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20201125 इस्कॉन कोरमंगला यात्रा के साथ ज़ूम सत्र

25 Nov 2021|Duration: 00:15:27|हिन्दी|Zoom Sessions|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुं दीन- तारणम्।
परमानन्द माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी : बैंगलोर में कोरमंगला यात्रा में आकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ; और प्रेमा पद्मिनी देवी दासी एवं विजय वेणुगोपाल दास द्वारा स्वागत के लिए धन्यवाद। अब पवित्र दामोदर मास चल रहा है। कल से दामोदर महीने के अंतिम पांच दिवस हैं, साथ ही भीष्म-पंचक आरंभ होगा। अतः हम आशा करते हैं कि भक्त भीष्म-पंचक का पालन करेंगे। मेरा एक वीडियो है जो फेसबुक पर भीष्म-पंचक व्रत पालन की व्याख्या करता है। और मुझे नहीं पता कि आपने जयपताका स्वामी ऐप डाउनलोड किया है या नहीं, इस माध्यम से ही मैं भक्तों के संपर्क में रहने का प्रयास कर रहा हूँ। मानव जीवन का उद्देश्य वास्तव में कृष्ण के साथ हमारे संबंध को पुनः जाग्रत करना है। चूँकि भौतिक संसार में लोग सोचते हैं कि हम शरीर हैं, और शरीर के सगे संबंधी आदि, शरीर को मुख्य वस्तु माना जाता है। परंतु वास्तव में, हम शाश्वत, चेतन आत्माएं हैं। हम इस विशेष शरीर में अधिकतम सौ वर्षों तक रह सकते हैं। परंतु मुझे लगता है कि बीमा कंपनियां 75 साल तक की गणना करती हैं। वे कहते हैं कि महिलाएँ, पुरुषों की तुलना में थोड़ा अधिक जीती हैं। वैसे भी, भगवद्गीता हमें बताती हैं कि शरीर की मृत्यु होती है परंतु आत्मा कभी नहीं मरती। हम एक जन्म से दूसरा जन्म लेते रहते हैं। हमारे कर्मों के आधार पर, हमें उत्तम या निम्नतर जन्म मिलता है। परंतु यदि हम पूरी तरह से कृष्णभावनाभावित हैं, तो हम पुनः जन्म नहीं लेंगे।

हम कृष्ण की सेवा करने के लिए आध्यात्मिक जगत में वापस जाएंगे। सामान्यतः, ऐसा आशीर्वाद प्राप्त करना अत्यधिक कठिन होता है। परंतु इस कलियुग को अधम युग कहा जाता है। यहाँ, भगवान् कुछ विशेष उपहार देते हैं। यदि हम उनके पवित्र नाम का जप करें, जो उनसे अभिन्न है, तो हम शुद्ध हो सकते हैं और वापस भगवान् के पास जा सकते हैं। अतः, हम सभी को भगवद्गीता पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रीमद्-भागवतम् पढ़ते हैं, इस पर चर्चा करते हैं और दूसरों को इसे समझने में सहायता करते हैं। ऐसे में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने का प्रयत्न करें। और इस प्रकार से कार्य करने पर, कृष्णभावनामृत से हमें असीमित सुख मिलता है। और जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। वास्तव में, इस भौतिक संसार में कोई भी स्थान मंगलदायक नहीं है। जैसे अभी हम विश्वव्यापी महामारी से जूझ रहे हैं, क्योंकि लोग मांस, चिकन, टर्की आदि खा रहे हैं; इसलिए प्रकृति हमें इस कोरोना वायरस से दंडित कर रही है, जो प्राणियों से आता है। किंतु कम से कम यह आदर्श स्थिति होगी कि लोग शाकाहारी हों, परंतु यदि वे हरि के पवित्र नाम का जाप कर सकें, तो यह सबसे उत्तम बात होगी। स्वाभाविक रूप से यदि कोई हरि के नाम का जप करता है, तब कृष्ण-प्रसाद का भोजन करना अत्यंत सरल है और हमें प्रसन्नता है कि भारत में हम घरों में पति-पत्नी और बच्चों को देखते हैं, वे अर्चा विग्रहों की पूजा करते हैं। श्रीकृष्ण, वे मांसाहारी भोजन स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप अपना भोजन श्रीकृष्ण को अर्पित करते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से कृष्ण-आहारी (कृष्णटेरीयन) या शाकाहारी होगा। अतः, हम आशा करते हैं कि लोग हरे कृष्ण का जप करेंगे, भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा और सेवा करेंगे और भगवान् कृष्ण की शिक्षाओं का अध्ययन करेंगे। भक्ति-वृक्ष कार्यक्रम करके हम भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का अध्ययन कर रहे हैं। हम चर्चा करते हैं कि हम कैसे समझ सकते हैं कि हम श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को लागू कर सकते हैं। यह कुछ सैद्धांतिक नहीं है, यह कुछ ऐसा है जिसे हमारे दैनिक जीवन में व्यावहारिक रूप से अभ्यास किया जाना चाहिए। हमने सुना कि कैसे चेन्नई में उनके भक्ति-वृक्ष समूह में 40 भक्त थे और उन्होंने उनसे गीता के लिए 18 दिवसीय, 18 दिवस में 18 अध्याय, 'गीता मेड ईज़ी' पाठ्यक्रम को प्रचारित करने के लिए कहा। उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप्स पर पोस्टर लगाने, कॉन्टैक्ट्स को प्रमोट करने का प्रयास करने को कहा। 40 भक्त! आप जानते हैं कि उन्होंने कितने लोगों का पंजीकरण कराया? 9,000! हर एक के इतने संपर्क थे। उसी तरह, आज रात हमारे पास आसानी से 161 लोग कॉल पर हैं। हम सरलता से 10,000 या अधिक प्राप्त कर सकते हैं। मैंने मेंगलुरु को चेन्नई की सफलता के बारे में बताया। वहाँ, नामनिष्ठ प्रभु, वे ज़ूम का खर्च नहीं उठा सकते थे क्योंकि 1000 उपयोगकर्ताओं के लिए ज़ूम काफी महंगा है। फिर उन्हें एक माइक्रोसोफ्ट प्रोग्राम मुफ्त में मिला, 25 प्रोग्राम। और उन्होंने सात भाषाओं कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, हिंदी, अंग्रेजी आदि में एक पाठ्यक्रम दिया। सात। वह 10 से 11 हजार लोगों का रजिस्ट्रेशन करा पाए। उन्होंने समूह के 20 भक्तों को कक्षाएं दीं। वे उनके लिए पहले से ही एक विशेष क्लास रखते और उन्हें तैयार करते कि क्या बोलना है। पहली सीरीज के बाद उनमें आत्मविश्वास आ गया और उन्होंने तीन और सीरीज की। 10 से 11 हजार प्रत्येक बार! तो, आप सोच सकते हैं कि आपके पास जब 150 या 160 भक्त हैं, आप कितने लोगों तक पहुंच बना सकते हैं। इसलिए, मैं लोगों को प्रोत्साहित करना चाहूँगा, उन्हें कृष्ण-भक्ति की आवश्यकता है और यह उनकी सहायता करने का एक सुअवसर है। हरे कृष्ण!

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Transcribed by अजित मधुसूदन दास द्वारा हिंदी अनुवाद
Verifyed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा सत्यापन
Reviewed by धर्मात्मा निमाइ द्वारा समीक्षा

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