निम्नलिखित 18 अक्टूबर, 2020 को श्री धाम मायापुर, भारत में परम पावन जयपताका स्वामी महाराज द्वारा गीता मेले की 25 वीं वर्षगांठ में ज़ूम भागीदारी है
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्
यत्-कृपा तम अहम वन्दे श्रीगुरुं दीन-तारणं
परमानंदम माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्
hariḥ oṁ tat sat
जयपताका स्वामी: मैं एक घंटे तक रुक सकता था, लेकिन मेक्सिको में एक कार्यक्रम था जिसके लिए मैंने बहुत पहले प्रतिबद्धता जताई थी और हम उसे भूल गए थे। इसलिए, मैं आपके साथ पंद्रह मिनट रुकूँगा। भगवान चैतन्य ने उपदेश दिया था: बोलो-कृष्ण, भज-कृष्ण, करो-कृष्ण-शिक्षा । दो हरे कृष्ण कीर्तन।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण
हरे हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम
राम हरे हरे
और साथ ही, कृष्ण की भक्ति सेवा और कृष्ण एवं उनकी शिक्षाओं का गुणगान करना । श्रील प्रभुपाद ने कहा है कि कृष्ण की शिक्षाएँ दो प्रकार की हैं: एक भगवद्गीता, जो भगवान कृष्ण के मुख कमल से निकली है। दूसरी श्रीमद्भागवतम्, जो भगवान कृष्ण के बारे में है। अतः ये दो प्रकार की शिक्षाएँ हैं - भगवान कृष्ण के मुख कमल से निकले वचन और दूसरी जो भगवान कृष्ण एवं उनकी लीलाओं के बारे में है। अब मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि आप गीता पाठ्यक्रम और भागवत पाठ्यक्रम के माध्यम से भक्तों को शिक्षित कर रहे हैं। यह भगवान चैतन्य का विशेष उपदेश है। और हम जानते हैं कि हमारे आचार्यों ने कहा है – गृहे थाको वने थाको सदा हरि बोले डाको । अब हम कामना करते हैं कि सभी को शुद्ध कृष्ण प्रेम प्राप्त हो, जिसके कारण इस जीवन के अंत में वे भगवान के धाम लौट जाएं। और इस प्रकार उनका मानव जीवन सफल हो। यह भौतिक संसार एक कारागार है। कृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं कि यह भौतिक संसार दुःखालय और अशाश्वत है, क्षणभंगुर है। इसीलिए हमें बहुत कष्ट भोगने पड़ते हैं। लेकिन हम सोचते हैं कि यदि हम अपनी इंद्रियों को तृप्त करें तो हमारा जीवन परिपूर्ण हो जाएगा। लेकिन हम इस प्रकार परिपूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते। कुछ समय तक कष्ट रहता है और जब कुछ समय के लिए वह कम हो जाता है, तो हम उसे सुख समझते हैं। जैसा कि नारु गोपालदास ने समझाया है कि भगवान चैतन्य के भक्तों ने कृष्ण प्रेम प्राप्त किया। वे भगवान चैतन्य की सेवा करना चाहते थे। हम आशा करते हैं कि सभी को कृष्ण प्रेम प्राप्त हो । और जब किसी को कृष्ण प्रेम प्राप्त हो जाता है, तब वास्तव में उसका जीवन परिपूर्ण हो जाता है।
कृष्ण प्रेम को उसके आठ रूपों, अष्ट-सात्विक-भाव से समझा जा सकता है। नवद्वीप में भगवान कृष्ण के सभी भक्त चैतन्य के भक्त थे। जब चैतन्य ने संन्यास लिया, तो सभी बहुत दुखी हुए। उन्हें उनसे विरह का कष्ट हो रहा था। लेकिन चैतन्य ने भारत में सभी पर कृपा करने के लिए संन्यास लिया। अपने जीवन के पूर्व 24 वर्षों तक नवद्वीपवासियों को चैतन्य की विशेष कृपा प्राप्त हुई। उसके बाद उन्होंने संन्यास लिया और नीलाचल चले गए। फिर उन्होंने छह वर्षों तक पूरे भारत का भ्रमण किया। वे वृंदावन गए और यमुना के दर्शन किए। फिर वे प्रयाग, बनारस गए। बनारस में उन्होंने वहां के मायावादी संन्यासियों को कृष्ण के प्रति भक्ति की कृपा प्रदान की । फिर वे जगन्नाथ पुरी लौट आए ।
हमने सुना है कि बीच में वे एक नवद्वीप में आए और वहाँ के सभी नवद्वीपवासियों पर कृपा की। विशेष रूप से उन्होंने शची देवी पर कृपा की। यदि हमारे मन में भगवान चैतन्य, भगवान कृष्ण के प्रति थोड़ी सी भी भक्ति हो, तो वही हमारे जीवन की पूर्णता होगी। प्रभु अद्वैत आचार्य, आज जो लीला घटी, उसमें उन्होंने कहा, “आज आप चले गए, पर मुझे अपने हृदय में कोई अनुभूति नहीं हुई, क्यों? मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा हृदय लोहे का बना है।” भगवान चैतन्य ने कहा, “मैं तुम्हें यह रहस्य बता रहा हूँ। तुम्हारा प्रेम इतना प्रबल है कि यदि तुम अपने प्रेम को प्रकट करतीं, तो मैं इस स्थान को छोड़ नहीं पाता। इसीलिए मैंने तुम्हारे प्रेम को अपने वस्त्र में गाँठ बाँध रखी है।” इसके बाद भगवान चैतन्य ने गाँठ खोली और तुरंत ही अद्वैत गोसाणी कृष्ण-प्रेम के आनंद में डूब गए ! उनकी आँखों से पाँच-सात धाराओं में आँसू बहने लगे। यह रहस्य भगवान चैतन्य ने अद्वैत गोसाणी को बताया। खैर, हम आशा करते हैं कि आप सभी को कृष्ण प्रेम प्राप्त हो और इस कृष्ण प्रेम, कृष्ण भक्ति के सिवा जीवन में कुछ भी नहीं है । हरे कृष्ण!
इस सभा के सभी महाराजाओं और सभी भक्तों के प्रति, जो कृष्ण के प्रति यह भक्ति प्राप्त कर रहे हैं, मैं अत्यंत ऋणी हूं।
मुझे उम्मीद है कि आप सभी जयपताका स्वामी ऐप को एंड्रॉइड या एप्पल पर डाउनलोड करेंगे।
हरे कृष्ण!
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