव उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए। भगवान ने माता अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। अत: माता अदिति के गर्भ से प्रकट होकर उन्होंने शंख, चक्र , गदा, एवं पद्म से युक्त चार भुजाओं वाला रूप धारण किया। उनके वक्ष स्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह था। तथा उनके कान के कुंडल जो मत्स्य के सदृश थे, अत्यंत सुन्दर थे। हाथों में चूड़ियाँ तथा भुजाओं में बाजूबंद। उनके सिर पर मुकुट तथा उनकी छाती पर एक ब्राह्मण सूत्र, यज्ञोपवित था। तथा उनके चरणों में टखनों की नूपुर थे । और उनके कंठ में सुन्दर माला थी। तथा वहाँ मधुमक्खियाँ वरमाला से मधु एकत्रित करने के लिए गुंजन कर रही थीं। और भगवान् अपने कंठ में कौस्तुभ मणि धारण किये हुए थे। उनका तेज कश्यप मुनि के पूर्ण घर को उज्ज्वलित कर रहा था। उनके प्रकट होने से सम्पूर्ण ब्रह्मांड, सभी अत्यंत प्रसन्न हो गए।

देवता, गाय, ब्राह्मण, सभी अत्यंत हर्षित हो गए। वामनदेव के प्राकटय दिवस का एक अन्य नाम है विजय। तो कृष्ण सत् चित आनंद हैं । वह सम्पूर्णतः दिव्य है। तथा जैसा कि ब्रह्म संहिता में बताया गया है, अनादी अनंत रूपम..। उनके असीमित रूप हैं, वे मौलिक है। मुख्य अभिनेता के समान वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं। तो, उन्होंने एक बटुक ब्राह्मण का रूप धारण किया। तथा उन्हें एक युवा ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट हुए देखकर सभी ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए। कुछ ने तुरंत उन्हें उपनयनम की ब्राह्मणवादी दीक्षा दी। किसी ने उन्हें एक छाता दिया; किसी ने उन्हें ब्रह्मचारी दंड दिया। किसी ने उन्हें कमंडल, जल का पात्र भेंट किया। कुछ ने उन्हें छाता भेंट किया। तो इस प्रकार उनके पास एक ब्राह्मण का यथा उचित सभी सामान था।

चैतन्य-भागवत् में यह वर्णन किया गया है कि जब भगवान् चैतन्य ने पवित्र उपनयनम समारोह किया था, उस समय भगवान् चैतन्य अपने वामन अवतार के समान दिखते थे। वे घर-घर जाकर भिक्षा मांगते थे। तो यह भगवान् का अति सुंदर रूप है। तब वे बलि महाराज के पास गए तथा उनसे तीन पग भूमि देने को कहा। बलि महाराज ने भगवान् से कहा, मैं तुम्हें एक सम्पूर्ण लोक दे सकता हूँ, तुम इतनी नगण्य याचना क्यूँ कर रहे हो? किंतु वामनदेव ने कहा, मुझे अधिक की आवश्यकता नहीं है, यदि मैं तीन पग से संतुष्ट नहीं हूँ, तो मैं एक लोक से भी संतुष्ट नहीं होऊंगा। तो, बलि महाराज ने कहा, उचित है, मैं आपको वह दूंगा जिसकी आप कामना करते हो। परंतु उनके गुरु शुक्राचार्य ने उनसे कहा कि, नहीं, नहीं, उन्हें मत दो! वे वास्तव में विष्णु हैं, वे सब कुछ ले लेंगे! बलि ने कहा, मैंने उन्हें अपना वचन पहले ही दे दिया है। तो, शुक्राचार्य ने कहा कि भिन्न-भिन्न समय तथा विभिन्न प्रकार से कोई असत्य आचरण कर सकता है। विवाह के समय, एक बात मुझे स्मरण आती है, यदि आप कुछ अधिक ही बताते हैं तो इसमें कोई दोष नहीं है। ऐसे ही, शुक्राचार्य ने कहा कि तुम बस इतना कह सकते हो कि यह असत्य था। किंतु बली ने अपने गुरु की अवज्ञा की। तथापि शुक्राचार्य ने उन्हें श्राप दिया, तुम्हारा सर्वस्व समाप्त हो जायेगा। तब वामनदेवे अपने कमंडल से कुछ जल बलि महाराज के हाथ में दे कर वह संकल्प करवाना चाहते थे। किंतु शुक्राचार्य ने एक भ्रमर का रूप धारण किया तथा कमंडल कि टोंटी में प्रवेश किया और जल को अवरुद्ध कर दिया। परंतु तब वामनदेव ने कमंडल को उठाया और देखा कि एक भ्रमर उसमें अवरोध कर रहा है। तब वामनदेव ने एक तिनका लिया तथा भौंरे को कुरेदा, इस प्रकार शुक्राचार्य का एक नेत्र क्षतिग्रस्त हो गया, वे तिनके से नेत्रहीन हो गये। तो, वामनदेव ने कहा कि उन्हें अपने चरणों की माप से केवल तीन पग भूमि चाहिए थी। "तुम बुद्धिमान नहीं हो" बलि महाराज ने कहा," मैं तुम्हें सर्वस्व दे सकता हूँ, मैं तुम्हें एक सम्पूर्ण लोक दे सकता हूँ, मैं तुम्हें धन-संपदा, पत्नियां दे सकता हूँ, आपको केवल तीन पग भूमि चाहिए!" अतः वामनदेव ने अपने कमंडल से जल की, तीन बूँदें बली के हाथ में डाल दी और उनसे संकल्प करवाया। तत्पश्चात, वामनदेव ने अपना विस्तार करना आरम्भ किया, एक पग से उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी को ढक लिया। दूसरे पग से उन्होंने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को आवृत्त किया। तथापि वे ब्रह्मांड के किनारे पर पहुंच गये और ब्रह्मांड के आवरण मे छिद्र कर दिया, और इस प्रकार गंगा जल उसमें प्रवेश कर गया। तब भगवान् शिव ने गंगा को अपने शीश पर धारण किया, और गंगा स्वर्गीय लोकों से अवतरित हुई। उसके उपरांत भागीरथ महाराज ने गंगा को इस ग्रह पर आने के लिए कहा। मायापुर में हमारे यहाँ भागीरथी है। तथा गंगा, गंगा सागर में, कपिल मुनि के आश्रम में गई। तो, वामनदेव अति महत्वपूर्ण अवतार हैं क्योंकि इनके कारण ही गंगा ने हमारे लोक में प्रवेश किया। तब वामनदेव ने बलि महाराज से पूछा, " मैं अपना तीसरा पग कहां रखूं? " तब बलि महाराज ने कहा," मेरे शीश पर रख दीजिये"। तब उन्होंने अपने शीश पर वामनदेव के चरण कमल प्राप्त किये । तथापि बलि महाराज को चोर की भांति बांध दिया गया। तत्पश्चात उन्हें सुतल लोक प्रदान किया गया था तथा वामनदेव उनके द्वारपाल बनने के लिए उद्यत हो गए। तथा बली महाराज को वचन दीया की वे उन्हें सभी आक्रमणकारो से बचाएगें। उन्होंने कहा, तीन मनुओं के पश्चात् बलि महाराज वैध इंद्र होंगे। तो यह एक अत्यंत ही रोचक लीला है। तथापि हम देख सकते हैं कि भगवान् को समर्पण करने से हम परास्त नहीं होते हैं । तो दो पगों में उन्होंने बली महाराज से सब कुछ हर लिया था तथा तृतीय पग में उन्होंने कहा कि मैं इसे कहां रखूं? वामन देव ने बलि महाराज की सारी संपत्ति दो पगों में ले ली थी। तो बलि महाराज किसी भी प्रकार से भगवान् को संतुष्ट करना चाहते थे, अतएव उन्होंने कहा, आप कृपया अपना तृतीय पग मेरे मस्तिष्क पर रख दें। तब बलि महाराज वास्तव में भगवान् को विस्तार करते हुए नहीं देख सके क्योंकि भगवान् के चरणकमल उनके मस्तिष्क पर थे। कांचीपुरम मंदिर में मैंने यह स्वरूप देखा है। बलि महाराज ने कहा" मैं आपका रूप नहीं देख पाया, कृपया मुझे अपना रूप दिखाएं"। इसे दक्षिण भारत के कांचीपुरम में श्री उलगई अलरनाथ पेरुमल कहा जाता है। वहाँ लगभग 35 फीट चौड़ा एक विशाल विग्रह है। उन्होंने इस प्रकार एक पग उठाया । इस प्रकार वे भगवान् को तीन पगों में विस्तार करते हुए देख सकते थे। मैं उस मंदिर में गया था, वह अति सुंदर है। मुझे नहीं प्रतीत होता कि ऐसा कोई मंदिर है - जहाँ 35 फीट के विग्रह है! वैसे आज भगवान् वामनदेव की लीला थी। इसके वर्णन के प्रयत्न में हमारा पूर्ण समय व्यतीत हो चुका है।

तथा मैं श्रील जीव गोस्वामी के विषय में भी चर्चा करना चाहता था। वे रूप और सनातन के भतीजे थे। तथा जब वे सदैव भगवान् चैतन्य के विषय में विचार कर रहे थे तब उनके पिता अनुपम की मृत्यु हो गई। किंतु श्रील जीव गोस्वामी की इच्छा थी कि वे हर क्षण भगवान् चैतन्य का अनुसरण करें तथा वृंदावन में श्रील रूप तथा सनातन गोस्वामी के साथ रहे। तो उन्हें स्वप्न में भगवान् चैतन्य से एक आदेश प्राप्त हुआ कि काशी, बनारस में, उन्हें सर्वभौम भट्टाचार्य के एक शिष्य से संस्कृत सीखनी चाहिए। जिसका पालन करके वे संस्कृत के महान विद्वान बन गए। उन्होंने सभी वेदों, वैष्णव तत्त्व के प्रमाणों का अध्ययन किया। श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि उन्होंने अपने "षट् संदर्भ ग्रंथ" में सभी दर्शन, विश्व के सर्वोच्च दर्शन दिए थे। तदुपरान्त वे वृंदावन गए, वहां उन्हें सनातन गोस्वामी ने रूप गोस्वामी से दीक्षा ग्रहण करने के लिए कहा। एक दिग्विजय पंडित वृंदावन आया और उसने रूप गोस्वामी से कहा कि मैं आपके साथ शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ। रूप गोस्वामी ने कहा," अरे! आप एक महान पंडित हैं, आपका समय व्यर्थ करने की कोई आवश्यकता नहीं है"। दिग्विजय पंडित ने कहा कि तो आप मेरे पत्र पर हस्ताक्षर कर दो कि तुम मुझसे परास्त हो गए हो। अतएव उन्होंने हस्ताक्षर किए। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने कहा कि "जड़ेर प्रतिष्ठा, सुकरेर विष्टा" - भौतिक प्रसिद्धि की तुलना सूअरों के मल से की जाती है। किन्तु यह पंडित चिल्ला रहा था, जय घोष कर रहा था की मैंने रूप तथा सनातन को परास्त किया है, वे मेरे समक्ष कुछ भी नहीं है! यह सुनकर श्रील जीव गोस्वामी क्रोधित हो गए। तब उन्होंने उस पंडित को चुनौती दी। तत्पश्चात सात दिवसों तक उन्होंने पंडित के साथ शास्त्रार्थ किया तथा अंतिम निर्णय यह हुआ कि श्रील जीव गोस्वामी विजयी हुए है। उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि के लिए ऐसा नहीं किया, परंतु अपने आध्यात्मिक गुरु के आदर तथा सम्मान को बनाए रखने के लिए ऐसा किया। किंतु रूप गोस्वामी उनके व्यवहार से अप्रसन्न हो गये। उन्होंने कहा, आपने सात दिवस व्यर्थ कर दिए हैं, तुम वृंदावन में रहने के योग्य नहीं हो। तो जीव गोस्वामी अत्यंत दुखी हुए क्योंकि उनके गुरु असंतुष्ट थे। तथापि वह स्थान छोड़ कर किसी कंदरा में रह रहे थे। वे हर दो या तीन दिवस में भोजन ग्रहण करते थे। कालयोग से सनातन गोस्वामी उस गाँव में आए और उन्होंने सुना कि वहाँ एक संत है। तब उन्होंने कंदरा में जाकर जीव गोस्वामी को देखा और उस समय जीव गोस्वामी दुर्बल हो गए थे तथा गुफा छोड़ने के लिए अशक्त थे, अतः सनातन गोस्वामी ने उन्हें बाहर निकाला और पुनः वृंदावन ले गए। सनातन गोस्वामी ने रूप गोस्वामी से कहा कि एक बात है जो आपने भगवान् चैतन्य के दर्शन में नहीं समझी है। वह है जीवेर दया - सभी जीवों पर दया। जीव एक प्रकार का प्रतिरूप है - उन्होंने कहा जीव दया, जीव का अर्थ है सभी जीवित जीव, और इसका अर्थ हे जीव गोस्वामी भी है। तदुपरांत रूप गोस्वामी ने जीव गोस्वामी का आलिंगन लिया।

इसके पश्चात जाह्नवा देवी ने जीव गोस्वामी को लिखा कि हमें इन सभी पुस्तकों की आवश्यकता है जो गोस्वामीओं ने लिखी थीं, अतः जीव गोस्वामी ने पुस्तकों की प्रतिकृति करने के लिए पुनः बंगाल भेज दिया।

उस समय, श्रील गोस्वामी नरोत्तम दास ठाकुर, श्रीनिवास आचार्य और श्यामानंद पंडित के शिक्षा गुरु थे। वैसे, अनेक इतिहास हैं। रूप और सनातन गोस्वामी के पश्चात, श्रील जीव गोस्वामी सभी वैष्णवों के शिखा रत्न थे। अतः उन्होंने अपने "षट् संदर्भ" में सभी दर्शन लिखे।

वैसे, आज श्रील जीव गोस्वामी का प्राकट्य दिवस भी है तथा कल भक्ति चारु स्वामी का प्राकट्य दिवस या व्यास पूजा थी। उन्होंने श्रील प्रभुपाद की अंग्रेजी पुस्तकों का बंगाली में अनुवाद किया। तो भक्ति चारु स्वामी, श्रील प्रभुपाद के आदेश का पालन करने के लिए समर्पित थे। वैसे भी आज का दिवस अत्यंत विशेष है। हमें समझना चाहिए कि कैसे भगवान के असीमित रूप हैं, वे किसी भी प्रकार से प्रकट हो सकते हैं। इन सबके उपरांत, वे वही परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

मैं कुछ प्रश्न लूंगा और तत्पश्चात हमें यहीं समाप्त करना होगा। कृपया चैट में एक बांग्ला और एक अंग्रेजी प्रश्न डालें।

बंगाली : सुकमल नित्यानंद दास, हबीबगंज: बलि महाराज ने तीन पग भूमि दान की थी और भगवान् ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को दो पग से आवृत्त कर दिया था और तत्पश्चात बलि महाराज ने भगवान को सर्वस्व देने के लिए, यहां तक ​​कि अपने आप को भी अर्पित करने के लियर, उन्होंने अपना मस्तक भगवान् के तीसरे पग के लिये अर्पित कर दिया था। तो यहाँ पर हम देखते हैं कि बलि महाराज अति दानशील व्यक्ति हैं, उन्होंने भगवान को दान में सब कुछ दिया है। परंतु साथ ही उन्होंने संपूर्ण शरणागति भी ली है। तो बलि महाराज का कौन सा पक्ष अधिक गौरवान्वित है - भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण या एक महान दानशील व्यक्ति होने का उनका पक्ष ?

जयपताका स्वामी : भगवान के भक्त होने का उनका पक्ष । यह द्वितीय लीला किसी अन्य युग में हुई। किन्तु तब इंद्र के सौतेले भाई भास्कर पंडित थे। भास्कर महाराज। तो वहाँ वामनदेव ने भी भास्कर पर विजय प्राप्त की तथा उनसे तीन पग भूमि भिक्षा में माँगी। परंतु उन्होंने पूरे ब्रह्मांड को तीन पगों में नाप लिया। तो उन्होंने भास्कर महाराज से कहा, आप अत्यंत दानशील हैं, आप मुझसे कोई भी वरदान मांग सकते हैं। इस लीला में यद्यपि भास्कर महाराज को उनके दान के लिए गौरवान्वित किया गया था। भास्कर ने पूछा, आप कहाँ से आए हो, मुझे उस जगह जाना है! मेरी वहां जाने की इच्छा है! मुझे वैकुंठ जाना है! अतः उसे भगवान् की कृपा प्राप्त हुई । तो, यह ब्रह्मा के एक पृथक जन्म में हो सकता है, मुझे नहीं पता।

अंग्रेजी में अंतिम प्रश्न।

सुधामयी चित्रा देवी दासी : बलि महाराज भगवद्धाम क्यों नहीं गए, किन्तु इतनी कृपा पाकर फिर भी इंद्र के रूप में वापस क्यों आए?

जयपताका स्वामी : उन्हें कृष्ण का संग प्राप्त हुआ । तो यह उनकी इच्छा थी कि वे इंद्र का पद प्राप्त करें। तो वे तीन मनु के पश्चात इंद्र बनेगें। तथा अपने जीवनकाल अवधि की समाप्ति में, निश्चित रूप से वह पुनः भगवद्धाम जाएगें।

ठीक है, आप सभी का धन्यवाद, आइए देखते हैं मायापुर के भक्त वे अपना प्रसादम ग्रहण कर सकते हैं। फिर मंदिरों तथा सुदूर पूर्व के भक्तों के दर्शन करेंगे।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रतिलेखन का हिंदी अनुवाद अजीत मधुसूदन दास द्वारा
Verifyed by रोहिणी सुमुखी देवदासी द्वारा सत्यापित
Reviewed by निर्गुणा जाह्नवा देवी दासी द्वारा समीक्षित

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