Text Size

20210616 प्रश्नोत्तर सत्र परम पुज्य श्रील जयपताका स्वामी के साथ

16 Jun 2021|हिन्दी|प्रश्नोत्तर सत्र|Transcription|Śrī Māyāpur, India

16 जून 2021| अंग्रेज़ी |प्रश्न और उत्तर सत्र|श्री धाम मायापुर, भारत

इस श्लोक पर अब हमारे पास 10 मिनट प्रश्नोत्तर के लिए होंगे।

प्रश्न : गोपति कृष्ण दास, मायापुर - चैतन्य-चरित-महाकाव्य में यह उल्लेख किया गया है कि भगवान् चैतन्य राघव पंडित के घर में छह दिवस तक रहे, किन्तु चैतन्य-चरितामृत में इसका उल्लेख एक दिवस के रूप में किया गया है। किन्तु तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद ने कहा है कि चैतन्य-चरित-महाकाव्य, चैतन्य-चन्द्रोदय-नाटक, चैतन्य-भागवत् जैसे अन्य शास्त्रों में अधिक विवरण दिया गया है। तो हमें किसे अधिक प्रामाणिक स्वीकार करना चाहिए?

जयपताका स्वामी: कभी-कभी विभिन्न शास्त्रों में विवरण में यह अंतर होता है। परंतु सामान्यतः, हम चैतन्य-चरितामृत को अधिक आधिकारिक संस्तुति के रूप में स्वीकार करते हैं । किन्तु लीलाओं के कुछ भागों में जो अन्य पुस्तकों में वर्णित हैं, कृष्णदास कविराज कहते हैं कि वे किसी अन्य लेखक के प्रति अपराध नहीं करना चाहते हैं। अतः, हम वास्तव में विवरणों को अधिक गंभीरता से नहीं लेते हैं। हम जानते हैं कि भगवान् चैतन्य राघव पंडित के घर में रहे और चैतन्य-चरितामृत में बताया हैं एक दिवस रहे , अन्य ग्रंथ छह दिवस कहते हैं, परंतु हम निश्चित रूप से जानते हैं कि वे राघव पंडित के घर में रहे, सभी ऐसा कहते हैं । इस समय हमें क्या अंतर पड़ता है एक दिवस हो या छः दिवस ?

प्रश्न : लक्ष्मी राधा देवी दासी- भगवान् चैतन्य ने पुरंदर को पिता के रूप में संबोधित किया? इसका क्या महत्व है? जैसे पुंडरीक विद्यानिधि को भी बुलाया गया था और वे वास्तव में राधारानी के पिता वृषभानु थे। इसी प्रकार पुरंदर आचार्य कौन हैं?

जयपताका स्वामी: रोचक प्रश्न! हम जानते हैं कि भगवान् चैतन्य के पिता जगन्नाथ मिश्र को पुरंदर भी कहा जाता था। भगवान् चैतन्य ने पुरंदर आचार्य को पिता क्यों कहा, मुझे इसका शोध करना होगा

प्रश्न: व्रज विलास गौरांग दास, बोगोटा, कोलंबिया, दक्षिण अमेरिका - भक्तों की गतिविधियों को समझना अत्यंत कठिन है। भक्तों को साधारण समझे बिना हम उनके साथ कैसे जुड़ सकते हैं?

जयपताका स्वामी: तथ्य यह है कि इस संसार में ऐसे अल्प जनसमूह हैं जो हरे कृष्ण का जप करते हैं, और भगवान् को समर्पित हैं। तो आप क्यों सोचते हैं कि वे साधारण हैं? तथ्य यह है कि वे भक्त हैं, इसका अर्थ है कि वे विशेष हैं! और आपका प्रश्न ही इसका उत्तर भी देता है! कि भक्तों की गतिविधियों को समझना जटिल है। क्योंकि अंततः वे कृष्ण की सेवा करना चाहते हैं, अतः उन्हें विशेष माना जाता है, भले ही वे कुछ अनोखा कार्य कलाप क्यों न करें ।

प्रश्न: शांता गोपी देवी दासी: तमिल में - श्रीवास ठाकुर नारद मुनि के अवतार हैं। हरिदास ठाकुर ब्रह्मा के अवतार हैं। गौर लीला में उनका संबंध कैसा था, क्या गुरु-शिष्य जैसा था?

जयपताका स्वामी: हम जानते हैं कि हरिदास ठाकुर अद्वैत गोसाईं के निकट थे। वे अद्वैत आचार्य के साथ थे जब भगवान् चैतन्य अवतरित हुए, और वे जगन्नाथ पुरी गए जब भगवान् चैतन्य वहाँ थे। और फिर वे जगन्नाथ पुरी में रहे और भगवान् चैतन्य प्रतिदिन उनसे मिलने जाते थे। तो श्रीवास और हरिदास ठाकुर के बीच इतना संबंध नहीं था । परंतु हम जानते हैं कि भगवान् नित्यानंद , हरिदास ठाकुर के संग प्रचार करने जाते थे। और भगवान् नित्यानंद श्रीवास के अत्यंत घनिष्ट थे । तो, श्रीवास और हरिदास के मध्य कुछ वार्तालाप रहा होगा, परंतु इतना औपचारिक नहीं, जैसे गुरु और शिष्य के मध्य होता है ।

प्रश्न: राजेंद्र नागुलापल्ली, यूके- हम उस लीला को कैसे समझते हैं कि भगवान् चैतन्य ने राजा प्रतापरुद्र पर कृपा करने में इतना समय लिया परंतु नशे में धुत मुस्लिम राज्यपाल को उनकी कृपा इतनी सरलता से प्राप्त हुई?

जयपताका स्वामी: आप समझ सकते है कि एक राजा वह एक अद्वितीय स्थिति में होता है, वह राज्य का शासक है। और एक शासक के रूप में उसके पास सभी प्रकार की भौतिक सुविधाएँ हैं। भगवान् चैतन्य चूँकि एक सन्यासी थे, उन्हें राज्य के मुखिया से नहीं मिलना चाहिए। किन्तु राज्यपाल, वह राज्य का मुखिया नहीं है, वह एकमात्र राजा के राज्य के एक भाग की देखरेख करता है, और वह भगवान् चैतन्य के पास आया, झुककर प्रणाम किया और कृष्ण के नाम का जप करने लगा। तो इस प्रकार रामानन्द राय के समान वे एक राज्यपाल थे । तो सामान्यतः भगवान् चैतन्य राज्यपालों से मिलते थे परंतु वे राजाओं से नहीं मिलेते थे । परंतु फिर जब राजा प्रतापरुद्र ने भगवान् जगन्नाथ के सामने स्वयं को हीनभाव में प्रदर्शित किया, मार्ग को बुहारा, आदि, तो स्वाभाविक रूप से भगवान् चैतन्य उनके प्रति मृदु हो गए।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रतिलेखन का हिंदी अनुवाद : शशि मुखी केशवी देवी दासी
Verifyed by सत्यापित : प्रितीवर्धिनी तुलसी देवी दासी
Reviewed by समीक्षित : भवानन्दिनी देवी दासी

Lecture Suggetions