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20210626 श्रीमद्-भागवतम् 1.9.23

26 Jun 2021|Duration: 00:49:03|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुं दीन- तारणम्
परमानन्द माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीमद्-भागवतम् 1.9.23 के पाठ के साथ प्रवचन प्रारम्भ होता है:

भक्त्यावेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन्।
त्यजन् कलेवरं योगी मुच्यते कामकर्मभिः ॥

वे पुरुषोत्तम भगवान् जो एकाग्र भक्ति तथा ध्यान से एवं हरिनाम के कीर्तन से भक्तों के मन में प्रकट होते हैं, वे उन भक्तों को उनके द्वारा भौतिक शरीर छोड़ते समय सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त कर देते हैं।

तात्पर्य कृष्णकृपामूर्ति ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा : योग का अर्थ है अन्य समस्त विषयों से अनासक्त होकर मन को केन्द्रित करना और वास्तव में ऐसी एकाग्रता समाधि है या भगवान् की सेवा में शत-प्रतिशत अनुरक्ति है। जो इस प्रकार अपने चित्त को एकाग्र करता है, वह योगी कहलाता है। भगवान् का ऐसा योगी भक्त, भगवान् की सेवा में प्रतिदिन चौबीसों घण्टे लगा रहता है। फलस्वरूप उसका सारा ध्यान नवधा भक्ति में भगवान् के चिन्तन में लगा रहता है। नवधा भक्ति में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, स्तुति, दास्य-भाव, आज्ञा-पालन, सख्य-भाव या पूर्ण समर्पण सम्मिलित हैं। योग के ऐसे अभ्यास से अर्थात् भगवान् की सेवा द्वारा उनसे जुड़ने से भगवान् द्वारा मान्यता मिलती है, जैसाकि समाधि की सर्वोच्च स्थिति का वर्णन करते हुए भगवद्गीता में स्वयं भगवान् व्याख्या करते हैं। भगवान् ऐसे विरले भक्त को योगियों में श्रेष्ठ बतलाते हैं। भगवत्कृपा से ऐसा पूर्ण योगी अपना मन पूर्ण चेतना से भगवान् में एकाग्र करता है और इस प्रकार शरीर त्यागने के पूर्व उनके नाम का कीर्तन करने से वह भगवान् की अन्तरंगा शक्ति द्वारा तुरन्त ऐसे लोक को भेज दिया जाता है, जहाँ भौतिक जीवन तथा उससे सम्बन्धित कारणों का प्रश्न‍ ही नहीं उठता। भौतिक अस्तित्व में जीव को अपने सकाम कर्मों के अनुसार जन्म-जन्मान्तर तीन प्रकार के कष्टों की भौतिक स्थिति को सहना होता है। ऐसा भौतिक जीवन जीव की भौतिक इच्छाओं के ही कारण उत्पन्न होता है। भगवान् की भक्तिमय सेवा से जीव की स्वाभाविक इच्छाओं को मारा नहीं जाता, अपितु वे भक्तिमय सेवा के सही कार्य में लगाई जाती हैं। इससे इच्छाओं में वैकुण्ठ में स्थानान्तरित होने की योग्यता आ जाती है। यहाँ पर सेनापति भीष्मदेव विशेष प्रकार के योग का उल्लेख कर रहे हैं, जिसे भक्तियोग कहते हैं और वे भाग्यशाली थे कि भौतिक शरीर को त्यागने के पूर्व अपने समक्ष साक्षात् भगवान् को उपस्थित देख रहे थे। अतएव अगले श्ल‍ोकों में उन्होंने इच्छा व्यक्त की है कि भगवान् उनकी द‍ृष्टि के समक्ष बने रहें।

जयपताका स्वामी महाराज : तो जब भीष्मदेव बाणों की शय्या पर लेटे थे, युधिष्ठिर और अन्य पांडव उस समय उपस्थित थे। वे सीधे भगवान् श्रीकृष्ण को देख रहे थे। अतः इस तरह, क्योंकि श्रीकृष्ण मृत्यु के समय उनके सामने उपस्थित थे, वे अत्यंत प्रसन्न थे। वे यह भी देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए कि युधिष्ठिर और पांडव राजकीय स्थिति में थे। भीष्मदेव ने युधिष्ठिर को उपदेश दिया, यह सब विधि के विधान से हुआ है। श्रीकृष्ण की योजना को कोई नहीं जान सकता। कभी-कभी भक्त सोचते हैं कि यदि मैं भक्त बन गया, तो मुझे अब कोई समस्या नहीं होगी। किंतु जबतक हम इस भौतिक संसार में हैं, तबतक समस्याएँ रह सकती हैं। अतः, हमें समझना चाहिए कि यह भौतिक जगत हमारे निवास का स्थान नहीं है। और भगवान् का चिंतन करके, भगवान् का ध्यान करके, भगवान् के पवित्र नामों का जाप करके हम आध्यात्मिक जगत में वापस जा सकते हैं। मानव जीवन दुर्लभ अवसर है जो भगवान् को वापस पाने के लिए दिया जाता है। यदि हम स्वर्गलोक में हैं जहाँ पर अपार मात्रा में इन्द्रियतृप्ति होती है, तो इससे हम भगवान् को भूल जाते हैं। और नरक लोक में दंड इतने कठोर हैं कि हम भगवान् का स्मरण नहीं कर सकते। अतः, इस मध्य लोक में मनुष्य के लिए किसी-न-किसी प्रकार का सुख-दुख मिश्रित है। इसलिए, भगवान् के पास वापस जाने का यह एक सुयोग्य अवसर है। और यदि हम भक्तिमय सेवा करते हैं, तो हम अपने जीवन, अपने मिशन को पूर्ण कर सकते हैं। भक्तिमय सेवा की नौ विधाएं हैं। नवद्वीप धाम का प्रत्येक द्वीप भक्ति के नवविधाओं में से एक से जुड़ा हुआ है। भगवान् चैतन्य ने भक्तिमय सेवा की इन्हीं विधाओं की शिक्षा दी। विशेष रूप से भगवान् के पवित्र नामों का कीर्तन। अतः, हमें चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन आंदोलन का लाभ उठाना चाहिए। पवित्र नाम का जप-कीर्तन करके हम भगवान् को उपस्थित कर सकते हैं। वहाँ श्रीकृष्ण उपस्थिति का भीष्मदेव लाभ उठा रहे थे। यदि हम किसी भी क्षण मृत्यु को प्राप्त करते हैं, तो हम भगवान् के पवित्र नाम का जाप करना स्मरण कर सकते हैं। यदि भक्त हर समय भगवान् के पवित्र नाम का जप-कीर्तन करता है, तो मृत्यु के समय भगवान् भक्त को अपना स्मरण कराने में सहायता करते हैं।

चैतन्य महाप्रभु ने हमें ऐसी कृपा प्रदान की है। अब लोगों को बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए। हमें भक्ति योग का अभ्यास करना चाहिए और भगवद्धाम घर वापस जाना चाहिए। मैंने एक बार श्रील प्रभुपाद से कहा था कि मैं जीवन-पर्यंत आपकी सेवा करना चाहूँगा। उन्होंने कहा, "तुम मुझे वापस क्यों लाना चाहते हो?" मैंने सोचा ओह, क्या मैंने सही कहा था? तथापि मुझे क्या कहना चाहिए? तो मैंने कहा कि "मैं जन्म-दर-जन्म आपकी सेवा करना चाहता हूँ"। तब वे मुस्कुराए। अतः, हमें इस मानव जन्म का लाभ उठाना चाहिए और भक्ति योग का अभ्यास करना चाहिए। भौतिक संसार में बहुत-से लोग केवल इन्द्रियतृप्ति में ही व्यस्त रहते हैं। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि वे पशुओं का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किन्तु, उस जीवन शैली के साथ यदि वे कृष्णभावनामृत भी थोड़ा सा जोड़ सकते हैं, तो सभी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। स्वयंभु मनु के पास सभी भौतिक सुख और सुविधाएं थीं। किन्तु, क्योंकि उन्होंने कृष्णभावनाभावित तरीके से भौतिक भोग किया था, उनका उद्धार हो गया।

मैंने कई मंदिरों में स्नान-यात्रा उत्सव का आयोजन, भगवान् जगन्नाथ का स्नान उत्सव, चिड़ा दही उत्सव आदि का बहुत अच्छे से आयोजन करते देखा। इस प्रकार, यदि हम भक्तिमय सेवा करते हैं, तो हमारा जीवन मंगलमय हो जाएगा। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि लोग मंदिरों में सेवा करें और अपने घर में भी गृहस्थ भगवान् के अर्चा-विग्रह की सेवा कर सकते हैं। ऐसे कई घर हैं जहाँ भगवान् की अत्यंत सुचारु रूप से सेवा की जाती है। इस प्रकार, यदि हम अध्यात्म का ऐसा अभ्यास करते हैं, तो हमारा मानव जीवन सफल हो जाएगा। धर्म की कोई भी विधि भगवत्प्रेम की ओर अग्रसर करनी चाहिए। अतः, यही मूल परीक्षा है। क्या हम कृष्ण-प्रेम विकसित कर रहे हैं ?

एक संन्यासी अद्वैत आचार्य से मिलने आए। और उन्होंने पूछा कि केशव भारती के साथ भगवान् चैतन्य महाप्रभु का क्या संबंध है ? तब अद्वैत आचार्य सोच रहे थे कि मैं क्या कहूँ। फिर उसने सोचा कि मैं बाह्य तरीके से बोलूंगा। और फिर उन्होंने कहा कि भगवान् चैतन्य महाप्रभु केशव भारती के शिष्य हैं। अद्वैत आचार्य के सबसे बड़े पुत्र अच्युतानंद थे। उस समय उनकी आयु लगभग पांच वर्ष ही थी। यद्यपि वे वस्त्रहीन थे और उनका शरीर धूल से सना हुआ था, तथापि जब उन्होंने सुना कि उनके पिता ने कहा कि भगवान् चैतन्य के गुरु हैं तो वे क्रोधित होकर वहाँ आ गए। उन्होंने आकर कहा, “भगवान् चैतन्य महाप्रभु पूर्ण सर्वोत्तम भगवान् हैं, कोई उनका गुरु कैसे हो सकता है? वे ही सबके गुरु है! ब्रह्मदेव ने उनसे आध्यात्मिक तत्व सीखा है!” वे अपने पिता पर बहुत क्रोधित हुए और कहा कि आप इस तरह क्यों बोल रहे हैं? किन्तु अद्वैत आचार्य अपने नन्हे पुत्र की सारी भक्ति देखकर अत्यंत आनंदित थे। मेरा एक पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्त बन गया है, हरि बोल! हरि हरि हरि बोल! गौरहरि! अतः, उन्होंने अपने पुत्र से क्षमा याचना की और कहा कि मैं ऐसा फिर कभी नहीं कहूँगा। फिर उन्होंने पुत्र का आलिंगन किया और अपने वक्षस्थल से चिपकाया, उसे अपनी गोद में बिठाया और अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। आगंतुक संन्यासी ने कहा कि मैंने कभी किसी बालक को ऐसा तत्त्वज्ञान बोलते हुए नहीं देखा और पिता को अपने बालक से क्षमा माँगते हुए नहीं देखा। अतः, उन्होंने झुककर प्रणाम किया और स्वयं को अत्यंत कृतज्ञ अनुभव किया।

अतः, हमारे पास भगवान् चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों की ये सभी लीलाएँ हैं। उनके कोई भौतिक रूप नहीं है, वे सभी अलौकिक हैं। अतः, हम इन लीलाओं का स्मरण कर सकते हैं। तब भगवान् चैतन्य अपने पार्षदों के साथ जगन्नाथ पुरी से ठीक उसी समय अद्वैत आचार्य के घर आए थे। वैसे भी, अद्वैत आचार्य भगवान् चैतन्य को अपने घर में पाकर अत्यंत प्रसन्न थे। और स्त्रियों ने उलू ध्वनि की। और पुरुषों ने की जय ध्वनि! हरि बोल! तब भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अच्युतानंद से कहा कि अद्वैत आचार्य मेरे पिता के समान हैं, अतः हम भाई हैं। फिर उन्होंने अच्युतानंद को अपनी गोद में ले लिया, हालाँकि वह धूल से लथपथ था परंतु भगवान् ने उस पर अपनी कृपा वृष्टि की। तब अच्युतानंद पर भगवान् चैतन्य का इतना आशीर्वाद था। अच्युतानंद जगन्नाथ पुरी गए और उन्होंने गदाधर पंडित से शिष्यत्व स्वीकार किया।

अद्वैत आचार्य की छह संतानें थी। तीन भक्त थे, तीन स्मार्त ब्राह्मण थे। अतः, इसका कोई आश्वासन नहीं है कि आपके सभी संतान भक्त होंगे। किन्तु माता-पिता को अत्यंत सावधान रहना होगा और वे कृष्ण भावनाभावित संतान उत्पन्न करने का प्रयास कर सकते हैं। शुभ समय का ध्यान करें। एकादशी, अष्टमी, पूर्णिमा, अमावस्या, इन तिथियों पर शिशु को गर्भ धारण करने से मना किया जाता है। उपवास के दिनों और उत्सव के दिवस भी ऐसा करने से मना किया जाता है। अतः, कृष्णभावनाभावित, स्वस्थ और दीर्घायु पुत्र प्राप्त करने के लिए भगवान् के चरण कमलों में प्रार्थना करनी चाहिए। निस्संदेह, केवल गृहस्थ ही इस यज्ञ को कर सकते हैं। किन्तु हम उन्हें कृष्णभावनाभावित संतति के प्रयास के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इस तरह श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और उनकी धर्मपत्नी ने भगवान् जगन्नाथ से प्रार्थना की और परिणाम स्वरूप कृष्णकृपामूर्ति भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर प्रकट हुए। बहुत से लोगों की ऐसी संतानें हैं जो भक्त नहीं हैं। हमें कृष्ण भावनाभावित संतति उत्पन्न करने के लिए गृहस्थ भक्तों की आवश्यकता है। मैंने विभिन्न क्षेत्रों से सुना है कि हमारे भक्त बच्चे बहुत शांत और आज्ञाकारी हैं। हमने सुना है कि कैसे भारत के स्कूलों में छात्र बहुत उद्दंड और उत्तेजित होते हैं।

अतएव युधिष्ठिर एवं उनके भाई, कृष्ण, वे सभी भीष्मदेव के समक्ष उपस्थित थे। कई ऋषि, साधु-संत एवं ऋषि-मुनि भी उपस्थित थे। इस प्रकार, भीष्मदेव जैसे महान आत्मा भगवान् के सम्मुख थे; अतः इस प्रकार के सुंदर आध्यात्मिक वातावरण में वे निश्चित रूप से आध्यात्मिक जगत वापस जाएंगे। इसलिए, वे सभी इसका साक्षी बनना चाहते थे।

जो भी हो, कोरोना वायरस के इस समय में कई लोग संसार त्यागकर जा रहे हैं। हम पवित्र नाम का कीर्तन करके उन्हें आध्यात्मिक जगत वापस जाने में मदद करना चाहते हैं। इस प्रकार, बहुमूल्य मानव जीवन का उपयोग करें। हम कोरोना वायरस से भले ही बच जाएं, परन्तु येन-केन प्रकारेण हमें शरीर का त्याग करना ही होगा। अतः, हमें भीष्मदेव से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने कृष्णभावनाभावित भावना में इस संसार का त्याग किया; ताकि हम इस भौतिक जगत में पुनः जन्म न लें। अतः, वस्तुतः यही श्रील प्रभुपाद की इच्छा थी, इस हेतु उन्होंने बैक टू गॉडहेड पत्रिका (भगवद्दर्शन / भगवद्धाम वापसी) का निर्माण किया है।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by हिंदी अनुवाद दिनेश उपाध्याय द्वारा
Verifyed by अजीत मधुसूदन दास द्वारा सत्यापित
Reviewed by धर्मात्मा निमाइ दास द्वारा समीक्षित

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