श्री श्रीमद् जयपताका स्वामी महाराज द्वारा 7 नवंबर 2020 को इस्कॉन बैंगलोर - गंधर्विका नरसिंह गिरिधारी मंदिर संघ के साथ जूम सत्र, श्री मायापुर धाम,भारत से ।
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्रीगुरुम् दीन तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्॥
जयपताका स्वामी: मैं लक्ष्मी नृसिंह मंदिर में पुनः आकर अति प्रसन्न हूँ । गंधर्विका गिरिधारी गौरांग मंदिर। यह दामोदर का पवित्र मास है । समस्त बारह माहों में से, ये भगवान् कृष्ण का सर्वप्रिय माह माना जाता है। अतः हम इस माह का लाभ उठाते हैं तथा यशोदा-दामोदर को दीप दान अर्पित करते हैं। हम दामोदरष्टकम् का गायन करते हैं तथा विभिन्न भक्तिमय सेवाओं में संलग्न होते हैं। एक बार भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु से सनातन गोस्वामी (जो पहले एक प्रधानमंत्री थे) ने पूछा कि "लोग मुझे पंडित कहते हैं, परन्तु वस्तुतः मैं मूर्ख हूँ, क्योंकि मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ । अतः कृपया आप मुझे बताएँ कि मैं कौन हूँ?” तब भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, "जीवेर स्वरूप हय नित्येर कृष्ण-दास: । तुम एक जीव हो, भगवान् की तटस्थ शक्ति , तुम भगवान् कृष्ण की नित्य सेवा कर रहे हो"। अतः इस प्रकार उन्होंने सनातन गोस्वामी को उनके वास्तविक सनातन-धर्म से अवगत कराया । सामान्यतः लोग विचार करते हैं कि वे शरीर हैं। यदि वे ईश्वर में श्रद्धा रखते भी हैं, तो ईश्वर से कुछ भौतिक सुखों के लिए प्रार्थना करते हैं। उन्हें ज्ञात नहीं कि यथार्थ में भगवान् की सेवा करने से सर्वोच्च आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है। अतः वे इस विषय पर ध्यान केंद्रित नहीं करते एवं सदैव इंद्रियतृप्ति में लीन रहते हैं। अतएव उन्हें “गो-दास“ अर्थात् इंद्रियों के दास कहा जाता है । इस प्रकार तथाकथित प्रख्यात नेता भी अपने भौतिक पदों से अत्यंत आसक्त हैं एवं उन्हें त्यागने के लिए अनिच्छुक हैं।
हम श्रीमद्-भागवतम् के प्रथम स्कंध में देखते हैं कि युधिष्ठिर महाराज को जब यह ज्ञात हुआ कि भगवान् कृष्ण इस भौतिक जगत् को त्याग चुके हैं, तो वे अविलम्ब अपने पौत्र को सम्पूर्ण राज्य हस्तांतरित कर एवं सब कुछ त्याग कर हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। उन्होंने अपना राजसी महल, राजसी वस्त्र, अपना सिंहासन, अपना मुकुट इत्यादि सब त्याग दिये एवं वन की ओर प्रस्थान कर गए । हमें कलियुग में उनका अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं है, किंतु श्री चैतन्य-चरितामृत में श्रीवास पंडित के निवास स्थान को भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के आश्रम के रूप में वर्णित किया गया हैं। हम चाहते हैं कि गृहस्थ अपने गृह में भक्ति-योग का अभ्यास करें, इस प्रकार उनका घर एक आश्रम बन जाता है, एक भक्ति-आश्रम । घर में उनके समक्ष अर्चा-विग्रह तथा भक्ति सेवा की विभिन्न गतिविधियाँ हैं । चूँकि हम भौतिक जगत् में हैं, हम कभी आनंद तो कभी पीड़ा का अनुभव करते हैं । यही इस भौतिक जगत् का मूल स्वभाव है । लोग मुझसे प्रश्न करते हैं, "जब जीवन में इतनी कठिनाइयाँ हैं तो मैं भगवान् कृष्ण की सेवा कैसे कर सकता हूँ?" परंतु जीवन में कठिनाईयाँ तो सदैव होती हैं , विशेष रूप से कलियुग के सांसारिक जीवन में। परंतु ये विपत्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर की कृपा हैं क्योंकि हम ऐसी परिस्थितियों में यथार्थ में भगवान् श्री कृष्ण को स्वयं को समर्पित कर सकते हैं । देवता स्वर्ग-लोक से आते हैं तथा असंतोष प्रकट करते हैं कि उनके जीवन में कोई समस्या नहीं है अतः वे भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में अधिक चिंतन नहीं करते । उनके समक्ष मात्र एक समस्या है कि कभी-कभी उन पर दानवों का आक्रमण हो जाता है। तथा द्वितीय समस्या यह है कि उन्हें अन्य कोई समस्या नहीं है। अतः वे उलाहना देते हैं कि "हम कैसे भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा कर सकते हैं जब हमारे जीवन में कोई समस्या ही नहीं है?
हम ध्यान-भंग हो जाते हैं तथा विचार करते हैं कि हम भौतिक रूप से सुखी हैं।” यहाँ भौतिक जगत् में लोग कहते हैं, “जब समस्याएँ हैं तो मैं भगवान् कृष्ण की सेवा कैसे कर सकता हूँ ? “ किंतु वास्तविक समस्या तो नर्क में है। इतना घोर कष्ट है कि यह सचमुच भयानक है। अतः ये अत्यंत निंदनीय है कि हम उस पीड़ा में भी भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में चिंतन करने में असमर्थ हैं। स्वर्ग में भौतिक इन्द्रियतृप्ति के कारण अत्यधिक आनंद है अतः भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में अधिक चिंतन सम्भव नहीं । हमें यहाँ इस भौतिक जगत् में प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि यहाँ हम संतुलित हैं। अल्प आनंद , अल्प कष्ट । अधिक कष्ट नहीं, बस थोड़ा ही । अधिक आनंद नहीं, बस थोड़ा ही ! यह वस्तुतः भगवद्धाम पुनः जाने के लिए एक उत्तम स्थान है। तथा हमें यह समझने में सहायता करता है कि भौतिक जगत् वह स्थान नहीं है जहाँ हम रहना चाहते हैं। हम नित्य-निरंतर भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करने के लिए भगवद्धाम लौट जाना चाहते हैं। यदि हम पूर्ण रूप से भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में निरंतर लीन रहते हैं, तो हमें इस भौतिक जगत् , इस दुःखालय में भी, पीड़ा का बोध नहीं होगा। कभी-कभी, भक्त अपने गुरु या भगवान् श्री कृष्ण से वियोग का अनुभव करते हैं। स्वाभाविक रूप से यह एक प्रकार का कष्ट है परन्तु साथ ही, यह एक प्रकार का आध्यात्मिक आनंद भी है। मनुष्य को हृदय में कुछ आध्यात्मिक संतुष्टि का अनुभव होता है। क्योंकि ये यथार्थ में भगवान् श्री कृष्ण के साथ हमारा विशुद्ध संबंध है । हम इसकी तुलना किसी भौतिक वस्तु से नहीं कर सकते। मैं मात्र यह कहना चाहता था कि ये दामोदर-मास भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करने के लिए है । तथा ऐसा करके आप अपने पूर्वजों, अपने वंशजों एवं स्वयं के मोक्ष का मार्ग सुनिश्चित कर सकते हैं । अतः भगवान् की कृपा का लाभ उठायें, 'हरे कृष्ण' का जप करें, दीपक अर्पित करें तथा कृष्णभावनाभावित बनें। आप भक्ति-वृक्ष समूहों का भाग हैं , अतः आप अत्यंत भाग्यशाली हैं । श्री श्री लक्ष्मी नरसिंह गंधर्विका गिरिधारी गौरांग मंदिर का भाग हैं, अतः आप कृष्णभावनाभावित होने के लिए इस मानव जीवन का सदुपयोग कर सकते हैं। तथा ये समझकर कि कैसे भगवान् श्री कृष्ण इस भौतिक जगत् में प्रकट तथा अप्रकट तो होते
हैं,परन्तु वे भौतिक शक्ति के अधीन नहीं हैं । वे स्वेच्छा से प्रकट एवं अप्रकट होते हैं तथा स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं । हम इस दामोदर-मास को उत्सव रूप में मनाते हैं जहाँ भगवान् श्री कृष्ण को उनकी माता यशोदा ने बाँधा है। तथा वे उनके द्वारा बँधने के लिए सहमत हो जाते हैं क्योंकि वो उनसे अत्यंत प्रेम करती हैं तथा उनकी सेवा के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। इस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण भक्तों के प्रेम का प्रत्युत्तर देते हैं। मैं आशा करता हूँ कि आप सभी दामोदर मास की इस विशेष कृपा का लाभ उठाएँगे तथा उत्साहपूर्वक भगवान् कृष्ण की सेवा में संलग्न होंगे। साथ ही अपने मित्रों, सहकर्मियों, सभी को भी कृष्णभावनाभावित गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। मैंने चेन्नई में पूछा, गीता-कक्षा में उनके 40 भक्त थे। उन्हें 9000 पंजीकरण कैसे मिले? 40 से 9,000 तक। उन्होंने कहा, उन्होंने सभी भक्तों से कहा कि वे अपने मित्रों को बताएँ, भिन्न- भिन्न व्हाट्सएप ग्रुप में सम्मिलित हों, सभी को संदेश भेजें। उन्होंने गीता मेड ईज़ी कोर्स के विषय में कुछ पोस्टर भेजे। इस प्रकार उन्हें 9000 रजिस्ट्रेशन प्राप्त हो गए। इसी प्रकार , मंगलुरु में उन्हें 11,000 पंजीकरण प्राप्त हुए ।भक्तों के अथक उत्साह के कारण। वे सभी को इस मानव जीवन का सदुपयोग करने में सहायता करना चाहते हैं तथा श्री कृष्ण की सेवा करना चाहते हैं,
पारलौकिक परमानंद का आस्वादन लेना चाहते हैं तथा भगवद्धाम पुनः लौट जाना चाहते हैं। वैसे भी, मेरी तीव्र इच्छा है कि मेरे सभी शिष्य तथा मेरे क्षेत्र के अन्य भक्त, कृष्णभावनामृत में अपनी पूर्ण क्षमतानुसार विकसित हों अतः हम चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् का अत्यंत परम भक्त बने। हरे कृष्ण!
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