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20201117 प्रश्न और उत्तर सत्र

17 Nov 2021|Duration: 00:12:15|हिन्दी|प्रश्नोत्तर सत्र|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारिणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

प्रश्न : हम एक ऐसे भक्त के प्रति कैसे व्यवहार करते हैं जो हमारे अत्यंत आत्मीय हैं परंतु जो क्रोध, ईर्ष्या आदि से गम्भीरता पूर्वक वशीभूत हैं, जिसे संभवतः किसी विशेषज्ञ से इस विषय में सहायता लेने की आवश्यकता है । हम उनकी सहायता किस प्रकार कर सकते है ? उन्हें प्रत्यक्ष रूप से इस तथ्य से परिचय कराना सम्भव नहीं है क्योंकि वे ज्वालामुखी की भाँति विस्फोटक हो सकते हैं ।

जयपताका स्वामी : कहना कठिन है। मैं सोच रहा हूँ, मुझे ज्ञात नहीं, आप कह रहे हैं कि वह व्यक्ति आपके अत्यंत निकट है। सम्भवतः आप कोई एक वीडियो बनाए जब वे व्यक्ति क्रोधित अवस्था मैं हो और पुनः उस व्यक्ति को वह वीडियो दिखाएँ , यदि आप उस व्यक्ति के शुभचिंतक हैं। परंतु आप भयभीत हैं कि उन्हें दोष की अनुभूति नहीं है, परन्तु यह दार्शनिक प्रश्न नहीं है, यह एक व्यावहारिक विषय है, और किसी को कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करता है। मैं एक मानक उत्तर नहीं कह सकता क्योंकि यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकता है।

राजेश्वरी पेचिमुथु : मंदिरों के नामकरण में हमारे पास भगवान् श्री कृष्ण के मंदिरो के क़ई भिन्न भिन्न नाम हैं जैसे श्री श्री राधा कृष्ण मंदिर, श्री श्री राधा गोपीनाथ मंदिर, श्री श्री राधा पार्थ-सारथी मंदिर, मायापुर में हमारे पास श्री राधा माघव है। राधारानी के भिन्न नाम होते हुए भी, हम राधारानी के श्रीविग्रह के भिन्न नामकरण क्यों नहीं कर रहे हैं?

जयपताका स्वामी : बेंगलुरु में, वे श्री गंधर्विका गिरिधारी कहते हैं। कुछ मंदिरों में वे राधा का नाम प्रयोग करते हैं, और कुछ को वे राधारानी कहते हैं, कुछ मंदिर राधिका या गंधर्विका परन्तु लोग सामान्य रूप से केवल राधा कहते हैं, यद्यपि श्रीमती राधारानी के भी 108 या हजार नाम हैं। पर यह उन लोगों पर निर्भर करता है जो श्रीविग्रह का नामकरण करते हैं कि वे क्या नाम देते हैं, हमने पुंडरीकधाम में वृषभानवी के रूप में नामकरण किया । चूँकि पुंडरीक वृषभानु महाराज का अवतार है, और राधारानी का एक नाम वृषभानु की पुत्री वृषभानवी है। श्रीविग्रह को वृषभानवी मुरारी कहा जाता है।

रसप्रिया गोपीका देवी दासी : कई बार, परिस्थितिवश भी, हम आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिए गए निर्देशों का गम्भीरता पूर्वक पालन नहीं कर पाते हैं। तो क्या यह अपराध है, या हम घमंडी की स्थिति में है? इस प्रकार की आपराधिक मानसिकता से कैसे दूर रह सकते हैं?

जयपताका स्वामी : तो आप स्वतः ही पूर्व में ही इसका उत्तर दे चुके हैं । आपराधिक़ होना, हाँ! पवित्र नाम का तीसरा अपराध गुरु के आदेश की अवज्ञा करना है। क्या हमें घमंड है? सम्भवतः! इस आपराधिक मानसिकता से निवृत्ति कैसे पाएं? यही त्याग है। आप इसे त्याग सकते हैं!

गौरांग प्रसाद दास : जब कोई भक्त अच्छे पद पर आसित होता है, तो क्या यह उसके अच्छे कर्म के परिणाम होता है या क्या हमें यह समझना चाहिए कि यह भगवान् की दया है?

जयपताका स्वामी : हमने श्रील प्रभुपाद से सुना, आज या कल मुझे ठीक से स्मरण नहीं है, उन्होंने कहा कि भगवान् की कृपा से हमें ऐश्वर्य प्राप्त होता है। पुनः हम माया के वशीभूत (मोहग्रस्त) हो जाते हैं क्योंकि माया अत्यंत प्रबल है । अतः, हमें कदापि यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि हमारे पास भौतिक ऐश्वर्य है, तो यह भगवान् की दया से नहीं अपितु हमारे अच्छे कर्मों से है। क्योंकि हमें यह आशीर्वाद भगवान् की कृपा से प्राप्त हुआ है। सौ जन्मों तक वह हमें हमारा कोई भी कर्मफल दे सकते हैं। तो यदि हमारे पास अब अच्छे कर्म हैं, तो वह भी भगवान् की दया है। तो हमें भगवान् श्री कृष्ण का विस्मरण नहीं करना चाहिए । जो कुछ भी हमें प्राप्त है उसका सदुपयोग हमें कृष्ण की सेवा में करना चाहिए ।

कालिंदी सुंदरी देवी दासी : क्या भक्तिमय सेवाओं में क्रोध का उपयोग करना उचित है? मेरे पास बहुत से उत्तरदायित्व हैं। कभी-कभी यह उचित विधि से काम करता है और कभी-कभी प्रायः ये तब तक काम नहीं करता जब तक मैं क्रोध नहीं दिखाती। एक भक्त ने कहा कि क्रोध हमारे भजन को नष्ट कर देता है।

जयपताका स्वामी : सामान्यतः यदि कोई भगवान् श्री कृष्ण या गुरु या कृष्ण के शुद्ध भक्तों को रुष्ट करता है तो हम क्रोध का उपयोग करते हैं। हम इसका उपयोग मिथ्या अहंकार की तुष्टि के लिए नहीं करते हैं कि मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया जा रहा है अतः मुझे क्रोध आता है। हमें किसी को सेवा के लिए प्रेरित करना है परन्तु इस क्रियाकलाप का कुछ महत्व नहीं है जिसके कारण हमारे मध्य के सम्बंध आहत (बाधित) हो ।

तो, क्रोध वह है जिसका हमें सही अर्थों में उपयोग करना चाहिए, और संभवतः आपको किसी परिस्थिति की अनुभूति दृढ़ता पूर्वक हो सकती हैं और फलतः आप कुछ भाव प्रकट करते हैं, परन्तु यही एकमात्र विधि तो नहीं हो सकती। अतः हमें यह देखना चाहिए कि कम से कम दुष्प्रभावों के साथ सबसे प्रभावी क्रिया कलाप क्या है।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रीती उपाध्याय द्वारा हिंदी अनुवाद
Verifyed by अजित मधुसूदन दास द्वारा सत्यापन
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा समीक्षित

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