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20201207 इस्कॉन शेषाद्रिपुरम , बंगलौर के साथ ज़ूम सत्र

7 Dec 2020|Duration: 00:09:25|हिन्दी|Zoom Sessions|Transcription|Bangalore, India

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री गुरुं दीन-तारणम्॥
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ॥
हरि: ऊँ तत् सत् ॥

जयपताका स्वामी: मुझे शेषाद्रिपुरम इस्कॉन में विभिन्न कार्यक्रमों को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है। भगवान् चैतन्य ने शिक्षा दी है कि सभी को कृष्ण की सेवा में संलग्न रहना चाहिए। उन्होंने कहा, 'ग्रहे थाको वने थाको सदा हरि बोले डाको '। सभी को, चाहे वैरागी आश्रम में हो या गृहस्थ आश्रम में , हरे कृष्ण महा मंत्र का जप करना चाहिए। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता है कि भक्त, पति तथा पत्नी, कृष्णभावनामृत के प्रचार में एकदूसरे की सहायता कर रहे हैं। अधिकांश व्यक्तियों को गृहमेधी कहा जाता है क्योंकि वे केवल भौतिक जीवन के विषय में विचार करते हैं। उनके परिवार, उनके विस्तारित परिवार। परन्तु भगवान् चैतन्य ने गृहस्थों को शिक्षा दी कि उन्हें भी कृष्ण की सेवा करने का प्रयास करना चाहिए तथा कृष्ण की सेवा करने से, उनका जीवन सिद्ध हो जाएगा ।

परीक्षित महाराज, वे एक गृहस्थ थे, उन्होंने श्रीमद्-भागवतम् का श्रवण किया तथा उनका उद्धार हुआ। इसी प्रकार अर्जुन वे एक गृहस्थ थे, उन्होंनें भगवद्गीता का श्रवण किया तथा उनका उद्धार हुआ। प्रहृलाद महाराज, आप जानते हैं, वे बाद में गृहस्थ बन गये। जब वे एक छोटे बालक थे, तब उनके पिता उनका वध करना चाहते थे क्योंकि वे एक भक्त थे तथा उनके पिता पूर्णरूपेण नास्तिक थे। अतः इस प्रकार अनेकों गृहस्थों को देखते हैं, पति और पत्नी कृष्ण की सेवा करते हुए सफलता प्राप्त करते हैं।

वृन्दावन लीला में कृष्ण तथा उनके गोप सखा भूखे थे अतः वे यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों के समीप गये। ब्राह्मणों ने यह कहकर भोजन देने से मना कर दिया, कि वे अभी यज्ञ करने में व्यस्त हैं । तब कृष्ण ने ग्वालाबालों से कहा, "उनकी पत्नियों से पूछो"। जब उन्होंने उनकी स्त्रियों से पूछा, तो उन्होंने कहा, "ओह, कृष्ण भूखे हैं? हमें उन्हें भोजन खिलाना चाहिए! इस प्रकार से उनकी पत्नियों को कृष्ण द्वारा आशीर्वाद दिया गया था। तथा यज्ञ ब्राह्मणों को अपनी प्रमाद पर पश्चात्ताप हुआ। सभी स्त्रियाँ भक्ति में अधिक उन्नत थीं।

अतः सफलता का रहस्य कृष्ण की सेवा में संलग्न होना है। यदि कोई एक गृहस्थ के रूप में, कृष्ण की सेवा में संलग्न रहने के हेतु पति या पत्नी एक दूसरे के साथ सहयोग करते हैं, जिससे वे अपनी संतानों को कृष्णभावनाभावित बना सकें, यही मानव जीवन की सफलता है।

मैं अत्यंत आभारी हूँ कि आप सभी ने गत वर्षों में पुस्तकों को वितरित करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग किया तथा आशा करते हैं कि आप इस वर्ष भी अत्यंत सफल होंगे तथा यदि आप कृपया विचार कर सकते हैं कि आप अपने परिवारजनों , अपने मित्रों, सहकर्मियों , अपने पड़ोसियों को पुस्तकें कैसे वितरित कर सकते हैं। मान लीजिए कि संस्था में लगभग 500 सदस्य हैं, यदि प्रत्येक सदस्य द्वारा प्रत्येक सप्ताह एक पुस्तक वितरित की जाती है, तो वह 2000 पहुँच जाएगी। अतः यह संख्या अधिक बढ़ सकती है। अनेक भक्त, वे वास्तव में अधिक वितरण कर रहे हैं। अतएव हम चाहते हैं कि जन-सामान्य को भगवान् चैतन्य की कृपा प्राप्त हो।

अतः सभी को कृष्ण के नाम का जप करना चाहिए और उन्होंनें निर्देश दिया है कि हमें कृष्ण के अर्चाविग्रह की पूजा और सेवा करनी चाहिए तथा हमें कृष्ण की शिक्षाओं का अध्ययन करना चाहिए। यह अधिक कठिन नहीं है।

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by सर्व प्रिय केशवी देवी दासी द्वारा अनुवाद
Verifyed by अजित मधुसूदन दास द्वारा सत्यापित
Reviewed by भवानन्दिनी देवी दासी द्वारा समीक्षित

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