श्री श्रीमद् जयपताका स्वामी का इस्कॉन अरुप्पुकोट्टै भक्तों के मध्य एक ज़ूम सत्र ,28 दिसंबर 2020, श्रीधाम मायापुर, भारत में।
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ओम् तत् सत्
भगवान् चैतन्य ने छः वर्ष दक्षिण भारत का भ्रमण किया । सम्भवतः वे आपके घर भी पधारें हो। भगवान् चैतन्य की कृपा से, कोई भी सरलता से कृष्ण प्रेम प्राप्त कर सकता है । वे प्रतिदिन भिन्न भिन्न घरों में ठहरते थे । गृहस्थ उनके चरण पखारते व उन्हें प्रसाद अर्पित करते । वह बैठते तथा परिवार से चर्चा करते, पड़ोसियों और ग्रामीणों से बात करते, तत्पश्चात् चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ उपस्थित लोगों से कहा "यारे देखो, तारे कहो 'कृष्ण-उपदेश' - जिसे भी आप देखते हो, आप उन्हें भगवान् श्री कृष्ण का उपदेश सुनाओ। अतः उन्होंने सभी को गुरु बनने व भगवान् श्री कृष्ण के संदेश को वितरित करने का आदेश दिया । भगवान् कृष्ण और उनका नाम अभिन्न हैं ।
तो, भगवान् चैतन्य का संदेश था कि सभी को हरे कृष्ण महा-मंत्र का जप करना चाहिए । अतः वे सभी को स्वतंत्र रूप से करुणा प्रदान कर थे, लेशमात्र भी बिना भेद भाव किए कि कौन योग्य है, कौन नहीं, भगवान कृष्ण का शुद्ध प्रेम वितरित कर रहे थे । कभी-कभी उन्हें प्रेम-अवतार के रूप में जाना जाता है, क्योंकि वह मुक्तहस्त से भगवान कृष्ण का प्रेम वितरित करते हैं । अतः हम आशा करते हैं कि आप सभी को भगवान् चैतन्य की कृपा प्राप्त होगी। उनकी कृपा से कोई भी भगवान् जगन्नाथ की कृपा प्राप्त कर सकता है या श्रीमती राधा और भगवान् श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकता है। उन्होंने स्वयं को भगवान् कृष्ण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया । क्योंकि कृष्ण केवल तीन युगों - सत्य, त्रेता व द्वापर में स्वयं को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में प्रस्तुत करते हैं। किन्तु चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्री कृष्ण हैं जो एक गुप्त अवतार या छद्म अवतार के रूप में अवतरित हुए हैं । वह युग-धर्म को वितरित करने के लिए अवतरित हुए थे । युग-धर्म, विशेष रूप से हरि के नामों का जप करना है।
तो, हम अत्यंत प्रसन्न हैं कि आप कृष्ण के नाम का जप कर रहे हैं । हमने आपकी रथ-यात्रा के दर्शन किए ।कैसे आप भगवान् जगन्नाथ को लेकर आ रहे हैं और श्री कृष्ण के नामों का जप कर रहे हैं । सभी देवता भगवान् के दास हैं। हम सभी देवताओं को अधिकाधिक सम्मान प्रदान करते हैं, और उन्हें भक्तों के रूप में भी सम्मान देते हैं, किंतु हमें यह देखना चाहिए कि कोई भी श्री कृष्ण के समान या उनसे श्रेष्ठ नहीं है । वे सभी देवताओं द्वारा पूज्य हैं , और वे सभी पर अपनी कृपा करते हैं। भगवान् शिव के अवतार - अद्वैत गोस्वामी, सदाशिव तथा महा-विष्णु के संयुक्त अवतार हैं।
इस कलियुग में, हम सोचते हैं कि हम यह शरीर हैं। किन्तु भगवान् चैतन्य ने हमें सिखाया की हम शाश्वत आत्मा हैं। यह श्रीमद् भगवत् गीता की शिक्षा है । तो, हम आशा करते हैं कि आप सभी हरे कृष्ण महामंत्र का जप करके शुद्ध कृष्ण भावनामृत प्राप्त कर सकते हैं। कृष्णे मतिर अस्तु ! आपको कृष्ण का प्रेम प्राप्त हो । सामान्यतः इस भौतिक जगत में, चूंकि हम शरीर के रूप में जाने जाते हैं, शरीर कभी प्रसन्न होता है, और कभी अप्रसन्न होता है। मैंने यूके में जूम के माध्यम से एक शिष्य को देखा, वह शिष्य कोविड के नवीन स्ट्रेन से पीड़ित था। वह अत्यंत पीड़ा में था। मैं प्रार्थना करता हूं कि सभी भक्त शीघ्र स्वस्थ हो जाएं। हम सभी से अत्यंत सावधान रहने को कह रहे हैं। उसी क्षण साथ साथ ,पवित्र नाम का जप करें। हमने सुना है कि अत्यधिक लोग ऑनलाइन कार्यक्रम कर रहे हैं। हम बेंगलुरु के कार्यक्रम में ऑनलाइन गए, उन्होंने 800 लोगों को पंजीकृत किया था, इस कारण इस महामारी की अवधि में इंटरनेट द्वारा प्रचार को विस्तृत करना संभव है। लोग विकल्प की खोज कर हैं। वे अधिक उन्मुक्त हैं।
तो हमें ज्ञात हैं कि यह भौतिक जगत स्थायी रूप से निवास करने योग्य नही है । जीवन के अंत में, हमें आध्यात्मिक जगत में पुनः जाना चाहिए, और यही जीवन का लक्ष्य है । भक्तिमय सेवा में संलग्न होना तथा वैकुण्ठ लोक पुनः जाना। कुछ दिवस पूर्व वैकुण्ठ एकादशी थी । वह दिवस था जब भगवद् गीता बोली गयी थी । यदि हम भगवत् गीता का अध्ययन करते हैं तो हम निश्चित रूप से वैकुण्ठ जाएंगे । तो भगवद् गीता वास्तव में वैकुंठ का गुप्त द्वार है । अतः वैसे भी, हरे कृष्ण का जप करें व प्रसन्न रहें ।
हरे कृष्ण!
मैं अधिक नहीं बोलना चाहता क्योंकि समय सीमित है, और हमें अन्य घरो में भी जाना है।
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