मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे श्री गुरुं दीन-तारणम्॥
परमानन्द माधवम् श्री चैतन्य ईश्वरम् ।।
हरि: ऊँ तत् सत्
इस शुभ रात्रि (भारत की रात, अमेरिका की प्रातः) पर, हमारे वैष्णव कैलेंडर के अनुसार दीपावली के इस शुभ दिवस पर, हमें ज्ञात हैं कि अयोध्यावासी पुनः अयोध्या में भगवान् राम एवं सीता का स्वागत कर रहे थे, क्योंकि यह अन्धकार की रात्रि है, उन्होंने नगर को दीपों से जगमगा दिया, अतः इसे दीपावली के नाम से जाना जाता है। इस कारण हम चाहते हैं किभगवान् हमारे हृदय में भी प्रवेश करें तथा यह दीपावली उत्सव वास्तव में उसी के लिए है ।
हाल ही में, भगवान् चैतन्य पर हमारी कक्षाओं में, माधवेंद्र पुरी कैसे श्रवण कर रहे थे, वे गोपाल के आदेश का पालन कर रहे थे और उन्होंने गोवर्धन पर पूजा पद्धति की स्थापना की। वह चंदन-लकड़ी का गूदा तथा कपूर लेने के लिए पैदल चलकर जगन्नाथ पुरी गए, रास्ते में रेमुणा में गोपीनाथ भगवान् के अर्चाविग्रह ने माधवेंद्र पुरी के लिए खीर का एक कुल्हड़ चुरा लिया। उसके उपरांत वे जगन्नाथ पुरी के पास गए तथा उनको वहाँ 40 किलो चंदन, एक पहाड़ सा प्राप्त हुआ। तो 2.2 पाउंड एक किलो के समान है। इस प्रकार 40 किलो लगभग 88 पाउंड होगा और उन्हें 20 तोला कपूर भी प्राप्त हुआ अतः मार्ग में विभिन्न टोल कलेक्टरों ने उन्हें रोक लिया। परंतु उनके पास सरकारी अधिकारियों का एक विशेष पत्र था, इस कारण अधिकारियों ने उन्हें जाने दिया। किंतु बंगाल, उस बिहार के पश्चिम में, उत्तर प्रदेश , मुस्लिम शासन के अधीन था। ऐसे में उनके पत्र का वहाँ कोई मूल्य नहीं था किंतु गोपाल के अर्चाविग्रह ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और कहा कि गोपीनाथ के अर्चा विग्रह को चंदन की लकड़ी का गूदा अर्पित करे , अतः गोपीनाथ उनसे भिन्न नहीं हैं, यह उन्हें ठंडक प्रदान करेगा। मैं सोच रहा था कि कैसे माधवेंद्र पुरी, उनके पास यह असंभव कार्य था, कोई पैसा नहीं, कोई जनशक्ति नहीं थी और चंदन की लकड़ी लाकर उसे वापस वृंदावन ले जाने का यत्न कर रहे थे।
तो इसी प्रकार हम सोच रहे थे कि कैसे श्रील प्रभुपाद, वे व्यापारी- मालवाहक- जहाज से अमेरिका गए, बिना पैसे के, 7.5 डॉलर, यह लगभग दो टंंक भोजन के समान है। फिर भी आज हमारे पास श्रील प्रभुपाद के बलिदान के कारण समस्त विश्व में कृष्ण भावनाभावित आंदोलन है। यह माधवेंद्र पुरी की लीला से स्मरण होता है, मिशन के साथ श्रील प्रभुपाद पश्चिम में गए व सम्पूर्ण जगत में कृष्ण भावनामृत लाए, हम श्रील प्रभुपाद के कितने ऋणी हैं। दामोदर के इस पवित्र माह में दीपावली के पावन दिवस पर मैं आपसे मिलने से अत्यंत प्रसन्न हूँ। और मुझे आशा है कि आप सभी को भगवान् कृष्ण की कृपा प्राप्त होगी और आप अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। हम देखते हैं कि कैसे, यशोदा कृष्ण को अपने प्रेम से जीतने में सक्षम थी । कृष्ण अजेय हैं, वे अजिता हैं - अजेय । परंतु वह स्वयं को प्रेम से जीतने की अनुमति देते है। तो, यही रहस्य है, हमें कृष्ण के लिए प्रेम विकसित करना चाहिए । और तभी हम सभी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
हरिबोल!
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