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20201221 25वें जाग्रत छात्र समाज को संबोधन

21 Dec 2020|Duration: 00:21:54|हिन्दी|Others|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ओम् तत् सत् ॥

जयपताका स्वामी: जाग्रत छात्र समाज को संबोधित करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि ये छात्र हमारे देश का भविष्य हैं तथा निश्चित रूप से इस समूह के छात्र बुद्धिमान होते हैं।

श्रीमद्-भागवतम् के 11वें सर्ग में एक भविष्यवाणी की गई थी, कि भगवान् चैतन्य अवतरित होंगे । वे स्वयं कृष्ण हैं, किंतु वे भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त के रूप में प्रकट होंगे । भगवान् के साथ उनका प्रकाश, उनकी शक्ति, उनके नित्य परिकर तथा उनके भक्त प्रकट होंगे। वे हरिनाम संकीर्तन का प्रचार करेंगे, पवित्र नामों का जप करेंगे। जो बुद्धिमान हैं, वे उनका अनुसरण करेंगे। अब यह जाग्रत छात्र समाज के विद्यार्थी अत्यधिक बुद्धिमान हैं तथा इस कारण भगवान् चैतन्य की शिक्षाओं का पालन कर रहे हैं। इस भौतिक संसार में सामान्य लोग सोचते हैं कि भौतिक सुख ही सब कुछ है। किंतु हम जानते हैं कि यह बहुरंगी भौतिक जगत बस एक क्षण के लिए और अस्थायी है। किंतु, कृष्ण के साथ हमारा सम्बंध स्थायी तथा शाश्वत है  किंतु इस भौतिक जगत में हमें अध्ययन करना तथा अन्यों के साथ व्यवहार करना है । हम जानते हैं कि वास्तविक सत्य कृष्ण हैं । इस कारण हम कृष्ण के नाम का जप करते हैं, कृष्ण की सेवा करते हैं व उनकी शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं । इस कारण इसे जाग्रत छात्र-प्रबुद्ध छात्र कहा जाता है। क्यों जाग रहा है? ऐसा इस कारण है क्योंकि इन छात्रों ने माया को नियंत्रित कर लिया है । इस प्रकार वे कृष्ण के नाम का जप करते हैं तथा कैसे कृष्ण प्रत्येक के हृदय में उपस्थित हैं, यह उन्हें ज्ञात है तथा उनके द्वारा अनुभव किया गया है। इस प्रकार वे अत्यधिक आनंद का अनुभव करते हैं। इस भौतिक संसार में जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि वास्तविक समस्याएँ हैं। यदि हमें इनका समाधान प्राप्त हो गया है तो कृष्ण की भक्तिमय सेवा ही एकमात्र मार्ग है । कृष्ण की भक्तिमय सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। अब इतने जन्म लेने के पश्चात ।

ब्रह्माण्डे भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज: ॥ [चैतन्य-चरितामृत 19.151]

हम इससे पूर्व,  विभिन्न ब्रह्मांडों में अनेक जन्म ले रहे थे। अब कृष्ण की भक्तिमय सेवा तथा आध्यात्मिक गुरु की दया

से, हम बारम्बार  जन्म व मृत्यु के चक्र को समाप्त कर सकते हैं। गृहे थाको वने थाको सदा हरि बोले थाको जिनके परिवार हैं, जो ब्रह्मचारी या त्यागी हैं, वे सभी प्रत्येक क्षण कृष्ण के पवित्र नामों का जप कर सकते हैं। इस प्रकार , हम जिस वर्तमान स्थिति में हैं, उससे हम पुनः भगवत् धाम जा सकते हैं। कहा जाता है कि किसी वृक्ष को काटने के लिए पहले सहारा देना पड़ता है उसके पश्चात पेड़ को काटा जाता है। इसी प्रकार इस भौतिक जगत में, यदि हमारे पास कृष्ण की सेवा का समर्थन है, तो हम माया के चंगुल से बच सकते हैं ।

मैं अत्यंत आभारी हूँ कि आनंद वर्धन प्रभु, इस जाग्रत छात्र समाज की सेवा में सम्मिलित हैं। इस प्रकार अपनी अल्प आयु में  हम यह समझने में सक्षम होते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है। बहुत से विद्वान शिक्षक हैं, जो इस बात को नहीं समझते हैं। इस प्रकार, हम एक विनम्र भाव से सभी छात्रों के साथ घुलमिल जाएंगे व अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को जानेंगे। इस प्रकार हम कृष्ण के नाम का जप करते हैं, हमारी अच्छी संगति है । यदि हम ऐसा करते हैं, तो हमारा जीवन सिद्ध हो जाएगा। भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके नाम में कोई अंतर नहीं है । इस प्रकार यदि हम कृष्ण के नाम का जप करते हैं, तो हमारा जीवन सिद्ध हो जाएगा ।

सामान्यतः लोग अपने शरीर को लेकर चिंतित रहते हैं। वे यह नहीं समझते हैं कि वे वास्तविक आत्मा हैं, आत्मा ।  आत्मा का शरीर होता है। जब आत्मा इस भौतिक शरीर से बाहर निकलती है, तो यह शरीर नष्ट हो जाता है व मर जाता है। भौतिक शरीर सुंदर हो सकता है, किंतु जब आत्मा उस शरीर को छोड़ देती है, तो शरीर सुंदर नहीं रह जाता है। हम समझते हैं कि आत्मा वास्तविकता में सुंदर है। क्योंकि,  जब तक आत्मा उपस्थित है, भौतिक शरीर सुंदर है। इस प्रकार, इस मानव जीवन में हमारे पास जो बुद्धि है, वह है आत्मा को समझना। आत्मा शाश्वत है व कृष्ण का अंश है । तो कृष्ण का अंश होने के नाते, हमें कृष्ण की सेवा करनी चाहिए । यदि हम भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करते हैं, तो हम प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हैं क्योंकि हम कृष्ण का अंश हैं । जैसे हमारा हाथ हमारे शरीर का एक अंग है। यदि वह हाथ स्वस्थ है, तो वह शरीर की सेवा करेगा। जैसे क्रिकेट खेलना, फ़ुटबॉल खेलना, हाथों का उपयोग करके हम कुछ भी कर सकते हैं। किंतु यदि हाथ स्वस्थ नहीं है तो हम वह नहीं कर सकते जो हम चाहते हैं। उसी प्रकार यह बद्ध आत्मा अस्वस्थ या रोगी के समान है व कृष्ण की सेवा नहीं करना चाहती । वे कृष्ण के साथ अपने संबंध को नहीं समझते हैं । ऐसे में उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है। किंतु यदि वे भगवान् श्रीकृष्ण को समझते हैं तथा उनकी सेवा करते हैं, तो उनका जीवन सिद्ध होता है ।

मुझे बता दिया गया था कि आप छात्र सामान्यतः प्रति वर्ष एक बार मायापुर आते हैं। किंतु इस महामारी के कारण, हम इस वर्ष वर्चुअल मीट कर रहे हैं। जो भी हो, मैं अत्यंत आभारी हूँ कि हमें यह अवसर प्राप्त हुआ है व मैं आपका सगं प्राप्त कर सका । मुझे लग रहा है कि मैं तुम्हें कुछ प्रसाद नहीं दे सकता । किंतु कम से कम मैं आप सभी को हरि-कथा कहने में सक्षम हूँ । यदि आनंद वर्धन प्रभु आपको महाप्रसाद दिखा सकते हैं, तो कृष्ण अपने नेत्रो से इसे स्वीकार करते हैं, किंतु हमारे लिए इसे हमारे मुँह में डालना होगा तथा मुँह से पेट तक, तथापि  पचाना होगा । मैं आभासी यात्राओं पर अनेक घरों  में जाता हूँ  एवं  कई मुझे प्रसाद की प्रस्तुति करते हैं, उस प्रसाद में कोई कैलोरी नहीं होती है, किंतु उसमें अत्यधिक भक्ति होती है। अब, कृष्ण के नाम का जप करने, कृष्ण कीर्तन गाने में, कृष्ण के लिए नृत्य करने में अत्यधिक आनंद है । मुझे आशा है कि आप सभी परम पुज्य भक्ति विजय भागवत स्वामी की संगति में प्रसन्नता अनुभव कर रहे होंगे। जब वह आपको संबोधित कर रहे थे, तो मैंने उनकी बात का एक अंश ही सुना, पूरी बात नहीं सुन सका।

मुझे श्रील प्रभुपाद का एक पत्र मिला जब वे मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया पहुंचे थे। वहाँ प्रेस के पत्रकारों ने उनसे कहा, प्रभुपाद, "आप भारत से आए हैं जो एक गरीब देश है व ऑस्ट्रेलिया एक समृद्ध देश है। आप हमसे क्या लेने आए हो?" श्रील प्रभुपाद ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं तुमसे कुछ लेने नहीं आया हूँ। मैं तुम्हें बिल्ली और कुत्ते के जीवन से मुक्ति दिलाने आया हूँ ।" पत्रकारों ने उत्तर दिया, आपका क्या अर्थ है, "क्या हम एक बिल्ली व कुत्ते का जीवन जी रहे हैं?" श्रील प्रभुपाद ने कहा, "देखो कुत्ते क्या करते हैं ? जो कुछ भी मिलता है वह खा लेते हैं। तुम जाकर होटलों या रेस्तराओं में भोजन खाते हो। तुम कांटे , चाकुओं व चम्मचों से खाते हो। किंतु भोजन वही है।" तब श्रील प्रभुपाद ने उदाहरण दिया, "आप कैसे सोते हैं, कैसे पुरुष व महिला एकजुट होते हैं तथा वे कैसे लड़ते हैं। तो ये अत्यंत ही मूलभूत वस्तुएँ हैं। यह मानव जीवन, भगवान् श्रीकृष्ण की भक्तिमय सेवा करने व कृष्ण को जानने के लिए है। नहीं तो हम एक नीच पशु का जीवन जी रहे हैं।" अगले दिन एक दैनिक समाचार पत्र में शीर्षक था कि "एक स्वामी भारत से हमें बिल्ली व कुत्ते के जीवन से बचाने के लिए आए है!"  छोटे अक्षरों में लिखा था, "वह हमें मारने आए है!" अर्थात् शिकारी, बिल्लियों तथा कुत्तों को पाने के लिए यहाँ है! वह जो कुछ भी कहेगे, वह हमें बिल्ली व कुत्ते के जीवन से मुक्त कर देगें!

इस प्रकार जाग्रत छात्र समाज के छात्र सम्पूर्ण जगत में कृष्ण भावनामृत का प्रचार करें। मैं आशा करता हूँ कि आपका जीवन सफल हो। भगवान् चैतन्य की इन शिक्षाओं को लेकर आप प्रचार करेंगे । मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूँ ।

आपको मेरी शुभकामनाएँ !

कृष्णे मतिर अस्तु !

हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे

निताई गौर हरि बोल!

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by शशि मुखी केशवी देवी दासी द्वारा हिंदी अनुवाद
Verifyed by अजित मधुसूदन दास द्वारा सत्यापित
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा समीक्षित

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