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20201106 बलरामदेश के भक्तों के साथ जूम सत्र।

6 Nov 2020|Duration: 00:24:47|हिन्दी|Zoom Sessions|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्रीगुरुम् दीन तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि ॐ तत् सत्॥

जयपताका स्वामी: दामोदर के इस पवित्र मास में बलरामदेश की यात्रा करके मुझे अत्यंत प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है। बारह महीनों में से, यह कार्तिक मास / दामोदर मास भगवान् श्री कृष्ण को सर्वाधिक प्रिय है। यह एक विशेष अनुग्रह है कि इस माह में किया गया कोई भी भक्तिमय कार्य अनेक गुना अधिक फलदायी होता है। कोई शास्त्र कहता है सौ गुना , कोई कहता है हजार गुना, इसका अर्थ है कि यदि आप 25,000 डॉलर मूल्य की कार खरीदते हैं तो आपको उसका मात्र 1% अर्थात् 250 डॉलर ही खर्च करना होगा, शत प्रतिशत नए वाहन के लिए । इस प्रकार , अल्प भक्ति बहुत अत्यधिक आध्यात्मिक पदोन्नति का मार्ग सुनिश्चित कर देती है। परंतु दीक्षित भक्तों के लिए कोई समस्या नहीं है क्योंकि वे नियमित उपभोक्ता हैं; उन्हें सभी प्रकार के लाभ सदैव प्राप्त होते हैं। यह विशेष रूप से कनिष्ठ भक्तों को आकर्षित करने के लिए है। तो चैन्नई में चालीस भक्तों के लिए कक्षा का आयोजन किया जा रहा था, तत्पश्चात् उन्होंने "भगवद् गीता मेड ईज़ी" का आयोजन किया एवं उन्हें 9,000 पंजीकरण मिले । मैंने उनसे पूछा, "इसका रहस्य क्या था?" उन्होंने कहा कि उन्होंने अनेक प्रकार के यत्न किए। उन्होंने चालीस लोगों को अपने-अपने व्हाट्सएप संपर्कों को संदेश भेजने का सुझाव दिया; उनके कार्यालय के मित्र, उनके परिचित, उनके पड़ोसी, तथा फेसबुक पर। कुछ लोग सम्पर्क प्राप्त करने हेतु विभिन्न समूहों, विभिन्न फेसबुक पृष्ठों में सम्मिलित हो गये ।तत्पश्चात उन्होंने सभी नए संपर्कों को पोस्टर भेजे , जिससे उन्हें 9,000 पंजीकरण मिले। मात्र चालीस भक्तों के माध्यम से 9,000 पंजीकरण सम्भव हो गये ।

इस दामोदर मास में लोगों को भक्ति सेवा करने के लिए प्रेरित करना एक विशेष कृपा है। तथा जो लोग इस दामोदर माह में दीपदान में सहभागी होते हैं, वे वस्तुतः आनंदित अनुभव करते हैं । साधारणतः लोग अत्यधिक बद्ध होते हैं, तथा वे सोचते हैं कि वे ये शरीर हैं ।किंतु शरीर एवं शरीर की इन्द्रियाँ कभी सुखी होते हैं, तो कभी व्यथित ।इस महामारी से भौतिक जीवन के क्लेश में अधिक वृद्धि हो गयी है। हमारी एक चिकित्सक से भेंट हुई जो कोविड-19 से ठीक हो गये थे किंतु फिर भी उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं थीं, वे अवसादग्रस्त थे। यद्यपि वे स्वस्थ हो गए थे, किंतु कोविड के बाद के प्रभाव अभी भी उन पर थे । वे भक्तों द्वारा पञ्च-तत्व मंत्र तथा हरे कृष्ण- मंत्र का जप करने की बात सुन कर प्रसन्न थे। अतः यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भक्त स्वयं कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करें तथा अन्य लोगों में इसका प्रचार एवं प्रसार करें ।

मैं आज प्रातः विचार कर रहा था कि कैसे मेरे सभी शिष्यों को भी कृष्ण भावनामृत में उन्नति करनी चाहिए । प्रथम तथा द्वितीय दीक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी उन्हें श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करते रहना चाहिए। उन्हें श्रीमद्-भागवतम् का पठन करके भक्ति-वैभव तथा भक्तिवेदांत की उपाधि प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। उन्हें चैतन्य-चरितामृत का अध्ययन भी करना चाहिए तथा भक्ति-सार्वभौम की उपाधि भी प्राप्त करनी चाहिए । इस प्रकार उन्हें अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

भगवान् कृष्ण की सेवा करके, हम वस्तुतः इस भौतिक जगत को पार करके आध्यात्मिक जगत जा सकते हैं। जैसे सूर्य पूर्व में उदय होता है तथा पश्चिम में अस्त होता है। कुछ आदिवासियों के विचारानुसार सूर्य पूर्व में जन्म लेकर पश्चिम में मृत्यु को प्राप्त होता है। परंतु वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि सूर्य की मृत्यु नहीं होती है, चाहे वो हमें दृष्टिगोचर हों अथवा नहीं अर्थात् सूर्य सदैव यथास्थान विद्यमान है, हम उसे देख पायें अथवा नहीं। इसी प्रकार भगवान् इस ब्रह्मांड में कभी प्रकट होते हैं, कभी अप्रकट होते हैं। ऐसा कदाचित नहीं है कि भगवान् विद्यमान ही नहीं हैं अपितु वे स्वेच्छा से यहाँ प्रकट एवं अप्रकट हो सकते हैं । यदि हम निम्न श्लोक समझ जाएं "जन्म कर्म च में दिव्यम एवम यो वेत्ति तत्त्वत:। त्यक्त्वा देहम पुनर्जन्म नैति माम एति सो अर्जुन॥" [भ. गी. 4.9] अर्थात् यदि हम भगवान् श्री कृष्ण के प्राकट्य एवं उनके क्रियाकलापों की दिव्यता का सत्य समझ जायें तो हम शरीर त्यागने के उपरांत भगवान् श्री कृष्ण को प्राप्त करते हैं तथा पुनः जन्म नहीं लेते हैं। यही जीवन की वास्तविक पूर्णता है।

बलरामदेश में कार्यरत होने के साथ -साथ आप आत्म-साक्षात्कार का उच्चतम अनुभव भी प्राप्त कर सकते हैं। भगवान् चैतन्य ने कहा कि, गृहे थाको वने थाको ,सदा हरि बले डाको । तथा नरोत्तम दास ठाकुर, जिनका कल तिरोभाव दिवस था, उनके मतानुसार जो भी गृहस्थ या वानप्रस्थ हैं, यदि वे , "हे गौरांग!" का जप करते हैं तो मैं उनका संग चाहता हूँ। अतः हम चाहते हैं कि भक्त भगवान् कृष्ण के प्रति अपने सुप्त प्रेम को जागृत करें । दामोदर लीला में, हम देखते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण सदैव भगवान् हैं। यहाँ तक कि जब वे एक नन्हें शिशु हैं, वे तब भी भगवान् हैं। उन्होंने अर्जुन के दो वृक्षों को नीचे खींच लिया तथा कुबेर के पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया । इस प्रकार नलकुवेर एवं मणिग्रीव को भगवान् कृष्ण द्वारा मोक्ष की प्राप्ति हुई । किंतु उनकी माँ ने उन्हें नन्हें बालक के रूप में देखा। भगवान् कृष्ण को प्रेम करने वाले माता-पिता, मित्र एवं प्रेमियों द्वारा स्वयं पर प्रभुत्व अत्यंत प्रिय है । तो, वस्तुतः श्री कृष्ण अजित हैं, उन्हें कभी जीता नहीं जा सकता । दामोदर लीला में माता यशोदा कितनी भी रस्सियाँ लातीं वो सदैव दो अंगुल छोटी होती थीं । यह महत्वहीन था कि वो कितनी नई रस्सियाँ लाईं थीं, वे सदैव छोटी ही होती थीं। किंतु भगवान् कृष्ण ने देखा कि उनकी माँ अथक परिश्रम कर रही थीं, उन्हें पसीना आ रहा था तथा उनमें शुद्ध भक्ति थीं । यद्यपि, इसमें कुछ भौतिक भ्रम है। किंतु भगवान् कृष्ण इस लीला द्वारा यह संदेश देते हैं कि हम अपनी प्रेममयी भक्ति द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं ।

हम आशा करते हैं कि बलरामदेश के सभी शिष्य, पुरुष एवं महिलाएँ श्री कृष्ण के प्रति अपने सुप्त प्रेम को जागृत कर उनका शाश्वत संग प्राप्त करेंगे। जो मेरे शिष्य नहीं हैं उन्हें भी, एवम् सभी भक्तों को जीवन की ये सार्थकता प्राप्त करनी चाहिए। मैं यहाँ आकर अत्यंत प्रसन्न हूँ । तथा मैं समझता हूँ कि आप सभी अनेक दिव्य सेवाएँ कर रहे हैं। हम आशा करते हैं कि आप अपनी सेवाओं में अधिकाधिक वृद्धि करने में सफल होंगे। 1 नवंबर को हमने मलेशियाई दामोदर मास का शुभारम्भ किया । तथा 6,528 लॉगिन प्राप्त कर मलेशिया ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया । मैं इस विषय से अनभिज्ञ हूँ कि बलरामदेश में आपका कीर्तिमान क्या है? परंतु अन्य भक्तों के सहयोग से आप इस कीर्तिमान को तोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयत्न अवश्य कर सकते हैं। मैं यहाँ आकर अत्यंत प्रसन्न हूँ ।आप कुछ प्रश्न पूछना चाहें तो पूछ सकते हैं, तत्पश्चात् हम आगे बढ़ सकते हैं।

प्रश्न: हरे कृष्ण गुरु महाराज! अपने चरण कमलों में मेरा सादर प्रणाम स्वीकार करें। गुरु महाराज मात्र एक छोटा सा स्पष्टीकरण, दो दिन पूर्व आपने उल्लेख किया था कि जब भगवान् के विग्रहों का स्मरण करते हैं तो हमें शारीरिक रूप से अस्वच्छ नहीं होना चाहिए । उदाहरण के लिए, प्रातःकाल या रात्रि में सोते समय,जब हम अस्वच्छ होते हैं, तो क्या यह उचित है कि हम मंदिर के अर्चविग्रहों के रूप में भगवान् के विषय में चिंतन करें । मैं आपसे मात्र यह अनुरोध करना चाहता हूँ कि आप इसे स्पष्ट करें।

जयपताका स्वामी: मुझे वह बात स्मरण नहीं है। वस्तुतः पवित्र नाम का जप करने में कोई कड़े एवं सख़्त नियम नहीं होते हैं । एक बार एक नन्हा बालक भगवान् चैतन्य के लिए शौचालय जाने के लिए बाल्टी लेकर जा रहा था। भगवान् चैतन्य ने उससे पूछा, "आप हरे कृष्ण का जप क्यों कर रहे थे ? यह एक स्वच्छ स्थान नहीं है!" बालक ने उत्तर दिया , "क्या होगा यदि शौचालय में ही अपना शरीर त्याग दें ? आपको प्रत्येक क्षण जप करना है। तब भगवान चैतन्य ने कहा, "अब तुम मेरे गुरु हो।" इसलिए, उस दिन से उन्हें "गोपाल गुरु" के रूप में जाना जाने लगा। जब हम मंदिर जाते हैं, तो हम अर्च विग्रहों के समक्ष अस्वच्छ (अशुचि) नहीं जाना चाहते, क्योंकि अर्च विग्रह श्रीकृष्ण-अवतार हैं। परंतु भगवान् का स्मरण तो हम कभी भी कर सकते हैं। -

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रतिलेखन का हिन्दी अनुवाद: यशी मीरचंदानी द्वारा
Verifyed by सत्यापित : राधिका प्रेमा भक्ति देवी दासी द्वारा
Reviewed by समीक्षित : भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा

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