मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥
जयपताका स्वामी: यह मेरी मंगलगिरी की प्रथम यात्रा है। मैंने अनेक बार पानक नृसिंह मंदिर की यात्रा की है परन्तु मेरा इस्कॉन मंगलगिरी में आना नहीं हुआ है । मैं यहाँ आकर अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैंने गौर निताई के आकर्षक विग्रहों के दर्शन किए, अपने मनोहर मंदिर को देखा ।
मानव जीवन का उद्देश्य कृष्ण की सेवा करना है । आंध्र प्रदेश में, हमारे पास बालाजी हैं तथा हमारे पास नृसिंहदेव हैं । भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने मंगलगिरि का भ्रमण किया, उन्होंने इन सभी स्थानों का भ्रमण किया तथा मंगलागिरि के पर्वतों पर, भगवान् चैतन्य के चरण कमलों के चिन्ह हैं। नरसरावपेट जो निकट ही है, वहाँ का भ्रमण भगवान् कृष्ण ने किया तथा मुचुकुंद को मोक्ष प्रदान किया था। प्रायः भगवान् श्री कृष्ण भी मंगलगिरि आए थे अतः अनेक कारणों से यह एक अत्यंत पावन स्थान है। मंगलगिरि, पानक नृसिंह अत्यन्त प्राचीन है। युगों युगों से। उस मंगलगिरि पर्वत की तलहटी में युधिष्ठिर महाराज द्वारा निर्मित्त लक्ष्मी नृसिंह का एक नवीन मंदिर है। मुझे इस विषय में जानकारी नहीं थी क्योंकि यह 5000 वर्ष पुरातन मंदिर है। तथा मंगलगिरि अत्यंत प्राचीन है। अतएव हमारे समक्ष इस पवित्र स्थान में एक नवीन गौर निताई का मंदिर है जो अत्यंत शुभ है। भगवान् चैतन्य ने सम्पूर्ण दक्षिण भारत की यात्रा ६ वर्ष में पूर्ण की । उन्होंने आंध्र प्रदेश में अपने निर्देश दिए तथा समस्त दक्षिण भारत में एक ही निर्देश पुनरावृत्तित किया ।
यारे देख , तारे कह ' कृष्ण ' - उपदेश । आमार आज्ञाय गुरु हञा तार ' एइ देश ॥ (चैतन्य चरितामृत मध्यलीला 7.128)
‘जो भी आपसे मिलें, उन्हें कृष्ण का संदेश सुनाएँ। मेरे आदेश पर गुरु बनें तथा अपने देश को मुक्त करें'। वस्तुतः लोग भौतिक वस्तुओं में अत्यधिक लीन रहते हैं तथा वे यही विचार करते हैं कि वे भौतिक जीवन में किस प्रकार प्रसन्न रह सकते हैं । परन्तु भौतिक जगत् में इन्द्रियाँ कभी सुखी तो कभी दुःखी होती हैं । अतः यदि हमारे पास अति उत्तम समय है, व्यापक पीड़ा है, तो हम अति उत्तम विचार करते हैं। परन्तु वास्तविक आनंद हमें तभी प्राप्त होता है जब हम कृष्ण की सेवा करते हैं । जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं तो हमें दिव्य आनंद की अनुभूति होती है । भगवान् चैतन्य ने ज्ञान दिया कि चाहे कोई गृहस्थ हो या कोई वैरागी , सभी को हरे कृष्ण का जप करना चाहिए - " गृहे थाको वने थाको सदा हरि बोले डाको"। अतएव हमें प्रसन्नता है कि आप मंगलगिरी में जप कर रहे हैं।
अब महामारी है, तो स्वाभाविक रूप से हमें सामाजिक दूरी बनाए रखना, मास्क का प्रयोग आदि नियमों का पालन करना होगा। अतः हमारे पास इंटरनेट के उपयोग से संचालित किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रम हैं। जैसे मेरा आपके मंदिर में वस्तुतः दर्शन करना । मैं आपके मंदिर में आकर अति प्रसन्न हूँ। प्रायः सभी स्थलों की यात्रा करना दुष्कर होता है। परन्तु अब इस महामारी के साथ, चिकित्सकों ने मुझे सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं । किंतु मुझे वस्तुतः मंदिरों के दर्शन से अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है। मुझे ज्ञात नहीं था कि हमारे पास इतना आकर्षक मंदिर है ! अनेक श्रद्धालु भक्तों ने इस मंदिर के निर्माण में सहयोग दिया है। यदि हम अपनी ऊर्जा का उपयोग कृष्ण की सेवा के लिए करते हैं, तो हम सर्वोत्तम आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं । वस्तुतः, कृष्ण के लिए हमारी सेवा ही सर्वोच्च आशीर्वाद है ।
यह पवित्र दामोदर मास है। तथा भगवान् दामोदर को मात्र एक छोटा सा दीपक अर्पित करने से, पर्वत समान पाप कर्म नष्ट किये जा सकते हैं तथा यह हमारे ज्ञान चक्षु खोलने में भी सहयोगी होता है । अतएव हम आशा करते हैं कि हर कोई प्रतिदिन एक दीपक जलाए, तथा मंडली /संघ को आभासी कक्षाओं में सम्मिलित करे। चेन्नई में उनके 9,000 भक्त थे जिन्होंने "भगवद्गीता मेड ईज़ी" में भाग लिया। मैंने पूछा कि ये किस प्रकार सम्भव हुआ ? तो उन्होंने बताया कि उनके पास कक्षा में मात्र 40 भक्त उपस्थित थे। परन्तु उन्होंने प्रत्येक भक्त को अपने सभी परिचित लोगों को कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए कहा । उन्होंने कार्यक्रम के विषय में कुछ विज्ञापन दिए जिन्हें प्रत्येक भक्त ने अपने फेसबुक पेज, व्हाट्सएप ग्रुप पर डाला तथा इस प्रकार उन्हें 9,000 व्यक्तिगण मिले। 40 से 9,000 तक। तत्पश्चात् मैंने मैंगलोर में इस कार्यक्रम के विषय में उल्लेख किया ।अतः उन्होंने अपनी मंडली को एकत्रित किया एवं उन्हें कुछ निःशुल्क माइक्रोसोफ्ट मीटिंग प्रोग्राम प्राप्त हुए। प्रत्येक कार्यक्रम के लिए 275 । उन्हें 25 कार्यक्रम निःशुल्क प्राप्त हुए । जिनमे 10 से 11 हजार व्यक्तिगण सम्मिलित होते हैं। यद्यपि इस लॉकडाउन में अधिकांशतः लोगों का मंदिर में प्रवेश करना सम्भव नहीं हो पाता हैं, परंतु वस्तुतः कार्यक्रम में इसकी कोई सीमा नहीं है। मध्य पूर्व, आंध्र प्रदेश, अमेरिका, कनाडा में कई भक्त इस अवसर का सदुपयोग भगवान् चैतन्य के संदेश का प्रचार करने के लिए करते हैं। यही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। कौन योग्य है तथा कौन अयोग्य है, इस भेदभाव के बिना भगवान् चैतन्य ने हमें यह कृपा प्रदान की । मुझे आशा है कि वे आप सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बरसाएँगे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम, हरे हरे।
श्रील प्रभुपाद ने इस संदेश को समस्त विश्व में पहुँचाया। उन पर भगवान् चैतन्य की असीम कृपा थी तथा वे चाहते थे कि हम इस संदेश को अधिकाधिक विस्तृत करें। श्रील प्रभुपाद की जय! तो आप भक्तों का परिचय कराना चाहते थे।
मैं कई बार पानक नृसिंह के दर्शनार्थ गया था। अब मैं व्हीलचेयर पर सीमित हूँ। मुझे नहीं ज्ञात है कि मैं पहाड़ी पर किस प्रकार से चढ़ सकता हूँ।
मैं मंगलगिरी में आकर शुद्ध हो गया हूँ! आप भक्त यहाँ सेवा कर रहे हैं, यह देखकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता होती है। प्रायः जब मैं दक्षिण भारत जाता हूँ, तो मैं हैदराबाद, विजयवाड़ा, राजमुंदरी, तिरुपति तथा चेन्नई जैसे मंदिरों में जाता हूँ। मंगलागिरी में मंदिर को देखकर मैं अति हर्षित हूँ। मैंने मेटपल्ली जैसे अनेक मंदिर देखे तथा ज़ूम पर मैं भिन्न- भिन्न मंदिरों का दर्शन करता हूँ। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि मुझे मायापुर में वास करना चाहिए, उन्होंने मुझे यात्रा करने के लिए भी कहा, परन्तु ये दोनों साथ में कैसे सम्भव हो सकते थे ? परंतु अब मैं दोनों कर पा रहा हूँ! मंगलगिरी के मंदिर में दर्शन करके मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।
आप सभी सदैव मेरे हृदय में रहेंगे !
सभी भक्तों को आशीर्वाद!
कृष्णे मतिर अस्तु!
हरे कृष्ण!
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