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20201021 भगवान चैतन्य ने समर्पण के सिद्धांतों का उपदेश दिया और आतिसारा गाँव पहुँचे (भाग 1)

21 Oct 2020|Duration: 00:23:12|हिन्दी|Śrī Kṛṣṇa Caitanya Book|Transcription|Śrī Māyāpur, India

श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक

21 अक्टूबर 2020 को श्रीधाम मायापुर, भारत में परम पावन जयपताका स्वामी महाराज द्वारा श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक संकलन

प्रस्तावना : अतः, हम (भगवान) श्री कृष्ण चैतन्य पुस्तक के संकलन को जारी रख रहे हैं :

भगवान चैतन्य समर्पण के सिद्धांतों का उपदेश देते हुए आतिसारा गाँव पहुँचे।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.3

चैतन्य-भगवते प्रभु निलाकेले गमनेरा पारा अन्यान्य लीला मधुरभावे वर्निता:-

नीलाद्रि-गमन, जगन्नाथ-दर्शन
सर्वभौम भट्टाचार्य-प्रभु मिलन

अनुवाद : भगवान जगन्नाथ पुरी गए और भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दर्शन किए। उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य से भी मुलाकात की।

जयपताका स्वामी : यह लीला का संक्षिप्त विवरण है।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.4

ए सब लीला प्रभु दास वृन्दावन
विस्तारि करियाचेन उत्तम वर्णन

अनुवाद : इन सभी लीलाओं का वर्णन वृंदावनदास ठाकुर ने अपने ग्रंथ चैतन्य-भागवत में बहुत विस्तार से किया है।

जयपताका स्वामी : प्रत्येक लेखक दूसरे लेखक का सम्मान करना पसंद करता है और वे आमतौर पर एक ही बात को दो बार नहीं समझाते। यदि उन्हें कोई भिन्न विवरण दिखाई देता है, तो वे उसे समझा सकते हैं, या यदि किसी लीला का वर्णन किसी अन्य लेखक द्वारा स्पष्ट रूप से नहीं किया गया है, तो लेखक उसे प्रस्तुत करता है। चैतन्य-भागवत वृंदावनदास ठाकुर द्वारा पहले लिखा गया था। चैतन्य-चरितामृत उन पहलुओं को शामिल करता है जो चैतन्य-भागवत या चैतन्य-मंगल में शामिल नहीं हैं।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.05

सहजे विचित्र मधुर चैतन्य-विहार
वृन्दावन-दास-मुखे अमृते धारा

अनुवाद : स्वभाव से ही श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी कार्य अत्यंत अद्भुत और मधुर हैं, और जब वृंदावन दास ठाकुर द्वारा उनका वर्णन किया जाता है, तो वे अमृत की वर्षा के समान हो जाते हैं।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.06

पुनरुक्ति ओ दंभ वा श्रौतपंथ-विर ओधाभये ग्रंथकार निवृत्त:—

अतेव ताहा वर्णीले हय पुनरुक्ति
दंभ कारि' वर्णी यदि तैचे न शक्ति

अतः मैं अत्यंत विनम्रतापूर्वक निवेदन करता हूँ कि इन घटनाओं का वर्णन वृंदावनदास ठाकुर ने पहले ही बहुत अच्छे से कर दिया है, इसलिए उन्हीं बातों को दोहराना मेरे लिए अत्यंत गर्व की बात होगी, और यह उचित नहीं होगा। मुझमें ऐसी शक्तियाँ नहीं हैं।

जयपताका स्वामी : अतः मैं यह पुस्तक संकलित कर रहा हूँ क्योंकि वृंदावन दास ठाकुर कुछ लीलाओं का वर्णन करते हैं , लोचन दास अन्य लीलाओं का और कृष्ण दास कविराज अन्य लीलाओं का वर्णन करते हैं। भगवान चैतन्य के भक्तों ने मुझसे चैतन्य-लीला पर इन सभी विभिन्न पुस्तकों का संकलन प्रस्तुत करने का अनुरोध किया है । लगभग नौ या दस पुस्तकें हैं जिनमें से तीन सबसे प्रमुख हैं, इसलिए हम इन सभी पुस्तकों को एक साथ एक लीला श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.07

चैतन्य-भगवते याहा विस्तार, ताहा ए ग्रंथे संक्षेप, एवम् याहा तथाया संक्षिप्त, ताहा एस्थले विस्ताराभावे वर्निता-

चैतन्य-मंगले यहाँ करिला वर्ण
सूत्र-रूपे सेई लीला करिये सुचना

इसलिए मैं केवल उन घटनाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनका विस्तृत वर्णन वृंदावन दास ठाकुर ने अपने चैतन्य-मंगल (जिसे अब चैतन्य-भागवत के नाम से जाना जाता है ) में किया है ।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.08

तंर सूत्रे आचे, तेन्हा ना कैला वर्णन
यथा-कथनचित् कारी' से लीला कथन

अनुवाद : उन्होंने कुछ घटनाओं का विस्तृत वर्णन नहीं किया बल्कि उनका संक्षिप्त विवरण दिया, और मैं इस पुस्तक में उन्हीं का वर्णन करने का प्रयास करूंगा।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.09

ग्रंथकारेरा अतुलनीय मनद- धर्म - वृन्दावनदासेर वन्दना :–

अतेव तंर पाइ कारी नमस्कार तंर पाइ
अपराधा न ह-उक अमारा

अनुवाद : मैं वृंदावन दास ठाकुर के चरण कमलों में सादर प्रणाम करता हूँ । मुझे आशा है कि इस कार्य से मैं उनके चरण कमलों को अपवित्र नहीं करूँगा ।

जयपताका स्वामी : जैसा कि मैंने कहा, प्रत्येक लेखक दूसरे लेखक का बहुत सम्मान करता है। परिणामस्वरूप, वे अपेक्षा करते हैं कि सभी लोग सभी पुस्तकें पढ़ें। चूंकि यह संभव नहीं हो सकता, इसलिए मैं सीमित व्याख्याओं के साथ संयुक्त लीलाओं का यह संस्करण प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। फिर भी , पूर्ण प्रभाव, अनुभव और संपूर्ण निर्देश प्राप्त करने के लिए मूल पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं । मैं सभी आध्यात्मिक निर्देश नहीं दे पा रहा हूँ; मुख्यतः लीलाएँ और कुछ शिक्षाएँ।

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.10

नित्यानंदादि कारिजन-सन्गे प्रभुरा पुरीपथे यात्रा:-

ई-माता महाप्रभु कैलीला निलाकाले
चारि भक्त संगे कृष्ण- कीर्तन -कुतुहले

अनुवाद : श्री चैतन्य महाप्रभु अपने चार भक्तों के साथ जगन्नाथ पुरी की ओर प्रस्थान कर रहे थे और वे अत्यंत उत्साह से भगवान के पवित्र नाम, हरे कृष्ण मंत्र का जप कर रहे थे।

जयपताका स्वामी : हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे । यह हरे कृष्ण महा-मंत्र, भगवान चैतन्य को प्रसन्न करने और उनके नक्शेकदम पर चलने के लिए इसका जाप करना चाहिए

चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.11

भिक्षा लागी एक-दिन एक ग्राम गिया
अपाने बहुता अन्ना अनिल मागिया

अनुवाद : श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन स्वयं एक गाँव में जाकर प्रसाद तैयार करने के लिए बड़ी मात्रा में चावल और अन्य अनाज एकत्र करते थे ।

जयपताका स्वामी : अतः, गृहस्थ का धर्म दान देना है और ब्रह्मचारी , वानप्रस्थ और संन्यासी भीख मांगने के हकदार हैं। गृहस्थ ही उनका भरण-पोषण करते हैं ।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खण्ड 2.31

दैवे गौरगण ओ कृष्णगणेर अभिन्नता-

दैव से-आई प्रभु, भक्त-गणो से-आई सबा
उपमाओ से-आई से, से-आई से अनुभव

जयपताका स्वामी : ईश्वर की इच्छा से, वे वही परम पुरुषोत्तम भगवान थे, वे वही एकत्रित भक्त थे, स्थिति वही थी, और उनकी अनुभूतियाँ और भावनाएँ भी वही थीं।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खण्ड 2.32

जीवन-मरण कृष्ण-इच्छा
से हय विष वा अमृत भक्षिले ओ किछु नय

जयपताका स्वामी : जीवन और मृत्यु भगवान कृष्ण की इच्छा पर निर्भर करती है। विष या अमृत पीने से अपने आप कुछ नहीं होता।

तात्पर्य (श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा): इस भौतिक संसार में विष पीने से मनुष्य की मृत्यु हो सकती है, और अमृत पीने से जीव को अनन्त जीवन प्राप्त हो सकता है। केवल कृष्ण की इच्छा से ही भौतिक और आध्यात्मिक वस्तुएँ फल प्रदान कर सकती हैं। परन्तु यदि कृष्ण की इच्छा से उन वस्तुओं की शक्ति और प्रवृत्तियाँ छीन ली जाएँ, तो वे ऐसे फल प्रदान करने में असमर्थ हो जाती हैं। उमा और शिव के बीच की बातचीत इस तथ्य की साक्षी और प्रमाण है।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.033

ये-मते यहां कृष्णचंद्र राखे मारे
ताहा बाई अरा केहा करो ना पारे

जयपताका स्वामी : भगवान कृष्णचंद्र जिस प्रकार एक व्यक्ति को बचाते हैं और दूसरे को मार डालते हैं, उसकी नकल कोई नहीं कर सकता ।

तात्पर्य (श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा): भगवान की सेवा की ओर उन्मुख होने के बावजूद, अनेक व्यक्ति वैष्णव अपराध करने के कारण भगवान के भक्तों को साधारण नश्वर प्राणी समझते हैं, क्योंकि वे उन्हें भगवान से अलग देखते हैं। हरि, गुरु और वैष्णव को नश्वर मानकर वे इंद्रिय सुख के उन्माद में डूबे रहते हैं और सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, वे जानबूझकर या अनजाने में हरि और गुरु से ईर्ष्या करने लगते हैं । उनमें से कुछ कर्मकांड में लीन हो जाते हैं, और भौतिक सुख की लालसा में कुछ इंद्रिय सुख और मोक्ष को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं। गुरु और वैष्णव कृष्ण की शक्तियों से परिपूर्ण हैं। ऊर्जा और ऊर्जा में कोई अंतर नहीं है। फिर भी ऊर्जा को कभी भी ऊर्जा के रूप में नहीं पहचाना जा सकता। यही निराकारवादियों और भगवान के भक्तों के दर्शन में अंतर है। नारद-पंचरात्र (1.14.4) में श्री महादेव कहते हैं: “परमेश्वर द्वारा संरक्षित व्यक्ति सर्वत्र विजयी होता है, और परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत व्यक्ति को कोई भी संरक्षित नहीं कर सकता।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.034

नित्यानंद-गदाधरादि-सह नीलाकलाभिमुखे यात्रा-

हेना-मते श्रीगौरसुंदर निलाकेले
ऐसेन कलिया अपान-कुतुहले

जयपताका स्वामी : इस प्रकार श्री गौरासुंदर भगवान जगन्नाथ के नगर नीलाचल के लिए प्रस्थान कर गए। वे अपनी परमानंद की अवस्था में थे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.035

नित्यानंद, गदाधर, मुकुंद, गोविंदा
संहति जगदानंद, अरा ब्रह्मानंद

जयपताका स्वामी : भगवान के साथ उनके सहयोगी भगवान नित्यानंद, गदाधर पंडित, मुकुंद दत्त, गोविंद दास, जगदानंद पंडित और ब्रह्मानंद पुरी भी थे।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.036

पथे भक्तगणेर निष्किंचनता-परीक्षा-

पथे प्रभु परीक्षा करें सबा-प्रति
"कि सम्बल आछे बाला कहार संहति"

जयपताका स्वामी : रास्ते में भगवान चैतन्य ने सबकी परीक्षा लेते हुए पूछा, "तुम्हारे पास कौन-कौन सी संपत्ति है, मुझे बताओ ?"

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.037

के वे दीयाचे करे पथेरा संबाला
निष्कपते मोरा स्थाने कहा ता' सकला”

जयपताका स्वामी : “आप सभी मुझे स्पष्ट रूप से, बिना किसी छल के बताएं कि क्या रास्ते में किसी ने आपको कोई संपत्ति दी है ।”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.038

सबे बाले, - "प्रभु, विना अज्ञेय तोमार
कारा द्रव्य लइते वशक्ति आचे कारा"

जयपताका स्वामी : उन्होंने उत्तर दिया, “हे चैतन्य भगवान, आपकी अनुमति के बिना, आपकी अनुमति के बिना किसी को भी कुछ लाने की शक्ति किसके पास है?”

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.039

शुनियाठाकुरा बड़ा संतोष हेलाशेषे
सेई लक्ष्ये तत्व कहिते लागिला

जयपताका स्वामी : उनकी प्रतिक्रिया सुनकर भगवान चैतन्य अत्यंत संतुष्ट हुए। इसके बाद उन्होंने इस विषय से संबंधित कुछ सत्य प्रकट किए और उनकी व्याख्या की।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.040

भक्तगनेर निरापेक्षत प्रभु संतोष -

प्रभु बाले, - "कहारो ये किछु ना लैलैहते अमार बड़ा संतोष करिला
"

जयपताका स्वामी : भगवान चैतन्य ने कहा, "मैं इस बात से अत्यंत संतुष्ट हूं कि तुममें से किसी ने भी किसी से कुछ नहीं लिया।"

तात्पर्य (श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा): भगवान गौरसुंदर ने नित्यानंद, गदाधर, मुकुंद, गोविंद और ब्रह्मानंद से पूछा, “तुम्हारे पास क्या संपत्ति है?” उत्तर में उन्होंने कहा, “हमारे पास आपके सिवा कोई संपत्ति नहीं है।” उनकी बात सुनकर और उनके अटूट संकल्प को देखकर गौरसुंदर अत्यंत प्रसन्न हुए। यद्यपि पाखंडी भक्त जो भक्ति मार्ग से भटक जाते हैं , गुरु-वैष्णव और परमेश्वर के बीच भेद करते हैं , इसलिए वे एकत्व की अवधारणा को नहीं समझ सकते। अचिंत्य-भेदाभेद का दर्शन ही दिव्य सुखों के पोषण का एकमात्र कारण है ।

चैतन्य-भागवत अंत्य-खंड 2.41

शरणागति-शिक्षा-दान-

"राखे कृष्ण मारे के?
मारे कृष्ण राखे के?'—

भोक्तव्य अदृष्टे थाके ये-दिने लिखना
अरण्ये ओ असि मील अवश्य तखाना

जयपताका स्वामी : “जो कुछ भी तुम्हें भोजन के रूप में मिलना तय है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा, चाहे तुम जंगल में ही क्यों न हो।” बृहन्नारदीय पुराण (7.74) में उल्लेख है: “शरीरधारी प्राणियों को बिना माँगे ही कष्ट आता है, उसी प्रकार सुख भी ईश्वर की योजना से ही प्राप्त होता है।”

- END OF TRANSCRIPTION -
Transcribed by Jayarāseśvarī devī dāsī
Verifyed by JPS Archives
Reviewed by JPS Archives

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