मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।.
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री गुरुं दीन-तारणम्॥
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ।।
हरि: ऊँ तत् सत्
जयपताका स्वामी: आज प्रातः आप सभी दीक्षा समारोह के लिए एकत्रित हुए हैं। अब मैं वर्चूअल माध्यम से दीक्षा प्रदान कर रहा हूँ । वर्तमान में जूम के माध्यम से हम कई शिष्यों को दीक्षा प्रदान कर रहे हैं। मैं एक आध्यात्मिक नाम प्रदान करूँगा तथा कोई मेरी ओर से आपको जप-माला प्रदान करेगा । भगवान् चैतन्य ने कहा कि "गृहे थाको वने थाको सदा हरि बोले डाको"। व्यक्ति चाहे संन्यासी है या गृहस्थ है, वे सभी हरिनाम का जाप करेंगे। गृहस्थ जीवन का उद्देश्य भगवान् कृष्ण को केंद्र में रखना और उनकी सेवा करना है ।पति व पत्नी को सम्मिलित रूप से भगवान् कृष्ण की सेवा करने का प्रयास करना चाहिए । तथापि जब उन्हें संतति प्राप्त हों, तो वे भी कृष्ण भावनाभावित हों तथा उन्हें मंदिर में भी सेवा करने का प्रयास करना चाहिए।
शंकराचार्य ने कहा कि मायावादी को ब्रह्म में लीन होने हेतु संन्यासी बनना पड़ता है। परन्तु हम भगवान् कृष्ण के भक्त भगवान् कृष्ण की सेवा करना चाहते हैं । हम निराकार ब्रह्म में विलीन नहीं होना चाहते। इस प्रकार, हम देखते हैं कि पांडव, प्रह्लाद महाराज, वे भगवान् कृष्ण के भक्त थे और उन्होंने भगवान् कृष्ण की सेवा की । इस प्रकार, एक गृहस्थ होते हुए भी द्रौपदी भगवान् कृष्ण की भक्त थी । कुंती देवी, देवहूति, देवकी, यशोदा, श्रीमती राधारानी अतः पति या पत्नी, उनका एकमात्र उद्देश्य कृष्ण की सेवा करना होना चाहिए । इस प्रकार, विभिन्न परिस्थितियों में, हमें भगवान् कृष्ण की सेवा करनी चाहिए ।
इस दीक्षा से पूर्व आप आकांक्षी और गुरु आश्रय थे तथा अब यह एक अभ्यास है। दीक्षा के पश्चात् , आप भगवान् कृष्ण की सेवा करने का संकल्प लेंगे । वह सेवा जो आप गुरु-परंपरा को प्रदान करते हैं । मैं व्यक्तिगत रूप से सभी के संपर्क में रहने का प्रयास करूंगा। इस आधुनिक जगत् में फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यम हैं, और जयपताका स्वामी ऐप है। जिनके पास मोबाइल फोन हैं, वे इस ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं। प्रतिदिन, मैं मेरे क्रियाकलाप का कुछ विवरण देता हूँ। कल, मैंने डिसायपल केेयर ( शिष्य देखभाल) नामक एक कार्यालय प्रारम्भ किया । अब मैंने अपने पुरुष तथा महिला शिष्यों की देखभाल के लिए कुछ लोगों को नियुक्त किया है मेरी सहायता करने के लिए मेरे कुछ वरिष्ठ शिष्य हैं, जो आपका मार्गदर्शन करेंगे। इस प्रकार मैं प्रयास कर रहा हूँ कि आप सभी भगवान् कृष्ण की सेवा में संलग्न हो । परन्तु श्रील प्रभुपाद ने एक उदाहरण दिया कि शीतऋतु में, पक्षी उत्तर से दक्षिण की ओर उड़ते हैं, तथा पुनः ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर दक्षिण से उत्तर की ओर। वह हम आकाश में देखते हैं। परंतु प्रत्येक पक्षी को स्वयं उड़ना होता है। हम देखते हैं कि वहां एक नेतृत्व करने वाला पक्षी होता है तथा अन्य पक्षी उसका अनुसरण करते हैं। परन्तु हम वैज्ञानिकों से सुनते हैं कि मुख्य पक्षी आकार में बड़ा होता है और इसके पीछे हवा की गति 30% कम हो जाती है तथापि इस प्रकार से वह अन्य को अग्रसर कर पाता है । परन्तु नेता आकार में बड़ा और वजन से भारी होता है। अतः जैसा भी हो , हम में से प्रत्येक को भगवान् कृष्ण की सेवा में उड़ान भरनी है । जो मैं आपके लिए नहीं कर सकता । 16 माला जप, भगवान् कृष्ण की सेवा, मंदिर में सेवा, आदि आपको करना है । परन्तु मै सदैव आपका मार्गदर्शन और निर्देशन करने के हेतु उपस्थित रहूँगा।
मैं प्रतिदिन आप सभी के लिये प्रार्थना करूंगा, परंतु यह आप का उत्तरदायित्व है कि आप भगवान् कृष्ण की सेवा करें, भगवान् कृष्ण का प्रसाद ग्रहण करें , और नियामक सिद्धांतों का पालन करें। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो यह मेरा अपराध नहीं होते हुए भी मुझे सहन करना होगा, तथा आपको भी सहन करना होगा। दीक्षा के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह केवल सीख नहीं है, हमें वास्तव में कार्य करना है। प्रतिज्ञा से बंधे रहकर, भगवान् कृष्ण की सेवा करें। तथा इस प्रकार , भगवान् कृष्ण की सेवा में संलग्न रहते हुए, हम पुनः भगवान् के पास, वास्तविक निवास स्थान जा सकते हैं, यही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए । तथा इस प्रकार भगवान् कृष्ण की सेवा करने में हमें जो आनंद प्राप्त होता है उसकी कोई सीमा नहीं है । अधिवास कीर्तन में हम गाते हैं - आनंदेर सीमा नाई , आनंदेर सीमा नाई , निरानंद दुरे जाई , निरानंद दुरे जाई । भगवान् कृष्ण की सेवा में संलग्न रहते हुए हमें जिस आनंद का अनुभव होता हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है । तथा सामान्यरूप से , भौतिक जगत् में रहने से कष्ट ही प्राप्त होता है । परंतु जब हम भगवान् कृष्ण की सेवा कर रहे हैं, तो सभी कष्ट दूर हो जाते हैं । इस प्रकार हम आशा करते हैं कि आप सभी अति उत्साह के साथ भगवान् कृष्ण की सेवा में संलग्न रहेंगे और पूर्ण मन से भगवान् कृष्ण को समर्पण करेंगे । तत्पश्चात भगवान् कृष्ण आपकी, सभी पापों से रक्षा करेंगे। आपको सभी नियामक सिद्धांतों और नियमों का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। यदि आप त्रुटि भी करते हैं तो आपको संशोधन करने के लिए पुनः प्रयास करना होगा। प्रायश्चित का इससे उत्तम कोई उपाय नहीं है।
अब नाम परिवर्तन की प्रक्रिया की जाएगी तथा अब आप सभी को आध्यात्मिक नाम प्रदान किया जाएगा । जो आध्यात्मिक नाम रखना चाहते हैं तथा जिनके पास जन्म से ही आध्यात्मिक नाम हैं, हम उन्हें थोड़ा परिवर्तित कर देंगे। मुझे आशा है कि आप सभी कृष्ण की सेवा में अत्यंत प्रसन्न होंगे ।
हरिबोल!
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