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20201104 l ज़ूम प्रश्नोत्तर सत्र | श्री धाम मायापुर ,भारत

4 Nov 2020|हिन्दी|प्रश्नोत्तर सत्र|Transcription|Śrī Māyāpur, India

श्री श्रीमद् जयपताका स्वामी का प्रश्न और उत्तर सत्र 4 अप्रैल 2020, श्री धाम मायापुर ,भारत मैं I

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

प्रश्न: हेमांग हलधारा दास- प्रतिदिन कम से कम दो घंटे पुस्तकें। गुरु महाराज , एक ब्रह्मचारी के रूप में, प्रतिदिन दो घंटे संभव है, परंतु एक कार्मिक भक्त के रूप में , क्या मैं श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन और प्रचार समय की उपलब्धता के अनुसार कर सकता हूँ ? क्या आप कृपा कर स्पष्ट कर सकते हैं ? या मात्र 45 मिनट श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों के साथ प्रचार सेवा पर ध्यान केंद्रित कर सकता हूँ क्योंकि अनेक बार हमें आत्मसात करने की आवश्यकता होती है?

जयपताका स्वामी: मुझे ज्ञात नहीं है कि तुम कहाँ के रहने वाले हो? बेंगलुरु तीव्र ट्रैफिक जाम के लिए प्रसिद्ध है। तो कोई भी ईयरफोन पर श्रील प्रभुपाद की पुस्तकें सुन सकता है। या यदि कोई गाड़ी चला रहा है तो लाउडस्पीकर सिस्टम का प्रयोग कर सकता है । तो वह भी पढ़ने के समान ही है । तो जब एक महिला भोजन पका रही होती है तो वह ऑडियो में श्रील प्रभुपाद के रिकॉर्ड किए गए व्याख्यान या भगवद गीता सुन सकती है। अतः देखें कि आपके पास अपनी नियत दिनचर्या के अतिरिक्त कितना रिक्त समय है और आप उसमें कितना समय अध्ययन में और कितना समय प्रचार करने में उपयोग कर सकते हैं। यदि आप जो पढ़ते हैं उसका वाचन नहीं कर रहे हैं, तो आप उसको विस्मृत कर सकते हैं। अतः व्याख्यान देना भी पठन पाठन का अंग है। यह आपको शिक्षाओं को आत्मसात करने में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न: श्रीमन् बलराम कृष्ण दास और श्रीरूप माधवी देवी दासी- अपनी पुरी की यात्रा के समय हमने टोटा गोपीनाथ मंदिर के गर्भगृह और महाप्रभु की वस्त्र-समाधि के दर्शन किये । मैं समझता हूँ कि महाप्रभु के केश जो एकमात्र वपु-समाधि है ,अभी हमारे दर्शन के लिए उपलब्ध है । कृपया मुझे यह समझने में सहायता करें कि क्या वस्त्र-समाधि को भी वपु-समाधि का एक भाग माना जा सकता है?

जयपताका स्वामी: वपु -समाधि ,समाधि में रखे शरीर का एक भाग है। और पुष्प-समाधि वे पुष्प हैं जो शरीर पर थे, वो समाधि में रखे थे ? वस्त्र-समाधि, वह वस्त्र होगा जो महाप्रभु ने पहना था । मुझे ज्ञात नहीं है कि क्या हम इसे वपु-समाधि कह सकते हैं, परन्तु निश्चित रूप से यह शुभ है। और एक प्रकार से महाप्रभु के शरीर और उनके द्वारा पहने गए वस्त्रों में कोई अंतर नहीं है।

प्रश्न: ककुली रानी - जब मैं अपने कार्यस्थल पर होती हूँ तो प्रातः समय की अनुपलब्धता के कारण मैं भोजन तैयार नहीं कर पाती और जब मुझे भूख लगती है ,अतः मैं किराना से कुछ जलपान क्रय करती हूँ । मेरे प्रिय आध्यात्मिक पिता, क्या मैं जो कर रही हूँ, वह सही है? चिप्स तथा अन्य वस्तुएँ जैसे खाद्य पदार्थ मशीनों द्वारा निर्मित किए जाते हैं और मशीनों द्वारा पैक किए जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह आपत्तिजनक है और मै उसे ग्रहण करती हूँ । मैं उन्हें मानसिक रूप से अर्पण करती हूँ और सूखे तुलसी के पत्ते डालकर उसका सेवन करती हूँ । क्या यह भगवान द्वारा स्वीकार किया जाएगा ? क्या यह सही है? क्या मैं जो कर कर रही हूँ ? कृपया आप प्रकाश डाले ।

जयपताका स्वामी: फल, नमकीन सामग्री, दुग्ध उत्पाद, व मेवा, सूखे मेवे आदि अर्पित किए जा सकते हैं। वे भगवान को अर्पित कर सकते हैं, स्वच्छ तुलसी पत्र डालें और उन्हें अर्पित करें। जिन वस्तुओं का निर्माण मशीनों या लोगों द्वारा होता है यदि उनकी सामग्री शाकाहारी है, तो हम तीन बार श्री विष्णु कह सकते हैं परंतु यह एक प्रकार की आपात स्थिति है। परंतु यह अर्पित करने योग्य नहीं है।

प्रश्न: कृष्ण-कथा देश से कुशाल, 10 वर्ष: यदि किसी गाँव में कुशल राजा है, तो लोग भी प्रसन्न होंगे । तो हमारे शरीर में परमात्मा वास कर रहे हैं परन्तु तब भी हम क्यों पीड़ित हैं ?

जयपताका स्वामी: मैं एक उत्तम राजा और परमात्मा के मध्य संबंध नहीं देखता। सबके ह्रदय में परमात्मा है। परन्तु हम परमात्मा के परामर्श के विरुद्ध पाप कर्म कर रहे हैं । इस कारण हम भुगत रहे हैं। हमारे दुःख पिछले सौ जन्मों में किए गए किसी पाप कर्म के कारण हो सकते हैं। यद्यपि हमें स्मरण नहीं है पर परमात्मा को सब कुछ स्मरण है। अतः यदि हमारे कर्म ऐसे हैं तो हमें दुख उठाने देंगे। और यदि हम भगवान को कार्तिक में एक दीपक अर्पित करते हैं तो वे कहते है कि हम पहाड़ के सदृश पाप कर्म से भी मुक्त हो सकते हैं। तो जो लोग अच्छे कर्म कर रहे हैं, जो लोग बुरे कर्म कर रहे हैं, उनके ह्रदय में परमात्मा है । पर जो उत्तम कर्म करते हैं, उन्हें उत्तम फल प्राप्त होता है। जो लोग अनैतिक कर्म करते हैं, उन्हें अनैतिक फल प्राप्त होता है।

प्रश्न: कृष्ण और सम्यक [आश्रय शिष्य]: क्या हम आध्यात्मिक प्रयास तथा इच्छाएँ कर सकते हैं? यदि हां, तो हमें उन्हें किस सीमा तक रखना चाहिए? आपके अद्भुत शब्दों के लिए सदा सर्वदा के लिए मैं आभारी हूँ।

जयपताका स्वामी: स्वाभाविक रूप से हमारी आध्यात्मिक इच्छाएँ, आध्यात्मिक गतिविधियाँ हो सकती हैं । यही भक्तिमय सेवा है, यह एक आध्यात्मिक प्रयास है। यदि हम शुद्ध भक्तों की संगति करना चाहते हैं तो हम कृष्ण, भगवान चैतन्य की दया की इच्छा रखते हैं, ये सभी आध्यात्मिक इच्छाएँ हैं।

प्रश्न :शचिपुत्र अवतार दास [बंगाली]: आपने कल प्रश्नोत्तर सत्र में कहा था कि हमें नियमित रूप से हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने की प्रणाली का पालन करना चाहिए। इस स्थिति में, कार्यालय में कर्मियों की संगति के साथ भी, मैं महा-मंत्र का जप करने में नियमित कैसे हो सकता हूँ?

जयपताका स्वामी: यह निर्भर करता है, आपका कार्य-क्षेत्र क्या है । तो, उनका प्रश्न था कि हमें सदैव हरे कृष्ण महा-मंत्र का जप करना चाहिए, हम वह कार्य कैसे कर सकते हैं ? वह बांग्लादेश से है। तो, यह निर्भर करेगा कि आपका कार्य क्या है। यदि आप किसी कारखाने या किसी और स्थान में कार्यकर रहे हैं, तो आप कार्य करते हुए गा सकते हैं। यदि आप किसी कार्यालय में कार्य कर रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से आपको अपने कार्यालय का कार्य ही करना होगा। कार्यालय का कार्य करने से पहले आप ओम तत् सत का जाप कर सकते हैं। मैं जो करने वाला हूँ, वह एक सेवा है, आप यह भगवान् कृष्ण से कह रहे हैं । वास्तव में ,आप अपने वेतन से भोग लगा सकते हैं, मंदिर को कुछ दान कर सकते हैं और आप और आपका परिवार भी जीवित रहने वाला है। तो प्रारम्भ में आप कह सकते हैं कि ओम तत् सत! यदि आप जप न कर पाने पर भी मानसिक रूप से जप करते हैं, तो वैसे भी आप अपना कार्य कर रहे हैं, जो आपके तटस्थ कार्य का ही भाग है।

प्रश्न: मेरा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ है और भगवान बालाजी की उपस्थिति मे, मेरा उपनयन समारोह किया गया और मुझे हमारे पैतृक स्थान पर हमारे परिवार के पुजारी द्वारा ब्राह्मण जनेऊ प्रदान किया गया था। मेरा प्रश्न यह है कि क्या मैं उपनयन समारोह के आधार पर गायत्री मंत्र का जाप करने के लिए योग्य हूँ या इस्कॉन में अपनी दूसरी दीक्षा प्राप्त करने तक प्रतीक्षा करूं? कृपया इस विषय में मेरा मार्गदर्शन करें।

जयपताका स्वामी: जनेऊ समारोह को उपनयनम कहा जाता है। जो लोग द्विज परिवार में जन्म नहीं लेते हैं, हम उन्हें उपनयनम और पंचरात्रिक मंत्र देते हैं। तो आप अपनी स्मृति गायत्री का जाप कर सकते हैं जो आपको अपने उपनयनम से प्राप्त हुई है और दूसरी दीक्षा के समय, आपको अपने पंचरात्रिक मंत्र प्राप्त होंगे। आपको सात मंत्र प्राप्त होंगे। एक वैदिक है, जो उपनयनम और छह पंचरात्रिक हैं। मेरे अनेक शिष्य जो भारत से हैं, उनके पास पहले से ही उनका उपनयनम था तो वे स्मृति गायत्री का जप करना जारी रख सकते हैं और जब वे दूसरी दीक्षा प्राप्त करते हैं, तब वे पंचरात्रिक मंत्र प्राप्त करते हैं । चूंकि पश्चिमी देशों में, या जो द्विज नहीं है , वे इसे ब्राह्मणवादी दीक्षा कहते हैं। वास्तव में, यह ब्राह्मणवादी और पंचरात्रिका है । आपके पास पहले से ही यज्ञोपवीत है, जब आप दूसरी दीक्षा लेंगे, तो आपको पंचरात्रिक मंत्र प्राप्त होंगे। हरे कृष्ण!

प्रश्न: आनंद और जननी: कृपया मुझे स्वर्ण धारण करने का क्या विशेष लाभ है ,के विषय को समझने में सहायता प्रदान करें। हमारे परिवार में अनेक लोग स्वर्ण पहनते हैं। परन्तु हमने सीखा है कि स्वर्ण कलि -पुरुष का स्थान है। गृहस्थ के रूप में इसे कैसे समझें और कार्यान्वित करें? कृपया प्रबुद्ध करें।

जयपताका स्वामी: स्वर्ण एक शुद्ध धातु है। और हम इसका उपयोग अपने श्रीविग्रह की सज्जा के लिए करते हैं परन्तु कलियुग में संभवतः लोग स्वर्ण की चोरी कर लेते हैं। अतः हमें अर्चाविग्रह की पूजा में शुद्ध स्वर्ण का प्रयोग सुरक्षित रूप से करना चाहिए। कभी-कभी महिलाएं किसी विशेष समारोह में स्वर्ण के आभूषण पहनती हैं। यह गृहस्थों के लिए अनुमत है। महिलाओं को अपने पति के दूर होने पर स्वर्ण के आभूषण नहीं पहनने चाहिए परन्तु वह अपने पति की उपस्थिति में पहन सकती है, यह अत्यंत आकर्षक है। तो अब हमारे पास कागज का पैसा है। पहले कागज का पैसा एक निश्चित मात्रा में स्वर्ण के समानुपात में होता था। अतः हम इसे पाउंड स्टर्लिंग कहते हैं क्योंकि यह इस पर आधारित है कि आपको कितनी चांदी प्राप्त हो सकती है। परंतु अब पाउंड, यूरो, रुपये हैं और कागज किसी विशिष्ट मात्रा में स्वर्ण के समान नहीं है। एक प्रकार की मिथ्या अर्थव्यवस्था है जो कलियुग का भाग है। परंतु ऐसा नहीं है कि महिलाएं स्वर्ण के आभूषण नहीं पहन सकतीं। विषय मात्र यह है कि यह थोड़ा असुरक्षित है अतः सामान्यतः वे विशेष सामाजिक अवसरों के उपलक्ष्य में वे धारण करती हैं ।

प्रश्न: जब हम जप कर रहे होते हैं तो ग्यारहवें अपराध से कैसे बचा जा सकता है?

जयपताका स्वामी: वैसे भी, यह एक प्रकार का विवाद है कि क्या तथाकथित, 11वां अपराध हमें 10वे में इसका संशोधन करना चाहिए। वैसे भी इससे बचने का उपाय है, अपने नामजप पर ध्यान देना । भगवान् के विग्रह को देखते हुए श्रवण और जप पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ।

प्रश्न: अच्युत अर्जुन दास: चूंकि आपकी छोटी बेटी तनुश्री मजूमदार माता बनने जा रही है, अतः चिकित्सक ने उसे प्रसव की तिथि 11 नवंबर बताई। कृपया मेरी पत्नी को आशीर्वाद प्रदान करें ।

जयपताका स्वामी: उसे सुरक्षित प्रसव हो, उसकी संतान कृष्णभावनाभावित, सुखी, दीर्घायु सुपुत्र हो और वह भी स्वस्थ रहे। कृष्णनेर मतिर अस्तु !

प्रश्न: संगीतामयी गोपी देवी दासी : मैं अपनी गुरु बहन को आध्यात्मिक जीवन में और अधिक गंभीर होने के लिए कैसे प्रोत्साहित कर सकती हूँ । यदि वह कृष्ण भावनामृत को गंभीरता से लेने में सक्षम नहीं है और भक्तिमय गतिविधियों में स्वाद विस्मृत कर रही है, तो मैं उसकी सहायता किस प्रकार कर सकती हूँ?

जयपताका स्वामी: मुझे ज्ञात नहीं है कि वह कृष्ण भावनामृत में स्वाद क्यों विस्मृत कर रही है और हमें देखना चाहिए कि इसका कारण क्या है और उस समस्या का उत्तर देने का प्रयास करना चाहिए। यदि वह अधिक बार पंचतत्व मंत्र का जप करती है, तो इससे उसे हरे कृष्ण का जाप करने में तथा अधिक स्वाद प्राप्त करने में सहायता प्राप्त हो सकती है। यदि वह मुझसे सहजता से बात नहीं कर सकती है, तो वह जयपताका स्वामी ऐप डाउनलोड कर सकती है, और नियमित संदेश पोस्टिंग पढ़ सकती है।

अपने मित्रों, भाइयो, गुरु बहनों से भी जयपताका स्वामी ऐप डाउनलोड करने को कहें।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by प्रतिलेखन का हिंदी अनुवाद : शशि मुखी केशवी देवी दासी
Verifyed by सत्यापित : प्रितीवर्धिनी तुलसी देवी दासी
Reviewed by समीक्षित : भवानन्दिनी देवी दासी

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