कीया रानी : कभी-कभी प्रश्न उठता है कि महाराज परीक्षित इतने महान भक्त होने के बावजूद उन्होंने ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प क्यों डाला? महाराज परीक्षित के इस कृत्य से हमें क्या समझना चाहिए ?
जयपताका स्वामी: हम समझते हैं कि भगवान् ने उन्हें किसी भ्रम में डाल दिया ताकि श्रीमद्-भागवतम् अभिव्यक्त हो सके। किन्तु ऋषि ने इसे गंभीर अपराध नहीं माना। निश्चित रूप से, यह सम्राट को मृत्यु का श्राप देने का अधिपत्र नहीं है। यदि वर्तमान समाज में कोई ऐसा करता है तो उस व्यक्ति को कैसे सजा दी जानी चाहिए? तुम्हें पता है, निश्चित रूप से मृत्यु दंड नहीं! कदाचित अनादर के लिए कुछ सजा ! किंतु सम्राट को उस समय लग रहा था कि उनको सम्मान नही दिया गया। और हम इसे कृष्ण की व्यवस्था के रूप में लेते हैं। जैसे जब अर्जुन ने लड़ने के लिए अपनी अनिच्छा व्यक्त की, तब हम मानते हैं कि उन्हें कृष्ण द्वारा किसी भ्रम में डाला गया था, ताकि कृष्ण भगवद् गीता अभिव्यक्त कर सकें। सामान्यतः , परीक्षित महाराज इस तरह की भूल कभी नहीं करेंगे।
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संगितामयी गोपी देवी दासी: गृहस्थ होने के नाते हम कैसे समझ सकते हैं कि हम वास्तव में गृहस्थ हैं या गृहमेदी। और श्रीमद्-भागवतम् में यह पहले से ही वर्णित है कि किसी को गृहस्थ जीवन का पालन कैसे करना चाहिए। क्या होगा यदि हम शास्त्रों के अनुसार कार्य नहीं करते हैं और अपनी वासनाओं को संतुष्ट करते रहते हैं?
जयपताका स्वामी: यही कारण है कि हम भगवान् चैतन्य की लीलाओं में पढ़ते हैं जब भगवान् चैतन्य वृंदावन में थे, एक गृहस्थ उनके पास पहुंचे और उन्होंने कहा, मैं बहुत पतित गृहस्थ हूँ। तो इस तरह उन्हें भगवान् चैतन्य की कृपा प्राप्त हुई। अब श्रील प्रभुपाद ने कहा कि गृहस्थ के रूप में हमें अपने लक्ष्य को ऊँचा रखने का प्रयास करना चाहिए। परंतु जैसा कि आपने कहा, हो सकता है कि हम इसे अभी सम्पन्न करने में सक्षम न हों। परंतु हम प्रयास करते हैं। यही कारण है कि शास्त्र हमें अलग-अलग व्रत देता है, विभिन्न प्रणालियाँ जिनका हम पालन कर सकते हैं। जैसे भीष्म पंचक वैकल्पिक है। तो ऐसी कई चीजें हैं जो वैकल्पिक हैं। यदि आपको लगता है कि आपको अधिक शुद्धिकरण की आवश्यकता है, तो आप इन वैकल्पिक व्रतों को कर सकते हैं। एक ब्रह्मचारी विचार कर सकता है, ये मेरे लिए नहीं हैं, मुझे कोई समस्या नहीं है। परंतु वे गृहस्थों को उपदेश भी दे सकते हैं। और यदि, वे ऐसा करते हैं, कोई नुकसान नहीं। मैंने श्रील प्रभुपाद से पूछा कि दामोदर महीने में हमें क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा, यह विशेष रूप से नए ग्राहकों के लिए है! जैसे किसी दुकान में बिक्री होती है। नए ग्राहकों को प्रोत्साहित करने के लिए, परंतु आप एक नियमित ग्राहक हैं। सभी महीने, सभी दिन, बिक्री हो या न हो, आप एक नियमित ग्राहक हैं। तो यह जवाब श्रील प्रभुपाद ने मुझे दिया।
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प्रश्न [बंगाली]: गृहस्थ आश्रम में कई दीक्षित प्रभु और माताजी और उनके परिवार हैं। किन्तु उनकी संताने , भले ही कृष्ण भावनामृत परिवारों से जुड़े हों, वे भक्तिमय जीवन शैली का पालन नहीं करते हैं। वे बाहर का खाना खाते हैं और भक्तिमय जीवन से अनभिज्ञ हैं। यदि उनकी संताने इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो क्या इससे माता-पिता की भक्तिमय जीवन शैली प्रभावित होगी? क्या आप कृपया इस पर विस्तार से बता सकते हैं।
जयपताका स्वामी : एक बार, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने कहा था कि यदि वे जानते हैं कि हर बार, उन्हें एक कृष्ण भावनाभावित सन्तान होने का आश्वासन दिया जाता है, तो वे 100 बार यौन जीवन में सम्मिलित होंगे। अतः, हर बार आपकी सन्तान भक्त ही होगी, इसकी गारंटी नहीं है। अतः हम शुरू से ही चेष्टा करते हैं कि हमें एक कृष्ण भावनाभावित सन्तान की प्राप्ति हो। तो हम देवताओं की आराधना करते हैं, हमें गुरु का आशीर्वाद मिलता है। हम गर्भधान -संस्कार करते हैं। फिर हमें भी प्रेम और स्नेह से सन्तान का लालन-पालन करना होगा। यह कोई संयोग नहीं है कि वे भक्त बन जाते हैं। उन्हें किसी शुद्ध भक्त की कोई विशेष संगति मिल सकती है। माता-पिता स्वाभाविक रूप से अनुभव करते हैं कि यदि सन्तान भक्त बन जाती है तो वे बहुत सफल होते हैं। ऐसा कोई शास्त्र नहीं है जो कहता है कि यदि कोई सन्तान भक्त नहीं है, तो वह किसी तरह माता-पिता को प्रभावित करता है। किन्तु शिशु के जीवन के पहले पांच साल, यदि वे कुछ कुकर्म कार्य करते हैं, तो माता-पिता को उत्तरदायित्व लेना पड़ता है। यह एक ऋषि द्वारा यमराज को दिया गया श्राप था इसलिए यह कार्य ब्रह्मांड में किया गया था। क्योंकि जब वह छोटा शिशु था तो उसने एक कीट को तिनके से आघात किया था।
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श्रीनिवास दास और रत्नावली देवी दासी : हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां कोई कृष्ण भावनामृत वातावरण नहीं है। हम किसी अन्य व्यक्ति के व्यवहार पर टिप्पणी कैसे कर सकते हैं, और हम अपनी पुत्री को आध्यात्मिक वातावरण का उपहार कैसे दे सकते हैं?
जयपताका स्वामी : यही कारण है कि हम मायापुर में इस कृष्ण भावनामृत वातावरण को बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। और जगत के विभिन्न हिस्सों में, वे भक्तों, छोटे बच्चों, कृष्ण भावनामृत वातावरण देने के लिए भिन्न - भिन्न प्रयास कर रहे हैं। भक्त समूह विकास मंत्रालय, उनके पास विशेष रूप से बच्चों के लिए एक कार्यक्रम है। यदि आप इस उपक्रम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो कृपया सीडीएम से संपर्क करें।
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राधिका प्रेमभक्ति देवी दासी : जब किसी का भौतिक जीवन बहुत अधिक समस्याग्रस्त है, तो हमें इसे कृष्ण की विशेष दया या कर्म के भुगतान के रूप में कैसे लेना चाहिए?
जयपताका स्वामी : हाँ! तो, हम इसे कृष्ण की दया के रूप में लेते हैं क्योंकि वे अपनी अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होने देते हैं। भक्तों के लिए, वे देखते हैं कि उनके कर्म कम कीमत पर तय होते हैं। वास्तव में, यह भौतिक संसार हमेशा समस्याग्रस्त है। यह भौतिक संसार दु:खालय है। यह पहले से ही भगवान् श्री कृष्ण द्वारा भगवद् गीता में कहा गया है। यदि आपको लगता है कि यह भौतिक जगत समस्याग्रस्त है, तो यह आपके लिए आध्यात्मिक जगत में वापस जाने के लिए एक प्रेरणा होनी चाहिए। आप भौतिक जगत में, जीवन के बाद जीवन में क्यों रहना चाहते हैं? आप यह क्यों नहीं देखते कि यह भौतिक संसार समस्याग्रस्त है? और तुम्हें कृष्ण भावनाभावित होने का प्रयास करना चाहिए ? आपका इतना अच्छा नाम है। राधिका प्रेमभक्ति! मुझे राधिका की वह प्रेम-भक्ति चाहिए! तो हम देखते हैं कि यह भौतिक जगत एक भयानक स्थल है, किन्तु हम एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करने का प्रयास करते हैं। अतः यह बहुत जरूरी है कि पति-पत्नी दोनों ही भक्त हों, और वे कृष्ण के बहुत प्रिय बनने का प्रयास करते हों।
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