मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
कक्षा श्रीमद्-भागवतम् १.1.10.27 से पढ़न के साथ आरंभ होती है।
अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः ।
पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं स्मितावलोकं स्वपति स्म यत्प्रजाः ॥ २७ ।।
अनुवाद : निस्सन्देह, यह कितना आश्चर्यजनक है कि द्वारका ने स्वर्ग के यश को पिछाड़ कर पृथ्वी की प्रसिद्धि को बढ़ाया है। द्वारका के निवासी उनके प्रिय स्वरूप में समस्त जीवों के आत्मा (कृष्ण) का सदैव दर्शन करते हैं। भगवान् उन पर दृष्टिपात करते हैं और अपनी मुस्कान भरी चितवन से उन्हें कृतार्थ करते हैं।
तात्पर्य कृष्ण कृपा मूर्ति श्री श्रीमान ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा : स्वर्ग में इन्द्र, चन्द्र, वरुण तथा वायु जैसे देवता निवास करते हैं और पुण्यात्माएँ वहाँ तभी पहुँचते हैं, जब पृथ्वी पर वे अनेक पुण्यकर्म करते हैं। आधुनिक विज्ञानी स्वीकार करते हैं कि उच्चलोकों में काल की व्यवस्था पृथ्वी से भिन्न है। इस प्रकार प्रामाणिक शास्त्रों से यह पता चलता है कि वहाँ पर हमारी गणना के अनुसार आयु दस हजार वर्ष है। पृथ्वी के छह मास, स्वर्ग के एक दिन के बराबर होते हैं। इसी प्रकार भोग की सुविधाएँ भी अधिक हैं और वहाँ के निवासियों की सुन्दरता अतिशय है। पृथ्वी के सामान्य लोग स्वर्ग पहुँचने के लिए अत्यन्त इच्छुक रहते हैं, क्योंकि उन्होंने सुन रखा है कि पृथ्वी की अपेक्षा वहाँ जीव को अधिक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। अब वे अन्तरिक्ष यान द्वारा चन्द्रमा पर पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। इन सब बातों पर विचार करते हुए पृथ्वी की अपेक्षा स्वर्ग अधिक प्रसिद्ध है। परंतु द्वारका के कारण पृथ्वी की प्रसिद्धि ने स्वर्ग को पीछे छोड़ दिया है, क्योंकि यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने राजा के रूप में राज्य किया। इस पृथ्वी के तीन स्थान- वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका ब्रह्माण्ड के प्रसिद्ध लोकों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ये तीनों स्थान इसीलिए निरन्तर पवित्र हैं, क्योंकि जब भी भगवान् अवतरित होते हैं, तो वे विशेषकर इन्हीं तीन स्थानों में अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं। ये निरन्तर भगवान् के पवित्र स्थल हैं और आज भी भगवान् के यहाँ दृष्टिगोचर न होने पर भी भक्तगण इन पवित्र स्थानों का लाभ उठाते हैं। भगवान् सभी जीवों के आत्मा हैं और वे चाहते हैं कि सारे जीव अपने स्वरूप में रहकर उनके सान्निध्य में दिव्य जीवन में भाग लेते रहें। उनका आकर्षक रूप तथा उनकी मधुर मुस्कान प्रत्येक के हृदय में घर करने वाली है और एक बार ऐसा हो जाने पर जीव भगवान् के धाम में प्रवेश पा जाता है, जहाँ से कोई भी लौटता नहीं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है। भले ही स्वर्ग के ग्रह भौतिक भोग की अच्छी सुविधाएँ देने के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध क्यों न हों, लेकिन भगवद्गीता (९.२०-२१) से हम जान पाते हैं कि ज्योंही संचित पुण्य क्षीण हो जाते हैं, त्योंही मनुष्य को पृथ्वी पर पुनः आना पड़ता है। द्वारका स्वर्गलोक से इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जिस किसी को भी भगवान् की स्मित चितवन की प्राप्ति हुई है, उसे इस सड़ी-गली पृथ्वी पर फिर से नहीं आना पड़ता-जिसे भगवान् ने भी दुख का स्थान बताया है। न केवल यह पृथ्वी, अपितु ब्रह्माण्ड के सारे लोक दुख के स्थान हैं, क्योंकि ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में न तो शाश्वत जीवन है, न शाश्वत आनन्द और न शाश्वत ज्ञान है। जो व्यक्ति भगवान् की भक्तिमय सेवा में लीन रहता है, उसके लिए उपर्युक्त तीनों स्थानों द्वारका, मथुरा या वृन्दावन में से किसी एक में रहने की संस्तुति की जाती है। चूँकि इन तीनों स्थानों में भक्ति का प्रवर्द्धन होता है, अतएव जो लोग शास्त्रों की बताई विधि से नियमों का पालन करने के लिए वहाँ जाते हैं, उन्हें वैसा ही फल मिलता है, जैसा भगवान् श्रीकृष्ण के उपस्थित रहने पर मिलता था। उनका धाम तथा स्वयं वे अभिन्न हैं और आज भी कोई शुद्ध भक्त किसी अन्य अनुभवी भक्त के निर्देशन में सारे फल प्राप्त कर सकता है।
जयपताका स्वामी: तो यह श्लोक बताता है कि कैसे हस्तिनापुर की स्त्रियाँ भगवान् कृष्ण के विषय में बोल रही थीं। तथा पिछले श्लोक कहते हैं कि स्त्रियों की विचारधारा वेदों के ऋचाओं की तुलना में भगवान कृष्ण को अधिक प्रसन्न करते थे। तथा इस श्लोक में, विशेष रूप से यह द्वारका की महिमा बताता है । हम पढ़ते हैं कि कैसे द्वारका में, चंद्र तथा विभिन्न ब्रह्मा आदि भगवान कृष्ण को देखने आएंगे । श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि यदि हम द्वारका, मथुरा तथा वृंदावन जैसे इन तीन धामों में रहते हैं, तो कोई भी भगवान् के घर वापस जा सकता है। परन्तु हमारे पास शास्त्रों से प्रमाण है कि यदि हम नवद्वीप धाम में रहते हैं, तो यह नवद्वीप धाम वृंदावन से अभिन्न है। तो वृंदावन धाम माधुर्य-धाम है, मधुरता की मिठास । नवद्वीप धाम औदार्य-धाम है - उदारता की मधुरता। तथा उसके पश्चात पुरी और द्वारका-धाम, ये भिन्न हीं हैं । वहाँ होने वाली रथ-यात्रा वास्तव में द्वारका से वृंदावन तक की यात्रा है।
हम पढ़ रहे हैं कि कैसे भगवान् चैतन्य काशी गए। वह एक विक्रेता का उदाहरण देते है। उन्होंने कहा, मैं बेचने के लिए माल का भारी बोझ लेकर आया हूँ, कृष्ण का शुद्ध प्रेम । यदि मैं काशी में आया हूँ और मुझे खाली हाथ लौटना पड़े, अपने भार के साथ, तो क्या लाभ? मुझे यहाँ कोई ग्राहक नहीं मिल रहा है, यहाँ शून्यवादी हैं, हर कोई अवैयक्तिक तथा मायावादी है । तो मैं कैसे अपने बोझ से मुक्त हो पाऊँगा, अपना माल बेचूँगा और थोड़ा हल्का बनूँगा। भले ही मैं कुछ छूट पर बेच सकूँ। भगवान् चैतन्य की मनोदशा कितनी अद्भुत है! तो, श्रील प्रभुपाद पूरे विश्व में अपना संदेश लेकर आए। तो वे भगवान् चैतन्य महाप्रभु के प्रतिनिधि थे । तो किसी न किसी प्रकार, वे बेचना चाहते है, वे भगवान् चैतन्य के उत्पाद का वितरण चाहते है । जैसे भगवान् चैतन्य पूछ रहे थे कि वे स्वयं कितना कुछ कर सकते हैं, सभी को मेरी सहायता करनी चाहिए। तो इस प्रकार, भगवान् चैतन्य वे कृष्ण के इस प्रेम को सम्पूर्ण जगत में वितरित करना चाहते थे । श्रील प्रभुपाद ने भगवान् की सहायता करने का उत्तरदायित्व लिया। परन्तु यदि लोग इसे ग्रहण नहीं करते हैं, तो वे बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं। अतएव, हम इस महामारी के समय में प्रयास कर रहे हैं, लोगों को पवित्र नाम का जाप करना चाहिए। हम कुछ भौतिक लाभ के लिए पवित्र नाम का उपयोग नहीं करते हैं। हम सदैव कहते हैं, यदि भगवान् ऐसा चाहते हैं। यदि कोई किसी कठिनाई से बाहर आने के लिए भगवान् के पवित्र नाम की शरण लेता है, तो वह कुछ आपत्तिजनक हो सकता है। परन्तु जप, नाम जप न करने की अपेक्षा अपराध युक्त नामजप करना बेहतर है। यदि कोई वर्तमान में अपराध के साथ भगवान् के पवित्र नाम का जप करता है, तो भविष्य में वह अपराध रहित या विशुद्ध रूप से जप करेगा। काशी में लोग ब्रह्म, आत्मा, चैतन्य, माया, वगैरह शब्द उच्चारित करते थे किंतु उन्होंने भगवान कृष्ण का नाम उच्चारण नहीं किया । परंतु चैतन्य महाप्रभु चाहते थे कि हर कोई पवित्र नामों का जप करे । तो वे जप कर रहे थे तथा सभी सामान्य जन उनके साथ जुड़ गए। किन्तु मायावादी संन्यासी निर्विशेषवादी होने के कारण, उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्होंने भगवान् चैतन्य की निंदा की। इस प्रकार हमें किसी न किसी रूप में संसार के लोगों को जप कराना होगा ।
दक्षिण अमेरिका में, मैंने कहा कि वे भगवान् के किसी भी नाम का जाप कर सकते हैं, लेकिन हरे कृष्ण का जाप करना अपेक्षाकृत उत्तम है । तो एक ईसाई नन, उसने "जेसु क्रिस्टो, जेसु क्रिस्टो, क्रिस्टो क्रिस्टो, जेसु जेसु" का जाप करना शुरू कर दिया। और फिर उसने सोचा कि यह हरे कृष्ण के समान है, मैं हरे कृष्ण का प्रयास क्यों नहीं करती? हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम, हरे हरे! तब उसने अनुभव किया कि हरे कृष्ण महा मंत्र का जाप अधिक शक्तिशाली है। तो उसके बाद उन्होंने हरे कृष्ण महा-मंत्र जप का जाप करना प्रारम्भ किया । और फिर दीक्षा ली। वह अभी भी एक ईसाई नन है, परन्तु हरे कृष्ण का जप करती है तथा नियामक सिद्धांतों का पालन करती है। वैसे भी, हम नवद्वीप के पवित्र धाम में रह रहे हैं तथा यह वृंदावन से भिन्न नहीं है। जहाँ भी इस्कॉन मंदिर है, मंदिर के आसपास के एक निश्चित क्षेत्र को एक प्रकार का छोटा धाम माना जाता है। और भक्ति तीर्थ स्वामी ने यह दिखाया, जब उन्होंने गीता नगरी में अपना देह त्याग किया, वहाँ राधा दामोदर के श्री विग्रह है, जिसे श्रील प्रभुपाद ने स्थापित किया था। इसलिए किसी न किसी रूप में पवित्र स्थान में रहना चाहिए।
अब हम भद्र पूर्णिमा उत्सव मना रहे हैं। तथा हम पूरे विश्व में २५,००० भागवतम् सेट वितरित करने का प्रयास कर रहे हैं । वैशेषिक प्रभु ने इस लक्ष्य को स्थापित किया है। तो, हम भागवतम्-महात्म्य में पढ़ते हैं कि जहाँ भी श्रीमद्-भागवतम् है, वह कृष्ण का साहित्यिक अवतार है । और यह कि सभी देवता, हर कोई उनका दर्शन करने आता है जहाँ भागवतम् रखी जाती है। यदि हम किसी न किसी प्रकार से नवद्वीप या वृंदावन-धाम में निवास करने में सक्षम नहीं हैं, तो हमें कम से कम श्रीमद्-भागवतम् का एक सेट अपने घरों में रखना चाहिए। क्योंकि श्रीमद्-भागवतम् में भगवान की भक्तिमय सेवा के अलावा कोई अन्य निर्देश नहीं है। तो, चैतन्य महाप्रभु ने देवानंद पंडित से कहा, आप श्रीमद्-भागवतम् पर व्याख्यान दे रहे हैं, लेकिन आप भक्ति सेवा की महिमा का वर्णन नहीं कर रहे हैं। तो यह एक अपराध है, यह अर्थहीन है। तो आप श्रीमद्-भागवतम् का एक सेट लेकर अपने घर को धाम बना सकते हैं । यदि आपके पास धन नहीं है, तो कम से कम भागवतम् के कुछ श्लोक लिखें। यही कारण है कि बैक टू गॉडहेड पत्रिका में, उन्होंने कुछ भागवतम् श्लोकों को केंद्र में रखा है। सबसे उत्तम बात यह है कि श्रीमद्-भागवतम् का पूरा सेट लें तथा इसे नियमित रूप से पढ़ें।
तो हम देखते हैं कि कैसे हस्तिनापुर की महिलाएँ अपने महल की चोटी पर चढ़ गईं तथा भगवान् को देखकर अपनी प्रार्थना कर रही थीं। तो किसी भी तरह पुरुषों और महिलाओं, सभी को भगवान् कृष्ण की सेवा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए । मैं एक भक्त से मिला, उसने मुझसे कहा कि वह स्वर्ग में या संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्म लेना चाहता है! हम देखते हैं कि ब्रह्मांड में हर स्थल दुख का स्थान है। कुछ लोग जीवन की लंबी अवधि के लिए स्वर्गीय ग्रहों में जाते हैं लेकिन मृत्यु तथा बुढ़ापा वहाँ भी होता है। और बाद में पुनः इस ग्रह पर लौटना होगा। अमेरिका, हमने देखा है कि यह COVID-19 में नंबर 1 है! तो इस जगत में प्रत्येक स्थान, ब्रह्मांड में प्रत्येक स्थान दुख है।
मैंने एक दिन श्रील प्रभुपाद से कहा, कि मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ, जन्म -जन्मान्तर तक । उन्होंने कहा, तुम क्यों चाहते हो कि मैं यहाँ वापस आऊँ? तो फिर, मैंने उस वाक्य को परिवर्तित कर कहा, मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ, यहाँ तक कि इस जन्म के पश्चात् भी। मैं सोच रहा था कि मेरे सभी शिष्यों, पुरुषों तथा स्त्रियों, उन्हें आध्यात्मिक जगत में वापस जाना ही है। अब विश्व में 50% स्त्रियां हैं, 50% पुरुष हैं। भारत में लगभग 52% स्त्रियाँ और 48% पुरुष हैं या विपरीत क्रम में । तो मेरे सभी शिष्यों को एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करना चाहिए, उन्हें मेरी सहायता करनी चाहिए, उन्हें वापस भगवान् के धाम तक पहुँचाने में। चाहे बांग्लादेश हो या भारत या कहीं और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सभी अपने सनातन घर वापस भगवान् के पास जाते हैं। तथा सभी मुझे सहायता करे ताकि मैं मेरे गुरुभाइओं और गुरुबहिनों, और अन्य सभी को हरे कृष्ण का जप करने और प्रक्रिया को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकूँ।
अब स्थिति ऐसी है कि देखा जा रहा है कि कोई भक्तिमय सेवा कर रहा है तो कोई भक्तिमय सेवा छोड़ चुका है। जिन्होंने भक्तिमय सेवा छोड़ दी है, हमें प्रयत्न करने चाहिए कि वे सभी वापस आ जाएँ। जो जप कर रहे हैं, जो अनुशीलन कर रहे हैं, हमें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, हमें उन्हें अभ्यास करने और जारी रखने के लिए उत्साहित करना चाहिए। हमें भगवान् चैतन्य की कृपा का सुयोग अवसर मिला है। और श्रील प्रभुपाद वह पूरे संसार में गौर वाणी लाए। तो, भगवद् गीता में कृष्ण बताते हैं यदि कोई उनकी शरण लेंगे तो वे पवित्र सनातन धाम में वापस जाएँगे । वे स्त्री हों, वैश्य हों या शूद्र, वे कोई भी हों, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। तो यह विशेष भगवद् कृपा जो श्रील प्रभुपाद ने संपूर्ण विश्व में वितरित की, हमें बहुत आभारी होना चाहिए और इस खजाने को स्वीकार करना चाहिए । भगवद् गीता तथा श्रीमद्-भागवतम् पढ़ें। मैं उन भक्तों का बहुत आभारी हूँ जो भागवतम् तथा भगवद् गीता का वितरण कर रहे हैं। इस प्रकार मानव जीवन सफल होता है। हस्तिनापुर की महिलाएँ कह रही हैं कि द्वारका वासी कितने भाग्यशाली हैं। वे भगवान कृष्ण के सुंदर, मृदु हास्य पूर्ण मुखारविंद को देखकर अपने जीवन को पूर्ण रूप से सफल बनाने में सक्षम हैं। तो हमें भगवान् चैतन्य की इस विशेष कृपा को ग्रहण करना चाहिए । हमें स्मरण है कि कैसे यह संसार दुखों का स्थान है।
भक्तिमय सेवा में संलग्न होकर, हम अपने शाश्वत निवास, भगवद धाम में पुनः जा सकते हैं। यह श्रील प्रभुपाद द्वारा किया गया विशेष बलिदान था। मैंने देखा कि कैसे मायापुर में, श्रील प्रभुपाद प्रत्येक रात्रि को उठते थे और अनुवाद करते थे, अपने तात्पर्य लिखते थे। वे रात्रि 12 बजे उठते थे और रोज प्रातः 4 बजे तक लिखते थे। उसके बाद वह अपना जप करते और फिर बाहर प्रातः भ्रमण के लिए जाते। अब हमारे पास ये पुस्तकें श्रील प्रभुपाद द्वारा लिखी गई हैं । हमें इनका अत्यंत ध्यानपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। तो मैं कुछ प्रश्न लूंगा।
नारु गोपाल दास: आज आपने बताया कि आप कैसे चाहते हैं कि आपके सभी शिष्य भगवान् के पास वापस जाएँ और आप चाहते हैं कि वे बिना किसी अपराध के जाप करें। और मेरा प्रश्न यह है कि यदि पति और पत्नी दोनों दीक्षित शिष्य हैं, और यदि पति पत्नी को पीटता है या उसे कुछ मानसिक उत्पीड़न देता है, या उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है, या शारीरिक रूप से कभी-कभी उसे इस तरह पीटा जाता है इस हद तक कि उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, ऐसे मामलों में, क्या पति वैष्णव अपराध कर रहा है? या नहीं और यह गुरु को कैसे प्रभावित करता है?
जयपताका स्वामी: निश्चित रूप से यदि कोई वैष्णवों पर अत्याचार कर रहा है, तो वह वैष्णव अपराध है। यदि कोई इस तरह से कार्य करेगा, तो वह वापस भगवान् के पास, वापस भगवान के पास कैसे जाएगा? भागवतम् हमें बताता है कि एक पति को कभी भी पत्नी के साथ इस तरह से लड़ाई या झगड़ा नहीं करना चाहिए। लेकिन कई बार महिलाएँ थोड़ा भावुक हो जाती हैं। परंतु पुरुष का यह कर्तव्य है कि वह उस निचले स्तर पर न आए। मैंने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश नहीं किया है, मैंने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन शास्त्र कहते हैं कि जब एक मनुष्य इस तरह की स्थिति में होता है, तो उसे उस जगह को छोड़ देना चाहिए, बाहर जाना चाहिए, अपना मस्तिष्क शांत करना चाहिए और फिर घर लौट जाना चाहिए।
दूसरा प्रश्न?
प्रश्न बांग्ला में: आपने कक्षा में उल्लेख किया है कि अपराध के साथ भी पवित्र नामों का जाप करना ही चाहिए, क्योंकि यह पवित्र नामों का जप न करने से उत्तम है। मेरा प्रश्न यह है कि कभी-कभी जब हम वरिष्ठ वैष्णवों से बात कर रहे होते हैं, तो कभी अनजाने में या हम बिना चाहे भी, कभी-कभी हम शिष्टाचार तोड़ देते हैं। तो क्या ऐसी स्थिति में हम अपराध के घेरे में आते हैं?
जयपताका स्वामी: आप जो तुलना कर रहे हैं, मैं उसे समझ नहीं पा रहा हूँ, क्योंकि मैंने जप के विषय में बात की थी, और आप इसकी तुलना वैष्णव अपराध से कैसे कर सकते हैं? यदि आपको लगता है कि आपने कोई अपराध किया है, तो आप उस वैष्णव के पास जा सकते हैं तथा क्षमा माँग सकते हैं।
प्रश्न अखिल प्रभु: जीवन में कभी-कभी ऐसी कई अनसुलझी समस्याएँ होती हैं, जो हमें इतना अशांत करती हैं, और भगवान की कृपा के बिना हम उनसे छुटकारा नहीं पा सकते हैं। तो उस स्थिति में यदि हम पवित्र नाम का आश्रय लेते हैं और हमारी सहायता के लिए प्रार्थना करते हैं, तो क्या यह भी आपत्तिजनक है?
जयपताका स्वामी: तो हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हम शुद्ध भक्तिमय सेवा करें, यह अपमानजनक नहीं है। यदि हम कहते हैं कि हम पतित हैं और हम पूर्णता की अवस्था तक पहुँचना चाहते हैं, तो यह आपत्तिजनक नहीं है। यदि हम नामजप से कुछ भौतिक लाभ चाहते हैं, तो यह एक व्यवसाय की तरह है, यह आपत्तिजनक है । परन्तु यदि कोई संतान माता-पिता से संपर्क करते है कि वे कुछ सहायता करना चाहते हैं, या हो सकता है कि वे इस कारण नही आ रहे हैं कि वे सेवा करना चाहते हैं, लेकिन माता-पिता प्रसन्न हैं कि वे कम से कम किसी कारण से आ रहे हैं। अंतिम प्रश्न।
प्रश्न बंगाली में: सुकमल नित्यानंद दास, हबीबगंज: आपने कहा था कि हर कोई जो नवद्वीप-धाम में रहता है या रहना चाहता है, उनके घरों में श्रीमद्-भागवतम् का एक सम्पूर्ण सेट होना चाहिए। तो यदि किसी के पास श्रीमद्-भागवतम् का एक सेट है, तो क्या इसका मतलब यह है कि उस घर में पवित्र धाम की महिमा स्थापित हो रही है?
जयपताका स्वामी: कुछ सीमा तक वह भी एक धाम है। परंतु यह तुलना इस प्रकार नहीं है। हम जानते हैं कि यदि हम नवद्वीप-धाम में कुछ सेवा कर रहे हैं, तो हमें हजार गुना लाभ मिलता है । शास्त्र कहते हैं कि यदि किसी के पास श्रीमद्-भागवतम् है, तो उस स्थान की तुलना धाम से की जाती है। किन्तु सटीक तुलना या मात्रा की व्याख्या नहीं की गई है। तो इस तरह, कम से कम यदि श्रीमद्-भागवतम् है, तो घर शुद्ध हो जाता है । तो अब हम कुछ मंदिरों के दर्शन करेंगे तत्पश्चात् कुछ घरों को देखने जाएंगे।
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