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20201103 प्रश्न और उत्तर सत्र

3 Nov 2020|Duration: 00:17:59|हिन्दी|श्रीमद-भागवतम|Transcription|Śrī Māyāpur, India

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिं
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री-गुरुम् दीन- तारणम्
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम्॥
हरि ॐ तत् सत्॥

रूपश्री वसुधा देवी दासी : दामोदर महीने में कौन-सी पुस्तक पढ़नी चाहिए?

जयपताका स्वामी : कृष्ण पुस्तक में, दामोदर-लीला पर अध्याय है, जिसे पढ़ा जा सकता है।

मधुस्मिता इंदुलेखा देवी दासी : हम आध्यात्मिक गुरु के साथ

अपने हृदय के संबंध को कैसे सुधार सकते हैं? हमेशा आपके मधुर शब्दों के लिए धन्यवाद।

जयपताका स्वामी : रोचक सवालमैं हमेशा सोचता हूँ कि मुझे श्रील प्रभुपाद से कितनी कृपा मिली, और यदि मुझे उनकी कृपा ना मिलतीं, तो मैं आज कहाँ होता? तो मधुस्मिता इंदुलेखा देवी दासी, मुझे नहीं पता कि आपको अपने आध्यात्मिक गुरु से कोई कृपा मिली है या नहींकिंतु क्या आपको लगता है कि आपकी आज की स्थिति पहले से श्रेष्ठतर है? यदि आप कृष्ण भावनाभावित नहीं होती और अपने आध्यात्मिक गुरु से नहीं मिलतीं, तब आपकी क्या स्थिति होती ? मुझे दो रात पहले एक डरावना स्वप्न आया था। अचानक, मुझे लगा कि मैं शरीर हूँ। यह अत्यंत भयानक था! अत्यधिक भयानक! भक्तों की संगति से वंचित होना। कृष्ण की संगति से वंचित होना ! मैं ऐसी स्थिति में कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं आना चाहता! यह मेरे अब तक के सबसे डरावना सपनों में से एक है।

अवतारी गौरांग दास : गृहस्थों के लिए अर्चा-विग्रह की प्रक्रिया क्या है? क्या कोई ऐसी पुस्तक है जिसे हम घर पर अर्चा-विग्रह की पूजा के लिए संदर्भित कर सकते हैं?

जयपताका स्वामी : पंचरात्रिका दीपिका, द्वितीय (ब्राह्मण) दीक्षित भक्तों और अन्य भक्त , जो केवल अर्चा-विग्रह की प्रारंभिक पूजा का अभ्यास कर रहे हैं, वे आरती और भोग अर्पित करना जैसी आधारभूत सेवाएँ कर सकते हैंहम अपने आध्यात्मिक गुरु और श्रील प्रभुपाद, भगवान चैतन्य और भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हैं और अतः हम भगवान के सामने अपना भोग अर्पित करते हैं।

तुलसी लीलामयी देवी दासी : प्रातः मंगला आरती के बाद नामजप करने पर मुझे अधिक आनंद मिलता हैयद्यपि उस समय कोई अन्य सेवा आती है, तो किसे अधिक महत्व दिया जाना चाहिए - जप या सेवा? उस सेवा को दोबारा करते समय क्या होगा यदि हम सोचते हैं कि आज जप श्रेष्ठतर नहीं होगा। तो बाद में उस सेवा को करने में कोई रुचि नहीं रहती है। तब मुझे क्या करना चाहिए?

जयपताका स्वामी : यह एक सापेक्ष प्रश्न हैमुझे नहीं पता कि सेवा क्या है? यदि कोई आपातकालीन सेवा है, कुछ करना अति आवश्यक है, तो आपको वही सेवा करनी चाहिए। इस प्रकार हम गृहस्थ होने के संबंध से, हर सुबह

जप करना संभव नहीं हो सकता है। यदि आपका बच्चा रो रहा है, तो मैं अभी अपना जप करूँगी! अतः मुझे नहीं पता कि सेवा क्या है। इस प्रकार हमें हर समय जप करना सीखना चाहिए। निश्चय ही, प्रातःकाल में जप करना आदर्श होता है क्योंकि यह ब्रह्म-मुहूर्त का समय होता है। कभी-कभी हम ब्रह्म-मुहूर्त के पर्यंत अपना नामजप नहीं कर सकते - परंतु ऐसा सदैव नहीं होता हैमुझे नहीं लगता कि प्रातः काल अधिक सेवा होगी। किंतु कभी-कभी हो भी सकती है। तो उस स्थिति में आपको स्वयं को कार्यकलाप करने की शैली विकसित करनी चाहिए।- वास्तव में 16 माला के जप में अधिकतम 2 घंटे लगते हैं। अतः दिन में किसी तरह अपनी जपमाला कर ले, आपके पास 24 घंटे हैं।

सचीपुत्र अवतार दास [बंगाली] : क्या हमारी परंपरा, भागवत-गुरु-परंपरा या दीक्षा-गुरु-परंपरा है?

जयपताका स्वामी : हमारी गुरु-परंपरा भागवत-परंपरा हैइसका अर्थ है कि जो भी संबंध प्रगाढ़ होता है वे इसे करते हैं। जो संबंध प्रबल होता है वो दिया जाता है। अधिकतर परिस्थितियों में यह दीक्षा है किंतु कुछ परिस्थितियों में यह शिक्षा हो सकती है। वास्तव में, सभी प्रकरण सामान्य स्तर

पर दीक्षा हैं किंतु हमारा संप्रदाय श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद द्वारा दिया गया है। और उन्होंने देखा कि श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के दीक्षा-गुरु, ब्राह्मणों को वरीयता दे रहे थे। ऐसे ब्राह्मण को जिनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआअतः श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने सोचा कि गुरु एक जाति-गोसायी थे। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर को सिद्ध जगन्नाथ दास बाबाजी द्वारा शिक्षित किया गया था और उन्होंने इस संबंध को अधिक महत्व दिया था। इस तरह यह एक भागवत-परंपरा हैश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने गौर किशोर दास बाबाजी से दीक्षा ली। इस तरह, हम दीक्षा-परंपरा भी हैंपरन्तु हम भागवत-परंपरा को महत्व देते हैंइस प्रकार चूंकि श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने गौर किशोर दास बाबाजी से दीक्षा ली, इस प्रकार अन्य वैष्णवों ने गौर किशोर दास बाबाजी को स्वीकार किया। तो उस तरह से हमारे पास दीक्षा-परंपरा भी हैपरंतु हमारी पुस्तकों में जो परंपरा है वह भागवत-परंपरा है।

कृष्ण करुणामृत दास : एक भक्त जो प्रतिदिन 16 माला जप कर रहा है, परन्तु उनका चरित्र नहीं बदल रहा है, दूसरों के दोष ढूंढ रहा है और घर में क्लेश कर रहा है। ऐसे भक्त की सहायता कैसे करें?

जयपताका स्वामी : क्या वे पंचतत्व मंत्र का जाप कर रहे हैं? सामान्य रूप से कोई व्यक्ति पंचतत्व मंत्र का जाप करता है और वह बदलने लगता है। किंतु पवित्र नाम का केवल जप करना, और पवित्र नाम के दस अपराध करते रहना, स्वाभाविक रूप से हम अधिक उन्नति नहीं करते हैं। अतः दस अपराधों को करने से बचें। सबसे अधिक दुष्टतम अपराध यह है कि सारे अपराधों की निंदा करना।

लीलामयी गौरांगी देवी दासी : हम कैसे कार्य कर सकते हैं जब मंदिर में अन्य भक्त हमारे प्रचार कार्यों को उनकी ऑनलाइन गतिविधियों जैसे फूड फॉर लाइफ, कृष्ण वेस्ट, आदि की स्पर्धा के रूप में देखते हैं।

जयपताका स्वामी : मुझे नहीं पता कि क्या आपको अन्य भक्तों के एकीकरण की आवश्यकता है, किंतु आप अपनी प्रचारक गतिविधियों में, फूड फार लाइफ या कृष्ण भावनामृत गतिविधियों के लिए कुछ घोषणा भी सम्मिलित कर सकते हैं, तो इससे उन्हें भाग लेने में अधिक प्रसन्नता होगी।

भक्त ब्रायन : हम तपस्या का भाव कैसे विकसित करें, मेरे लिए तपस्या करना अत्यंत कठिन है, परंतु यह आवश्यक है। मै अपने आध्यात्मिक जीवन मे उन्नति के लिए और अधिक तपस्या कैसे कर सकता हूँ ?

जयपताका स्वामी : अष्टांग-योग प्रक्रिया की गंभीर तपस्या के रूप में संस्तुति की गई है। जैसे, शीतकाल के मध्य में शीतल नदी में बैठकर ध्यान करनाग्रीष्म के अधिक गर्म दिनों में मध्याह्न में चारों ओर अग्नि जलाकर ध्यान करनाकिंतु हम ऐसी चीजों की अनुशंसा नहीं करते हैं। हमारी तपस्या ऐसी है जैसे दामोदर के माह में हम दामोदर को दीपक अर्पित करते हैं, हम उड़द-दाल ग्रहण नहीं करते, हम एकादशियों का पालन करते हैं। तो यह अत्यधिक कड़ी तपस्या नहीं। मैं एकादशी की प्रतीक्षा करता हूँ क्योंकि एकादशी मेरा प्रिय दिवस है। मैं अधिक सब्जियां और पान-दे-युका (कसावा पनीर ब्रेड) ले सकता हूँ, मुझे लगता है कि भक्त ब्रायन यह जानते हैं। तो हम केवल प्रसाद लेते हैंतुम कृष्ण को अपना भोग अर्पित करो और प्रसाद के रूप में तुम ग्रहण कर लोमहा तपस्या! एक परम तपस्या! आपको कृष्ण को अपना भोग अर्पित करना होगा ! बाद में तुम

प्रसाद के रूप में ग्रहण करो! ठीक है!

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Transcribed by हिंदी अनुवाद: रति रूपिणी जाह्नवा देवी दासी
Verifyed by सत्यापित : अजित मधुसूदन दास
Reviewed by समीक्षित : भवानन्दिनी देवी दासी

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