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20201028 टोल वसूलने वालों को मिली राहत (भाग 2)

28 Oct 2020|Duration: 00:29:19|हिन्दी|Śrī Kṛṣṇa Caitanya Book|Transcription|Śrī Māyāpur, India

श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक

28 अक्टूबर 2020 को श्रीधाम मायापुर, भारत में परम पावन जयपताका स्वामी महाराज द्वारा श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक संकलन

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्
यत्-कृपा तम अहम वन्दे श्रीगुरुं दीन-तारणं

परमानंदम माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्

Hariḥ oṁ tat sat!

प्रस्तावना : आज हम श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक संकलन को जारी रख रहे हैं, आज के अध्याय का शीर्षक है:

टोल वसूलने वालों को दया मिली (भाग 2)

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.173

नित्यानंद सबा प्रबोधेन - "चिंता नाइ अमा
-सबा' चादिया न येयेन गोसानि"

जयपताका स्वामी : भगवान नित्यानंद ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा, “चिंता मत करो। भगवान चैतन्य हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.174

दानी बाले, -"तोमारा ता' संन्यासीरा नाहा
एतेके अमारे से उचिता दाना देहा'"

जयपताका स्वामी : टोल कलेक्टर ने कहा, "आप संन्यासी नहीं हैं , इसलिए आपको उचित कर का भुगतान करना चाहिए।"

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.175

महाप्रभु क्रंदन-लीला-

काटा-दूरे प्रभु सबा प्रसाद चादिया
हेंत माथा कारी' मात्रा कंडेन वसिया

जयपताका स्वामी : कुछ दूरी पर भगवान चैतन्य अपने साथियों को पीछे छोड़कर, अपना सिर नीचे झुकाकर बैठ कर रोने लगे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.176

काष्ठ-पाषाणादि द्रवे शुनि से क्रंदन
अदभुत देखिया दानी भावे मने मन

जयपताका स्वामी : उस विलाप को सुनकर लकड़ी, पत्थर और अन्य वस्तुएँ भी पिघल जातीं। जब टोल कलेक्टर ने वह अद्भुत दृश्य देखा, तो वह सोचने लगा।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.177

दानिरा विस्मया ओ प्रभुरा परिचय-जिज्ञासा-

दानी बाले, - "ए पुरुष नर कभू नहे
मनुष्येरे नायने की एता धारा वाहे"

जयपताका स्वामी : कर संग्रहकर्ता ने कहा, “यह व्यक्ति निश्चित रूप से कोई साधारण मनुष्य नहीं है। क्या किसी मनुष्य की आँखें ऐसे आँसू बहा सकती हैं?”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.178

सबारे जिज्ञासा दानी प्रणति करिया
"के तोमारा, कारा लोक, काहा ता' भंगिया?"

जयपताका स्वामी : सभी से पूछताछ करने के बाद, टोल कलेक्टर ने आदरपूर्वक भक्तों से पूछा, “आप कौन हैं? आपका नेता कौन है? मुझे सच बताइए।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.179

भक्तगण-कार्तिक परिचय-प्रदान-

सबे बलिलेना, - "ऐ ठाकुर सबारा
`श्री-कृष्ण-चैतन्य' नाम शुनियाच यान्रा"

जयपताका स्वामी : उन सभी ने उत्तर दिया, “वे हम सबके स्वामी हैं। आपने उनका नाम, 'श्री कृष्ण चैतन्य' अवश्य सुना होगा ।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.180

सबेइ उन्हारा भृत्य अमर सकला''
कहिते सबारा अँखि वही पड़े जाला

जयपताका स्वामी : “हम सब उनके सेवक हैं।” यह उत्तर देते ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.181

dānīra nayane premāśru—

देखिया सबरा प्रेमा मुग्धा हैला दानीदानीरा
नयना दुइ वही पाडे पानी

जयपताका स्वामी : सभी के शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम को देखकर टोल कलेक्टर आश्चर्यचकित हो गया। उसकी दोनों आँखों से आँसू बहने लगे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.182

प्रभु निकट शरणागत दानी-

अथे-व्याथे दानी गिया प्रभुरा चरणे
दण्डवत् है' बाले विनय वचने

जयपताका स्वामी : टोल कलेक्टर जल्दी से भगवान चैतन्य के पास गया और उनके चरण कमलों में गिरकर प्रणाम किया और उसने निम्नलिखित विनम्र शब्द कहे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.183

“कोटि कोटि जन्मे यत अचिला मंगला
तोमा' देखी' अजी पूर्ण हैला सकला

जयपताका स्वामी : “लाखों-करोड़ों जन्मों में मैंने जितने भी पुण्य कर्म किए हैं, अब आपको देखकर मैंने उन सभी को पूरा कर लिया है।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.184

अपराध क्षमा करा करुणा-सागर!
कैला निलाकला गिया देखा सतवरा”

जयपताका स्वामी : “हे दया के सागर, कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें! शीघ्र ही नीलाचल जाइए और अपने प्रभु के दर्शन कीजिए।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.185

दानिरा प्रति प्रभु कृपा ओ स्थान-त्याग-

दानी-प्रति करि' प्रभु शुभ दृष्टि-पता
'हरि' बलि' कैलिलेना सर्व-जीव-नाथ

जयपताका स्वामी : भगवान चैतन्य ने हरि, हरिबोल! के पवित्र नामों का जाप करते हुए टोल कलेक्टर पर अपनी दया दृष्टि डाली और सभी आत्माओं के स्वामी, हरिबोल! नाम का जाप करते हुए प्रस्थान किया। भगवान चैतन्य ने टोल कलेक्टर पर अपनी कृपा बरसाई। किसी प्रकार टोल कलेक्टर को अहसास हुआ कि भगवान चैतन्य साधारण मनुष्य नहीं हैं और उसने भगवान को प्रणाम किया और इस प्रकार दया की याचना की। टोल कलेक्टर को भगवान चैतन्य की कृपा प्राप्त हुई और उनके साथी जगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े।

चैतन्य मंगल, मध्यखंड 15.112

हेनई समाये कठोदुरे अरा दानी
ढाकिते ढाकिते ऐसे उभा कारी' पानी

जयपताका स्वामी : उसी क्षण, कुछ दूरी पर एक और टोल-कलेक्टर था, जो भगवान चैतन्य को पुकारते हुए अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर आया।

चैतन्य मंगल, मध्यखंड 15.113

देखिया ठाकुर ताहे उभा कैला बाई
हाथसाने सेई दानी रहे सेई ठानी

जयपताका स्वामी : यह देखकर भगवान चैतन्य ने अपनी दोनों भुजाएँ उठा लीं। अपने हाथों को हवा में हिलाते हुए, टोल-कलेक्टर वहीं रुक गया (आगे चलने में असमर्थ)।

मुरारी गुप्ता कडाका 3.5.9

अनुवाद : भगवान ने हाथ हिलाकर उस आदमी से कहा, “यहाँ से दूर चले जाओ!” यह सुनकर टोल वसूलने वाला उन्हें छोड़कर चला गया, और प्रतापी गौरा आनंदपूर्वक अपने मार्ग पर चल दिए।

चैतन्य मंगल, मध्यखंड 15.114

झरझरा नयना-पुलक कलेवरा
हरे-कृष्ण-नाम सेई बोले निरंतर

जयपताका स्वामी : टोल कलेक्टर की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी और उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए थे। वे पवित्र महामंत्र हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप कर रहे थे , वे इसे लगातार दोहराते रहे।

चैतन्य मंगल, मध्यखंड 15.115

देखि' नित्यानंद-गदाधरेरा उल्लास
गौरांग-चरित्र कहे ए लोचनदास

जयपताका स्वामी : यह देखकर भगवान नित्यानंद और गदाधर पंडित आनंदित हो उठे। इस प्रकार लोचन दास ने भगवान गौरांग के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.186

सबारा करिबे गौरसुन्दर उद्धारा
विना पापी वैष्णव-निंदक-दुराचार

जयपताका स्वामी : भगवान गौरासुंदर वैष्णवों के पापी, दुराचारी अपराधियों को छोड़कर सभी का उद्धार करेंगे।

तात्पर्य (श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा): कुछ गैर-वैष्णवों का मानना ​​है कि वैष्णव भी उन्हीं की तरह पाप कर्मों में लिप्त हो सकते हैं। जब गौरासुंदर पापियों को स्वीकार करते हैं, तो वैष्णव पाप कर्मों में क्यों न लिप्त हों? और पापियों को वैष्णव गुरु बनने की अनुमति क्यों न दी जाए ? लेखक का तात्पर्य यह है कि गौरासुंदर सभी का उद्धार करेंगे, परन्तु वे वैष्णवों की निंदा करने वालों या पवित्र नामों का जप करने के बल पर पाप कर्म करने वालों का उद्धार कभी नहीं करेंगे । पाप कर्मों का समर्थन करने वाले नास्तिक चाहे कितनी भी अच्छी तरह से भक्तों का वेश धारण कर लें और स्वयं को “वैष्णव” या “ गुरु ” बताकर प्रचारित करें, वैष्णवों की निंदा करने वाले दुराचारी नास्तिकों के लिए आत्म-धोखे के अलावा कोई सिद्धि प्राप्त करना संभव नहीं है । शत्रु राक्षसों को भी श्री चैतन्यदेव की कृपा प्राप्त हुई है, फिर भी ईर्ष्यालु, पापी नास्तिक कभी भी श्री गौरसुंदर की कृपा पर निर्भर नहीं रहेंगे, वे स्वयं को गौर के अभिमानी, पाखंडी भक्त के रूप में उजागर करेंगे और नरक के मार्ग पर चल पड़ेंगे।

जयपताका स्वामी : भगवान चैतन्य सभी पर अपनी कृपा निःस्वार्थ भाव से बरसाते हैं। जो लोग वैष्णवों की निंदा करते हैं या उनका अपमान करते हैं , या सोचते हैं कि “मैं पाप कर सकता हूँ और हरे कृष्ण का जप करके पाप से मुक्त हो सकता हूँ”, इसका अर्थ है जप के बल पर पाप करना। ऐसे लोगों को भगवान चैतन्य की कृपा प्राप्त नहीं होगी। कोई व्यक्ति वास्तव में पतित हो सकता है और भगवान की कृपा प्राप्त करके सुधर सकता है, लेकिन जो भगवान को धोखा देना चाहता है और पाप करता है और सोचता है कि हरे कृष्ण का जप करने मात्र से उसके पाप क्षमा हो जाएँगे , वह पवित्र नाम का घोर अपमान है। ऐसे लोगों को कृपा प्राप्त नहीं हो सकती।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.187

असुर द्रविल चैतन्यर गुण-नाम अत्यंता
दुष्कृति पापी से-आई नहि माने

जयपताका स्वामी : भगवान चैतन्य के गुणों और नामों को सुनकर राक्षस भी रूपांतरित हो जाते हैं। केवल घोर पापी ही भगवान चैतन्य को स्वीकार नहीं करते। अतः नास्तिक या राक्षस जैसे लोगों को भी भगवान चैतन्य की कृपा प्राप्त हो सकती है और वे सबसे पतित लोगों का भी उद्धार करेंगे, परन्तु जो विशेष रूप से पापी हैं और भगवान को धोखा देना चाहते हैं, उन्हें उनकी कृपा प्राप्त नहीं होती।

इस प्रकार टोल कलेक्टरों को दया मिलने का अध्याय समाप्त होता है।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by Jayarāseśvarī devī dāsī
Verifyed by JPS Archives
Reviewed by JPS Archives

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