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20201226 यूरोपीय भक्तों के साथ एक ज़ूम सत्र निम्नलिखित

26 Dec 2020|Duration: 00:12:28|हिन्दी|Zoom Sessions|Transcription

जयपताका स्वामी :

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

कृष्ण कृपा मूर्ति श्री श्रीमद् अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, इस कृष्ण भावनामृत आंदोलन को पश्चिम में ले आए। उन्होंने मुझे यात्रा करने और प्रचार करने का आदेश दिया। वास्तव में, उन्होंने सभी संन्यासियों को ऐसा करने के लिए कहा था। मैं उस समय उपस्थित संन्यासियों में एक संन्यासी हूँ। तो, मैंने श्रील प्रभुपाद के आदेश पर विश्व भर की यात्रा की और विभिन्न देशों का भ्रमण किया। तो , मैंने स्पेन, फ्रांस, लिथुआनिया, लातविया, इटली और विभिन्न देशों का भ्रमण किया । कुछ ही देश ऐसे है जहां मैं नहीं गया। परंतु बात यह थी कि हमने देखा कि कैसे भगवान् चैतन्य की कृपा सभी के लिए है। अब महामारी के कारण हम यात्रा नहीं कर पा रहे हैं, मेरे लिए यात्रा करना अत्यंत भयावह है। अतएव, मैं यहाँ मायापुर में रह रहा हूँ ।

परंतु प्रत्येक रात्रि, मैं पूरे विश्व के विभिन्न समूहों का भ्रमण करता हूँ। आज रात्रि , मैं यूरोप का भ्रमण कर रहा हूँ। कल अमेरिका, इस प्रकार प्रत्येक दिवस किसी अन्य स्थान पर भ्रमण करता हूँ । कृष्ण की कृपा से, यद्यपि, हम मायापुर में हैं, हम वही कर रहे हैं जो प्रभुपाद ने कहा था, “पूरे विश्व में प्रचार कर रहे हैं!” मैं अत्यंत आभारी हूं कि आपने मुझे आज रात्रि यहां आने का अवसर दिया।

और प्रत्येक रात्रि लगभग 7 बजे, भारतीय समयानुसार, हम भगवान् चैतन्य की लीलाओं पर एक कक्षा देते हैं। हमने उनके बाल्यकाल से प्रारंभ किया था, अब हम उस लीला तक पहुंचे है... जहाँ उन्होंने संन्यास लेने के पश्चात जगन्नाथ पुरी में प्रवेश ही किया है। तो उन्होंने स्वयं को अत्यंत विनम्रता पूर्वक सार्वभौम भट्टाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया कि वे उनसे श्रवण करना चाहते थे कि “एक संन्यासी का क्या कर्तव्य होना चाहिए?” सात दिवस के लिए सार्वभौम भट्टाचार्य ने निर्विशेष , मायावादी- भाष्य प्रस्तुत किया। तत्पश्चात सार्वभौम ने कहा, “आपने कोई प्रश्न नहीं पूछा, आपने सात दिवस तक कुछ नहीं कहा, मुझे नहीं पता कि आप कुछ समझे या नहीं?”

भगवान् चैतन्य ने कहा, “ठीक है, मैं सूत्रों को समझता हूँ, परंतु मैं आपकी व्याख्या को नहीं समझता।” साधारणतया सूत्र कठिन होते हैं, भाष्यों से इसे सरल बनाना चाहिए। उन्होंने इसके विपरीत कहा; उन्होंने वेदांत-सूत्र को समझा, परंतु उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य की संस्तुति को स्वीकार नहीं किया।

सार्वभौम ने उनसे पूछा, “आपका इससे क्या अभिप्राय है?”

तब भगवान् चैतन्य ने वैष्णव दर्शन की व्याख्या करना प्रारंभ किया। और उनकी मायावादी व्याख्याओं का खंडन किया। तो यह अत्यंत ही तकनीकी है, किंतु भगवान् के सगुणवाद दृष्टिकोण को स्थापित करके भगवान् चैतन्य ने इस महान दार्शनिक, सार्वभौम भट्टाचार्य पर अत्यधिक कृपा की। पश्चिम में हम देखते हैं कि ईसाई धर्म, इस्लाम में , मूल रूप से निर्विशेषवाद ने प्रवेश किया था। और भगवान् चैतन्य सगुणवाद दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं, उसी प्रकार श्रील प्रभुपाद पश्चिम गए, और उन्होंने भगवान् के पूर्ण पुरुषोत्तम रूप, साकार रूप को प्रस्तुत किया। तो हम भगवद् गीता- यथारूप का अध्ययन करते हैं, प्रत्येक पृष्ठ यह कहता है, “श्री भगवान् उवाच् - पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कहते हैं।” तो, हमारी प्रक्रिया भगवान् के व्यक्तित्व को समझने की है, उनके लिए हमारे प्राकृतिक स्नेह और प्रेम को जागृत करने की है। हम मूल रूप से भक्ति-योग का अभ्यास करते हैं। और भक्ति-योग, ज्ञान योग और अष्टांग योग की तुलना में इस कलियुग में सफलता का रहस्य है , वास्तव में भक्ति-योग सबसे आसान और प्रत्यक्ष विधि है। तो हरे कृष्ण गाना, और कृष्ण के विग्रह की पूजा करना या कृष्ण की सेवा करना; जैसा कि प्रभुपाद ने कहा था, हमें प्रभुपाद की पुस्तकें , कृष्ण की शिक्षाओं को वितरित करना चाहिए । और हमें भी पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए और कृष्ण भावनामृत दर्शन को समझना चाहिए । तो, प्रभुपाद ने कहा, यदि हम विश्व का एक प्रतिशत या एक प्रतिशत का 1/10 भी कृष्णभावनाभावित बना सकते हैं, तो यह संपूर्ण विश्व को अत्यंत परिवर्तित कर देगा ।

तो हमारा मुख्य कर्तव्य यह देखना है कि कैसे भगवान् चैतन्य का संदेश विश्व भर में कृष्ण भावनामृत की बाढ़ ला सकता है। और हम आशा करते हैं कि आप सभी अपने मित्रों, पड़ोसियों, कार्य-सहयोगियों आदि के मध्य कृष्ण भावनामृत का विस्तार, प्रचार करने के लिए अपने स्तर पर सर्वोत्तम प्रयास करेंगे। तो बहुत-बहुत धन्यवाद।

भगवान् सच्चिदानंद हैं - शाश्वत, ज्ञानमय और आनंदमय- हम सभी आनंद पाने का प्रयास कर रहे हैं, जो कि कृष्ण भावनाभावित होकर सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। भौतिक जीवन में सुख कुछ मिश्रित होता है अथवा अप्रसन्नता होती है। और आध्यात्मिक जीवन में शुद्ध आनंद है। हम चाहते हैं कि सभी प्रसन्न रहे और दूसरों को भी प्रसन्न रखे।

हरे कृष्ण!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रति लेखन का हिंदी अनुवाद राधिका प्रेमा भक्ति देवी दासी द्वारा
Verifyed by सत्यापित अजित मधुसूदन दास द्वारा
Reviewed by समीक्षित निर्गुणा जाह्नवा देवी दासी द्वारा

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