यह प्रवचन परम पूज्य जयपताका स्वामी महाराज द्वारा 24 मार्च, 2024 को श्री धाम मायापुर, भारत में दिया गया था। यह प्रवचन श्रील प्रभुपाद से जुड़ने के बंगाली कार्यक्रम में दिया गया था।
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्
यत्-कृपा तम अहं वंदे श्रीगुरुं दीन-तारणं
परमानंदम माधवं श्री चैतन्य ईश्वरम्
Hariḥ oṁ tat sat!
जयपताका स्वामी : मैं कनाडा में मॉन्ट्रियल, टोरंटो और अन्य स्थानों पर अध्यक्ष था। फिर श्रील प्रभुपाद ने मुझे भारत भेजा। मैंने ब्रदर्स एयरलाइंस से भारत की यात्रा की। वे तीन भाई थे, एयरलाइंस का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया था। वह विमान द्वितीय विश्व युद्ध का प्रोपेलर विमान था। वह विमान अधिक दूर तक नहीं उड़ सकता। हमने ब्रुसेल्स से रोम, रोम से काहिरा, काहिरा से यमन, यमन से कराची और कराची से मुंबई तक उड़ान भरी। जब मैं मुंबई पहुँचा तो वहाँ सुरक्षा के ज्यादा प्रतिबंध नहीं थे। एक महिला भीख मांग रही थी और उसके साथ एक बच्चा था। उसने मुझसे पूछा, 'बख्शीश! बख्शीश!' मेरे पास एक फोन नंबर था, मैंने उस नंबर पर कॉल किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फिर एक व्यक्ति आया और बोला, अगर आप मुद्रा बदलना चाहते हैं तो मैं आपको अच्छी दर दे सकता हूँ। मैंने देखा कि स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और मैं वहाँ से जाना चाहता था। फिर मैं कलकत्ता गया। मैंने टैक्सी लेकर चैतन्य गौड़ीय मठ गया। मायापुर आने से कुछ महीने पहले मैं चैतन्य गौड़ीय मठ में था। तब श्रील प्रभुपाद जापान से वहाँ आना चाहते थे, लेकिन वे चाहते थे कि तब तक कोलकाता में हमारा अपना घर हो जाए। कलकत्ता में एक डॉक्टर थे, उन्होंने हमें कुछ महीनों के लिए अपना नया क्लिनिक रहने के लिए दे दिया और हम वहाँ रहे और श्रील प्रभुपाद आए।
जब श्रील प्रभुपाद कलकत्ता पहुँचे, तो मैंने गौड़ीय मठों को श्रील प्रभुपाद के स्वागत के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन कोई नहीं आया। श्रील प्रभुपाद के कोई भी गुरुभाई नहीं आए, केवल कुछ ब्रह्मचारी आए । उन्होंने कहा कि वे उन्हें गौड़ीय मठ ले जाएँगे। लेकिन श्रील प्रभुपाद ने कहा, “नहीं, मैं अपने स्थान पर जाऊँगा।” वे कुछ भक्तों को मठ से प्रसाद लेने के लिए भेजेंगे। गुरुभाईयों के बीच इस तरह की बातचीत मुझे समझ नहीं आई। श्रील प्रभुपाद ने कहा, “यदि वे मेरे पास आते तो अच्छा होता, लेकिन वे चाहते थे कि मैं उनके गौड़ीय मठ जाऊँ।” श्रील प्रभुपाद ने कहा, “मैं वहाँ जाऊँगा और पश्चिम में मैंने जो भी प्रचार किया होगा, उसका श्रेय वे लोग ले लेंगे।” यह बात मुझे समझ नहीं आई, लेकिन श्रील प्रभुपाद समझ गए थे। हम कलकत्ता में दो साल रहे। फिर श्रील प्रभुपाद ने मुझे मायापुर भेज दिया। उसके बाद मैं मायापुर में ही रहा।
हमने मायापुर में अमाना शेख नाम के एक व्यक्ति से कुछ जमीन खरीदी थी। उस समय जमीन की कीमत 1100 रुपये प्रति बीघा थी। बासेर बाड़ी नाम की एक जगह थी जहाँ कीमत 500 रुपये प्रति बीघा थी, हमने वहाँ से भी किसी से जमीन खरीदी। मैंने सुना है कि अमेरिका में श्रील प्रभुपाद ने संस्थापक-आचार्य की उपाधि धारण की थी और श्रील प्रभुपाद ने स्वयं को संस्थापक-आचार्य नाम दिया था क्योंकि उन्हें पता चला था कि उनके एक सचिव ने कुछ जमीन अपने नाम पर कर बेच दी थी। इस तरह, श्रील प्रभुपाद के कुछ गुरुभाई पश्चिम में श्रील प्रभुपाद के प्रचार कार्यों का श्रेय लेना चाहते थे। श्रील प्रभुपाद ने संस्थापक-आचार्य की उपाधि इसलिए धारण की ताकि उनका यह अधिकार बना रहे। श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि इस्कॉन के सभी भक्तों का उनसे एक विशेष संबंध हो। इसी कारण इस्कॉन के प्रत्येक मंदिर में श्रील प्रभुपाद की प्रतिमा स्थापित थी। और प्रतिदिन श्रील प्रभुपाद की गुरु-पूजा की जाती थी।
हर रात एक कुत्ता मायापुर में श्रील प्रभुपाद के व्यासासन पर आता था । और हमें हर रात मुरमुरे का प्रसाद मिलता था। हम रात के खाने में मुरमुरे और दूध का प्रसाद लेते थे और भक्त विश्राम करते थे। मैं जालीदार दरवाजे के पीछे छिपकर देखता था कि कुत्ता आता है या नहीं। मैंने कुत्ते को देखा। वह श्रील प्रभुपाद के व्यासासन के सामने आया और पूर्ण प्रणाम किया। हरिबोल!
अतुल कृष्ण दास : जब श्रील प्रभुपाद मायापुर आते थे, तब आप हमेशा उनके साथ रहते थे। क्या आप श्रील प्रभुपाद की कोई विशेष लीलाएँ या उपदेश साझा कर सकते हैं जो आपने उनसे उस समय सुने थे?
जयपताका स्वामी : कुछ दिनों श्रील प्रभुपाद मायापुर आते और मधुर बातें करते थे। फिर चार-पाँच दिन बाद वे धीरे-धीरे सारी कमियाँ देखते और बताते। वे पूछते कि यह बर्तन गंदा क्यों है? श्रील प्रभुपाद कहते कि मायापुर आध्यात्मिक मुख्यालय है, इसलिए सब कुछ उत्तम होना चाहिए। श्रील प्रभुपाद लोटस बिल्डिंग में रहते थे। सुबह वे टहलने जाते थे। अगर उन्हें कहीं गंदगी दिखती, तो वे हमें बता देते। लोटस बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर श्रील प्रभुपाद रहते थे और ब्रह्मचारी चौथी मंजिल पर रहते थे। ब्रह्मचारी थोड़े अस्वच्छ थे और जहाँ वे रहते थे वहाँ गंदगी रहती थी। ब्रह्मचारी वहाँ एक दीवार पर अपने कपड़े सुखाते थे । एक दिन श्रील प्रभुपाद ब्रह्मचारियों के घर गए। वहाँ कपड़े सुखाने की एक रस्सी थी और उन्होंने कहा कि ब्रह्मचारी हमारे भवन को खराब कर रहे हैं। क्योंकि वह रस्सी भवन को नुकसान पहुँचा रही थी। तब हमारा चक्र भवन तैयार हो गया। उन्होंने ब्रह्मचारियों को चक्र भवन भेज दिया । इस प्रकार, श्रील प्रभुपाद मायापुर को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने के लिए सलाह देते थे।
अतुल कृष्ण दास : भविष्य में श्रील प्रभुपाद के शिष्यों और अन्य भक्तों को उनका सान्निध्य कैसे प्राप्त होगा?
जयपताका स्वामी : हमें श्रील प्रभुपाद के साथ संगति करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस समय मुझे बंगाली थोड़ी-बहुत समझ आती थी। गौड़ीय मठ से एक महाराज आए थे, जो श्रील प्रभुपाद को अपने गुरु के प्रकटोत्सव में आमंत्रित करने आए थे। श्रील प्रभुपाद बंगाली में बोलते थे और मैं समझ सकता था। उन्होंने कहा, अगर मैं जाऊँगा तो केवल एक ही बात कहूँगा। मैं कहूँगा कि हम एकजुट होकर प्रचार क्यों नहीं करते? आप इसे बार-बार सुनना चाहते हैं। आप हमारे साथ मिलकर प्रचार क्यों नहीं करना चाहते? महाराज ने कहा कि हम छोटे तालाब की छोटी मछली हैं। आप बड़ी मछली हैं और हम आपके साथ नहीं रह सकते। श्रील प्रभुपाद बहुत निराश हुए। फिर वह महाराज चले गए। इस प्रकार श्रील प्रभुपाद की अनेक पुस्तकें, प्रवचन और पत्र उपलब्ध हैं। यदि आप सभी इन्हें पढ़ें तो श्रील प्रभुपाद के विचारों और भावों को समझ सकेंगे। श्रील प्रभुपाद ने श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के निर्देशों का पालन किया। उन्होंने कहा कि यदि कोई कमी थी तो वह केवल यही थी कि उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का शब्दशः पालन किया।
जब मैं आया था तब श्रील प्रभुपाद की बहुत कम पुस्तकें थीं। फिर धीरे-धीरे भगवद्गीता और श्रीमद्-भागवतम् प्रकाशित हुईं। अब यदि आप सभी इनका अध्ययन करेंगे तो यह सबके लिए अच्छा होगा। फिर मुझे श्रील प्रभुपाद का बहुत सामंतन प्राप्त हुआ और उन्होंने मुझे लगभग 40 उपदेश दिए। मुझे यकीन नहीं है कि मैं उन सभी का पालन कर पाऊंगा, मुझे नहीं पता। अब यदि कोई उपदेश शेष रह जाए तो आप उसे पूरा कर लें। श्रील प्रभुपाद अनुवाद करने में दो से तीन घंटे लगाते थे, उन्होंने इसके लिए बहुत परिश्रम किया था। इसलिए मैंने सोचा कि मुझे भी श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि उन्होंने इन पुस्तकों को लिखने में बहुत मेहनत की थी। अब मुझे भक्तिवेदांत की उपाधि प्राप्त हो गई है। मैंने श्रीमद्-भागवतम् का बहुत अध्ययन किया है। मुझे आशा है कि सभी शिष्य और अन्य भक्त श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का अध्ययन करेंगे। इस प्रकार वे श्रील प्रभुपाद की इच्छा पूरी कर सकेंगे। हरि शौरी प्रभु और अन्य भक्तों ने इतिहास लिखा है। श्रील प्रभुपाद के प्रवचन, उनके अनुवाद, अनेक प्रकाशित हो चुके हैं। इस प्रकार, ये सभी बहुत ही अमूल्य ग्रंथ हैं जो श्रील प्रभुपाद ने हमारे लिए छोड़े हैं। श्रील प्रभुपाद हमें प्रेरित करते थे। मैं श्रील प्रभुपाद को पत्थर, इस्पात, लोहा आदि की तस्वीरें भेजा करता था और श्रील प्रभुपाद जवाब में लिखते थे कि तुम मुझे इन चीजों की तस्वीरें दिखा रहे हो, मैं इमारत देखना चाहता हूँ! फिर कमल, चक्र, गदा, शंख की इमारतें आईं। इसलिए हमें श्रील प्रभुपाद का साथ मिलता था क्योंकि वे हर साल दो बार मायापुर आते थे।
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