नमो महा-वदान्याय, कृष्ण प्रेम प्रदायते।
कृष्णाय कृष्ण चैतन्य, नामने गौरा-त्विशे नमः॥
हे कृष्ण करुणा-सिंधु, दीन-बन्धु जगत्पते।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोस्तुते
तप्त-कांचन गौरांगी, राधे वृन्दावनेश्वरी।
वृषभानु सुते देवी, प्रणमामि हरिप्रिये
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
जयपताका स्वामी : आज श्रीमती राधारानी के प्राकट्य का शुभ दिवस है। यह मायापुर के लिए एक अत्यंत विशेष दिवस है क्योंकि श्रीमती राधारानी ने मायापुर का निर्माण किया है। तो, वह रावल में प्रकट हुई थी। वे एक अद्भुत तेज के साथ एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल में थी, जो यमुना नदी में तैर रहा था। राजा वृषभानु, उन्होंने उस कमल को देखा और उस ओर चले गए। तभी भगवान् ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने कहा, आपने अपनी पुत्री के रूप में भगवान् विष्णु की शक्ति प्राप्त करने के लिए बड़ी तपस्या की है; ह्ललादिनी शक्ति या अंतरंगा शक्ति, जो ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी का स्रोत है। अतः आप इन्हें ले जाइए और इनका सुचारू रूप से लालन पालन कीजिए। उसके पश्चात् भगवान् ब्रह्मा अंतर्ध्यान हो गए तो वृषभानु महाराज ने पुत्री को ले लिया और जाकर अपनी रानी कीर्तिदा को दे दिया। परन्तु उनकी शिशु कन्या की आंखें बंद थीं। उसने रूदन भी नही किया। तो कुछ लोगों ने सोचा कि कन्या अंधी हैं और बोल भी नहीं सकती। यद्यपि उनका एक भव्य जन्मोत्सव मनाया गया। वृषभानु महाराज ने ब्राह्मणों को 1000 गायें दान दीं।
अतः नारद मुनि, उन्होंने देखा कि भगवान् श्री कृष्ण प्रकट हो चुके हैं ,और उन्हें ज्ञात था कि उनके साथ उनकी शक्ति भी प्रकट होंगी। वे बच्चों को आशीर्वाद देने के लिए विभिन्न घरों में गए, परन्तु उन्हें भगवान् श्री कृष्ण को आनंद प्रदान करने वाली ह्ललादिनी शक्ति नहीं मिली। फिर वे वृषभानु महाराज के निवास पर गए। उन्होंने और सभी लोगों से नारद मुनि का परिचय कराया परन्तु अपनी पुत्री को नहीं दिखाया।अतः नारद मुनि ने पूछा, क्या आपके यहाँ कोई और भी शिशु है ? उन्होंने कहा कि हमारी एक पुत्री है परन्तु वह अंधी है और बोल नहीं सकती। नारद मुनि ने कहा मुझे आपकी पुत्री दिखाईए, अतः राजा वृषभानु ने कन्या को नारदमुनि को दिया और जैसे ही नारद मुनि ने कन्या को अपने हाथों में लिया, जैसे ही श्रीमती राधारानी को उनके हाथों में रखा गया, तो वे भावविभोर हो गए, परमानंद!! उनका स्वर अवरुद्ध हो गया, वे बोल भी नहीं सकते थे। वे ऐसे परमानंद में थे कि उनके नेत्रो से अश्रु की धारा बह रही थी। और वृषभानु महाराज सोच रहे थे कि नारद मुनि को क्या हो गया है। नारदमुनि को स्वयं सामान्य अवस्था में आने में घंटे भर का समय लग गया। नारद मुनि ने उनसे कहा कि आप अपनी पुत्री का भली भाँति लालन पालन कीजिए। उन्होंने यशोदा मैया और नंद महाराज को उनके पुत्र के विषय में भी वही निर्देश दिये और उन्होंने वृषभानु और कीर्तिदा को उनकी पुत्री के विषय में भी वही निर्देश दिया। वह बाहर आ गए और उन्होंने प्रार्थना की कि क्या वे श्रीमती राधारानी का किशोरी रुप में दर्शन कर सकते है?तथापि वहाँ श्रीमती राधारानी और ललिता देवी ने नारद मुनि को अपने दर्शन दिए। ललिता देवी ने कहा कि कुछ लोग, राधारानी के दर्शन प्राप्ति हेतु दीर्घ कालीन ब्रह्मा के दिनों तक तपस्या करते हैं। आपको अतिविशेष कृपा मिल रही है।
तो वहाँ एक उत्सव का अवसर था, जब वृषभानु महाराज ने अपने अत्यंत घनिष्ठ मित्र नंद महाराज को आमंत्रित किया। उन्होंने भगवान् कृष्ण को श्रीमती राधारानी के साथ समान स्थल पर लेटा दिया। भगवान् कृष्ण राधारानी को देख रहे थे। वे दोनों शिशु रूप में थे। परन्तु श्रीमती राधारानी, कृष्ण की उपस्थिति की सुगंध को अनुभव कर सकती थीं। तत्पश्चात् राधारानी ने अपने नेत्र खोलें और उन्होंने जो प्रथम व्यक्ति को देखा वे भगवान् श्री कृष्ण थे और वे अविरत रूदन कर रही थी। यह प्रथम अवसर था जब उन्होंने अपने नेत्र खोलें और सबको राधारानी का दिव्य सुमधुर स्वर सुनाई दिया। अतः अब वृषभानु महाराज और कीर्तिदा अत्यंत प्रसन्न हुए। उनकी पुत्री देख सकती है, और अब वह बोल भी सकती है।
तो संयोग से राधारानी को दुर्वासा मुनि का आशीर्वाद मिला। वह जो कुछ भी पकाएगी वह अमृत हो जायेगा , अमृत। तो यशोदा मैया और नंद महाराज ने सोचा कि राधारानी को हमारे पुत्र कृष्ण के लिए भोजन बनाना चाहिए। जिससे कृष्ण अमृतमय भोजन ग्रहण कर सके। श्रीमती राधारानी, वे लक्ष्मियों की स्रोत हैं। यह सर्व वैभव विलास राधारानी के विस्तार हैं और द्वारका की रानियाँ श्रीमती राधारानी के प्रतिबिम्ब हैं, वे वैभव प्रकाश हैं।और गोपियाँ राधारानी का प्रत्यक्ष विस्तार हैं। कृष्ण एक थे, परन्तु वे दो हो गए, कृष्ण और राधा। वे दो हो गए जिससे कि वे परमानंद का आनंद ले सके।
कृष्ण के पास तीन सैद्धान्तिक शक्तियाँ हैं - अनंत काल, असीमित आनंद और असीम ज्ञान से परिपूर्ण उनकी दिव्य शक्तियाँ, संधिनि, संवित और ह्ललादिनी। ये तीन मुख्य शक्तियाँ है शाश्वत शक्ति , चेतन शक्ति जिसे कभी-कभी ज्ञान के रूप में जाना जाता है, और ह्ललादिनी शक्ति, आनंद प्रदान करने वाली शक्ति। अतः श्रीमती राधारानी ह्ललादिनी शक्ति हैं। एक बार, भगवान् कृष्ण राधारानी से कह रहे थे, "तुम्हें इतना विनम्र नहीं होना चाहिए"। और उन्होंने समझाया कि कैसे सब कुछ अन्य चीजों पर स्थिर निर्भर है। जैसे सम्पूर्ण भौतिक जगत् गर्भोदकशायी विष्णु और अनंत शेष पर स्थित है। पुनः उन्होंने वर्णन किया कि अन्य सभी चीजें उन पर निर्भर हैं। भगवान् कृष्ण, उन्होंने कहा कि मैं तुम पर निर्भर हूँ। अतः भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमती राधारानी को सर्वोच्च स्थान पर रखा। आज प्रातः मन्दिर घोषणा में वे कह रहे थे कि हम कैसे गौड़ीय हैं। हमारी मान्यता है कि श्रीमती राधारानी विशेष रूप से आराध्य और पूजनीय हैं।
तो यहां हम नवद्वीप में हैं, जो एक पवित्र भूमि है और श्रीमती राधारानी द्वारा प्रकट किया गया है। माता पार्वती ने भगवान् शिव से पूछा कि नवद्वीप कैसे प्रकट हुआ। तो उन्होंने कहा कि जब श्रीमती राधा रानी ने सुना कि भगवान् श्री कृष्ण वृंदावन के वन में विरजा से मिल रहे थे। तो श्रीमती राधा रानी यह देखने के लिए वहां आई। विरजा ने जब यह सुना कि श्रीमती राधारानी आ रही हैं तो उन्होंने स्वयं को नदी रूप में परिवर्तित कर लिया। और भगवान् श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए। श्रीमती राधा रानी जब वहाँ पहुँची तो उन्हें वहां कोई भी नहीं मिला। वे भगवान् श्री कृष्ण के विचारों में पूर्ण रूप से अभिभूत थीं और उन्होंने गंगा और यमुना के निकट अपनी सखियों को एकत्रित किया। उन्होंने विभिन्न नदियों के मध्य एक रमणीय स्थल का निर्माण किया। और उसके निकट भाँति भाँति के वृक्ष , सरीसृप, मादा और पुरुष भ्रमर और हिरण तथा मृग आनंद लेते हुए विचरण कर रहे थे। वह स्थान चमेली, मल्लिका और मालती पुष्पों से सुगंधित था। वहाँ गंगा और यमुना श्रीमती राधारानी के आदेश से प्रकट हुई तथा एक सुंदर वातावरण का निर्माण किया। उन्होंने तुलसी के वृक्षों के वन का निर्माण किया। अतः कामदेव, वह भी वहीं उपस्थित हुए। यहाँ तक कि पक्षी भी भगवान् श्री कृष्ण के नामों का जप करते। वास्तव में, मेरे सेवकों में से एक ने बताया कि उन्होंने एक पक्षी को गौरांग.. गौरांग.. जपते हुए सुना। तो भगवान् श्री कृष्ण को आकर्षित करने के लिए, श्रीमती राधारानी ने बांसुरी को बजाना प्रारम्भ किया। अतः मधुर संगीत की ध्वनि सुनकर भगवान् श्री कृष्ण उस स्थान पर प्रकट हुए। अतः राधारानी ने भगवान् श्री कृष्ण के मन को आकर्षित किया और देखा कि कृष्ण वहाँ आ गए। अतः उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण के हाथों को पकड़ लिया और दोनो परमानंद का अनुभव कर रहे थे। अतः भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमती राधारानी से अत्यंत प्रेम पूर्वक वार्ता लाप किया। "आप का मुखारविंद अत्यंत मोहक है,। आप मेरी जीवन प्राण हैं। आप से अधिक अन्य कोई मुझे प्रिय नहीं है। आपने मेरे लिए इस रमणीय स्थान का निर्माण किया है, मैंने इसे स्वीकार कर लिया है और मैं आप के साथ यहाँ निवास करूँगा, और मैं इस स्थान को नई सखियों से युक्त और कुंजो में परिवर्तित कर दूंगा। अतः भक्त इसे नवीन वृंदावन के नाम से सम्बोधित करेंगे। और चूँकि यद्यपि यहाँ अनेक नदियां है, अतः इन नदियों की उपस्थिति के कारण यह द्वीप हैं, अतः कुछ लोग इस स्थान को नवद्वीप के नाम से सम्बोधित करेंगे"।अतः भगवान कृष्ण के आदेश से सभी पवित्र तीर्थस्थान यहाँ निवास के लिए आ गए। उन्होंने राधारानी को बताया क्योंकि आपने इस स्थान को मेरे लिए निर्मित किया है, अतः मैं यहाँ सदा सर्वदा निवास करूंगा। जो लोग यहाँ आ कर निवास करेंगे और हमारी पूजा करेंगे उन्हें हमारी सखियाँ बनने का आशीर्वाद मिलेंगा। मेरी प्रिया राधा, वृंदावन की भाँति यह स्थान भी अत्यंत पवित्र है। यदि कोई एक बार भी यहाँ आता है, मात्र एक बार, उस व्यक्ति को सभी पवित्र तीर्थ स्थलों की तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होगा, जो भी फल वह यहां प्राप्त करेगा। और वे मेरे प्रति भक्ति को अति शीघ्र प्राप्त करेंगे, भक्ति जो कि मुझे अति प्रिय है"। अतः भगवान शिव ने माता पार्वती को यह कथा सुनायी। इसके पश्चात् भगवान् श्री कृष्ण, वे श्रीमती राधारानी से संविलित हो गए तथा उनका वर्ण सुनहरा हो गयाऔर यही वर्ण गौरहरि के रूप में जाना जाता है क्योंकि राधारानी भी गोरी हैं, वे सुनहरे वर्ण की है। महाप्रभु , वे गौर और हरि है। बाह्यरूप से वे सुनहरे वर्ण के है, आंतरिक रूप से वह कृष्ण है। इस रूप के दर्शन कर के, ललिता सखी, उन्होंने अपना सखीरूप त्याग दिया और वे एक पुरुष रूप में परिवर्तित हो गयी। तथापि वे गौरहरि की सेवा कर सके। अंत में विशाखा और अन्य सभी सखियों ने यह देखा, तो उन्होंने भी पुरुष रूप धारण कर लिया। तथा चारों दिशाओं से जय गौरहरि..जय गौरहरि.. का उद्गघोष सुनायी देने लगा। उस समय भक्तों ने भगवान् श्री कृष्ण के इस रूप को गौरहरि के नाम से पुकारा। गौर और हरि को संयुक्त रुप में गौरहरि पुकारते हैं। अतः कृष्ण और राधा, कृष्ण, राधा और कृष्ण के रूप में दो बन गए और पुनः उन्होंने गौरहरि का रूप धारण करने के लिए स्वयं को संयुक्त कर लिया।
अतः वृंदावन में राधारानी भगवान् श्री कृष्ण के बाईं और स्थित है। और वह सर्वदा उन्हें परमानंद प्रदान कर रही है। परंतु नवद्वीप में वे राधारानी के साथ संयुक्त रूप में है, राधारानी उनके ह्रदय में है। वृंदावन में ललिता, विशाखा और सभी सखियां कृष्ण और राधारानी की सेवा करते हैं। परन्तु नवद्वीप और नीलाचल में भक्त के रूप में वे गौरहरि की सेवा करते है। तो इस तरह, नवद्वीप राधारानी के लिए बनाया गया था। और यहाँ कृष्ण राधारानी के साथ गौरांगा या गौरहरि के रूप में संयुक्त है। तो, यह इतिहास है कि कैसे नवद्वीप प्रकट हुआ। जब एक मनुष्य नवद्वीप की इन महिमा को सुनता है, तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और दृढ़ भक्ति उनके हृदय में स्थापित हो जाती है। विशेष रूप से, प्रातः काल में, श्रवण करना अत्यंत मंगलकारी होता है। वृंदावन में, भगवान् श्री कृष्ण रास नृत्य में दिखाई देते हैं। यहाँ नवद्वीप में, वे गौरांग या गौरहरि के रूप में प्रकट हुए। और भगवान् श्री कृष्ण के प्रकट होने के पश्चात् , एक कल्प या ब्रह्मा के एक दिन में , वे प्रकट होते है। तो ब्रह्मा के एक दिन में एक हजार चतुर्युग होते हैं। यह ब्रह्मा के एक दिन में, पृथ्वी के चार अरब वर्ष की भाँति है। और उनकी रात भी इतनी ही लम्बी होती है है। अतः हम राधा और कृष्ण की महान कृपा प्राप्त कर रहे हैं, केवल पांच सौ साल पूर्व गौरांग, गौरहरि के रूप में संयुक्त रहे। अतः इस गोपनीय विषय वस्तु को उन लोगों को प्रदान नहीं किया जाना चाहिए जो विश्वासहीन, मूढ़ या गैर-भक्त हैं। तो यह अनंत संहिता से एक अंश है। यहाँ हम पंचतत्व और राधा माधव और अष्टसखी की पूजा करते हैं। तो हम राधारानी के स्थान पर आकर अत्यंत धन्य हो गए हैं। हमारे लिए, राधाष्टमी वर्ष का एक अत्यंत विशेष दिन है। हमें आशा है कि सभी भक्त श्री राधा माधव और भगवान् चैतन्य की कृपा का लाभ उठाएंगे।
हम यहाँ 8.30 पर विभिन्न श्रीविग्रह के दर्शन करते हैं। अतः पहले से ही 8.31 हो गया है! अतः मैं अपनी कक्षा को यहाँ समाप्त कर रहा हूँ। जय श्री राधे!
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