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20210914 51वां संन्यास वार्षिकोत्सव

14 Sep 2021|हिन्दी|सार्वजनिक वक्तव्य|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी : श्रीमती राधारानी की जय हो! मुझे याद है 51 साल पहले इस पवित्र दिन पर, श्रील प्रभुपाद ने कहा था कि लॉस एंजिल्स में नौ संन्यासी थे और उन्होंने कहा कि, तब, भारत में दो थे, और इसलिए उन्होंने कहा कि मैं 11वां था। इस पवित्र अवसर पर उन्होंने मुझे संन्यास दंड प्रदान किया, उन्होंने मुझे संन्यास गायत्री दी। क्या मुझे अंग्रेजी में बात करनी चाहिए, या बंगाली में ? यदि मैं अंग्रेजी में बोलता हूं, तो सुजितेन्द्रिय प्रभु को बंगाली में अनुवाद करना होगा । मैंने सुना है कि साथ-साथ अनुवाद चल रहा है। वैसे भी, मैं सोच रहा था कि हमारे कई गृहस्थ भी संन्यासी की तरह जीवनयापन कर रहे हैं। वे भगवान् श्री कृष्ण की सेवा के लिए अत्यंत समर्पित हैं। मुख्य बात है कृष्ण की सेवा करना । आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करें। एक संन्यासी होने के कारण मेरा दायित्व मंदिर , शिष्यों और आध्यात्मिक गुरु के प्रति था। यदि मैं गृहस्थ होता, तो सम्भव है की मुझे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए बहुत समय देना पड़ता। श्रील प्रभुपाद अत्यंत दयालु थे कि उन्होंने मुझे कई निर्देश दिए और उन्होंने मुझे अत्यधिक संग प्रदान किया। उन्होंने मुझे मायापुर धाम विकसित करने को कहा। हमने आज सुना कि किस प्रकार राधा रानी ने भगवान् कृष्ण की प्रसन्नता के लिए मायापुर धाम, नवद्वीप धाम का निर्माण किया।

तो यह एक अति विशेष स्थान है और मैं यहां पवित्र धाम में आकर अत्यंत भाग्यशाली प्रतीत कर रहा हूं। इस COVID प्रतिबंध के कारण, मैं एक वर्ष से अधिक समय से मायापुर में हूँ। वहीं, इंटरनेट का उपयोग करके मैं संपूर्ण विश्व के कई मंदिरों के दर्शन कर पाया हूं। तो श्रील प्रभुपाद ने कहा कि मुझे मायापुर में अधिक समय बिताना चाहिए और साथ ही उन्होंने मुझे यात्रा करने और प्रचार करने के लिए कहा। अब इंटरनेट के माध्यम से मैं दोनों कार्य कर रहा हूं। यध्यपि, मैंने कई बार संपूर्ण विश्व की यात्रा की। कभी-कभी साल में पांच या छह बार भी। कभी कभी मेरे सचिव भी थक जाते थे। परन्तु सम्पूर्ण विश्व के विभिन्न भक्तों को देखना अत्यंत प्रेरणादायक था। तो मैं अब विचार रहा हूं कि कैसे सभी पुरुष, सभी महिलाएं, वे कृष्ण भावनाभावित हो सकते हैं । हम देखते हैं कि सुनीति, देवहुति, जिन्होंने माता बनकर अपनी संतानों का कृष्णभावनामृत की ओर मार्गदर्शन किया एवं भगवद् धाम चली गईं, । और निश्चित रूप से देवहुति, वे भाग्यशाली थी की उन्हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् , कपिल देव , पुत्र के रूप में प्राप्त हुए ।

मैं विचार कर रहा था कि सभी पुरुष, सभी महिलाएं, उन्हें कृष्णभावनामृत में इस तरह संलग्न होना चाहिए कि श्रील प्रभुपाद की इच्छाएं एवं पंचतत्व की इच्छाएं पूर्ण हो सकें। मुझे नहीं पता कि भगवान् श्री कृष्ण मुझे इस संसार में कितने समय तक रखेंगे, परन्तु मुझे आशा है कि मैं अपनी अंतिम श्वास तक श्रील प्रभुपाद के निर्देशों का पालन कर सकूँ ।

अन्य भक्तों के साथ पदयात्रा का उद्घाटन करने के बाद, मुझे व्यक्तिगत रूप से अर्चा विग्रह के त्वरित दर्शन करने का अवसर मिला। अब मैं आप सभी को संबोधित कर रहा हूं। हम श्रील प्रभुपाद, उनके निर्देशों को केंद्र में रखना चाहते हैं । और हम जानते हैं कि यह भोतिक जगत अत्यंत संकटमय स्थान है । हर पग पर संकट है। तो भगवान् श्री कृष्ण की सेवा करने के प्रयास में मैं श्रील प्रभुपाद की कृपा से अद्भुत परिणाम प्राप्त कर रहा हूं । और भगवान् चैतन्य चाहते थे कि हर कोई भगवत प्रेम का आस्वादन करे । उन्होंने कहा कि भक्ति वृक्ष का फल वितरित करना है। तो मैं आशा करता हूं कि हर कोई उस फल का आस्वादन कर सकता है, और भगवान् चैतन्य के अनुरोध के अनुसार इसे वितरित करने में सहायता कर सकता है। एक बार किसी ने श्रील प्रभुपाद से अर्चा विग्रह के सामने पूछा कि वे किस लिए प्रार्थना कर रहे हैं । निःसंदेह यह एक बहुत ही व्यक्तिगत प्रश्न है और मैं नहीं समझता कि किसी शिष्य को वास्तव में ऐसा प्रश्न पूछने का अधिकार है। परंतु श्रील प्रभुपाद ने उस शिष्य की ओर रुख किया और कहा, मैं प्रार्थना कर रहा हूं कि मैं पतित न हो जाऊं । तो, निश्चित रूप से, हम जानते हैं कि यह भौतिक जगत हर समय हमारी परीक्षा ले रहा है । और यह अत्यंत आवश्यक है कि हम स्वयं को गुरु और गौरांग को समर्पित करें। तो, मुझे संन्यासी बनने का अवसर मिला और हम 51वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, और मुझे आशा है कि मैं राधा और माधव की कृपा से सदा श्रील प्रभुपाद की सेवा करता रहूंगा। हरे कृष्ण!

वास्तव में परम पूज्य भक्ति पुरुषोत्तम स्वामी की पुस्तक में श्रीमती राधारानी की महिमा पर मैं दूसरे खंड को पढ़ने की प्रतीक्षा कर रहा हूं। क्यूँकि पहले खंड में यह कहा गया था कि वे विभिन्न महिलाओं की शुद्धता का परीक्षण कर रहे थे। उनके पास कई छिद्र वाले पात्र थे और उन्हें यमुना या कुछ और पार करना था, और सारा पानी पात्र में रहना चाहिए। परंतु राधारानी को छोड़कर हर कोई परीक्षा में असफल हो गया। श्रीमती राधारानी की जय!

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Transcribed by हिंदी अनुवाद शशि मुखी केशवी देवी दासी द्वारा
Verifyed by अजित मधुसूदन दास द्वारा सत्यापित
Reviewed by व्रज कृष्ण दास द्वारा समीक्षित

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