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20201224 गीता जयंती की पूर्व संध्या पर गीता महात्म्य पर विशेेष संबोधन

24 Dec 2020|Duration: 00:35:45|हिन्दी||Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ओम् तत् सत्॥

जयपताका स्वामी: आज गीता जयंती का पूर्व दिवस है। इस प्रकार यह भगवद् गीता अत्यधिक महत्वपूर्ण है। अतः, मैं गीता-महात्म्य के विषय में चर्चा करूंगा। गीता-महात्म्य भगवद् गीता यथारूप में, भूमिका के अंत में लिखे गए है।

कक्षा का प्रारम्भ गीता-महात्म्य की महिमा से होती है:

श्लोक 1

गीता शास्त्रमिदं पुण्यं य: पठेत् प्रयतः पुमान्।

विष्णु: पदं अवाप्नोति भय शोकादि वर्जित:॥

"यदि कोई भगवद् गीता के उपदेशो का पालन करे तो वह जीवन के दु:खों तथा चिन्ताओं से मुक्त हो सकता है, और उसका अगला जीवन आध्यात्मिक होगा।" (गीता-महात्म्य 1)

जयपताका स्वामी:  गीता-महात्म्य के इन श्लोकों से हम यह जान सकते हैं कि किस प्रकार हम सभी भय एवं चिंता से  मुक्त हो सकते हैं। आज लोग चिंता से भरे हुए हैं। तो, भगवद् गीता-महात्म्य कहता हैं कि प्रति दिन भगवद् गीता का अध्ययन करने से हम चिंता एवं भय से मुक्त हो सकते हैं। अनेक लोग,  भय एवं चिंता से मुक्त होने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते हैं। किन्तु यहाँ यह समझा जाता है कि यदि हम भगवद् गीता के निर्देशों के अनुसार अपना जीवन यापन करते हैं, तो हम भय एवं चिंता से मुक्त हो सकते हैं। अनेक जन विभिन्न कारणों से चिंताग्रस्त होकर आत्मघात कर लेते हैं। किन्तु भगवद् गीता इन सभी लोगों का उद्धार  कर सकती है। अतः, हमें भगवद् गीता का अध्ययन करना चाहिए।

श्लोक 2

गीताध्ययन शीलस्य प्राणायाम परस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्म कृतानी च॥

"यदि कोई भगवद् गीता को निष्ठा तथा गम्भीरता के साथ पढ़ता है तो भगवान् की कृपा से उसके सारे पूर्व दुष्कर्मों के फलों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।" (गीता-महात्म्य 2)

जयपताका स्वामी: यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है। अनेक लोग अपने पूर्व कर्मों के कारण पीड़ित हैं। यह गीता-महात्म्य स्पष्ट् करता है कि यदि हम भगवद् गीता का अध्ययन करते हैं एवं उसका पालन करते हैं, तो हमारे पूर्व-कर्म हमें प्रभावित नहीं करेंगे। निस्संदेह, हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि हम कुछ दुष्कर्म करे, एवं पुनः भगवद् गीता का अध्ययन करें जिससे, हम दुष्कर्मों से मुक्त हो जाए। हम भगवान् से छल नहीं कर सकते। किन्तु यदि हमारे पास पूर्व से कुछ कुकर्म हैं, या कर्मों की पूर्व प्रतिक्रियाएं हैं, तो वह स्वचालित रूप से शून्य हो जाएगी। कल मोक्षदा एकादशी है। इस दिवस पर भगवद् गीता कही गई थी। एवं हम कुरुक्षेत्र में यज्ञ करेंगे। जो कुरुक्षेत्र की यात्रा नहीं कर सकते, वे आज, कल भगवद् गीता का अध्ययन कर सकते हैं। इस प्रकार हम प्रातःकाल से रात्रि तक गीता का पठन करते रहेंगे। तो, मोक्षदा एकादशी के महात्म्य में, एक महान राजा थे। उनके पिता, वे नरक में थे। तो पुत्र, अपने पिता की सहायता करना चाहता था, वह शांति पूर्वक नहीं रह पा रहा था क्योंकि उसके पिता नरक में थे। वे पर्वत मुनि से भेंट करने गए, जो त्रिकाल-ज्ञानी थे।  राजा ने पर्वत मुनि को बताया कि उनके पिता ने क्या किया था। अपने पूर्व जीवन में उनके पिता ने बलपूर्वक अपनी पत्नी की संगति का आनंद लिया था। उस समय उनकी पत्नी को मासिक धर्म हो रहा था एवं उसने अनेक बार अपने पति से ऐसा न करने का निवेदन किया। इस कारणवश उनके पिता नरक में थे। हमें नहीं पता कि हमने अपने पूर्व जन्म में किस प्रकार के कुकर्म किए थे। अतः, यदि हम भगवद्-गीता का अध्ययन करते हैं, यदि हम भगवद्-गीता के निर्देशों के अनुसार जीवन पालन करते हैं, तो हम अपने पूर्व जन्मों के कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाएंगे।

श्लोक 3

मलिनेमोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने। सकृद् गीतामृत स्नानं संसार मलनाशनम्॥

"मनुष्य जल में स्नान करके नित्य अपने को स्वच्छ कर सकता है, किन्तु यदि कोई भगवद् गीता-रूपी पवित्र गंगा-जल में एक बार भी स्नान कर ले तो वह भौतिक जगत रूपी   भवसागर की मलिनता से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाता है।"

जयपताका स्वामी: तो, हम धन्य हैं कि मायापुर में गंगा बहती है। यहाँ यह कहा गया है कि यदि हम भगवद् गीता के जल में स्नान करते हैं तो हम शुद्ध हो जाते हैं। यदि हम भगवद् गीता में स्नान करते हैं तो हम अपने संपूर्ण भौतिक जीवन से शुद्ध हो जाते हैं। हरिबोल!

श्लोक 4

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरै:।

या स्वयं पद्मनाभस्य: मुखपद्माद्विनि: सृता॥

"चूँकि भगवद्गीता, भगवान् के मुख से निकली है, अतएव किसी को अन्य वैदिक साहित्य पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती। उसे केवल भगवद्गीता का ही ध्यानपूर्वक तथा मनोयोग से श्रवण तथा पठन करना चाहिए। वर्तमान युग में लोग सांसारिक कार्यों में इतने व्यस्त हैं कि उनके लिए समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन कर पाना सम्भव नहीं रह गया है। परन्तु इसकी आवश्यकता भी नहीं है। केवल एक पुस्तक, भगवद्-गीता ही पर्याप्त हैं क्योंकि यह समस्त वैदिक ग्रंथों का सार है और इसका प्रवचन भगवान् ने किया है।“

जयपताका स्वामी: चूँकि भगवद्गीता यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान द्वारा बोले गए शब्द हैं, अतः यह सबसे पवित्र है। गंगा पवित्र है क्योंकि उसने भगवान् के चरण स्पर्श किए। भगवद्गीता, भगवान् के श्री मुख से आ रही है। भगवान् के श्री मुख एवं चरणों में कोई भेद नहीं है। परन्तु भगवद् गीता के पठन के अपने लाभ हैं। गंगा नदी भारत में स्थान बद्ध है परन्तु भगवद्गीता संपूर्ण विश्व में उपलब्ध है। कुछ जिले ऐसे हैं जो गंगा नदी से अत्यंत दूर हैं। साथ ही कई राज्य गंगा से दूर हैं। विदेशों की क्या बात करें? भगवद्गीता का आप कहीं भी पठन कर सकते हैं एवं गीता के जल में किसी भी स्थान पर स्नान कर सकते हैं। गीता दिव्य है, यह हमें भौतिक बंधनों से मुक्त करती है। मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि इतने सारे गीता कोर्स के भक्त इतनी संख्या में गीता को प्रायोजित कर रहे हैं। भगवद् गीता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के मुख कमल से निकली हुई अत्यधिक शुद्ध करने वाली पवित्र वाणी है।

श्लोक 5

भारतामृत सर्वस्वं विष्णु वक्त्राद्विनिः सृतम्। गीता-गंगोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥

"जो गंगाजल पीता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है। अतएव उसके लिए क्या कहा जाय जो भगवद्गीता का अमृत पान करता हो? भगवद् गीता महाभारत का अमृत है और इसे भगवान् कृष्ण ने स्वयं सुनाया है।"

जयपताका स्वामी: तो, हम देख सकते हैं कि भगवद्गीता का पठन करने से हम शुद्ध होते हैं। एवं इस भगवद् गीता के माध्यम से हमें शाश्वत, स्थायी जीवन मिलता है।

श्लोक 6

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन:। पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥

"यह गीतोपनिषद्, भगवद् गीता, जो समस्त उपनिषदों का सार है, गाय के तुल्य है और ग्वालबाल के रूप में विख्यात भगवान् कृष्ण इस गाय को दुह रहे हैं। अर्जुन बछड़े के समान है, और सारे विद्वान तथा शुद्ध भक्त भगवद् गीता के अमृतमय दूध का पान करने वाले हैं।"

जयपताका स्वामी: हम सभी अर्जुन के अनुयायी हैं, बछड़ों के समान हम भगवद्गीता का दुग्ध पान कर रहे हैं। इस प्रकार भगवद् गीता का अमृत रूपी दुग्धपान करने से सभी वैदिक साहित्यों का सार प्राप्त हो सकता है। नई दिल्ली के इस्कॉन में, उनके पास विश्व की सबसे विशाल भगवद् गीता है। उस भगवद् गीता का भार कुछ 6 टन या 6000 किलो के समान है। भगवद् गीता एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है कि केवल गीता का पठन करने मात्र से ही आप सभी वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। श्रील प्रभुपाद की अभिलाषा थी कि इस "गीतार् गान" का हर विद्यालय में अध्ययन किया जाए। जिन्हें भगवद् गीता मिलती है, हमें उन्हें गीतार् गान की एक प्रति देनी चाहिए। जिस प्रकार आज गंगा जल में वे विभिन्न प्रकार के प्रदूषक डालते हैं, उसी प्रकार ये अलग-अलग भाष्य भी,  वे भगवद् गीता पर विभिन्न टिप्पणियां इस प्रकार से करते हैं कि कोई भगवद्-गीता को यथार्थ रुप से समझ नहीं सकता। यही कारण है कि श्रील प्रभुपाद ने भगवद् गीता को यथारूप लिखा। इस भगवद् गीता में भगवान् श्री कृष्ण के निर्देश यथारूप हैं। हम भगवद् गीता के इस ज्ञान के जल का पान कर सकते हैं एवं मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

श्लोक 7

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम् एको देवो देवकीपुत्र एव।

एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा॥

"आज के युग में लोग एक शास्त्र, एक ईश्वर, एक धर्म तथा एक वृत्ति के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं। अतएव एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम् – केवल एक शास्त्र भगवद् गीता हो, जो सारे विश्व के लिए हो।"

जयपताका स्वामी: हरिबोल! हरिबोल! हरिबोल!

"एको देवो देवकीपुत्र एव - सारे विश्व के लिए एक ईश्वर हो - श्री कृष्ण।"

जयपताका स्वामी: हरिबोल!

"एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि - और एक मंत्र, एक प्रार्थना हो - उनके नाम का कीर्तन, "हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा - और केवल एक ही कार्य हो - भगवान् की सेवा। ”

जयपताका स्वामी: इस प्रकार हम इस गीता-महात्म्य से जान सकते हैं कि यह भगवद् गीता वस्तुतः संपूर्ण मानवता को संयुक्त कर सकती है। जो इस भगवद् गीता का अध्ययन करता है, इस भगवद् गीता को उपहार में देता है, एवं इस भगवद् गीता की शिक्षाओं का प्रचार करता है, संपूर्ण मानवता के लिए यह सबसे महानतम कल्याणकारी कार्य है; मैं अत्यन्त आभारी हूँ कि आप इस भगवद् गीता का पठन करने के लिए इतनी विशाल सभा का आयोजन कर रहे हैं, मुझे आशा है कि आप सभी स्वस्थ रहेंगे एवं आप भगवद् गीता के इस अमृत संदेश को सभी में वितरित करेंगे। यदि यह भगवद् गीता अत्यन्त उचित प्रकार से प्रसारित की जाती है, तो इससे मानव समाज में परिवर्तन आ सकता है। लक्ष्मी गोविंद दास एवं भक्ति विजय भागवत स्वामी, एवं उपस्थित सभी व्यक्तियों का अत्यधिक धन्यवाद। हरे कृष्ण! मैं यहीं विराम देना चाहूंगा।

कृष्णे मतिर अस्तु! कृष्णे रतिर अस्तु! भगवद् गीता मतिर अस्तु! हरे कृष्ण!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रति लेखन का हिंदी अनुवाद रोहिणी सुमुखी देवी दासी द्वारा
Verifyed by राधिका प्रेमा भक्ति देवी दासी द्वारा
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा

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