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20201203 Question and Answer Session

3 Dec 2020|Duration: 00:27:33|हिन्दी|प्रश्नोत्तर सत्र|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्।
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

दिलीप (बेंगलुरू): जब संस्था के अधिकारियों और मेरे मध्य कुछ मिथ्या प्रचार हो जाए, तो उस भक्त के साथ कैसा व्यवहार करें जिससे कि हमारे मध्य सम्बंध का विच्छेद ना हो ? गुरु महाराज आपसे विनम्र निवेदन है कि इस विषय पर कुछ प्रकाश डाले?

जयपताका स्वामी : कल मैंने एक वीडियो भेजा, “क्या होगा यदि आपके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है?”। क्या आपने वह वीडियो देखा है? मेरे कथन का तात्पर्य है कि यदि आप कुछ सेवा करने के इच्छुक हैं तो अधिकारी अतिप्रसन्न होते हैंसामान्यरूप से, लोग यह नहीं पूछते, “क्या आपके पास मेरे लिए कुछ सेवा है?” अतः यदि कोई मतभेद हो तो आप क्षमा मांग सकते है मुझे ज्ञात नहीं है कि वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करना संभव है। परंतु सामान्यतः,यदि आप उनसे पूछे कि मुझे कुछ सेवा प्रदान करें !” तब मुझे प्रतीत होता है कि आपकी समस्या हल हो जाएगी। और पुनः अवसर देखकर, आप उन्हें वस्तु स्थिति बता सकते है कि मुझे ज्ञात नहीं है कि आप को मतभेद कैसे हो गया,मेरी तो मात्र यही इच्छा है क़ि मैं भगवान कृष्ण की कुछ और सेवा करूँ। हरे कृष्ण!

जयरासेश्वरी देवी दासी : आपके अमृत तुल्य व्याख्यान के लिए बहुत-बहुत धन्यवादभगवान् चैतन्य द्वारा बताए गए शिवाष्टम के विषय में श्रवण करना एक रहस्योद्घाटन था। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपने मंदिरों में पाठ नहीं करते हैं, और न ही हम अपने मंदिरों में शिवरात्रि मनाते हैं। कृपया मुझे सुधारें यदि मुझे कुछ मिथ्या ज्ञात हुआ है, गुरु महाराज और हमें प्रबुद्ध करें।

जयपताका स्वामी : यहाँ मायापुर में हम जगन्नाथ मंदिर में शिवरात्रि मनाते हैं और मैं प्रतिदिन भगवान् शिव से प्रार्थना करता हूँ। चूंकि वे नवद्वीप के पवित्र धाम के रक्षक हैं। उनकी दया के बिना हम नवद्वीप धाम में प्रवेश नहीं कर सकते। परन्तु मुझे नहीं लगता कि जो मंदिर इस्कॉन में हैं, वे भगवान् शिव की महिमा को पर्याप्त रूप से समझते हैं। निःसंदेह, वह कृष्ण के समान नहीं है, उस बात पर जोर दिया गया हैपरन्तु वे सर्वोत्तम वैष्णव है, इसकी व्याख्या श्रीमद्-भागवतम् के 12वें सर्ग में भी है। तो यह अच्छी बात होगी यदि भक्त इसे समझेंगे। और चार वैष्णव परम्पराओं ब्रह्मा- लक्ष्मी- शिव और चार कुमारों, में से एक भगवान् शिव द्वारा प्रारम्भ किया गया है।

अरुणकांति गौरांग दास [बंगाली]: यदि वैष्णवों के मध्य मतभेद होता है, तो वरिष्ठ भक्तों को उन्हें एकजुट करने के लिए क्या करना चाहिए? कृपया मुझे आशीर्वाद दें कि मैं कोई भी वैष्णव अपराध करने से दूर रहूं

जयपताका स्वामी : हम मनन कर रहे हैं कि एक प्रबंधक के लिए, किसी को सलाह देना और विवादों का निराकरण करना सीखना चाहिए। तो, संक्षेप में, रहस्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के दृष्टिकोण से तथ्य को देखे। इस प्रकार वे स्वयं निदान समझ जाते हैं। आपके प्रश्न के लिए धन्यवाद अरुणकांति गौरांग

किया रानी : यदि हमारा कोई आत्मीय अपना शरीर त्याग देता है, तो हमें कितने दिनों तक पातक का पालन करना चाहिए और पूजा स्थल को स्पर्श नहीं करना चाहिए? यद्यपि मैं दीक्षित नहीं हूँ मुझे कितने दिन तक पातक पालन करना चाहिए और कितने दिन एक दीक्षित शिष्य को पातक पालन करना चाहिए। कृपया मुझे प्रबुद्ध करें

जयपताका स्वामी : तो यह निर्भर करता हैपातक एक सन्यासी पर लागू नहीं होताऔर मुझे प्रतीत होता है कि वैष्णवों के लिए, सामान्यतः यह अवधि 11 दिन की होती हैपरन्तु यदि पूजा करने वाला कोई नहीं है और यह एक आपात स्थिति है, तो आपातकाल कोई नियम नहीं जानता। यह एक माँ की भाँति है जिसे अपने बच्चे का पोषण करना होता है। वह ग्यारह दिनों तक बच्चे को उपवास के लिए नहीं छोड़ेगी। तो यदि पूजा करने वाला कोई और नहीं है तो आप अपने घर के मंदिर में ही कर सकते हैसामुदायिक मंदिर में भिन्न भिन्न नियम हो सकते हैं।

कृष्ण और सम्यक : भगवान् श्री कृष्ण भगवद गीता में कहते हैं, जो कोई मुझे स्मरण करता है, वह मेरे पास वापस आता है। तो, यह पहले से ही लोगों के कर्म में पूर्वनिर्धारित है कि मृत्यु के समय व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण को स्मरण कर सकता है और वापस भगवान् के पास जा सकता है। क्या यह एक व्यक्तिगत रुचि या स्वतंत्र इच्छा है?

जयपताका स्वामी : इस हेतु हम जीवन पर्यन्त हरे कृष्ण का जप करते हैंताकि हम मृत्यु के समय भगवान् श्री कृष्ण का स्मरण कर सकेंहमने सुना है कि भगवान् श्री कृष्ण को स्मरण करना और भगवान् की सेवा करना, भगवान् के पास वापस जाना कर्म का विषय नहीं है। यह हमारी भक्ति और स्वतंत्र इच्छा का विषय है। यदि कोई चिंतन करता है कि मृत्यु के समय, हम भगवान् श्री कृष्ण के विषय में सोचने का अभ्यास नहीं कर रहे हैं, तो वे कुछ और सोच सकते हैं, क्या पता? “धत्तेरे की! मेरे कुत्ते को कौन खिलाएगा? ओह! मेरी बिल्ली! उसे अपना दूध पिलाना है।” यही कर्म है। तो, हमें भगवान् श्री कृष्ण को स्मरण करने का प्रयास करना चाहिए और स्वाभाविक रूप से मृत्यु के समय हम भगवान् श्री कृष्ण को स्मरण करते हैं

श्यामहरी श्रीनिवास दास : यदि हमने कृष्ण भावनामृत में आने से पूर्व कुछ पाप कर्म किए हैं, जब भी हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो वह कार्य दिखा रहा है और हमारे पाप कर्म दिखा रहा है, इसे कैसे लें? यद्यपि अब मैं एक महान आंदोलन में हूं, सभी सेवाएं कर रहा हूं, और अपनी नियमित साधना कर रहा हूं और आपके सभी निर्देशों का पालन कर रहा हूं और भक्तों की संगति में हूं। कृपया मेरी सहायता करें कि मैं इन घटनाओं का सामना कैसे करूं और अपनी साधना में और दृढ़ बनूं?

जयपताका स्वामी : भगवान् चैतन्य ने कहा कि किसी को भी जगाई मधाई को उनके द्वारा पूर्व के किए गए पापपूर्ण कृत्यों के लिए निमित्त नहीं मानना चाहिए। उन्हें उस पर निर्धारित नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब जबकि उन्होंने भक्ति सेवा स्वीकार कर ली है, वे भगवान् श्री कृष्ण को अति प्रिय हो गए हैंइसलिए, हमने पूर्व में जो कुछ भी किया, जब दीक्षा लेते हैं, वह स्वाभाविक रूप से क्षमा हो जाता है। इसके अतिरिक्त, तुलसी की परिक्रमा, एकादशी, पुरुषोत्तम मास, दामोदर मास और भीष्म -पंचक का पालन करने जैसी अन्य गतिविधियों का अभ्यास करके इससे निवृत्ति हो सकती है।

ललितांगी राधा देवी दासी : हम श्रीमद्-भागवतम् से समझते हैं कि जब ब्रह्मा ने रुद्र की रचना की, तो उन्हें ज्ञात हुआ की उनके वंशजों से संकट हो सकता है तो उन्होंने उन्हें तपस्या करने के लिए कहा। हम यह भी सुनते हैं कि रुद्र एक संप्रदाय का प्रारम्भ किये है। यह विरोधाभासी प्रतीत होता है। कृपया हमें प्रबुद्ध करें।

जयपताका स्वामी : हम भगवान् शिव को एक गुण-अवतार के रूप में देखते हैं, तमोगुण के रूप में। तो स्वाभाविक रूप से उस विषय में वह असामान्य चीजें कर सकते हैंसाथ ही हमें ज्ञात हैं कि उनका प्रमुख गुण भगवान् हरि के प्रति उनकी भक्ति है। और इस लीला में, हमने पढ़ा कि उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलों में रहने के लिए, क्षमा के लिए याचना कीभगवान् श्री कृष्ण उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें श्री क्षेत्र में रहने के लिए स्थान प्रदान कियाऔर भुवनेश्वर में, जो श्रीक्षेत्र का एक भाग है।

लक्ष्मी राधा देवी दासी : मेरा जप-माला जप से संबंधित एक प्रश्न हैकुछ समय पहले एक कार्यक्रम में नामजप करते समय मेरी जप माला मेरे पास नहीं थी और मैंने एक काउंटर पर क्लिक करके नामजप कर रही थीफिर किसी ने मुझे एक जप-माला प्रदान कीवहाँ भक्तों के जप के लिए रखी हुई अनेक जप मालाओं में से एक माला को मैंने स्वीकार कर लिया। किसी और ने मुझसे कहा कि आपको दीक्षित होने के कारण अन्य लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली किसी भी जप माला पर जप नहीं करना चाहिए। क्या वास्तव में ऐसा है? क्या हम किसी जप-माला पर उस स्थिति में जप नहीं कर सकते जहाँ हमारी अपनी जप माला नहीं हैकृपया मुझे जप में रुचि विकसित करने और अधिक रुचि लेने के लिए आशीर्वाद दें।

जयपताका स्वामी : अच्छा होगा यदि आप हमेशा अपनी जप-माला रखेंमैंने विशेष रूप से कभी नहीं सुना कि हम अन्य मालाओं पर नामजप नहीं कर सकतेहम जानते हैं कि निःसंदेह यदि कोई अन्य माला पर जाप करता है, तो वह वहां कुछ अपराध छोड़ सकता है। इसलिए हम पहले पंचतत्व मंत्र का जाप करते हैं और फिर हरे कृष्ण का जाप करते हैं। यह कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। वैसे भी मंदिर में काउंटर का प्रयोग करना ठीक नहीं है। मैं शिष्यों को इसका उपयोग करने की अनुमति देता हूं जब मोटरवे पर गाड़ी चला रहे हों या सुबह की सैर पर जा रहे हों। पर मंदिर में उन्हें अपनी माला पर जप करना चाहिए।

बोगोटा के भक्त ब्रायन (इच्छुक शिष्य) : हम भक्तों की देखभाल कैसे कर सकते हैं? हम देखते हैं कि कुछ भक्त कुछ समय के लिए आते हैं और फिर छोड़ जाते हैं। यह अत्यंत निराशाजनक है। कृपया भक्तों की उचित देखभाल को समझने में मेरी सहायता करें।

जयपताका स्वामी : यही कारण है कि श्रील प्रभुपाद ने कहा कि भक्त बनाने के लिए खून ( रक्त) की बाल्टी चाहिए। तुम सोचते हो कि कृष्ण भावनामृत में भक्त को घर जैसा अनुभव कराने के लिए क्या किया जा सकता थाऔर हो सकता है कि हम अधिक देखभाल करने वाले, अधिक प्यार (प्रेम) करने वाले, अधिक मिलनसार हो सकते हैं, इसलिए भले ही वे भाग जाएं, उन्हें यह स्मरण होगा और हो सकता है कि वे बाद में वे वापस आएं जब उन्हें ज्ञात होने लगे कि भौतिक जगत में कोई मित्र नहीं है।

गुरु दयाल दास : यदि किसी मंदिर में कोई अध्यक्ष नहीं हैं, तो मंदिर परिषद के सदस्य प्रबंधन कर रहे हैं। तो उस क्षेत्र में कुछ भक्त श्रीविग्रह की पूजा मानदंड का पालन नहीं कर रहे हैं, नियमों और विनियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। हम उनके साथ कैसे सहयोग कर सकते हैं?

जयपताका स्वामी : मैं मंदिर के अध्यक्ष के न होने और मंदिर परिषद के बीच के संबंध को नहीं समझता। और फिर कुछ भक्त जो अर्चा विग्रहों के पूजा के नियमों और विनियमों का पालन नहीं करते हैं, और उन्हें मूल रूप से पतित माना जाता है। हमें उस भक्त को प्रोत्साहित करने का प्रयास करना चाहिए, हमें उसकी संगति नहीं लेनी चाहिए, किंतु हमें अपनी संगति देनी चाहिए। और उसे और अधिक उत्साही बनने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास करें। हम और क्या कर सकते हैं?

वैकुण्ठ विजया देवी दासी : क्या हम ज्ञात अज्ञात रूप से वैष्णव अपराध कर रहे होंगे, इसे नियंत्रित करने के लिए, हमें क्या करना चाहिए ? कृपया मेरा मार्ग दर्शन कीजिए।

जयपताका स्वामी : कलियुग में वैष्णव के विषय में, भगवान् श्री कृष्ण के विषय में अच्छा सोचना, यदि आप कुछ दान, चंदा या भक्तिमय सेवा करना चाहते हैं, तो आपको उस का लाभ मिलेगा। पर यदि आप किसी कुकर्म के विषय में सोचते है और उसे आप उसे नहीं करते हैं, तो आपको उसका प्रतिफल नहीं मिलेगा। तो, यह है कलियुग का लाभ

शांता गोपी देवी दासी : क्या क्षेत्र पालक के रूप में भगवान् शिव सभी इस्कॉन मंदिरों के लिए स्वीकार्य हैं?

जयपताका स्वामी : इस्कॉन मंदिर यदि यह एक क्षेत्र है, तो शिव क्षेत्रपाल हैं। मुझे ज्ञात नहीं है कि सभी मंदिरों को क्षेत्र माना जाता है। हमने सुना है कि एक मंदिर एक श्रीपाट हो सकता है, और यह कि मंदिर के एक निश्चित क्षेत्र में पवित्र है। और कुछ क्षेत्रों में 12 शालिग्राम, उसके लिए कुछ माप हैंतो हम भी भगवान् शिव को अपना सम्मान अर्पित कर सकते हैं। मुझे ज्ञात नहीं है की, अधिकांश इस्कॉन मंदिरों में भगवान् शिव हैं या नहीं। पर यदि वे ऐसा करते हैं, तो हम सभी वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ के रूप में उन्हें अपना सम्मान देते हैं। हरे कृष्ण!

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Transcribed by हिंदी अनुवाद प्रिती उपाध्याय द्वारा
Verifyed by अजित मधुसूदन दास द्वारा सत्यापित
Reviewed by व्रज कृष्ण दास द्वारा समीक्षित

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